प्रधान मंत्री इमरान खान

पाकिस्तान में बहुप्रतीक्षित चुनाव संपन्न हुए और परिणाम हालाँकि थोड़े विवादास्पद रहे लेकिन उसके बावजूद घोषित हो चुके हैं।

इमरान खान जनता की पसंद है और वे स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिलाकर उस जादुई संख्या को पाने की जुगाड़ में है, जिसके बाद वे शपथ ले सकते हैं। चुनाव सेना द्वारा “प्रबंधित” थे या नहीं, अब यह कोई मुद्दा नहीं है। अब इमरान खान पृथ्वी के सबसे खतरनाक राष्ट्रों में से एक के नेता हैं। अपने प्रारंभिक भाषण में उन्होंने भारत के बारे में समोचित उद्गार व्यक्त किए जान पड़ते हैं लेकिन तब भी उन्होंने कश्मीर मामले में अपने देश की लकीर का फ़कीर होने का फैसला किया।

राजनीतिक प्रवक्ताओं और दुनिया भर के मीडिया द्वारा इन चुनावों की बड़े पैमाने पर आलोचना हुई। तालिबान का करीबी होने को लेकर इमरान की आलोचना की गई है।  उनकी पूर्व पत्नी रेहम ख़ान द्वारा बताई गई सभी बातें किताब में उनकी प्लेबॉय छवि को उकसाने की कोशिश कर रही हैं, जिसमें इमरान खान को “निदेशक का अभिनेता” कहा गया है। इस किताब को चुनाव से ठीक पहले जारी किया गया था लेकिन उसका कोई ख़ास असर पड़ा हो, ऐसा नहीं दिखा।

भारत और शेष दुनिया को अगले 5 वर्षों तक इमरान खान और उनके समर्थकों से निपटना होगा। भारत ने एहतियात बरतते हुए इमरान की जीत का स्वागत किया है और दक्षिण एशिया को आतंक और हिंसा से मुक्त करने की अपनी बात दोहराई है।

दो प्रमुख विपक्षी नेता और उनके दल, नवाज शरीफ (पीएमएल-एन) और बिलावल भुट्टो (पीपीपी) हार गए, लेकिन तब भी मजबूत और विश्वसनीय विपक्ष प्रदान करने में सक्षम होने के लिए पर्याप्त सीटें हासिल करने में वे कामयाब रहे हैं, बशर्तें अगर वे अपने ही मुद्दों को ठीक तरीके से सुलझाने में सक्षम हो जाते हैं, तो! दोनों पक्षों ने चुनाव परिणामों को खारिज कर दिया है हालाँकि पीएमएल (एन) ने पंजाब प्रांत में जीत पर सवाल नहीं उठाया है और न ही पीपीपी ने सिंध में बहुमत पर सवाल उठाया है। उनकी चुनाव के बाद की टिप्पणियाँ केवल अपने राजनीतिक पदों और अपनी असफलताओं के कारणों पर लिपा-पोती करने के रूप में देखी जानी चाहिए।

पाकिस्तानी मतदाता ने हफीज सईद की धार्मिक और भारत विरोधी राजनीति को दृढ़ता से खारिज कर दिया है, लेकिन वह और उसका संगठन अब भी बना हुआ है। ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक वह पाकिस्तानी सेना द्वारा शासित नहीं होता है, जो हो नहीं सकता है, तो वह ऐसे ही अपने लड़ाई उकसाने के काम और भारत के खिलाफ आतंकवादियों के खुले प्रशिक्षण को जारी रखेगा। दूसरी ओर स्वयंभू न खेलने वाले कप्तान जनरल परवेज मुशर्रफ़ हैं, जिन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि वे हफीज सईद की प्रशंसा करते हैं,जो चुनाव लड़ने की धमकी दे रहा था, जिसने अब ख़ुदबख़ुद छोटे पर्दे और युद्ध भड़काने वाले “विशेषज्ञों की टिप्पणियों” को अपनी ओर से कुछ प्रदान करना कम कर दिया है।

इमरान खान की “नया पाकिस्तान” की जीत के क्या प्रभाव हैं?

  1. काफ़ी लंबे समय बाद, पाकिस्तान ने ऐसे नेता चुना है जो भ्रष्ट नहीं है और जिसने अप्रैल 1996 में तहरीक-ए-इंसाफ की स्थापना के बाद से तंत्र से लड़ते हुए अपने लचीलेपन को दिखाया है। उन्हें विभिन्न मोर्चों पर बार-बार लक्षित किया गया है, लेकिन शासन में सुधार लाने और भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए वे डटे हुए हैं। फिर भी, 269 सदस्यीय विधानसभा की 115 सीटों के साथ, उन्हें 15 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ये स्वतंत्र विधायक समर्थन देने की कीमत के रूप में क्या माँग करेंगे और इसका उनके शासन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
  2. उन पर पाकिस्तानी सेना का वरद हस्त है और इसे सकारात्मक विकास के रूप में देखा जाना चाहिए। सेना हमेशा से या तो राजनीतिक दल के सीधे नियंत्रण में रही है या उसके साथ विरोधी संबंध में रहे हैं। अब वह इमरान खान का समर्थन कर रही है, जो लोकतांत्रिक जीत के कुनबे में हैं, इससे भारत और बाकी दुनिया को किसी ऐसे व्यक्ति की बजाए, जो निर्णय लागू नहीं कर सकता है, तख़्त के पीछे की शक्तियों से सीधे निपटने का अवसर मिला है।
  3. पाकिस्तानी मतदाता बेचैन हो रहा है और सारे धार्मिक प्रचार से थक गया है। आजादी के बाद से पिछले सात दशकों में वह समृद्धि के लिए धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहा है। मतदाताओं ने भारत का महती विकास देखा है और ऐसे नेता की तलाश में हैं जो उनके देश का भी आर्थिक विकास कर सके। इमरान खान को अपने पिछड़े राष्ट्र के लिए कार्य करने का अवसर मिला है।
  4. पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था दिवालियापन की कगार पर है। देश भारी कर्ज में डूबा हुआ है और उसके पास पैसा नहीं है। पाकिस्तानी रुपया अब तक का सबसे कमजोर है, जिससे बाहरी ऋण और भी बड़ा हो गया है। जून 2018 में, पाकिस्तान को वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) द्वारा फिर से आतंक वित्तपोषण पर नज़र रखने की सूची में रखा गया था। इमरान खान को पैसा खड़ा करने और अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण पर काम शुरू करने के लिए कुछ चतुर पैंतरों की आवश्यकता होगी। जब तक कि अर्थव्यवस्था फिर से संभल नहीं जाती और नौकरियाँ और धन निर्माण शुरू नहीं हो जाता है, तब तक किसी भी राजनेता से कुछ और अन्य महत्वपूर्ण करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
  5. पाकिस्तान के बारे में दुनिया की धारणा शायद अब तक की सबसे कम है। पाकिस्तान में कई सालों से कोई विदेश मंत्री नहीं है। नवाज शरीफ ने इस पोर्टफोलियो को सीधे संभालने का फैसला कर घटिया काम किया। ग्रीन पासपोर्ट को सम्मान का थोड़ा आभास कराने के लिए गहन आत्मविश्वासपूर्ण निर्माण उपायों की आवश्यकता है। आतंकवादियों को समर्थन देना जारी रखते हुए यह भी दावा करते रहना कि पाकिस्तान खुद ही उससे पीड़ित है, दुनिया भर के सत्ता गलियारों में अब स्वीकार्य नहीं है। सऊदी अरब, जिसकी ओर हमेशा पाकिस्तान देखता रहा है, वहाँ भी युवराज शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के नेतृत्व में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। अगर वे बदल सकते हैं, तो पाकिस्तान भी ऐसा कर सकता है।
  6. चीन, पाकिस्तान के सभी मौसमी सहयोगी चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का समर्थन करने में अपना स्वयं का एजेंडा रखते हैं क्योंकि ऐसा करने से एशिया के आस-पास की लंबी समुद्री यात्रा से बाधित हुए बिना चीनी निर्यात मध्य पूर्व और यूरोप तक पहुँच जाएगा। दूसरी तरफ, चीन अपने उइघुर प्रांत में आतंकवाद से भी परेशान है, जिस पर पाकिस्तान को समर्थन करने का आरोप लगा है। पाकिस्तान को भारत, यूएसए और रूस के साथ मजबूत संबंध बनाने की जरूरत है। इमरान खान ने इसे पहचान कर कहा है कि “आप एक कदम उठाते हैं और हम दो कदम उठाएंगे।”
  7. विपक्षी दल पीएमएल (एन) और पीपीपी संसद में जिम्मेदार विपक्ष की तरह जांच और संतुलन प्रदान करना है और न कि केवल विरोध करना है इसलिए व्यापार बाधित नहीं करते हुए अपने देश के प्रति अपनी वचनबद्धता का प्रदर्शन कर सकते हैं। उनके बीच, उनकी पर्याप्त संख्या है। बिलावल भुट्टो और मरियम नवाज शरीफ़ अभी युवा हैं और उनके आगे राजनीति में लंबा समय पड़ा है। विपक्ष में बैठना सीखने के लिए बेहतरीन अनुभव हो सकता है।

