चिकनगुनिया, डेंगू – क्या हम तैयार हैं?

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बिहार में चमकी बुखार (इंसेफेलाइटिस) पर फौरी तरीके से काम हुआ, इसे सभी ने देखा है। हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में इस तरह की उदासीनता होना दुखद और भयावह है।

मानसून आने वाला है।

मलेरिया, जो माना जाता था कि दिल्ली से लगभग गायब हो गया है, वह विकराल रुप धरकर वापस आ गया है। चिकनगुनिया मच्छर से उत्पन्न एक उभरती हुई बीमारी है जो अल्फावायरस, चिकनगुनिया विषाणु के कारण होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से एडीज इजिप्ती और ए अल्बोपिक्टस मच्छरों द्वारा प्रेरित है, इसी प्रजाति के मच्छरों से डेंगू का संचरण होता है।

हमने देखा है कि चिकनगुनिया के परिणामस्वरूप तेज़ बुखार आता है, जिसमें बेहद कमज़ोरी लाने वाला दर्द होता है, खासकर जोड़ों में। गंभीर मामलों में चकत्ते भी देखे जा सकते हैं। कमजोरी, चक्कर आना, निरंतर होने वाली उल्टी की वजह से निर्जलीकरण, मुँह का स्वाद बहुत खराब हो जाना और खून निकलना इसके खतरनाक लक्षण होते हैं। हमें कितनी ही बार बताया गया है कि हमें कहीं भी पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए और पानी के प्रबंधन के गलत तरीकों की वजह से बहुत से लोगों का चालान भी काटा जा चुका है!

जब कभी किसी महामारी से सामना हुआ है, राजनेताओं ने नौकरशाहों को दोषी ठहराया, नौकरशाहों  ने दिल्ली नगर निगम को दोषी ठहराया और नगर निगम ने फिर राजनेताओं को दोषी बताया। मंत्रीगण इसके औचित्य को सही ठहराते हुए उन कारणों की बात करते हैं, जिसकी वजह से यह हर साल होता है और अन्य सरकारों के समय भी यह कैसे होता रहा है, यह बताने लग जाते हैं। टीवी एन्कर्स गला फाड़ कर चिल्लाते हुए जवाबदेही ठहराते हैं और समाचार पत्र इन कहानियों को अपनी सुर्खियाँ बनाते हैं, पर धीरे-धीरे वे अंदर के पन्नों में चली जाती हैं।

गरीब मरीज़ों को अपने प्रियजनों के साथ रोते-बिलखते एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में दौड़ना पड़ा।

लेकिन जीवन का अद्भुत चक्र जारी रहेगा। मानसून आता रहेगा और लौट जाएगा, सैलाब कम होता जाएगा और एक दिन सूख जाएगा, और अस्पतालों में रोगियों की संख्या कम हो जाएगी, समाचार चैनलों से ये ख़बरें ग़ायब हो जाएँगी और उम्मीद रहेगी कि अगले वर्ष तक फिर मच्छर जनित बीमारियाँ नहीं दिखेंगी। हर कोई फिर राहत की साँस लेगा और हमारे देश में जैसा कि हर महामारी या आपातकाल के बाद हमेशा होता है, उस साल की समस्या का “प्रबंध” कर लिया जाता है और जैसे कि लोगों की याददाश्त बहुत कम होती है, सो इस साल की चुनौतियां जल्द ही भुला दी जाती है।

स्वास्थ्य की डरा देने वाली बातों पर बिना सोचे प्रतिक्रियाएँ दे देना हमारे लिए अपवाद के बजाय आदर्श हैं।

मानसून, मच्छर और बीमारियाँ हर साल आती हैं। हम जानते हैं कि इस समस्या की हर साल पुनरावृत्ति होती है और जब तक हम इस रोग का उन्मूलन करने में सक्षम नहीं हो जाते है, तब तक सालों-साल यह जारी रहेगी। तो ऐसा क्यों है कि हम पहले ही योजना नहीं बना पाते और इन मच्छरों से उत्पन्न बीमारी के प्रभाव की गंभीरता को कम नहीं कर पाते? हमारी सरकारें क्यों ऐसा कोई कर्मी दल नहीं बनाती, जो केवल आने वाले वर्ष की योजना पर ध्यान केंद्रित करें?

सरकार के लिए मानसून से पहले निम्न कदम उठाना काफी सरल होगा (हालाँकि इस वर्ष के लिए पहले ही बहुत देर हो जाने की आशंका है):

