चुनावी घोषणापत्र – भाजपा बनाम काँग्रेस

190409 Go Vote

चुनाव समीप आ गए हैं। इसी के साथ आ गए हैं चुनावी घोषणापत्र, जिनमें कई वादें और सपने हैं, बिना ये देखें-समझें कि पिछले चुनावों में क्या वादे किए गए थे और तब से अब तक उनमें से कितने पूरे हुए। इन सालों में राजनीतिक दलों ने इसे रोजनामचा जैसा बना लिया है गोया जिसे हर चुनाव से पहले पूरा करना पड़ता है। उनसे कोई नहीं पूछता कि वे ऐसा क्यों करते हैं और निर्वाचित अधिकारियों के एक बार सत्ता में आ जाने के बाद कोई उनके किए चुनावी वादों को भी नहीं देखता।

इसलिए हमें कौन-सा घोषणापत्र हमारी पसंद के अनुरूप है यह तय करने से पहले गौर से देखना होगा कि राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में जो वादे किए थे उनमें से उन्होंने कितने पूरे किए, साथ ही जिसने घोषणापत्र जारी किया उस दल के नेता की विश्वसनीयता को भी परखना होगा। इसका बाकायदा ट्रैक रिकॉर्ड रखना होगा।

आइए हम उन मुख्य मुद्दों की जाँच करें जिनका सामना हमारा राष्ट्र कर रहा है और देखें कि भाजपा और काँग्रेस उन पर किस तरह ध्यान दे रही है। हमें सारी बयानबाजी पर कैंची चलाकर प्रत्येक बिंदु को आर्थिक विवेक के लेंस से तौलना होगा।

  1. रोजगार: हमारे देश की आबादी में हर साल 28 मिलियन से अधिक लोग जुड़ते हैं, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सत्ता में जिसकी सरकार है उसे रोजगार पैदा करने हैं। लेकिन क्या यह केवल सरकारी नौकरियों से साध्य होगा? या सरकार को ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करना चाहिए जो उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने के लिए अनुकूल हो। काँग्रेस अधिक सरकारी नौकरियों का वादा कर रही है तो भाजपा अधिक उद्यमी अवसर प्रदान कर रही है। यदि हम प्रभावी नौकरशाही चाहते हैं तो सरकारी नौकरियों की संख्या हमेशा परिमित होगी।
  1. स्वास्थ्य: हमारी बढ़ती जनसंख्या की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के आगे कोई तर्क नहीं हो सकता है। यह तथ्य है कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की वस्तुस्थिति भयावह है और कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता या इसे चुनौती नहीं दे सकता है। भाजपा ने अपनी आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से जो किया है, वह विचारणीय है, जिसने हमारे देश के लगभग 40% लोगों को चिकित्सा बीमा प्रदान की है। काँग्रेस के घोषणापत्र में राइट टू हेल्थकेयर एक्ट (स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम का अधिकार) की बात की गई है, लेकिन यह सोचा जाना चाहिए कि पहले से क्या लागू किया गया है जबकि उसके सामने किसका वादा किया जा रहा है।
  1. शिक्षा: काँग्रेस के घोषणापत्र में शिक्षा के लिए वार्षिक बजट का 6% आरक्षित करने का वादा किया गया है, जबकि भाजपा के घोषणापत्र में शिक्षण संस्थानों में वृद्धि की बात की गई है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भाजपा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए हमारे शैक्षिक संस्थानों को विकसित करना चाहती है, यहाँ एक बार फिर भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश पर ध्यान केंद्रित करने की बात है।
  1. किसान: आजादी के बाद से अब तक किसानों की दुर्दशा को लेकर बहुत बातें हुई लेकिन उनके लिए काम बहुत कम हुआ है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी किसान खैरात में भोजन नहीं चाहता है। वह कड़ी मेहनत कर अपनी जमीन से आजीविका अर्जित करना चाहता है। काँग्रेस, अपनी सामान्य शैली में अधिक विज्ञप्ति पत्रक देने का वादा करती है जबकि भाजपा 2024 तक खेत की आय दुगुना करने और खेती के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराने की बात करती है। इसी के साथ भाजपा ने पहले ही नीम लगे उर्वरक और बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़- एमएसपी) योजना लागू कर दी है।
  1. सुरक्षा: राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में किसी स्पष्टीकरण या चर्चा की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है, हर भारतीय (शायद कुछ अपवादों को छोड़कर) अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा चाहता है। इसमें हमारी सीमाओं की सुरक्षा, हमारे घरों की सुरक्षा और हमारी व्यक्तिगत सुरक्षा शामिल है। काँग्रेस आतंकवाद की समस्या को हल किए बिना सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को शिथिल करना चाहती है। भाजपा का स्पष्ट रूप से विपरीत दृष्टिकोण है और हमने देखा है कि किस नेता ने बीते वर्षों में क्या कार्रवाई की है। भाजपा ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी शून्य सहनशीलता (जीरो टॉलरेंस) पर जोर दिया है। क्या हम आतंकवाद पर केवल “कड़ी निंदा” करने का जोखिम उठा सकते हैं जैसा कि हमने हमेशा हमला होने के बाद किया है या हमें पूर्ण निवारण के लिए मुँह-तोड़ जवाब देना चाहिए?
  1. राजकोषीय विवेक: काँग्रेस का घोषणापत्र स्पष्ट रूप से मजबूत अर्थव्यवस्था दिए जाने की संभावनाओं का लालच दे रहा है, जहाँ मुद्रास्फीति नियंत्रण में हो, चालू खाता घाटा अपने सबसे निचले स्तर पर है और जीडीपी में लगातार मजबूत वृद्धि देखी गई है। वे न्यूनतम आमदनी योजना (एनवाईएवाई) जैसी अपनी लोकलुभावन योजनाओं के साथ खजाने पर छापा मारने का एक शानदार अवसर देखते हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने हमेशा राजकोषीय विवेक का प्रदर्शन किया है और कठिन निर्णय लेने में संकोच नहीं किया है जब हमारे देश के लिए दीर्घकालिक राजकोषीय नीतियों को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
  1. समान नागरिक संहिता: दुनिया में शायद कोई देश ऐसा नहीं है जो अपने नागरिकों के धर्म के आधार पर लागू कानूनों की बहुलता रखता हो। सभी नागरिकों के लिए कानून समान होने चाहिए। हमारी आजादी के बाद के विकास के चलते समान नागरिक संहिता के कड़े फैसले को टालते रहना तब से चली आ रही सरकारों को अनुकूल लगा है। इससे धार्मिक समूहों के बीच बहुत सारी चुनौतियाँ आई हैं। यह समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन शुरू होने वाली एक स्वस्थ बहस शुरू करने का समय है और भाजपा ने इस मुद्दे को संबोधित किया है, जबकि काँग्रेस समझदारी से चुप है।
  1. आधारिक संरचना : स्वतंत्रता के बाद हमसे क्रमिक सरकारों ने हमेशा अच्छे बुनियादी ढाँचे का वादा किया है। “अच्छे” की परिभाषा को कभी स्पष्ट नहीं किया गया है। क्या गड्ढेदार सड़कों को अच्छा या स्वीकार्य माना जाता है? क्या शुष्क और बिजली कटौती को स्वीकार्य माना जा सकता है? आज के युवा भारतीय अच्छी सड़कें, 100% बिजली और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की सुविधा को स्वीकार मानते हैं। भाजपा के घोषणापत्र में वर्ष 2022 तक सभी के लिए बुनियादी ढाँचे और आवास में महत्वपूर्ण निवेश के बारे में बात की गई है।

राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का घोषणापत्र निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में नौकरियों के आरक्षण का वादा करता है, उसे किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है। कई और हास्यास्पद वादे होंगे जो अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा किए जाएँगे। ये अभी अभी पैदा हुए वादे हैं जिन्हें सभी जानते हैं कि इन्हें कभी लागू नहीं किया जा सकता है।

जैसे-जैसे विकसित दुनिया की आबादी सिकुड़ती जाएगी, अधिक से अधिक भारतीयों को इन विकसित राष्ट्रों में प्रवास करने का अवसर मिलेगा। क्या हमें एक ऐसे नेता की आवश्यकता नहीं है जो भारत को को ऊँचाई प्रदान करे और यह सुनिश्चित करे कि हमारा पासपोर्ट अधिक शक्तिशाली हो या हमें ऐसे नेताओं के समूह की आवश्यकता है जो अपनी आवक देख रहे हों और यह सुनिश्चित करने में लगे रहे कि विश्व भविष्य के भारतीयों का स्वागत नहीं कर पाए?

भाजपा का घोषणापत्र भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विकसित राष्ट्र बनाने की बात करता है। काँग्रेस हमारे देश को गरीबी और अशिक्षा में रखना पसंद करेगी क्योंकि इसी तरह वे चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। लेकिन भारत बदल गया है, और युवा भारतीय जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए।

पर मिलियन डॉलर का सवाल बना हुआ है। क्या चुनावी घोषणापत्र का मतदाता से कोई मतलब होता है या वह विभिन्न नेताओं के अहंकार को फुगाने में अधिक उचित होता है? क्या हम ऐसा घोषणापत्र चाहते हैं, जिसे लागू करने पर कुछ राजनेताओं के अल्पकालिक व्यक्तिगत लक्ष्यों को पूरा करने के लिए देश के खजाने पर छापा पड़ेगा?

हमें अपने स्थानीय राजनेता और हमारे राजनीतिक नेताओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन “लोकतंत्र के त्योहार” की प्रतीक्षा करने के बजाय 5 साल तक करना चाहिए। यह एक आकलन है जो सत्ता में जो पार्टी है और जो विपक्ष में पार्टी है उसका होना चाहिए। एक नेता को अपने वादों को पूरा करने के लिए सरकार में रहने की आवश्यकता नहीं होती है।

जिम्मेदार मतदाताओं के रूप में, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि एक सरकार को कम से कम 2 मौके देने की आवश्यकता होती है  ताकि जो उसने शुरू किया है वह लागू हो। अगर 10 साल के अंत तक भी वादे नहीं निभाए गए, तो मतदाता को बदलने का पूरा अधिकार है। यूपीए को 10 साल दिए गए थे। एनडीए भी इसका हकदार है।

अंत में, जैसी कि पुरानी कहावत है, एक आदमी को मछली दें तो उसके एक दिन के लिए पर्याप्त होगी। एक आदमी को मछली पकड़ना सिखाया तो वह अपने सारे जीवन (सभी शाकाहारियों से माफी के साथ) खा सकेगा। हम देख सकते हैं कि कौन सा घोषणापत्र हमें खाने के लिए मछली दे रहा है और कौन सा घोषणापत्र हमें मछली पकड़ना सिखाने का वादा कर रहा है!