भारत के साथ पूरी दुनिया को इमरान खान को अपने बचाव को छोड़े बिना शासन का अलग मॉडल रखने का मौका देना होगा। शांतिपूर्ण पाकिस्तान इस पूरे क्षेत्र के संवर्धन और विकास में मददगार होगा और इसकी सफलता में सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी पाकिस्तान की है।

इमरान खान को अपने देश की कथा बदलने की जरूरत है। अपने देश के भीतर कई विरोधाभासी विचारों को साथ लेकर चलने के लिए उन्हें विकास और सुशासन का सरल वादा देने की ज़रूरत है। उनके लिए अनुकरण करने के दिन खत्म हो गए हैं और आलोचना एवं आरोप लगाने का खेल खेलने का समय आ गया है।

आम पाकिस्तानी नागरिक उन राजनेताओं से ऊब गया है और तंग आ चुका है, जिन्होंने बार-बार पैसे और असीमित शक्ति के लालच का प्रदर्शन किया है और आम पाकिस्तानी के लिए कुछ भी नहीं किया। इमरान खान को बहुत हद तक राष्ट्रपति ट्रम्प और प्रधान मंत्री मोदी की तरह सीधे लोगों से संवाद शुरू करने की जरूरत है, ताकि उनका संदेश सीधे जनता तक पहुँच सके और बीच की व्याख्या में कहीं खो न जाए।

उनके पास अन्य कोई विकल्प भी नहीं है।

इसके अलावा, शायद उनके पास यह एकमात्र अवसर है !

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे 5 बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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Prime Minister Imran Khan

180730 Pakistan Elections

The much awaited elections in Pakistan are over and the results, albeit controversial, have been declared.

Imran Khan is the people’s choice and is busy cobbling together independent candidates to get to the magical number after which he can be sworn in. Whether the election was “managed” by the army or not is no longer an issue. Imran Khan is now the leader of one of the most dangerous nations on Earth. His opening speech seemed to have all the right words for India and yet he chose to continue his nation’s hardline on Kashmir.

There has been widespread criticism of these elections from political spokespersons and media around the World. He has been criticised as being close to the Taliban. The tell-all book by his former wife Reham Khan trying to rake-up his playboy image, called Imran Khan a “directors actor.” Her book was strategically released just before the election but seemed to have no impact.

India and the rest of the World has to deal with Imran Khan and his backers for the next 5 years. India has cautiously welcomed his win and reiterated their position of making South Asia free of terror and violence.

The two principal opposition leaders and their parties, Nawaz Sharif (PML-N) and Bilawal Bhutto (PPP) have lost out but have managed to garner sufficient seats to be able to provide a strong and credible opposition if they are able to handle their own sets of issues. Both parties have rejected the election results, though the PML(N) has not questioned their victory on the province of Punjab nor has the PPP questioned their majority in Sindh. Their post-election comments should be seen only as political posturing and covering up of the reasons for their failures.

The Pakistani voter has strongly rejected the religious and anti-India rhetoric of Hafiz Sayeed but he and his organisation have not disappeared. Unless he is reined in by the Pakistani Army, which is not likely, he will continue his sabre rattling and his open training of militants against India. The other self-appointed non-playing captain, General Pervez Musharraf, who openly acknowledged his admiration for hafiz Sayeed was threatening to contest the elections is now simply reduced to providing “expert comments” on television and sabre rattling.

What are the implications of Imran Khan’s win for his “Naya (new) Pakistan”?