  1. पहचान क्षेत्रों का नक्शा उतारना– उम्मीद है, पिछले वर्षों के अनुभव के बाद, हमारे शहरों के अधिकारियों ने उन सभी क्षेत्रों का नक्शा उतारा होगा, जिसे उन्होंने जल संग्रहण के प्रवण के रूप में पहचाना है। उचित नियोजन के साथ, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मानसून की शुरुआत से पहले ऐसे सभी क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए कदम उठाए गए हैं।
  2. महामारी संबंधी सबूत– चालू वर्ष के अभिलेखों के आधार पर हमारे स्वास्थ्य शोधकर्ता इस वायरस से संबंधित गंभीरता को जानते होंगे और इसे काबू में लाने की चिकित्सकीय आवश्यकता को पहचानते होंगे।
  3. प्रकोप की त्वरित रपट करना आवश्यक है– इसका मतलब होगा कि जिन क्षेत्रों में समस्या देखी गई, वहाँ के हालात का जायजा लेने के लिए कक्ष/ निगरानी और मूल्यांकन केंद्र स्थापित करने होंगे। जिनका पूरे उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी के साथ स्पष्ट रूप से दस्तावेजीकरण कर उसका संचारण करने की आवश्यकता है।
  4. प्रयोगशालाएँ– यह हर साल की बड़ी बाधा बन चुकी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रयोगशालाएँ ज्ञात हो और नागरिकों तक उनकी जानकारी पहुँचे। और निश्चित रूप से, हमें आवश्यक जाँचों के लिए शुल्क सूची की ज़रूरत है और उसकी अग्रिम घोषणा करनी होगी।
  5. प्रतिक्रिया– प्रयोगशालाओं से हर घंटे डेटा एकत्रित करने की आवश्यकता है और अध्ययन सुधार के लिए विश्लेषण करना होगा। कुछ रोगियों के लिए देरी घातक साबित हो सकती है। पहले से तैयार समूहों से डेटा और अध्ययन सुधार को तेजी से करने में मदद मिलेगी।
  6. अनुदान- महामारी से निपटने की तमाम कार्रवाई के लिए अनुदान पहले से ही अलग रखा होना चाहिए, जिसे अब निकाला होगा। बजट और तदर्थ स्वीकृतियों के लिए हाथ-पैर मारने में समय बर्बाद होता है और तब तो यह अस्वीकार्य है, जब वह समय नष्ट हो जाता है जिसमें मनुष्य के जीवन को बचाया जा सकता है।
  7. अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम और डॉक्टरों को पहचानकर उन्हें सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। संपर्क दूरभाष क्रमांक और परीक्षण तथा उपचार के लिए पूर्व निर्धारित कीमतों की जानकारी को व्यापक रूप से विज्ञापित किया जाना चाहिए।

नागरिकों की शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना चाहिए न कि तब तक राह देखनी चाहिए जब तक समस्या सिर न उठा लें। इन क्षेत्रों में शिक्षित करने की आवश्यकता है, जैसे किस बात पर गौर करें और बीमारी की रपट कहाँ करें। लोगों को साथ ही शिक्षित करना होगा कि वे अपने घरों को मच्छर मुक्त रखें। घर के सभी कमरों में  सुरक्षित एयरोसोल का स्प्रे करें, मच्छरदानी का उपयोग करें, पानी के बर्तनों को ढाँक कर रखें, पानी के टैंक, पालतू जानवर के कटोरे और गमलों के नीचे रखी प्लेटों को सूखी रखें और पानी को जमा न रहने दें तथा  इस तरह के अन्य निवारक कदम उठाएँ।

एक बार स्पष्ट रूप से प्रलेखित योजना पर सहमती बन गई,तो इसे सक्रिय रूप से क्रियान्वित करना अपेक्षाकृत आसान और तेज़ हो जाएगा।

यदि श्रीलंका, मलेरिया के सबसे बुरे शिकारों में से एक, मलेरिया मुक्त हो सकता है, जैसा कि सितंबर 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित किया गया है, तो क्या यह आशा करना बहुत कठिन है कि भारत भी स्वच्छता के स्तर तक पहुंच सकता है, जहाँ मलेरिया और अन्य मच्छरों की वजह से होने वाली अन्य बीमारियाँ हमारे नागरिकों को प्रताड़ित नहीं करेंगी?

अंत में, बड़े पैमाने पर कोई स्वास्थ्य कार्यक्रम तब तक काम नहीं कर सकता जब तक कि स्पष्ट उत्तरदायित्व स्थापित न हो। किसी राजनेता, नौकरशाह या स्वास्थ्य कर्मचारी को अपने हाथ खड़े कर देने या कंधे झटकने की अनुमति नहीं मिल सकती है।

स्वास्थ्य किसी एक राज्य का विषय हो सकता है, लेकिन भारत की नागरिकता किसी राज्य भर की बात नहीं है।

अगर महामारी पर नियंत्रण पाना है तो केंद्र और राज्य के बीच सहयोग जरूरी है।

आरोप-प्रत्यारोप का खेल तुरंत रोकना होगा।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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Chikungunya, Dengue – Are we prepared?

170514 Aedes Mosquito

The inept handling of Encephalitis in Bihar is there for everyone to see. It is sad and appalling to see the apathy in our health care system.

The monsoons are around the corner.

Malaria, which was supposed to have almost disappeared from Delhi is back with a vengeance. Chikungunya is an emerging, mosquito-borne disease caused by an alphavirus, Chikungunya virus. The disease is transmitted predominantly by Aedes aegypti and Ae. Albopictus mosquitoes, the same species involved in the transmission of dengue.

Over the years, we have learned that Chikungunya results in high fever accompanied with severe debilitating pain, especially in joints.  Rashes can also be seen in severe cases. Weakness, dizziness, continuous vomiting leading to dehydration, very poor oral intake and bleeding are dangerous signs. We have been told that we must not let water collect anywhere and many people have been challaned because of their errant ways in managing water!

When confronted with an epidemic, politicians will blame bureaucrats who will blame the Municipal Corporation of Delhi who in turn will blame the politicians. Ministers will justify and find reasons on how this happens every year and happened under other Governments. TV anchors will scream at the top of their voices about accountability and newspapers will give these stories headlines, gradually relegating them to inside pages.

The poor patients will be left running from one hospital to another, crying for their loved ones.

The wonderful cycle of life will continue. Monsoons will retreat, water logging will dry up, hospitals will see lesser patients, the subject of ill patients will disappear from the news channels and hopefully, mosquito borne diseases will disappear for one more year. Everyone will heave a collective sigh of relief and as always happens in our country after every epidemic or emergency, the problem of this year would have been “managed” and given the short public memory, this year’s challenges would soon be forgotten.