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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Election Manifesto – BJP vs Congress

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The elections are here. So are the election manifestoes offering promises and dreams without looking back at what was promised and what was delivered since the previous election. Political parties, over the years have made this a routine that has to be gone through before each election. No one asks why they do this and no bothers to look at the election promises once the elected officials are in power.

Therefore, we must look at the track record of the political parties in implementing what they promise in their manifesto as well as the credibility of the leader of the party issuing the manifesto before deciding on which manifesto suits our liking.

Let us examine the key issues facing our nation and how the BJP and the Congress plan to address these. We need to cut out all the rhetoric and weigh each point with a lens of fiscal prudence.

  1. Jobs: With over 28 million people being added to our population each year, there is no denying the fact that the Government in power has to create jobs. But do these have to be only in Government jobs? Or does the Government have to provide an ecosystem that is conducive to creating jobs through entrepreneurship? The Congress is promising more Government jobs and the BJP is offering more entrepreneurial opportunities. Government jobs will always be finite if we want an effective bureaucracy.
  1. Health: The health needs of our growing population needs no argument. The fact that our health systems are appalling is a fact no one can deny or challenge. What is worth examining is what the BJP has done through its Ayushman Bharat scheme which has provided medical insurance cover for almost 40% of our country. The Congress manifesto talks of a Right to Healthcare Act, but it is worth thinking about what has already been implemented versus what has been promised.
  1. Education: The Congress manifesto promises to reserve 6% of the annual budget for education while the BJP manifesto talks about increasing educational institutions. What is important to note is that the BJP wants to develop our educational institutions to attain international eminence, once again focusing on the demographic dividend of India.
  1. Farmers: Since Independence, the plight of the farmers has been discussed with very little being done for them. It is important to understand that no farmer wants a dole to get a free meal. He wants to work hard and to earn a livelihood from his land. The Congress, its normal style promises more handouts while the BJP talks about doubling farm incomes by 2024 and providing more water for cultivation. In addition, the BJP has already implemented neem coated fertilizer and the increased MSP scheme.
  1. Security: The matter of national security needs no explanation or discussion. Clearly, every Indian (barring maybe a few exceptions) wants security for himself and his family. This includes security of our borders, security of our homes and our personal security. The Congress wants to dilute the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) without solving the problem of terrorism. The BJP clearly has a diametrically opposite view and we have seen which leader has taken what action over the years. The BJP has emphasised its zero tolerance against terrorism. Can we afford to simply “strongly condemn” terrorism as we have always done after being hit or should we hit back hard to create deterrence?
  1. Financial Prudence: The Congress manifesto is clearly salivating at the prospects of being given a strong economy where inflation is under control, current account deficit is at its lowest and the GDP has consistently shown strong growth. They see an excellent opportunity to raid the treasury with their populist schemes like NYAY. The BJP, on the other hand has always demonstrated fiscal prudence and not hesitated to take tough decisions when faced with challenges that can impact the long-term fiscal policies for our country.
  1. Uniform Civil Code: There are probably no countries in the World that have a multiplicity of laws applicable to their citizens on the basis of their religion. The laws must be the same for all citizens. Because of our evolution post-independence, it has suited successive Government to keep deferring the tough decision of a Uniform Civil Code. This has resulted in lots of challenges between the religious groups. It is time for a healthy debate to start on implementation of a Uniform Civil Code and the BJP has addressed this issue while the Congress is, understandably, silent.
  1. Infrastructure: Post independence, we have been promised good infrastructure by successive Governments. The definition of “good” has never been clarified. Are the pot-holed roads considered good or acceptable? Are the brown outs and load shedding considered acceptable? Today’s young Indians take good roads, 100% power and broadband connectivity for granted. The BJP manifesto talks about significant investment in infrastructure and housing for all by 2022.

The manifesto of the regional parties like the RJD which promises reservation of jobs in the private sector and the judiciary does not need any discussion. There will be many more ridiculous promises that will be made by other regional parties. These are still born promises that everyone knows can never be implemented.

As the population of the developed world shrinks, more and more Indians will find opportunity to migrate to these developed nations. Do we need a leader who makes India stand tall and ensures that our passport becomes more powerful or do we need a group of leaders who are inward looking and will ensure the World will not welcome the future generation of Indians?

The BJP manifesto talks about making India the third largest economy in the World and a developed nation. The Congress would prefer to keep our country in poverty and illiteracy since this is how they have managed to keep winning elections. But India has changed, and the young Indians know what they want.

The million-dollar question remains. Does an election manifesto mean anything to the voter or is it more an exercise to massage the egos of the various leaders? Do we want a manifesto that, if implement will raid the nation’s treasury to meet the short-term personal goals of a few politicians?

We need to assess the performance of our local politician and our political leaders on an ongoing basis rather than wait for the “festival of democracy” every 5 years. This is an assessment that must be done of the party in power and the party in opposition. A leader does not need to be in Government to fulfil his promises.

As responsible voters, it is important to accept that a Government needs at least 2 terms to implement what it has started. If at the end of 10 years the promises have not been kept, the voter has every right to make a change. The UPA was given 10 years. The NDA deserves the same.

In conclusion, as the old saying goes, give a man a fish and he will eat for the day. Teach a man to fish and he will eat all his life (with apologies to all the vegetarians). We can see which manifesto is offering us fish to eat and which manifesto is promising to teach us how to fish!