  1. 1. After a long time, Pakistan has elected a leader who is not corrupt and who has, demonstrated his resilience in fighting the system since he founded the Tehreek-e-Insaf in April 1996. He has been targeted repeatedly on various fronts but has stood his ground to improve governance and root out corruption. Yet, with 115 seats in the 269 member assembly, he needs the support of 15 additional legislators. It would be interesting to see how much these independent legislators will demand as the price for their support and how this will impact on his governance.
  2. He has the blessings of the Pakistani Army and this must be seen as a positive development. The Army has always been either directly in control or been in an antagonistic relationship with the political party. Now that they are, supporting Imran Khan, couched in the cloak of a democratic win, India and the rest of the World has an opportunity to deal directly with the powers behind the throne and not someone who cannot get decisions implemented.
  3. The Pakistani voter is getting restless and is tired of all the religious propaganda. They have been waiting patiently for prosperity promised over the past seven decades since independence. They see the major development in India and are looking for a leader who can deliver economic development for their country as well. Imran Khan has an opportunity to deliver for his backward nation.
  4. The Pakistani economy is bordering on the brink of bankruptcy. The country is saddled with huge debts and does not have the money. The Pakistani Rupee is at its weakest, making the external debt even larger. In June 2018, Pakistan was put back on the terror financing watch list by the Financial Action Task Force (FATF). Imran Khan will need some deft maneuvering to find the money and start work on rebuilding the economy. Unless the economy bounces back and starts creating jobs and wealth, nothing significant can be expected from any politician.
  5. Perceptions about Pakistan in the World are probably at an all-time low. Pakistan has not had a foreign minister for several years. Nawaz Sharif chose to handle this portfolio directly and did a lousy job. Serious confidence building measures are needed to bring some semblance of respectability to the green passport. Continuing its support of terrorists and claiming that Pakistan itself is a victim is no longer acceptable in the corridors of power around the World. Saudi Arabia, towards whom Pakistan always looks up to, has undergone a significant change under the leadership of Crown Prince Sheikh Hamdan bin Mohammed bin Rashid Al Maktoum. If they can change, so can Pakistan.
  6. China, Pakistan’s all weather ally has its own agenda in supporting the China Pakistan Economic Corridor (CPEC) since Chinese exports will get access to the Middle East and Europe without circumventing the time consuming sea journey around Asia. On the other hand, China is also troubled with militancy in its Uighur province which it blames on support for Pakistan. No nation can be completely dependent on another. Pakistan needs to start building strong relationships with India, USA and Russia. Imran Khan recognises this and has mentioned “you take one step and we will take two steps.”
  7. The opposition parties PML(N) and PPP can demonstrate their commitment to their nation by providing checks and balances of a responsible opposition in Parliament and not disrupt the business simply because they must. Between them, they have substantial numbers. Bilawal Bhutto and Maryam Nawaz Sharif are young and have a long time ahead of them in politics. Sitting in opposition can be a great learning experience.

India and the World needs to give Imran Khan a chance to deliver a different model of governance without letting down their guard. A peaceful Pakistan will help in the growth and development of the entire region and the stakes in this success is the highest for Pakistan.

Imran Khan needs to change the narrative in his country. He needs to carry several contradictory views within his nation with the simple promise of development and good governance. For him, the days of adulation are over and the time for brick bats and blame games has arrived.

The common Pakistani citizen is tired and fed-up of the politicians who have repeatedly demonstrated their greed for money and unlimited power and done nothing for the common Pakistani. Imran Khan needs to start communicating directly with the people, much like President Trump and Prime Minister Modi so that his message reaches directly and is not lost in interpretation.

He has no other options.

Besides, this maybe his only chance!

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies. A keen political observer, he is an Angel Investor and Executive Coach. He is the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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Pakistan – The War Within

180226 Pakistan

Pakistan holds a very special place in the hearts of most of the older Indians who see it as a dismembered part of our nation. Families were separated and property was lost. An imaginary and unfinished line was drawn through the sub-continent by Cyril Radcliffe resulting in the largest transmigration of people anywhere in the World and leaving over 2 million dead as a result of politically motivated rioting.

Pakistan, literally means “Land of the Pure.” It is another matter that nothing could be further away from the truth when one looks at its deeds and actions over the last 7 decades. Pakistan is home to Dawood Ibrahim, Hafiz Saeed, LeT, JeM, Harakatul Mujahideen, Haqqani network and dozens of other terrorist groups and continuous denials by the Pakistani establishment is no longer being accepted by the World.

What has gone wrong with this dream of Jinnah? How is his message of Unity, Faith and Discipline being addressed in modern Pakistan? Where has Pakistan, its leaders and its population, lost the plot?

Let us look at some of the challenges that are being faced by Pakistan.

Religion and the Muslim Brotherhood – Pakistan believes very strongly in the Muslim Ummah (community). The Muslim brotherhood. Pakistani journalists express shock and surprise when they are not given blind support from all other Muslim countries on their issues. While the Ummah will always remain relevant, it can no longer become a crutch to reach out to these nations for handouts and doles without a quid pro quo.

The other Muslim nations from the Ummah are not willing to provide blind support to Pakistan on their support to so many the terrorist cells housed in Pakistan. Nationalism in the other Muslim nations is based on wealthy ethnicity, language and culture rather than simply on religion as has been seen in Pakistan. This was one of the major reasons why Bangladesh broke away in 1971. How long will religion keep on feeding the appetite of the masses and for how long can religion provide jobs, development and education?

Kashmir – Pakistan does not ever want to let go of Pakistan Occupied Kashmir knowing very well that India will never give up its claim on Kashmir. Kashmir is almost a rallying cry for its leadership but this is now becoming irrelevant on the international stage and very weak within Pakistan. Secessionist movements are growing in Baluchistan and it is a matter of time before other states start to express their frustration with the Pakistani establishment.

Anti-India Sentiment – How long can Pakistan keep feeding its population with anti-India sentiments and how long will their gullible population continue to survive on a diet of hatred? When I first visited Karachi, in 2002, I was surprised to find how much animosity there was against India. For a population fed on anti-India propaganda, they know no better. History for Pakistan starts from 1947. The fact that Pakistan was a part of India is wiped out from the minds and consciousness of the people.

But reality is hitting home now. Journalists are questioning their politicians on why their country has been left so far behind. The Indian economy is almost 10 times the size of Pakistan and is growing at 7.5% per annum (4.5% for Pakistan) on a larger base.

With the growth of India, the World has de-hyphenated India and Pakistan. From a position of talking of the two nations together, India is now longer banded together with Pakistan. This must definitely be hurting the Pakistani establishment who want to be seen in the same league as India.

Victim Card – Pakistani politicians and journalists always play the victim card and go to great lengths to emphasise that they are the victims of terrorism and not its perpetrators. They have almost managed to convince the population that the entire World is conspiring against them. These people must start to understand that the World does not owe Pakistan a living and they have to stand up and take control of their own destiny.

Nuclear Power – A nation that has nuclear power knows the huge responsibility that is associated with this power. Not so with Pakistan. Not a day goes in Pakistan when its journalists or its military does not talk about its nuclear capabilities. Several prominent journalists take pride in announcing repeatedly that they are the only Muslim nation that was chosen by Almighty God to be given this power.