Knee jerk reactions to a health scare seems to be the norm rather than the exception with us.

The monsoons, the mosquitos and the diseases come every year. We know that this problem recurs every year and will continue to recur in the years ahead till we are able to eradicate the disease. So why is it that we are not able to plan earlier and reduce the severity of the impact of these mosquito borne disease? Why don’t our Governments have a task force that will focus on planning for the coming year?

It would be fairly simple for the Government to take the following steps before the monsoons (though this may already be too late for this year):

  1. Identify and map the areas – Hopefully, after last years’ experience, the authorities would have mapped all the areas in our cities which they have identified as prone to collection of water. With proper planning, we can ensure that steps are taken to rectify all such areas well before the onset of the monsoons.
  1. Epidemiological evidence – Based on the records for the current year our health researchers would be aware of the strain of the virus and medication needed to handle this.
  1. Quick reporting of the outbreak is essential – this would mean setting up situation rooms / monitoring and evaluation centres in areas where we have seen the problem. These need to be manned and monitored with clear accountability and responsibility documents and communicated.
  1. Laboratories – These become a huge bottleneck every year. We should ensure that laboratories are identified and communication sent to the citizens. And of course, we need the tariffs for tests agreed and announced in advance.
  1. Feedback from laboratories needs to be collected on an hourly basis and analysed for course correction. Delays can prove to be fatal for some patients. The teams that should collect feedback should be ready now rather than hurriedly put together before the mosquitos strike.
  1. Funding for the epidemic needs to be set aside for all the actions that need to be taken now. Scrambling for budgets and ad hoc approvals is time consuming and unacceptable when the time lost can save lives of human beings.
  1. Hospitals, clinics, nursing homes and doctors should be identified and numbers and prices need to be widely advertised well before the outbreak.
  1. Education of the citizens is an ongoing matter and should become a part of the curriculum of schools rather than delay action till the problem strikes. Education should be in the areas of what to watch out for and where to report the disease. In addition, people need to be educated on making homes mosquito free; spraying all rooms with safe aerosols; using mosquito nets; covering water containers; drying water tanks, pets’ bowls and potted plant plates; not letting water stagnate and other such preventive steps.

Once a clearly documented plan is agreed and in place, getting it activated will be quick.

If Sri Lanka, one of the worst victims of malaria, can become malaria free, as certified by the World Health Organisation in September 2016, is it too difficult to hope that India too can reach levels of cleanliness where malaria and other mosquito borne diseases will no longer plague our citizens?

Finally, no mass health programme can work unless there is clear accountability established. No politician, bureaucrat or health worker can be permitted to throw up their hands and shrug their shoulders.

Health is a state subject, but citizenship of India is not.

Collaboration between the centre and the state is essential if epidemics need to be handled.

The blame game needs to stop immediately.

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The author is an Executive Coach, a Storyteller and an Angel Investor. He hosts the highly successful podcast titled The Brand Called You. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books and writes for several online newspapers. 

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भाजपा की लोकसभा 2019 में जीत के 12 कारण

 

190422 Lok Sabha Elections

चुनाव हो गए और परिणाम भी आ गए हैं। ज़ाहिरन श्री मोदी के नेतृत्व ने नए दम से खड़ी भाजपा को रिकॉर्ड तोड़ जीत दिलाई है। यह ऐसा चुनाव था, जिसमें मतदाताओं ने घरों से निकलकर श्री मोदी के लिए मतदान किया, श्री मोदी के उन कामों के लिए मतदान किया, जो उन्होंने किए या जिनका शुभारंभ वे वर्ष 2014 में कर चुके थे और अब मतदाताओं ने उन कामों को पूरा करने के लिए समय दिया है।

कुछ पत्रकारों द्वारा फैलाए गए झूठ और बेबुनियाद ख़बरों को मतदाताओं ने सिरे से खारिज कर दिया है। विपक्ष का संदेश “मोदी हटाओ” खारिज किया जा चुका है। राजद्रोह के लिए कानून बनाने का काँग्रेस का वादा स्वीकार नहीं किया गया है। उनके भगवा आतंक के दावे को खारिज कर दिया गया है। विपक्षी नेताओं का यह दावा कि राष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौता किया गया, उसे भी दृढ़ता से खारिज किया जा चुका है। लोकतंत्र पर मंडराते तथाकथित खतरे को अस्वीकार कर दिया गया है।

दूसरी ओर, श्री मोदी के कथन “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” पर भरोसा और विश्वास जताकर उसे गले से लगाया गया है।

इन चुनावों से स्पष्ट है कि मुख्य रूप औसत भारतीय मतदाता अपने लिए क्या चाहता है:

  1. स्वच्छ प्रशासन: विभिन्न गैर-भाजपा सरकारों के पिछले 70 वर्षों के अति भ्रष्टाचार की अविश्वसनीय चरम सीमा से हम सब नाराज और क्षुब्ध हो चुके हैं।
  1. देश का मजबूत आर्थिक विकास जिससे संपदा और रोजगार का सृजन होगा।
  1. सुरक्षित वातावरण, न कि लगातार संभावित खतरों की आशंकाएँ, जो हमें और हमारे परिवारों को शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचा सकती है। हमें अपने कंधों पर कोई बोझ होने का डर न हो। न हम किसी अज्ञात बैग की आशंका से मेज और कुर्सियों के नीचे बैठने से पहले देखना चाहते हैं।
  1. जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ स्वच्छ वातावरण ताकि हम अपने परिवारों के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