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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10 कारण जिनकी वजह से हमें गठबंधन सरकार को वोट नहीं देना चाहिए

190401 Mahagathbandhan

चुनावों में भाजपा की लोकप्रियता में वृद्धि के आवेग को देखते हुए, इसे समझना आसान है कि किस तरह विपक्षी नेताओं को चिंता हो रही होगी, जो अपने राजवंशों और उनकी प्रासंगिकता को बचाने की जद्दोजहद में हैं। वहीं यह भी काफ़ी आश्चर्यजनक है कि लेखकों ने ऐसे लेखों को लिखना शुरू कर दिया है, जिसमें गठबंधन को महिमामंडित किया जा रहा है और केंद्र में गठबंधन सरकार के आने की उम्मीदें की जा रही हैं।

गठबंधन को व्यक्तियों के ऐसे समूह के अधिनियम के रूप में परिभाषित किया जाता है जो समान मूल्यों पर चलते या सामान्य दृष्टि साझा करते हैं। राजनीतिक गठबंधन ने गठबंधन के अर्थ को किसी संयुक्त कार्य को पूरा करने के अस्थायी गठबंधन की तरह अनुकूलित कर लिया है, लेकिन तब भी अपने घटकों के बड़े हित हासिल करने के साझे लक्ष्यों के साथ।

आगामी चुनावों में निष्क्रिय महागठबंधन का अब एकल बिंदु एजेंडा केंद्र में भाजपा को हटाना है। बस इतना ही। इसके पूर्व के गठबंधनों के विपरीत, इस बार महागठबंधन के घटक एक सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम के साथ भी नहीं आ पाए हैं। गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर भी कोई सहमत नहीं हो सका है। वे राज्यों में आर-पार लड़ते हैं और केंद्र में सहयोग करते हैं।

दुनिया भर में गठबंधन सरकारें हमेशा कमजोर और कम निर्णायक रही हैं। लगभग सभी गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म समझौता और सहिष्णुता है, जहाँ समायोजन और पारिश्रमिक जरूरतों को स्वीकार करना राष्ट्रीय आवश्यकताओं पर प्राथमिकता है। सबसे अधिक गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म है, जहाँ राष्ट्रीय आवश्यकताओं से ऊपर समायोजन और संकुचित जरूरतों को स्वीकारना प्राथमिकता होती है।

आइए हम गठबंधन सरकार की खामियों को परखते हैं क्योंकि इसके साक्ष्य न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में स्पष्ट दिखते हैं और उसके बाद अपना आकलन कर मतदान के लिए कदम बढ़ाते हैं।