How long will a population, suffering from hunger, shortage of power and no jobs keep filling its stomach with the comfort of their nation being a nuclear power? How long will they keep on taking cover under their presumed nuclear deterrent?

Corruption – Corruption has been the scourge of most developing nations of the World. In these countries, people bribe for what is theirs by right! Several countries in the World compete to be in the top 20 most corrupt nations of the World. It would give Pakistan some comfort and pride that in this one parameter, it has consistently managed to remain amongst the most corrupt nations of the World. The latest is the Panama Papers scandal which has former Prime Minister Nawaz Sharif named as one of the perpetrators.

China Pakistan Economic Corridor – CPEC, once touted as the answer to all the problems of Pakistan has come back to bite. Investments committed by China, Pakistan’s “all weather” friend have been converted into interest bearing loans which the country cannot afford. The US$ 50 billion committed has now become an albatross around the slender and weak neck of Pakistan and the country does not have the ability to even service the interest leave alone repay the debt.

Jobs have been created in Pakistan but primarily for Chinese who have been shopped out in large numbers to Pakistan. Second hand equipment to manufacture cement has been sent from China. It is rumored that there are 20 million Chinese who have been given visas to work and stay in Pakistan. The Chinese currency Yuan is now widely accepted in Pakistan and some people believe that it is a matter of time before the Yuan becomes legal tender in Pakistan. It was rumored that Pakistan has decided to make mandarin an official language. This was quickly denied but there can be no smoke without fire!

Are we likely to see a repeat of the Hambantota port in Sri Lanka where the Chinese companies have signed a 99 year lease and taken over the port? Is it only a matter of time before we see Chinese Naval ships positioned at this port?

The Financial Action Task Force (FATF) has, on 23rd February 2018, decided to put Pakistan on their grey list and this will have very significant consequences on Pakistan, already struggling to manage an economy in serious trouble. Unless Pakistan takes credible steps acceptable to the international community within the next three months, FATF may be the proverbial last straw that broke the camel’s back. With China voting against Pakistan on the FATF, I can almost hear Pakistani journalists stating “Et Tu China? Then fall Pakistan!”

Pakistan has only itself to blame for the situation that it finds itself in. Blaming one politician for all their faults is only a short term answer to the endemic problems Pakistan faces. The Pakistani Army which has ruled the country for almost half of its life as a nation also needs to take responsibility for the situation their country is faced with. The politicians and the Army have never trusted one another and are always watching their flanks, wary of the steps the other may take, both sides claiming to be the saviours of the nation.

The common man needs to wake and start demanding accountability from their leaders, both political and from the Army. It will take at least one generation to make a change in its mindset and that too if the process starts now. Supporting terrorism is not helping. Will Pakistan even be able to stay together as a nation of will it be implode?

Only economic prosperity in Pakistan will be able to meet the needs of the long suffering common man. Unless there are opportunities to create wealth and have prosperity for their families, religion and rhetoric will only lead towards chaos.

There are no easy answers.

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies and the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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पाकिस्तान – अंदरूनी युद्ध

180226 Pakistan

अधिकांश पुराने भारतीयों के दिलों में पाकिस्तान का अपना अलग विशेष स्थान है, जो उसे हमारे राष्ट्र के ही अलहदा हिस्से के रूप में देखते हैं। परिवार बिछड़ गए और संपत्ति चली गई। सिरिल रेडक्लिफ़ द्वारा उप-महाद्वीप के माध्यम से काल्पनिक और अधूरी रेखा खींच दी गई जिसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया में कहीं नहीं हुआ होगा इतनी बड़ी संख्या में लोगों को स्थान परिवर्तन करना पड़ा और राजनैतिक रूप से प्रेरित दंगों के परिणामस्वरूप 2 मिलियन से ज्यादा लोग मारे गए।

पाकिस्तान का शाब्दिक अर्थ “पाक भूमि” है। यह दीगर बात है कि जब पिछले 7 दशकों के इसके कर्मों और कार्यों को देखें तो सच्चाई से कोसों दूर है। पाकिस्तान दाऊद इब्राहिम, हाफ़िज़ सईद, लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद, हरक़ातुल मुजाहिदीन, हक्कानी नेटवर्क और दर्जनों अन्य आतंकवादी समूहों का घर बन चुका है और पाकिस्तानी संस्थान का इससे निरंतर अस्वीकार अब दुनिया द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा है।

जिन्ना के पाक सपने के साथ ऐसा यह क्या गलत हो गया? उनका एकता, विश्वास और अनुशासन का संदेश आधुनिक पाकिस्तान में यूँ इस तरह से कैसे पहुँच गया? पाकिस्तान, उसके नेता और वहाँ की आबादी ने आख़िर वह कथानक कहाँ खो दिया?

आइए हम उन चुनौतियों को देखें, जिनका सामना पाकिस्तान कर रहा है।

धर्म और मुस्लिम भाईचारा– पाकिस्तान मुस्लिम उम्माह (समुदाय) में बहुत दृढ़ता से विश्वास रखता है। मुस्लिम भाईचारा। पाकिस्तानी पत्रकार तब गहरा झटका और आश्चर्य व्यक्त करते हैं, जब उनके द्वारा रखे मुद्दों का अन्य सभी मुस्लिम देश अंधों की तरह समर्थन नहीं करते। यद्यपि उम्माह हमेशा प्रासंगिक रहेगा, लेकिन इन देशों तक बिना किसी मुआवजे की उम्मीद के ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचाने, खैरात बाँटने के लिए यह अब और अधिक बैसाखी नहीं बना रह सकता है।

उम्माह के अन्य मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के इतने सारे आतंकवादियों को पाकिस्तान में डेरा डालने को लेकर अंधा समर्थन देने के लिए तैयार नहीं है। अन्य मुस्लिम देशों में राष्ट्रवाद समृद्ध जातीयता, भाषा और संस्कृति पर आधारित है बजाय पाकिस्तान में देखा गया है कि वहाँ केवल धर्म पर आधारित है। यही एक मुख्य वजह थी जिसकी वजह से वर्ष 1971 में बांग्लादेश को टूटकर अलग हुआ था। कितने समय तक धर्म जनता का पेट भरेगा और कितने समय तक धर्म रोजगार, विकास और शिक्षा प्रदान कर सकता है?