आइए हम उन कारणों की पड़ताल और जाँच करें जिनसे व्यक्तिगत रूप से श्री मोदी के खिलाफ विपक्षी नेताओं की इतनी नकारात्मकता के बावजूद भाजपा ने चुनावों की लहर को अपनी ओर कर लिया।

  1. सकारात्मक रिपोर्ट कार्ड: पिछले चुनावों के दौरान वर्ष 2014 में श्री मोदी ने वादा किया था कि वे वर्ष 2019 में अपने रिपोर्ट कार्ड के साथ निर्वाचन क्षेत्र में वापस आएँगे। पहले पाँच साल के कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुल मिलाकर, मतदाता श्री मोदी के शासन और भारत के लिए निर्धारित दिशा से संतुष्ट थे। मतदाताओं ने सरकार की सभी योजनाओं का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने अपने जीवन में इन योजनाओं के प्रभाव का अनुभव किया है। उन्होंने उन नीतियों की निरंतरता के लिए मतदान किया है। मतदाताओं ने श्री मोदी को एक मौका और दिया है।
  1. अर्थव्यवस्था: अब भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और क्रय शक्ति समानता के मामले में दूसरी सबसे बड़ी ताकत है। श्री मोदी भारत को अगले दशक के त्वरित विकास के लिए पटरी पर ले आए हैं। यह ऐसा नेता है जो हर संभव मजबूत निर्णय लेने में संकोच नहीं करता है चाहे वे निर्णय अर्थव्यवस्था से संबंधित हों या मौलिक संहिता सुधार के जैसे कि दिवालियापन संहिता। इन सुधारों का प्रभाव अब आने वाले 5 वर्षों में पूरी तरह से महसूस किया जा सकेगा।
  1. स्वच्छ सरकार: श्री मोदी ने अपने बाधकों के मन में भी स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया है कि वे साफ-सुथरे हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया है कि उनकी सरकार में कोई भ्रष्टाचार न हो। पिछले पाँच वर्षों में छोटा- बड़ा कोई घोटाला नहीं हुआ है। राफेल सौदे की चर्चाओं ने मतदाताओं पर कोई प्रभाव नहीं डाला और श्री मोदी के खिलाफ़ श्री गाँधी के भ्रष्टाचार के आरोपों ने काम नहीं किया। जितना अधिक श्री गाँधी ने श्री मोदी के बारे में दुष्प्रचार किया, उतना ही उन्होंने मतदाताओं को श्री मोदी के करीब कर दिया।
  1. विदेश नीति: भारत अब राष्ट्र मंडली में कद्दावर हुआ है। पाकिस्तान को छोड़ दे तो भारत सभी पड़ोसी देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध विकसित करने में कामयाब रहा है। साथ ही भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस तथा उसी तरह ईरान और इजरायल के साथ स्वतंत्र और मजबूत एवं चीन के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत रखने में सफल रहा है। मतदाता ने भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते सम्मान को माना है। इन नीतियों का प्रभाव भारतीय पासपोर्ट के प्रति बढ़ते सम्मान में देखा जा सकता है। 
  1. महागठबंधन: महागठबंधन काम न आ सका। निश्चित रूप से उस तरीके से नहीं, जिस तरह राहुल गांधी ने खुद ही सभी के एक नेता के रूप में खुद को ताज पहनाया था। क्षेत्रीय नेताओं के इस अभिप्रेरक समूह के किसी भी घटक के पास कोई सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम नहीं था और न ही उन्होंने मतदाताओं के सामने समान मूल्यों के मानक समुच्चय को प्रस्तुत करता प्रतिनिधित्व दिया था। महागठबंधन के युद्धरत नेताओं ने अपने असली रंग दिखाए क्योंकि वे नुकीली ज़ुबान से बात करते रहे। एक ही रौ में वे अपने गठबंधन सहयोगियों की आलोचना भी करते रहे और प्रशंसा भी। इन राजनीतिक दलों के नेताओं को जितना लगता है कि मतदाता उन पर विश्वास करता है उससे कहीं अधिक भारतीय मतदाता चाणाक्ष हैं।
  1. राहुल गाँधी: जब यह लेख छपने के लिए तैयार था तभी, श्री गाँधी अमेठी में 17,000 से अधिक वोटों से पीछे चल रहे थे। यह नुकसान इसे भी स्थापित करेगा कि कैसे वे कोई भी परिणाम दिलवाने में सक्षम नहीं है। यद्यपि वे यह मानना चाहते हैं कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में उनकी जीत केवल उनके खाते में थी, अगर कोई लोकसभा चुनाव में पड़े मतों को देखे, तो वह संख्या अलग कहानी बताती है। श्री गाँधी ने भारत के लिए कोई भी स्पष्ट दृष्टिकोण या नए मार्ग की घोषणा नहीं की। उनकी न्याय योजना की बिना किसी विचार के घोषणा कर दी गई और उनके सलाहकार सैम पित्रोदा ने उनकी कोई मदद नहीं की, नियमित अंतराल पर उनके मुँह से गोले ही बरसते रहे। प्रियंका गाँधी ने वोटों को तोड़ने में थोड़ी कामयाबी हासिल की, जैसा कि उन्होंने कहा था, लेकिन यह सपा-बसपा गठबंधन के लिए हुआ।
  1. हिंदी के गढ़ और पश्चिमी भारत: हिंदी के गढ़ और महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों की जनता के दिलों में अभी भी श्री मोदी हैं। उन्होंने तीन राज्यों में भाजपा को मत देकर बाहर कर दिया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने बाहर निकलकर मोदी के लिए बहुत बड़ी संख्या में मतदान किया, जो आज देश के सबसे बड़े नेता हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा ने भी श्री मोदी का स्वागत किया है। विभाजनकारी राजनीति को मतदाताओं ने नकार दिया है और यह आने वाले वर्षों में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। 
  1. बुनियादी ढाँचा: भारत के बुनियादी ढाँचे में सुधार दिख रहा है। नई सड़कों के निर्माण से लेकर हवाई अड्डों तक और बेहतर बिजली आपूर्ति से लेकर सुपर-फास्ट ट्रेनों तक, सभी के लिए बेहतर बुनियादी ढाँचे की दिशा का मार्ग दिख रहा है। वर्ष 2014 से पहले, हमने अपने दैनिक जीवन के एक हिस्से के रूप में “लोड शेडिंग” को स्वीकार कर लिया था। जो अब बंद हो गया है। मतदाताओं का मानना है कि अभी और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है और उन्होंने श्री मोदी को इसके लिए एक और कार्यकाल का समय दिया है ताकि जो काम शुरू हुए थे, उन्हें पूर्णत्व की ओर ले जाया जा सकें। 
  1. मिलियन समर्थन: वर्ष 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले 80 मिलियन नए मतदाताओं ने मोदी के पक्ष में भारी मतदान किया। इन युवा भारतीयों का अयोध्या या राम मंदिर से कोई संबंध नहीं है, लेकिन श्री मोदी में, ये मिलियन युवा एक ऐसा नेता देख रहे हैं, जो उनके सपनों का भारत दिलवा सकता है। वे अपनी जीवन शैली में समग्र सुधार देखते हैं, और वे भारत के प्रति वैश्विक रवैये में परिवर्तन देख सकते हैं। 
  1. आतंक पर सख्त: पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमले का परिणाम सभी के सामने हैं। अगर पुलवामा हमले के बाद विपक्ष ने सरकार की आलोचना नहीं की होती, तो उन्हें बालाकोट हवाई हमलों के बाद धूल चाटनी नहीं पड़ती। मतदाता यह स्वीकार करता है कि केवल श्री मोदी को कड़ी टक्कर देने की हिम्मत थी और वे ऐसा नेता चाहते हैं जो देश की सीमाओं की रक्षा कर सके। 
  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था: हालाँकि विपक्षी दल चाहेंगे कि हम दूसरे तरीके को सही मानें लेकिन तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों के आँकड़े ग्रामीण भारत में अपनी बिक्री में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हैं। कुछ भी हो, श्री मोदी ने गरीबों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। न्याय योजना आसमान में एक कौड़ी भर थी, जबकि किसानों को सीधे लाभ हस्तांतरण ने बदलाव दिखा दिया। अधिक करने की आवश्यकता है और श्री मोदी निश्चित रूप से अपने एजेंडे में शीर्ष पर होंगे। 
  1. राजवंशीय राजनीति खारिज: भले ही काँग्रेस को 2014 के चुनाव के बाद से कोई विकास नहीं दिख रहा है। लेकिन काँग्रेस नेताओं को इस बारे में गंभीर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या उन्हें “परिवार” के सदस्य को नेता बनाये रखा जाना चाहिए या फिर स्वयंसेवकों को फिर से सक्रिय करने के लिए नए खून का संचार करना चाहिए। 22 विपक्षी दलों के नेता जो अपनी पार्टियों पर अपने परिवार की पकड़ को बनाए रखने के लिए दृढ़ थे, उन्हें भी खारिज कर दिया गया है। क्या अब ये नेता अपने काँटेदार पैतरे दिखाना शुरू कर देंगे क्योंकि उनके मतभेद खुलकर सामने आएँगे या फिर भी वे एक मंच पर हाथ से हाथ मिला रहने में सक्षम होंगे, यह दिखाने के लिए कि वे एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं!