  1. यह संघीय संरचना के साथ समझौता है: गठबंधन सरकारें अपनी परिभाषा के अनुसार छोटी पार्टियों का समूह है जो साथ आता है क्योंकि कोई भी अकेली पार्टी सरकार नहीं बना सकती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती होती है कि नेतृत्व कौन करेगा। हमने मुख्यमंत्रियों को चक्रीय क्रम में देखा है ताकि उनके व्यक्तिगत एजेंडे पूरे किए जा सकें। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम व्यक्तिगत क्षेत्रीय पार्टी एजेंडा को अपने राष्ट्र का मार्ग निर्धारित करने की अनुमति न दें।
  1. मजबूत बनाम लंगड़ा घोड़ा प्रधान मंत्री: पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टेलीकॉम घोटाले के बारे में पूछे जाने पर प्रसिद्ध टिप्पणी की थी कि उन्होंने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था और इसलिए वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। नेता के पास तब समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है, जब उसका सामना ऐसी चुनौती से होता है जो किसी एक पार्टी के लिए हो, पर देश के लिए नहीं। जीएसटी, दिवालियापन संहिता, जन हित योजनाएँ जैसे आधार, जन धन योजना, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना और अन्य ऐसी योजनाएँ जो पिछले 2 दशकों से सरकार के एजेंडे में थीं, लेकिन गठबंधन सरकारों की वजह से उन्हें लागू नहीं किया जा सका था।
  1. भारत का संविधान: संविधान ने उन 100 क्षेत्रों को निर्धारित है जिन्हें केवल संसद द्वारा तय किया जा सकता है, राज्यों द्वारा नहीं; इनमें रक्षा, विदेश नीति, सामान्य मुद्रा, न्यायपालिका, संघीय कर, वायुमार्ग और कई अन्य शामिल हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में गठबंधन सरकारों के निहित हित होते हैं। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव लाने की आवश्यकता होती है और वे हमेशा इन क्षेत्रों को अपने हिसाब से मोड़ने के तरीके खोजते रहते हैं।
  1. राजकोषीय विवेक से समझौता होना: अपने गठबंधन सहयोगियों की अलग-अलग वित्तीय माँगों को पूरा करने के लिए ऐसी सरकारों का राजकोषीय विवेक के साथ समझौता करना देखा गया है। क्षेत्रीय और राज्य की आवश्यकताएँ अग्रता क्रम में आ जाती हैं। मुद्रास्फीति की उच्च दर और उच्च राजकोषीय घाटे को देखना आम है जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के गंभीर संरचनात्मक दोषों को जन्म देता है।
  1. वादे पूरा करने के इरादे से नहीं किए जाते: मतदाताओं के सामने स्पष्ट जवाबदेही होना चाहिए ताकि वे अपने नेताओं से उनके द्वारा किए चुनावी वादों को पूरा करने के लिए कह सकें। गठबंधन सहयोगियों के पास हमेशा अपने किए वादों को पूरा न करने का कोई न कोई विश्वसनीय बहाना अवश्य होता है। भ्रष्टाचार को विभिन्न राजनीतिक दलों की जरूरतों को पूरा करने के स्वीकार्य अभ्यास के रूप में भी देखा जाता है जो अपने उसमें से अपने हिस्से माँग करते हैं। किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
  1. स्वास्थ्य और शिक्षा: राज्य नियंत्रित विषय जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा भी एक मामला है। हर कोई सर्वसम्मति से स्वीकार करता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा पर सभी को ध्यान देने की आवश्यकता है। हम राज्यों में मौजूद भारी असमानताओं को देख सकते हैं। हमारे राजनेता ऐसा क्यों मानते हैं कि सभी लोग समान नहीं हैं, और कुछ राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा है और अन्य राज्यों में नहीं? यही बात उन अधिकांश अन्य क्षेत्रों पर लागू होती है जिन्हें राज्य स्तर पर शासन के लिए सौंपा गया है।
  1. व्यक्तिगत एजेंडा निर्णय लेने की प्रबल प्रेरणा: संसद की 5 साल की अवधि और उससे भी कम गठबंधन के आपसी तालमेल की छोटी अवधि को देखते हुए, राजनीतिक दलों को पता है कि उनके पास अपने संबंधित समूहों के वित्तीय लाभों को अधिकतम कर सकने के का लघु गवाक्ष है। यह हमने यूपीए सरकार के वर्ष 2004 से वर्ष 2014 तक के कार्यकाल में देखा है और मुझे ज़रा भी भरोसा नहीं है कि वर्ष 2019 में सत्ता में आने पर यह सोच बदल जाएगी।
  1. विदेश नीति: विश्व राजनीति सीमाहीन दुनिया से ऐसी दुनिया में बदल रही है जहाँ फिर से सीमाएँ खींची जाने लगी हैं। मजबूत नेताओं के मजबूत देश ही इस नई दुनिया में ऐसी जगह बना पाएँगे जहाँ मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और मजबूत रक्षा क्षमताओं का सम्मान होगा। हमने उरी और बालाकोट की आलोचना होते देखी है। अगर कश्मीर में धारा 370 को लेकर कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे पहले ही हम तोड़-फोड़ की घटनाओं के बारे में सुन चुके हैं। गठबंधन सरकार, अपनी परिभाषा से ही हमेशा कमजोर रहेगी और इसलिए राष्ट्रीय पटल पर देश के हितों के साथ समझौता करेगी।
  1. निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी: ज़ाहिरन जब ऐसे दर्जनों लोग होंगे जो मानते हो कि वे गठबंधन में दूसरों की तुलना में राष्ट्र का बेहतर नेतृत्व कर सकते हैं, तो हर विषय पर उनके विचार अलग-अलग होंगे। इसलिए सबसे सरलतम मामलों पर भी निर्णय लेने के लिए सभी के समर्थन की आवश्यकता होती है और इस प्रकार निर्णय लेने की गति धीमी हो जाती है।
  1. कोई भी दल पल्ला झाड़ सकता है: गठबंधन सरकारें कमजोर होती हैं और हमेशा बर्फ की महीन सिल्ली पर चलती हैं, जिसमें जाने कब दरारें दिखाई देने लगे। वे ऐसे व्यक्तियों के समूह द्वारा समर्थित होते हैं जिनकी कोई सर्वसामान्य विचारधारा नहीं होती है। पहला कदम गठबंधन के खिलाफ बयान देने लगता है, फिर रूठना-मनाना शुरू होता है और अंतिम चरण इस तरह समर्थन खींचना होता है जिससे सुनिश्चित हो जाए कि ताश के पत्तों का महल बिखर जाएगा। सरकारों के ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जब सरकार खुद या उसके मूल्यों के साथ समझौता किया गया है और आगे भी ऐसे कई मामले देखे जा सकेंगे।

क्या भारत गठबंधन के नेताओं की कमजोर, अस्थिर और स्वार्थी जोड़-तोड़ को स्वीकार कर सकता है जिनके अपने निजी और व्यक्तिगत एजेंडा हैं और पिछले 5 वर्षों में हमारे हिस्से आई सभी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दरकिनार हो जाना बर्दाश्त कर सकता है?

पुरातन बात याद रखें कि “बहुत सारे रसोइए शोरबा खराब कर देते हैं?” क्या हम प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए संगीतमय कुर्सी का खेल देखना चाहते हैं? क्या हम हर 6 महीने में एक नया प्रधान मंत्री देखने को तैयार हैं?