कश्मीर– पाकिस्तान कभी भी पाक अधिकृत कश्मीर को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता, जबकि वह बहुत अच्छी तरह से जानता है कि भारत कश्मीर पर अपना दावा कभी नहीं छोड़ेगा। कश्मीर अपने नेतृत्व के लिए लगभग बस एक नारा बन गया है जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अप्रासंगिक-सा और पाकिस्तान के भीतर बहुत कमजोर-सा हो गया है। बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन तेज़ हो रहा है और यह कुछ ही समय की बात है केवल तब तक ही, जब तक अन्य राज्य पाकिस्तानी संस्थान से हताशा ज़ाहिर नहीं कर देते।

भारत विरोधी भावना– पाकिस्तान कब तक वहाँ की जनता को भारत विरोधी भावनाओं का दाना चुगाता रहेगा और नफरत के भोज पर वहाँ की आसानी से धोखा खा जाने वाली जनता कब तक जीवित रहेगी? जब मैं पहली बार वर्ष 2002 में कराची गया था, मैं यह देखकर दंग रह गया कि वहाँ भारत के ख़िलाफ़ कितना बैर भरा हुआ था। भारत-विरोधी प्रचार का ज़हर निगलती आबादी इससे भला और कुछ नहीं जानती है। पाकिस्तान का इतिहास वर्ष 1947 से शुरू होता है। यह तथ्य कि पाकिस्तान भारत का हिस्सा था, लोगों के दिलो-दिमाग़ से मिटा दिया गया है।

लेकिन वास्तविकता अब चोट पहुँचाने लगी है। पत्रकार अपने राजनेताओं पर सवाल दाग रहे हैं कि उनका देश क्यों इतना पिछड़ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान के आकार से लगभग 10 गुना ज़्यादा है और मोटे-मोटे तौर पर यह 7.5% की दर से प्रतिवर्ष (पाकिस्तान में 4.5%) बढ़ रही है।

भारत के विकास के साथ अब दुनिया भारत और पाकिस्तान को एक युग्म से अलग कर देख रही है। एक वक़्त था जब दोनों देशों में बात करने के हालात थे, लेकिन अब पाकिस्तान के साथ किसी सूत्र से बँधने से भारत बहुत आगे निकल गया है। यह निश्चित रूप से पाकिस्तानी संस्थान को कचोटता होगा, जो ख़ुद को हमेशा भारत के ही गुट में देखना चाहता रहा है।

बलि का बकरा– पाकिस्तानी नेता और पत्रकार हमेशा बलि के बकरे का खेल खेलते रहे हैं और इतना अतिश्योक्तिपूर्ण तरीके से बल देते हैं जैसे वे आतंकवाद के शिकार हैं न कि इसके मुजरिम। वे लगभग पूरी तरह से अपने लोगों के गले यह बात उतार चुके हैं कि पूरी दुनिया उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रही है। अब इन लोगों को यह समझना शुरू कर देना चाहिए कि दुनिया में पाकिस्तान का होना कोई एहसान नहीं है और उन्हें खड़े होना और अपने भाग्य पर खुद नियंत्रण रखना ही होगा।

परमाणु ऊर्जा– एक राष्ट्र जिसके पास परमाणु ऊर्जा है वह इस शक्ति से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी को जानता है। पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है। पाकिस्तान में ऐसा कोई दिन नहीं जाता,जब उनके पत्रकार या वहाँ की सेना उनकी परमाणु क्षमताओं के बारे में बात नहीं करते। कई प्रमुख पत्रकार बार-बार घोषणा करने में गर्व महसूस करते हैं कि केवल वे एकमात्र मुस्लिम राष्ट्र है जिन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा यह शक्ति देने के लिए चुना गया था।

कोई आबादी कब तक भूख से बिलबिलाती, बिजली की कमी से तरसती और बिना नौकरी अपने पेट को केवल अपने राष्ट्र के पास परमाणु शक्ति होने की सांत्वना से भरती रहेगी? वे अपने परिकल्पित परमाणु निवारक का आसरा कब तक लेते रहेंगे?

भ्रष्टाचार– विश्व के अधिकांश विकासशील देशों में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बला है। इन देशों में, लोग ने उन बातों के लिए रिश्वत दी है, जो वैसे भी उनका अधिकार है! दुनिया के कई देशों में विश्व के शीर्ष 20 सबसे भ्रष्ट राष्ट्रों में बने रहने की प्रतिस्पर्धा है। यह पाकिस्तान को कुछ शान्ति और गौरव प्रदान करेगा कि इस एक मापदंड में, यह विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्रों में लगातार बने रहने में सफल रहा है। नवीनतम पनामा पेपर्स कांड है, जिसमें पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ को अपराधियों में से एक के रूप में नामित किया गया है।

चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा– सीपीईसी (चाइना पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरिडॉर), कहकर हम कभी पाकिस्तान की सभी समस्याओं का जवाब टाल देते हैं। चीन द्वारा किया निवेश, पाकिस्तान का “हर मौसम” में साथ देने वाले मित्र ने ऋणों को ब्याज में परिवर्तित कर दिया है, जिसे देश जुटा नहीं सकता। पाकिस्तान की कमज़ोर और पतली गर्दन पर $ 50 बिलियन अमरीकी डॉलर सौंपना भारी रोड़ा बन गया है और देश की ब्याज छोड़ केवल अकेले कर्ज़ ही चुकाने की भी क्षमता नहीं है।

पाकिस्तानी नौकरियाँ ईज़ाद हो रही हैं लेकिन मुख्य रूप से चीनी लोगों के लिए, जो पाकिस्तान में बड़ी संख्या में दुकानदार हैं। सीमेंट निर्माण के लिए चीन से  पुराना उपकरण भेजा गया है। ऐसी अफवाह थी कि 20 मिलियन चीनी हैं जिन्हें पाकिस्तान में काम करने और रहने के लिए वीजा दिया गया है। चीनी मुद्रा युआन अब व्यापक रूप से पाकिस्तान में स्वीकार कर ली गई है और कुछ लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि इसके लिए कुछ ही समय बचा है कि युआन के लिए पाकिस्तान में कानूनी निविदा बन जाएगी। यह अफवाह थी कि पाकिस्तान ने मेंडारिन को आधिकारिक भाषा बनाने का फैसला कर लिया है। इस बात से जल्दी ही इनकार कर दिया गया था लेकिन आग के बिना कोई धुआं नहीं हो सकता!

क्या हम श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह के दोहराए जाने की आशंका देख रहे हैं, जब चीनी कंपनियों ने 99 साल के पट्टे पर हस्ताक्षर किए और बंदरगाह पर कब्जा कर लिया? क्या सिर्फ समय की बात है जब इस बंदरगाह पर तैनात चीनी नौसेना के जहाजों को देखा जाएँ?

वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ), जो 23 फरवरी 2018 को हुआ, उसमें पाकिस्तान को काली सूची में डालने का फैसला लिया गया है, और पाकिस्तान पर इसके बहुत गहरे परिणाम दिखेंगे, जो पहले से ही गंभीर संकट से जूझते हुए अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करने के लिए संघर्ष कर रहा है। सिवाय इसके कि पाकिस्तान अगले तीन महीनों में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को स्वीकार्य कदम उठाए, एफएटीएफ हो सकता है उस कहावत की तरह वह अंतिम मार हो, जो कमर तोड़ दें। चीन ने एफएटीएफ पर पाकिस्तान के खिलाफ मतदान के साथ, मैं पाकिस्तानी पत्रकारों को यह कहते हुए सुन तक सकता हूँ-“और तू चीन? फिर पाकिस्तान गिर जाए! ”

पाकिस्तान की इस स्थिति के लिए वह खुद को ही दोषी ठहरा सकता है। अपने तमाम दोषों के लिए किसी एक राजनेता को दोषी मानना पाकिस्तान के सामने जो स्थानिक चुनौतियाँ हैं उसका अल्पकालिक जवाब है। पाकिस्तानी सेना जिसने देश पर, देश की लगभग आधी से ज्यादा आयु तक शासन किया है, को भी इस स्थिति की ज़िम्मेदारी लेने की आवश्यकता है, जिसका देश सामना कर रहा है। राजनेताओं और सेना ने कभी एक दूसरे पर विश्वास नहीं किया और हमेशा अपने झंडा ऊँचा बने रहना चाहते रहे, दूसरों द्वारा लिए कदमों से सावधान होते रहे, दोनों पक्षों ने अपने को देश का उद्धारकर्ता होने का दावा किया।

सामान्य व्यक्ति को जागने की जरूरत है और अपने नेताओं, दोनों राजनीतिक और सेना से जवाबदेही माँगना शुरू करने की आवश्यकता है। इस मानसिकता में परिवर्तन करने के लिए कम से कम एक पीढ़ी लगेगी और वह भी अगर प्रक्रिया अब शुरू होती है। आतंकवाद का समर्थन करने से मदद नहीं हो सकती है। क्या पाकिस्तान यहाँ तक सक्षम हो सकता है कि एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहे, क्या वह बिखर जाएगा?

केवल पाकिस्तान में आर्थिक समृद्धि ही लंबे समय से पीड़ित आम आदमी की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होगी। जब तक धन पैदा करने और उनके परिवार को समृद्धि के अवसर नहीं मिलते, धर्म और बयानबाजी केवल अराजकता की ही ओर ले जाएगी।

इसके कोई आसान जवाब नहीं हैं।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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1/30 को # पीओटीयूएस का # एसओटीयू भाषण

180130 Trump

इस लेख के शीर्षक से उलझ गए न ?

यह लेख हाल ही में 30 जनवरी 2018 को संपन्न हुए “संयुक्त राज्य अमेरिका ” के राष्ट्रपति के “स्टेट ऑफ़ द यूनियन” अभिभाषण, उसके प्रभाव और भारत में उसी तरह की जिन चुनौतियों का हम सामना कर रहे हैं, उन समानताओं के बारे में है।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने व्याख्यान में सारे सही तार छेड़े। मैंने सितंबर 2016 में एक लेख लिखा था, जिसकी रूपरेखा में मैंने कहा था कि क्यों मेरा विश्वास है कि ट्रम्प चुनाव जीतेंगे और मुझे अभी भी विश्वास है कि वे हर वह चीज़ मुहैया कराएँगे जिसका उन्होंने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था। अतीत में हमने जिस ट्रम्प को देखा था उससे यह अलग था। अब वह कम आक्रामक और अधिक समावेशी था। यह पूरी तरह साफ़ है कि उनके लिए वह सब जो मायने रखता है, वह उनका देश है।

उन्होंने अमेरिका में बड़े निवेशों के बारे में बात की (ऐप्पल, क्रिसलर और माज़दा जैसी कंपनियों को एक-एक कर बाहर कर दिया), करों में कमी, बुनियादी ढाँचे के लिए अमेरिकी डॉलर $ 1.3 ट्रिलियन का निवेश, आप्रवासन और रक्षा बलों तथा अन्य सेवाओं जैसे सीमा रक्षक, पुलिस बलों और अग्निशमन सेवा को मजबूत करने के बारे में कहा। उन्होंने अपने लंबे अभिभाषण में कई ऐसे लोगों का स्थान-स्थान पर उदाहरणों के साथ बहुत अच्छी तरह से जिक्र किया, जिन्हें ध्यानपूर्वक चुना गया था और इस व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने देश के नागरिकों की सुरक्षा की आवश्यकता पर पर्याप्त समय चर्चा की। उन्होंने अमेरिकी युवाओं की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने के लिए व्यावसायिक स्कूलों की स्थापना करने की बात की।

उन्होंने विस्तार से दवाइयों की लागत और इन लागतों को जल्द ही कम करने की अपनी योजना के बारे में बताया। उन्होंने उनके राष्ट्रगान और उनके राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करने की आवश्यकता का भी उल्लेख किया। उनकी बातों को रिपब्लिकन बेंच द्वारा लगातार और कई बार, हालाँकि, अनिच्छा से डेमोक्रेटिक बैंच द्वारा सराहा गया। उन्होंने देश से कई चुनौतियों का सामना करने के लिए द्विपक्षीय दृष्टिकोण की मांग की।

जैसे-जैसे वे कहते गए, मैं उसे भारतीय संसद के साथ समानांतर रूप से देखने की कोशिश करता गया। क्या हमारे प्रधानमंत्री संसद में ऐसा लंबा भाषण दे सकेंगे, जिसमें विपक्षी दलों की भारी चुनौतियाँ और हड़बड़ी कर अचानक किसी भी निर्णय पर पहुँचने वाले या वॉक आउट (बाहर चले जाना) करने वालों का झुंड आड़े न आएँ? क्या विपक्षी, इतनी सारे उपलब्धियों के लिए भले ही अनिच्छा से लेकिन प्रधानमंत्री और इस सरकार की कभी सराहना करते हैं?