विपक्षी नेता चुनाव प्राधिकरण बदलने की माँग, पक्षपातपूर्ण चुनाव आयोग, नकारात्मक चुनाव और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की वापसी जैसे बहाने बनाते रहेंगे, लेकिन वे भी थोड़े समय में ही महसूस करेंगे कि ये खुद को समझाने के बहाने हैं। कोई भी मतदाता उनके किसी भी बहाने पर विश्वास नहीं करता। विपक्षी नेताओं के लिए, आत्मनिरीक्षण का समय आ गया है।

श्री मोदी के नेतृत्व में भारत को सर्वोत्कृष्ट मिलना अभी शेष है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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12 Reasons why BJP has won Lok Sabha 2019

190422 Lok Sabha Elections

The elections are over, and the results are out. Clearly, Mr Modi has led a resurgent BJP to a record victory. This was an election where the voter came out and voted for Mr Modi, for the work that he has done and to give him to complete what he started in 2014.

The lies and the canards spread by some journalists have been rejected by the voters. The single message of the opposition “Modi Hatao” was rejected. The Congress promise of doing away with the legislation for sedition was not accepted. The claim of saffron terror was rejected. The claim of opposition leaders that national institutions have been compromised was strongly rejected. The so-called threat to democracy was rebuffed.

On the other hand, Mr Modi’s statement of “Sabka Saath, Sabka Vikas, Sabka Vishwas” was trusted, believed and embraced.