अधिकांश सरकारें 40% से कम वोटों से चुनी जाती हैं। हालाँकि, सरल गणित काम नहीं करता है। यदि पिछले चुनावों में युद्धरत दो दल अपने वोटों की साँठ-गाँठ करते हैं, तो वे अपने आप यह मान लेंगे कि वे अगले चुनावों में जीत हासिल कर कर लेंगे। वे यह भी मानते हैं कि उनका मतदाता इतना नासमझ है कि संयुक्त पार्टी के लिए मतदान कर देगा और अतीत में एक दूसरे के खिलाफ उनके बाहुबली नेताओं द्वारा कही गई सारी बातों को भूला चुका होगा।

हमें एक ऐसी पार्टी की आवश्यकता है जिसके पास संसद में आवश्यक 272 सीटें हों। इससे सुनिश्चित होगा कि नेताओं को निर्णय लेने के लिए समझौता नहीं करना पड़ेगा जो छोटे क्षेत्रों के लिए तो चल सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि राष्ट्र हित में हो।

हमें अपने दिमाग का उपयोग कर वोट करने की ज़रूरत है जिससे सुनिश्चित हों कि हम एक मजबूत नेता के साथ एक ही पार्टी को वोट दें, जो लाखों युवाओं को उनके सपने सच में बदलने में मदद कर सकता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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10 Reasons why we must NOT vote for a Coalition Government

190401 Mahagathbandhan

Given the surge in popularity of the BJP in the run up to the elections, it is understandable that there would be concern amongst opposition leaders who are battling to save their dynasties and their relevance. What is more surprising are articles that have started to glorify coalitions where authors have started to hope for a coalition Government at the centre.

A coalition is defined as an act of union between a group of individuals who share a common set of values or a common vision. Political coalitions have adapted the meaning of coalition to mean a temporary alliance for combined action but still with a common set of goals for the larger good of their constituents.

In the forthcoming elections, the now defunct mahagathbandhan has a single point agenda of removing the BJP at the centre. That is it. Unlike earlier coalitions, this time that constituents of the mahagathbandhan have not even been able to come together with a common minimum programme. No one can agree on who will lead the coalition. They blatantly fight in the states and collaborate at the centre.

Coalition Governments around the World are always weaker and less decisive. Compromise and tolerance are the general dharma of most coalition Governments where adjustment and acceptance of parochial needs takes priority over national needs.

Let us examine the flaws of a coalition Government as is evident not just in India but around the World and then make our own assessment as we step out to vote.

  1. Federal Structure is compromised: Coalition Governments by their very definition is a group of small parties that come together because no single party can form the Government. This leads to the major challenge of who will lead. We have seen chief ministers by rotation so that personal agendas can be met. We must ensure that we do not allow personal regional party agendas to determine the path of our nation.
  1. Strong vs Lame Duck Prime Minister: Former Prime Minister Manmohan Singh had famously remarked when asked about the telecom scams that he headed a coalition Government and was therefore unable to do anything. The leader has no option but to compromise when faced with a challenge that suits a single party but not the nation. Areas like GST, Bankruptcy Code, Social welfare schemes like Aadhar, Jan Dhan Yojana, Swachh Bharat, National Health scheme and others have been on the agenda of Government for the past 2 decades but could not be implemented because of coalition Governments.
  1. Constitution of India: The Constitution has stipulated that 100 areas can only be decided by Parliament and not by States; These include Defence, Foreign Policy, Common currency, judiciary, federal taxes, airlines and several others. Coalition Governments have vested interests on most of these matters. They need to make a change for their constituencies and they always figure out ways to bypass these areas.
  1. Fiscal prudence is compromised: In order to meet the vastly varying financial demands from its coalition partners, governments have been known to compromise of fiscal prudence. Regional and state requirements take precedence. It is common to see high rates of inflation and high fiscal deficits which lead to serious structural flaws in the national economy.
  1. Promises are made with no intention of meeting them: Voters need clear accountability so that they can ask their leaders to deliver on their poll promises. Coalition partners always have a credible excuse for not delivering on their promises. Corruption is also seen as an acceptable practice to meet the needs of various political parties who demand their pound of flesh. No one is accountable.
  1. Health and Education: State controlled subjects like Health and Education are a case in point. Everyone unanimously accepts that Health and Education need everyone’s focus. We can see the huge disparities that exist in states. Why do our politicians believe that all people are not equal, and some states have better health and education and others do not? The same applies to most other areas that have been handed over for governance at the State level.
  1. Personal agendas drive decision making: Given the 5-year duration of parliament and even shorter duration of coalition understandings, the political parties know that they have a short window to maximise financial gains for their respective groups. This is what we have seen in the UPA Government from 2004 to 2014 and nothing gives me confidence that the thinking will change if they come to power in 2019.
  1. Foreign policy: World politics is changing from a borderless world to a world that is beginning to draw borders again. Only strong countries with strong leaders will be able to carve out a place in this new World that will increasingly respect strong economies and strong defence capabilities. We have seen the criticism of Uri and Balakote. We can already hear rumblings of breaking away in Kashmir if any action is taken on article 370. A coalition government, by its very definition will always be weak and therefore will compromise the country’s interests in the national arena.
  1. Decision making slows down: Understandably, when there are dozens of individuals who believe that they can lead the nation better than others in the coalition, they have their own set of divergent views on every subject. Therefore, decision making on even the simplest of matters needs the support of everyone thus slowing down decision making.
  1. Any party can pull the plug: Coalition Governments are frail and always walking on thin ice, not knowing when cracks may appear. They are supported by a group of individuals who have no common ideology. The first step is to start making statements against the coalition, next is to sulk and the final step is to withdraw support thus ensuring that the house of cards will collapse. Several instances of Governments hanging in their or compromising their values have been seen and continue to be seen.

Can India afford to have a weak, unstable and selfish set of coalition leaders with their own personal and private agendas run this nation and fritter away all the significant gains we have seen in the past 5 years?

Remember the old line “Too many cooks spoil the broth?” Do we want to see musical chairs for the chair of the Prime Minister? Are we willing to see a new Prime Minister every 6 months?