विश्लेषक लगभग सभी चैनलों पर उनके भाषण को खंगालने में लगे थे और मुझे पूरा यकीन था कि सुबह के समाचार पत्रों में के पन्ने भी उनके भाषण पर अलग-अलग लोगों के पक्ष और प्रतिपक्ष के विचारों से भरे होंगे। आलोचक उस बारे में बात करेंगे जो उन्होंने कहा ही नहीं, बजाए इसके कि जो कहा गया, उस पर बात करें। यहाँ ऐसा राष्ट्रपति है जो अपने देश के लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगाने पर एकाग्र हो रहा है और विश्व को नेतृत्व प्रदान करने से दूर जा रहा है। उनका “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (अमेरिका को फिर से महान बनाओ)” नारा अपने मतदाताओं से अपील करता है लेकिन बाकी पूरी दुनिया के लोगों को हिला देता है, जो पहले नेतृत्व प्रदान करने के लिए अमेरिका की ओर देखने और यदि घटनाएँ योजनाओं के मुताबिक न हो, तो बाद में उसे कोसने के आदी हो गए हैं।

भारत में हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वे बहुत अलग नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री को भी इस तरह के उच्च अभिमानी नेताओं और पत्रकारों के छोटे समूह का सामना करना पड़ता है, जिनका एकमात्र उद्देश्य प्रधानमंत्री द्वारा किए गए हर कार्य और उनके द्वारा उच्चारित हर शब्द की आलोचना करना है। मोदी की चुनौतियाँ बहुत अधिक हैं। न केवल उनके सामने विपक्षी दलों के आक्रामक समूह हैं, जिनसे उनकी व्यापक असमानताओं के चलते द्विदलीय चेहरे को प्रस्तुत करने की उम्मीद नहीं कर सकते, वे व्यवसायों के समर्थन या नामकरण के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें कभी भी किसी व्यवसाय समूह के साथ नहीं पहचाना जा सकता है।

भारत को भी अपनी अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढाँचे के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। हमें अधिक और बेहतर सड़कों और बेहतर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था की आवश्यकता है। हमें और अधिक हवाई अड्डों और नदी परिवहन की आवश्यकता है। हमें स्वच्छ ऊर्जा और साफ़ हवा की जरूरत है। हमें बेहतर स्वास्थ्य देखभाल और सस्ती दवाइयों और बेहतर शैक्षिक सुविधाओं की जरूरत है। हमें आम जनता के लिए सस्ते आवास की ज़रूरत है। हमें अपनी सीमाओं पर अधिक नियंत्रण की आवश्यकता है (जी, हमारे यहाँ पूर्व दिशा के पड़ोसी देश से हमारे देश में अवैध आप्रवासियों की एक बड़ी समस्या है)। हमारे देश में हर साल 27 मिलियन बच्चों की संख्या जुड़ जाती है, ऐसे में हमें और अधिक नौकरियों के निर्माण के लिए मजबूत और अवधारित नीतियाँ चाहिए। मेक इन इंडिया के दर्शन के समर्थन और उसे प्रेरित करने की जरूरत है क्योंकि केवल तब ही हम अपने लोगों के लिए वर्धित मूल्य की नौकरियों को पैदा कर पाएँगे।

हमें अपने रक्षा बलों के लिए अधिक सम्मान की आवश्यकता है साथ ही हमें भारतीय सेना के खिलाफ़ दर्ज होने वाले बेहूदा एफ़आईआर को रोकना होगा। पश्चिमी सीमा के  हमारे अति आक्रामक पड़ोसी पर लगाम कसने के लिए हमें एक मज़बूत नीति बनाने की आवश्यकता है और इसके लिए हमें अपने शस्त्रों और सशस्त्र बलों को अधिक सुविधाएँ मुहैया कराने की ज़रूरत है। हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रमों का केवल इसलिए समर्थन नहीं करना है कि हम “मंगल ग्रह पर पहुँचना” चाहते हैं बल्कि इसलिए समर्थन देना है क्योंकि इस तकनीक से अधिक विश्वसनीय रक्षा क्षमताओं को विकसित करने में मदद मिलती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हर आने वाले राजनेता ने “रोटी, कपड़ा, मकान” का वादा किया और अमीरों और गरीबों के बीच का अंतर बढ़ता चला गया। रोज़गार देने की आड़ में कतिपय लोगों के लिए बहुत कुछ किया गया, जिन्होंने विशाल धन जमा कर लिया। हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे देश के ” वंचितों” जिनमें कृषि मजदूर, कारख़ानों में काम करने वाले श्रमिक, भारत के ग्रामीण और अर्ध शहरी इलाकों में रहने वाले लोग और वे लोग जिन्हें पिछली सरकारों की उदारता का कभी कोई लाभ न मिला हो, ऐसे  लोग आते हैं, उन्हें भी इस देश में अवसर उपलब्ध हो सकें क्योंकि यह देश हम सबका है।

हमें अपनी सहस्त्राब्दियों और उससे परे तक के लिए अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है, जो लोग अगले कुछ दशकों में हमारे देश को शक्ति देंगे। यह सब केवल मजबूत और प्रतिबद्ध नेतृत्व द्वारा ही संभव हो सकता है, जिसकी भले ही आलोचना हो, लेकिन वह तब भी तमाम कठिन सुधारों का पालन करवा सके।

हमें आवश्यकता है कि राष्ट्रों की मंडली में भारत को उसकी सही जगह मिल सकें। हमें दक्षिण एशिया और विश्व में नेतृत्व प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें एक मजबूत और स्थायी विदेश नीति की आवश्यकता है।

जैसा कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपना भाषण “भगवान भगवान भला करे अमेरिका का” के साथ समाप्त किया था,मुझे विस्मय होगा अगर प्रधान मंत्री मोदी ने ऐसा कोई कथन कहा तो क्या होगा! अगर उन्होंने ऐसा कहा तो उपद्रव मच जाएगा कि वे “कौन-से भगवान” का उल्लेख कर रहे थे और किन चुनिंदा श्रोताओं के लिए उन्होंने “आशीर्वाद” माँगा था।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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#SOTU address of #POTUS on 1/30

180130 Trump

Confused with the title of this article?

This article is about the just concluded “State Of The Union” address of the “President Of The United States” on 30th January 2018, its implications and its similarities with the challenges we face in India.

President Trump struck all the right chords in this address. I had written an article in September 2016 outlining why I believed Trump would win the election and I continue to believe that he is delivering on everything that he had promised in his election manifesto. This was a different Trump than what we have seen in the past. He was less aggressive and more inclusive. It is clear that all that matters to him is his country.

He spoke about major investments in America (singling out companies like Apple, Chrysler and Mazda), reduction of taxes, investing over US$ 1.3 trillion in infrastructure, immigration, and strengthening the defence forces and other services like border guards, police forces and the fire service. He peppered his long speech with very well placed examples of people who had been carefully selected and invited to this address. He took time to discuss the need for protecting the citizens of the country. He spoke about setting up vocational schools to train the next generation of young Americans.

He spoke at length about the cost of medicines and his plans to reduce these costs very soon. He also referred to the need to respect their National Anthem and their National Flag. He was applauded regularly by the Republican benches and several times, albeit reluctantly, by the Democratic benches. He asked for a bi-partisan approach to many challenges being faced by the country.

As he spoke, I tried to draw a parallel with the Indian parliament. Would our Prime Minister be able to make a long speech in parliament without loud challenges from the opposition benches and without people rushing into the well or tagging a walkout? Would the opposition, even reluctantly, applaud the Prime Minister and this Government for so many achievements?