What is clear from these elections is that the average Indian voter is primarily interested in getting:

  1. A clean administration. We have been angered and frustrated with the incredible amount of corruption that has been seen over the last 70 years in various non-BJP governments.
  1. Strong economic growth of the country which will lead to wealth creation and job creation.
  1. A secure environment without constantly having to look for potential threats that could physically harm us and our families. We do not want to keep looking over our shoulders. Nor do we want to keep looking under tables and chairs for unidentified bags.
  1. A clean environment with all the necessities of life so that we can live normal lives with our families.

Let us explore and examine the reasons why the BJP has swept the polls despite so much negativity from opposition leaders against Mr Modi personally.

  1. Positive Report card: During the last elections in 2014 Mr Modi had promised that he would come back to the electorate in 2019 with his report card. A lot has been written about the significant achievements in the first five-year term. In overall terms, the electorate was satisfied with Mr Modi’s governance and the direction he had set for India. The voters strongly endorsed all the schemes of the Government. They have experienced the impact these schemes have made in their lives. They have voted for a continuance of his policies. The electorate has given Mr Modi another chance.
  1. Economy: India is now the sixth largest economy in the world and the second largest in terms of purchasing power parity. Mr Modi has put India on track for quick growth in the next decade. Here is a leader who has not hesitated to take the strongest possible decisions whether they relate to the economy or to make fundamental course corrections such as the bankruptcy code. The impact of these reforms will now be felt more completely in the coming 5 years.
  1. Clean Government: Mr Modi has clearly established even in the minds of his deterrents that he is squeaky clean. He has made every possible effort to make sure that there is no corruption in his government. There has been no major or minor scam in the past five years. The Rafale deal cut no ice with the voters and Mr Gandhi’s corruption charges against Mr Modi did not work. The more Mr Gandhi abused Mr Modi, the more he pushed voters towards Mr Modi. 
  1. Foreign policy: India now stands tall in the comity of nations. India has managed to develop extremely good relationships with all neighbouring states barring Pakistan. At the same time India has managed to keep strong independent relationships with USA and Russia, Iran and Israel as well as a grudging economic relationship with China. The voter has recognised the growing respect India has internationally. The impact of these policies can be seen in the increasing respect for the Indian passport.
  1. Mahagathbandhan: The mahagathbandhan has not worked. Certainly not in the manner that Rahul Gandhi had envisaged with him being crowned as the leader by one and all. None of the constituents of this motley group of regional leaders had any common minimum programme nor did they represent a similar set of values that they presented to the electorate. The warring mahagathbandhan leaders showed their true colours as they kept talking with forked tongues. Criticising and praising their alliance partners in the same breath. The Indian electorate is much smarter than what these political parties would have liked voters believe.
  1. Rahul Gandhi: At the time of this article going to press, Mr Gandhi was trailing by over 17,000 votes in Amethi. A loss here will establish how he has not been able to deliver anything of consequence. Though he would like to believe that his victory in the states of Rajasthan Madhya Pradesh and Chhattisgarh was only on account of him, if one looks at the electoral votes cast in the Lok Sabha elections, the numbers tell a different story. Mr Gandhi did not announce any clear vision or path for India. His Nyay scheme was announced without any thought and his advisor Sam Pitroda did not help him, shooting off his mouth at regular intervals. Priyanka Gandhi managed to split the votes, as she had said, but this happened for the SP-BSP combine.
  1. Hindi Heartland and Western India: The Hindi heartland and the states of Maharashtra and Gujarat clearly still have their heart with Mr Modi. They had voted out the BJP in three states but in the 2019 Lok Sabha elections, voters have gone out and voted in very large numbers for Mr Modi, clearly the tallest leader in the country today. West Bengal and Odisha have also welcomed Mr Modi. Divisive politics was rejected by the voters and this marks a significant change for India in the years ahead.
  1. Infrastructure: There is visible improvement in India’s infrastructure. From building new roads to airports and from significantly improved power supply to super-fast trains, the path towards improved infrastructure is there for everyone to see. Prior to 2014, we had taken “load shedding” as a part of our daily lives. This has now stopped. The voter believes that much more needs to be done and has given one more term to Mr Modi to complete what he started.
  1. Support of Millennials: The 80 million new voters who exercised their franchise for the first time in 2019 voted overwhelmingly in favour of Mr Modi. These young Indians have no links to Ayodhya or the Ram Temple but in Mr Modi, these millennials see a leader who can deliver the India of their dreams. They see an overall improvement in their lifestyle, and they can see the visible change in global attitude towards India.
  1. Tough on Terror: The result of the Pulwama attack and the Balakote air strike are there for everyone to see. If the opposition had not criticised the Government after the Pulwama attack, they would not have had to grind their nose in the dust after the Balakote air strikes. The voter recognises that only Mr Modi has had the courage to hit back hard and they want a leader who can protect the boundaries of the country.
  1. Rural Economy: Though the opposition parties would like us to believe otherwise, the figures of the fast-moving consumer goods companies and the automobile companies show a significant improvement in their sales in Rural India. If anything, Mr Modi has focussed his attention on the poor. While the Nyay scheme was a pie in the sky, the direct benefit transfer to farmers made a difference. More needs to be done and Mr Modi will certainly have this on the top of his agenda.
  1. Dynastic Politics Rejected: The Congress has seen almost no growth since the 2014 election. Congress leaders need to some serious introspection on whether they should continue to be led be a member of the “family” or whether new blood should be injected to energise the cadres again. The leaders of the 22 opposition parties who were determined to protect their family hold on their parties have also been rejected. Will these leaders now start to show their fangs as their differences come out in the open or will be still be able to hold hands on a stage to show how much they love each other!