Most Governments are elected with less than 40% votes. However, simple mathematics does not work. If two warring parties add up their votes in the previous elections, they will automatically assume that they will sweep the next polls. They also assume that their voter is gullible enough to vote for a combined party and forget all that has been said by their fearless leaders against one another in the past.

We need a single party that has the required 272 seats in Parliament. This will ensure that the leaders will not have to compromise on decision making that suits small regions and not necessarily the nation.

We need to vote with our heads and make sure that we vote for a single party with a strong leader that can help the millions of young people achieve their dreams.

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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अंतरिक्ष – अंतिम सरहद, लक्ष्य शक्ति

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सैकड़ों सालों से इंसान यह सोचकर विस्मित होता रहा है कि अंतरिक्ष में चल क्या रहा है।

खगोलविद कई नए खगोलीय पिंडों की खोज कर यह समझने की कोशिश करते रहे हैं कि ब्रह्मांड कैसे बना है। ज्योतिषियों का अंतरिक्ष को देखने का अलग दृष्टिकोण है, वे आकाश में स्थित खगोलीय पिंडों की उस भूमिका की खोज करते आ रहे हैं जिसके चलते उनके होने से पृथ्वी ग्रह पर हमारे दैनिक जीवन पर असर पड़ता है। चाँद पर हजारों कविताएँ लिखी गई हैं। चाँद की पूजा-अर्चना की जाती है। चँद्रमा आधारित कैलेंडर का पालन हममें से कई लोग करते हैं। अज्ञात उड़न खटोले (यूएफओ), अंतरिक्ष गेलेक्टिक मूवीज और कार्टून और वह सब, जो अंतरिक्ष के साथ जुड़ा है, हमें हमेशा रोमांचित करता है।

लेकिन तब भी जब वर्ष 1969 में नील आर्मस्ट्रांग चाँद पर उतरे थे, क्या अंतरिक्ष के प्रति आधुनिक मानव की रुचि वास्तव में शांत हो पाई थी। उनका कहा प्रसिद्ध वाक्य “मनुष्य का एक छोटा कदम, मानव जाति का एक विशाल कदम ” संभवत: अंतरिक्ष से संबंधित विश्व का सबसे अधिक याद किया जाने वाला उद्धरण होगा। मुझे याद है मैंने माँ से वर्ष 1969 की करवा चौथ पर पूछा था कि क्या चाँद इसके बाद भी पहले की तरह ही पवित्र रहेगा जबकि उस व्यक्ति ने 16 जुलाई 1969 को उस पर कदम रखा था!

जब प्रधान मंत्री मोदी ने 27 मार्च 2019 को मिशन शक्ति के सफल परीक्षण के बारे में भारत की घोषणा की और संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के साथ चार के चुनिंदा क्लब में भारत को शामिल करवाया तो यह वास्तव में भारत का एक विशाल कदम था, अंतरिक्ष में हमारे अधिकारों और हमारी सीमाओं की रक्षा करने का।

हर सही सोच वाले भारतीय को इस पर बहुत गर्व होना चाहिए। मैं ऐसे किसी भी भारतीय से मिलने पर दंग हो जाऊँगा जो देश की सर्वोत्तम संभव सुरक्षा नहीं चाहता है या यह नहीं चाहता है कि भारत को सुपर पावर के रूप में उसका सही स्थान मिले। केवल वे ही इस तरह नहीं सोच पाएँगे जो इस सरकार द्वारा उठाए हर कदम को आगामी चुनाव के निकटवर्ती चश्मा पहन देख रहे हैं।

कई विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएँ चौंका देने वाली और आश्चर्यजनक थीं। इन लोगों ने प्रक्षेपण की लागत की तुलना हमारे देश की भूखमरी को कम करने से की और बड़े कुटील तरीके से सफल परीक्षण की घोषणा को विमुद्रीकरण से जोड़ दिया, विपक्षी राजनेता और इन राजनेताओं से सहानुभूति रखने वाले पत्रकारों ने अपनी किताब में ऐसा कोई भी नकारात्मक विशेषण नहीं छोड़ा, जिसका उपयोग वे सरकार द्वारा उठाए गए किसी कदम से तुलना करने के लिए कर सकें। “केवल 300 किलोमीटर” या “केवल एक उपग्रह” जैसी टिप्पणियों से इन व्यक्तियों ने अपनी पूर्ण अज्ञानता का ही प्रदर्शन किया।

फिर निश्चित रूप से ऐसे लोग भी हैं जो हमारे देश में उठाए गए हर सकारात्मक कदम का श्रेय भारत के “प्रथम परिवार” को देते हैं। ये हमारे पहले प्रधानमंत्री द्वारा किए गए भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और उनके द्वारा स्थापित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के बारे में बातें करने से कभी नहीं अघाते।

आइए हम समझने की कोशिश करते हैं कि मिशन (लक्ष्य) शक्ति हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है।