The analysts are busy tearing apart his speech on every channel and I am sure the newspapers in the morning will be full of views and counter views on his speech. Critics are talking about what he did not say instead of talking about what he did say. Here is a President who is refocusing his energies on his own country and is moving away from providing leadership to the World. His “Make America Great Again” slogan appeals to his constituents but shakes up the rest of the World who have got used to looking towards America to provide leadership first and then blaming America when things do not go as per plan.

The challenges we face in India are no different. Our Prime Minister too is faced with a small group of high decibel politicians and journalists whose only aim is to critique every action that is taken and every word that is uttered by him. Mr Modi’s challenges are much greater. Not only does he have an over aggressive group of opposition parties who can never hope to present a bi-partisan face given their wide disparities, he can never think of supporting or naming businesses since he can never be identified with any business group.

India too needs huge investments in infrastructure in our economy. We need more and better roads and better public transportation. We need more airports and river transportation. We need clean energy and clean air. We need improved healthcare and cheaper medicines and improved educational facilities. We need cheap housing for our masses. We need more control of our borders (yes we have a huge problem of illegal immigrants from our neighbouring country on our east). In a country adding 27 million children every year, we need strong and determined policies to create more jobs. We need to support and galvanise the Make in India philosophy because only then will be create value added jobs for our people.

We need more respect for our defence forces and we must stop these ridiculous FIR’s against the Indian Army. We need a very strong policy to manage our over aggressive neighbour on our western border and therefore we need to improve on the arms and facilities for our armed forces. Our space programme needs to be supported not simply because we want to “reach for Mars” but because this technology helps develop more reliable defence capabilities.

Since Independence, the “roti, kapda, makan” promises have been made by successive politicians and the gap between the rich and the poor has continued to widen. Too much has been done for a few who have amassed huge wealth under the guise of providing employment. We need to ensure that the “have-nots” in our country which comprises of agricultural workers, blue collar workers, people in rural and semi urban India and those people who have never benefited from the largesse of previous Governments are provided opportunities in a nation that belongs to all of us.

We need to provide opportunities for our millennials and beyond, the people who will power our nation into the next few decades. All this can be delivered only by a strong and committed leadership who will be able to follow through on tough reforms despite criticism.

We need India to be take its rightful place in the comity of nations. We need to provide leadership in South Asia and in the World. For this we need a strong and unwavering foreign policy.

As President Trump ended his speech with “God bless America”, I wondered if a similar statement could be made by Prime Minister Modi. If he did, there would be an uproar of “which God” he was referring to and which audience he was selectively “blessing”!

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies. A keen political observer, he is an Angel Investor and Executive Coach. He is the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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PM Modi at Davos

180124 Davos

“What an amazing speech” was my immediate response as Prime Minister Modi concluded his almost hour long speech at the World Economic Forum opening ceremony.

Having been to Davos several times in the late nineties and heard many world leaders, I thought this was one of the finest speeches I had heard in a long time. It was also a very proud moment to hear him speak in Hindi.

Here was leader who combined the depth and knowledge of Indian civilisation with the current day issues of Climate Change, Terrorism and Protectionism and rising national walls to slow down globalization in the World. He forcefully made his pitch investments into India while talking of inclusive growth for every citizen of the country.

Very interestingly, the Prime Minister set the context of his talk at Davos referring to the last visit by an Indian PM to Davos in the mid-nineties when Euro as a currency did not exist, tweeting was done by the birds, Google did not exist, Amazon was a jungle and Osama bin Laden and Harry Potter was unheard of. That was the last millennium, he said where India was a US$ 400 billion economy.

Quoting frequently from the Upanishads, Vedas and ancient scriptures, he spoke about climate change and India’s philosophy of being in sync with Mother Nature. He spoke passionately about India’s target of 175 gigawatts of renewable energy by 2022 and he proudly announced that in the first three years India has already achieved 60 gigawatts. This was India’s answer to contributing to climate change.

Though he did not dwell too much on terrorism, he spoke about it as one of the three challenges the World faces today, clearly stating that there must be no distinction between good terrorists and bad terrorists.

The 2017 speech of Chinese President Xi Jin Ping at Davos addressed the need for globalization. Mr Modi spoke about his concerns about how countries were turning towards protectionism using tariff and non-tariff barriers. This would hurt the process of globalization he felt.

Singling out data as a major driver in the World that will offer solutions for technology driven transformation, he said that an underlying risk would be that whoever controls data may rule the World.

Mr Modi spoke about the many achievements of his Government at some length.

He spoke about foreign direct investment and the fact that almost every sector in the economy are now open for foreign investors. He referred to the direct benefit transfer schemes in India as well as to the “Beti bachao and Beti padhao” scheme. He also spoke about the removal of over 1400 laws that had slowed down progress and growth. He spoke about the youth of India getting unshackled so that they could find opportunities for growth and development.

He commented about the role Indian soldiers played in the first and second World Wars without any territorial or financial benefits and continue to play in the UN peace keeping forces around the World. He also referred to the over 150,000 lives Indian soldiers laid down in the past century, defending the World. He also spoke about India being a good World citizen, helping Nepal, Yemen and many other nations in Africa. He emphasized that India has never had designs on the territory of any other nation.

PM Modi has put his best foot forward as a global statesman, positioning India amongst the leaders in World affairs. At the same time, he has talked about Indian youth ready to propel their country into becoming a US$ 5 trillion dollar economy making it the third largest economy in the World.

He spoke about the philosophy of his Government outlined as Reform, Perform and Transform. “A predictable, stable, transparent and progressive India will continue to be the good news in an otherwise state of uncertainty and flux” he said. As a consummate salesman, he ended by saying that if the world wants “Wealth with Wellness”; “Health with Wholesomeness” and “Prosperity with Peace”, come to India.

It is my view that the chairs placed at the “head table of the World” have now been vacated since the Second World War. President Trump is looking inwards and focusing on the US economy. Prime Minister May is struggling with her nation to contain the after effects of Brexit. Chancellor Merkel is busy trying to cobble together an alliance in Germany so that she continue to govern. Japan is tied down with an aggressive North Korea and an ageing population and President Putin is busy coping with a very weak economy.

China always loves a vacuum and is moving quickly, under the determined leadership of President XI Jin Ping, to try and occupy one of the chairs at the head table of the World.

It is now upto Prime Minister Modi to guide India economically, politically, socially and culturally to take one of the other chairs at the head table of the World. A place that has always belonged to India for many centuries.

India will need to understand and address the challenges the World is facing and begin to think beyond our own problems alone.

Only this thinking will truly position India as a global super power.

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies and the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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