The opposition leaders will continue to make excuses such as the return of Electoral Authoritarianism, a partisan Election Commission, Negative elections and the Electronic Voting Machines but they will, in due course, realise that these are excuses to convince themselves. No voter believes any of their excuses. For the opposition leaders, the time for introspection has arrived.

Under the leadership of Mr Modi, the best is yet to come for India.

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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राष्ट्रवादी होना और ऐसा कहने में गर्व होना

190504 Nationalists

चुनाव अपने लंबे वृत्त को पूरा करते हुए समापन पर आ गए हैं। इन चुनावों को सबसे अधिक दोषारोपण करने वाले चुनावों के रूप में देखा जा सकता है और बीते कुछ दशकों में मैंने तो हर राजनेता को इतनी व्यंग्य उक्तियों से भरे हुए भाषण देते पहले कभी नहीं देखा था,जितना इस बार देखा।

इसके अलावा अभी तक जितना “राष्ट्रवाद” या “राष्ट्रवादी”  वाक प्रचार इन चुनावों का हिस्सा बना वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। भाजपा के सभी विरोधी दल, पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार इस शब्द को भाजपा और उसके सभी अनुयायियों पर आरोप के रूप में फेंक रहे हैं जैसे कि राष्ट्रवादी होना कोई अपराध है और जिसे हर हाल में लताड़ा जाना चाहिए, अपमानित करना, ताने मारना, उपहास करना और दंड दिया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद आधुनिक आंदोलन है। पूरे इतिहास में हम देखते हैं कि लोग अपनी पैदाइशी मिट्टी, अपने माता-पिता की परंपराओं, और स्थापित क्षेत्रीय प्राधिकारी से जुड़े होते हैं। अमूमन 18 वीं शताब्दी के अंत तक राष्ट्रवाद सार्वजनिक और निजी गठन की भावना के रूप में पहचाना जाने लगा। राष्ट्रवाद को कई बार ग़लती से राजनीतिक व्यवहार का कारक माना जाता है।

राष्ट्रवादी व्यक्ति वह होता है जिसकी उसके राष्ट्र के साथ पहचान दृढ़ होती है और जो राष्ट्र के हितों का दृढ़ता से समर्थन करता है।

दुनिया भर में राष्ट्रवादी आंदोलनों ने व्यक्ति को उसकी पहचान बनाने और राष्ट्रीय हित को बनाए रखने में मदद की है। राष्ट्रवादी आंदोलनों की पहली लहर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में क्रांतियाँ लेकर आईं, जिनके चलते जर्मनी और इटली का एकीकरण हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पूर्वी और उत्तरी यूरोप के साथ ही जापान, भारत, आर्मेनिया और मिस्र में इसकी दूसरी लहर उठी। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी राष्ट्रवादी आंदोलन था जैसे दुनिया के अधिकांश अन्य हिस्सों का उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन।

पूरे विश्व में राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आंदोलन तेजी से बढ़ रहे हैं।

यह डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव से हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि वे निश्चित रुप से फिलीपींस के राष्ट्रपति डुटर्टे के राष्ट्रवादी हैं। तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन से लेकर इंडोनेशिया में राष्ट्रपति जोकोवी तक, जापान में प्रधान मंत्री शिंजो आबे से लेकर इज़राइल में प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तक। दुनिया भर के और भी कई देशों में और अधिक राष्ट्रवादी नेता चुने जाएँगे। चीनी और रूसी नेता अपने कम्युनिस्ट देशों में अपने लोगों की रैली निकालने के लिए राष्ट्रवाद के रूप का उपयोग करते हैं।

महत्वपूर्ण कारक जिसे समझा जाना चाहिए और जिसका अध्ययन होना चाहिए वह यह है कि ऐसा क्या है, जो इस तरह के राष्ट्रवादी आंदोलन लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रक्रियाओं के माध्यम से दुनिया भर में हो रहे हैं। ये आंदोलन फासीवादी या तानाशाही आंदोलन नहीं हैं जो बंदूक की ताकत पर हुए हैं।

क्या यह बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि शासन के अन्य सभी प्रकारों ने उन लोगों को कुछ नहीं दिया है जिसका उन्होंने आम लोगों से वादा किया था जो कि बड़े पैमाने पर दुनिया भर के अधिकांश देशों में थे। उनकी पैदाइशी भूमि के साथ पहचान उनकी निश्चितता है जिससे कोई भी राजनेता आम आदमी को दूर नहीं कर सकता है और इसलिए यह नागरिकों की राष्ट्रवादी मानसिकता का हर संभव कारण है।

द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने 4 मई 2019 के अंक में “राष्ट्रवादी जोश की वजह से नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल सुरक्षित रहने की संभावना है” शीर्षक से लेख छापा है। लेख के लेखक को मोदी सरकार के प्रदर्शन या उनके द्वारा शुरू की गई अन्य तमाम सामाजिक विकास योजनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की सराहना करने का कोई कारण नहीं है, जिससे 500 मिलियन लोग कवर होने वाले हैं। भारत ने विश्व में जो प्रगति की है, न तो उनकी रुचि उसमें है न ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत की सफलताओं को लेकर है।