  1. वर्ष बीतने के साथ हमने अंतर्राष्ट्रीय समुद्र के क्षेत्रीय अधिकारों वाले देशों को स्वीकार करना सीखा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा क्षेत्रीय समुद्र को तटीय राज्य की आधार रेखा से 12 समुद्री मील या 22.2 किलोमीटर के रूप में परिभाषित किया गया है। ऐसी कोई परिभाषा अंतरिक्ष के लिए मौजूद नहीं है और संयुक्त राष्ट्र ने यह भी निर्दिष्ट किया है कि कोई भी देश हमारे चंद्रमा और हमारे ग्रहों सहित किसी भी खगोलीय निकाय पर क्षेत्रीय अधिकारों का दावा नहीं कर सकता है।
  1. अंतरिक्ष का निरीक्षण संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाह्य अंतरिक्ष मामलों द्वारा किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुसार, उस पर हस्ताक्षर किए 102 देशों में से कोई भी देश चंद्रमा पर संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता है। शुरुआती खोजकर्ताओं जैसे क्रिस्टोफर कोलंबस और आदि जिन्होंने सदियों उनका अनुसरण किया और अपने देशों के लिए नए महाद्वीपों और व्यापारिक ठिकानों और उपनिवेशों की स्थापना की। इसलिए, न केवल चंद्रमा पर बल्कि अब मंगल पर भी पहुँचने और वहाँ स्थापित होने की हौड़ लगी है।
  1. बहुत कम देशों ने उपग्रहों के निर्माण और प्रक्षेपण की क्षमता विकसित की है और भारत इन चुनिंदा देशों में से एक है। यहाँ तक कि केवल कुछ ही देशों ने मनुष्य को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता विकसित करने में कामयाबी हासिल की है और भारत इस क्षमता को भी तेजी से विकसित कर रहा है।
  1. निरंतर माँग रखने वाली मानव जाति के लिए अंतरिक्ष अगला मोर्चा है जहाँ लगातार अधिक चुनौतियों की तलाश है। भारत के लिए, अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति के प्रबंधन की मजबूत क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष निकायों में से एक है।
  1. यह भी समझने योग्य है कि रॉकेट का विकास राष्ट्र की रक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है। रॉकेट को इस तरह समझा जा सकता है कि वह कुछ और न होकर एक विशाल “निर्देशित मिसाइल” है और यह तकनीक नाटकीय रूप से अपनी सीमाओं को मजबूत करने के लिए भारत के पास उपलब्ध है। मिशन शक्ति हमें भविष्य में दुष्ट उपग्रहों को लक्षित करने की बहुत आवश्यक क्षमता प्रदान करती है।
  1. जो पहले जीत लेगा उसे अंतरिक्ष बहुत बड़ी संपत्ति का वादा दे सकता है। यही कारण है कि एलोन मस्क और रिचर्ड ब्रैनसन बड़ी रकम का निवेश कर रहे हैं। यदि कोई किन्हीं खगोलीय पिंडों तक पहुँचने और वहाँ से पृथ्वी पर लौटने का किफायती तरीका विकसित कर सकता है, तो उन अविश्वसनीय खनन अवसरों के बारे में सोचिए जिन्हें उत्पन्न किया जा सकता है। ये व्यवसायी पहले से ही अंतरिक्ष में मानव बस्तियाँ बसाने की बात कर रहे हैं और ऐसे व्यक्तियों की लंबी कतार है जो मंगल की “एक-तरफ़ा” यात्रा करने के लिए तैयार है।

अंतरिक्ष की खोज करना महँगी प्रक्रिया है जो बहुत अधिक जोखिमों से भी भरी है। चुनाव के संदर्भ में निंदनीय प्रतिक्रियाएँ समझ में आती हैं, लेकिन अंतरिक्ष की खोज की लागत के साथ हमारे ग्रह पर भोजन और आवास की उपलब्धता से उसकी तुलना करना अल्पकालिक और पूरी तरह से संदर्भ रहित है।

अपने अपोलो कार्यक्रम के कुछ असफल प्रक्षेपणों के बाद नासा ने अपना अधिकांश धन खो दिया? राष्ट्रपति ओबामा ने विफलता के डर से नासा का वित्त पोषण कम कर दिया। राष्ट्रपति ट्रम्प ने नासा को फिर से मजबूत किया है और 2024 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर वापस भेजे जाने का आह्वान किया है।

राष्ट्र ने अंतरिक्ष में हमारे अधिकारों की रक्षा की नई क्षमता विकसित की है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। हमेशा सत्ता में जिसकी सरकार होगी, श्रेय उसे ही जाएगा और विपक्षी नेताओं के पास इस कठोर वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

अंतरिक्ष अनुसंधान में निवेश करना महँगा है। पर यह हमारा भविष्य है और इसके लिए बहुत सरकारी धन की आवश्यकता लाज़मी भी है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए सरकार की इच्छा शक्ति की आवश्यकता होगी ताकि उसमें उचित निवेश हो। मिशन शक्ति, चँद्रमा और मंगल पर हमारे मिशन, निम्न पृथ्वी कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट-एलईओ) और भू स्थैतिक कक्षा (जियो स्टेशनरी ऑर्बिट- जीईओ) की हमारी सफल प्रक्षेपण क्षमताएँ अंतरिक्ष में बढ़ती उपस्थिति का प्रबंधन करने की हमारी क्षमताओं को दर्शाती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के पास ज्ञान और अनुभव है और हमारे हितों की चरम सीमा तक का पता लगा सकते हैं।

केवल कोई मजबूत सरकार ही हमारे अतिआवश्यक अंतरिक्ष कार्यक्रम का समर्थन कर उसके लिए आवश्यक वित्त पोषण जारी रख सकती है।

ऐसी सरकार को हमारे समर्थन की ज़रूरत है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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  • अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।