द इकोनॉमिस्ट की तरह कई अन्य उदारवादी पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा की जीत का कारण और कुछ नहीं, केवल राष्ट्रवाद होगा। राष्ट्रवाद की उनकी सुविधाजनक व्याख्या संरक्षणवाद, अलगाववाद, विदेशी लोगों को पसंद न करना (जेनोफोबिया) और कुलीन विरोधी भाषणबाजी है। इन पत्रकारों के लिए कुछ मायने रखता है तो यह कि उनके और उनकी दुलारी जनजाति को क्या मिलता है। भारत की जनता को ध्यान में रखकर संधारित किए गए अभूतपूर्व कार्यक्रम इन पत्रकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए कोई मायने नहीं रखते है क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों से उन्हें कोई सीधा लाभ नहीं होता है।

राष्ट्रवाद की सदियों पुरानी नकारात्मक परिभाषाओं और धारणाओं को बदलना होगा। राष्ट्रवादी होने की सकारात्मकताओं को स्वीकार करने की ज़रूरत आन पड़ी है और देश को मजबूत बनाने में राष्ट्रवाद की भूमिका को मान्यता दी जानी चाहिए।

जो राष्ट्र से संबंधित है वह सब राष्ट्रवाद है और इसका राष्ट्र के किसी धर्म या आर्थिक समूह से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। इसे इससे भी कोई मतलब नहीं है कि कौन बहुसंख्यक है या कौन अल्पसंख्यक है। मुझे तब हैरानी होती है जब ऐसे पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों द्वारा भारत में राष्ट्रवाद को एक धर्म से जोड़ा जाता है।

ये पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार बड़ी आसानी से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि इन चुनावों में राष्ट्रवादी जोश चाबुक की मार की तरह लोगों पर पड़ेगा और नरेंद्र मोदी को फिर दूसरी बार सत्ता में लाने में मददगार होगा। चूँकि यह राष्ट्रवादी आंदोलन श्री मोदी और भाजपा को शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी दिलाने में मदद करेगा, इसलिए इसे ग़लत और अस्वीकार्य के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। क्या कुछ राजनीतिक दलों की जरूरतों के कारण उनका एजेंडा संचालित किया जा रहा है या वे वास्तव में शक्तिशाली चौथे स्तंभ के जिम्मेदार सदस्यों के रूप में कार्य कर रहे हैं?

अधिकांश भारतीयों की मूक सहमति उन विचारों (और संभवतः उनके वोटों के रूप में भी) उन लोगों के खिलाफ मजबूत हो रही है जो देश में अस्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सोच सीमा पार के उन आतंकवादियों के खिलाफ हो सकती है जो समय-समय पर भारत चोट पहुँचाते हैं और पहली बार भारतीयों को ऐसा कोई मजबूत नेता दिख रहा है जिसे पछाड़ना मुश्किल है। यह उन लोगों के खिलाफ भी हो सकता है जो “टुकडे – टुकडे” नारे का उपयोग कर भारत को तोड़ने की बात करते हैं। या यह उन लोगों के खिलाफ हो सकता है जो राजद्रोह करने को तैयार हैं और जो इतना कहकर नहीं रुकते बल्कि यह भी कह रहे हैं कि वे देशद्रोह के खिलाफ कानून को हटा देंगे।

जो साफ़ दिख रहा है वह यह कि भारत के नागरिक कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले सात दशकों में राजनेताओं की दोगली बातें बहुत सुन ली है। वे इस तरह के कथनों से भी आज़ीज आ गए हैं, जैसे

“हम इस तरह के घृणित कार्य की कड़ी निंदा करते हैं” या “हम नागरिकों के लचीलेपन का सम्मान करते हैं।”

इन सभी पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों से मेरा एक ही सवाल है कि राष्ट्रवादी होने में क्या गलत है?

मैं एक राष्ट्रवादी हूँ और ऐसा कहते हुए मुझे गर्व होता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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Nationalist and Proud to say so

190504 Nationalists

The elections are coming to the end of their long cycle. These elections have possibly seen one of the most accusative and repartee filled speeches from each politician of every party that I have heard in the past few decades.

Yet one word “Nationalism” or “Nationalist” seems to be a part of these elections as never before. All anti BJP parties, journalists and political commentators are throwing this word as an accusation at the BJP and all its followers as if being a nationalist is a crime and something that should be scorned, derided and chastised at all costs.

Nationalism is a modern movement. Throughout history people have been attached to their native soil, to the traditions of their parents, and to established territorial authorities. It was not until the end of the 18th century that nationalism began to be a generally recognized sentiment moulding public and private. Nationalism is often mistakenly regarded as a factor in political behaviour.

A Nationalistic person is one who strongly identifies with their own nation and vigorously supports the nation’s, and therefore their own, interests.

Nationalist movements around the World have helped in creating an identity and uphold national interest. The first wave of nationalist movements happened in the middle of the nineteenth century leading to revolutions in Europe, which led to the unification of Germany and Italy. Toward the end of the nineteenth century a second wave swept Eastern and Northern Europe, as well as Japan, India, Armenia, and Egypt. India’s Independence movement was also a nationalist movement like the anti-colonial movements in most parts of the World.

Nationalism and nationalist movements have been on the rise all over the World.

From the election of Donald Trump who unabashedly says that he is a nationalist to President Duterte in Philippines. From President Erdogan in Turkey to President Jokowi in Indonesia. From Prime Minister Shinzo Abe in Japan to Prime Minister Benjamin Netanyahu in Israel. More nationalist leaders will be elected in more countries around the World. Chinese and Russian leaders use a form of nationalism to rally their people in their communist countries.

The important factor to study and understand is why these nationalistic movements are happening around the World through democratically elected processes. These movements are not fascist or dictatorial movements that have happened because of the power of a gun.

Is this change happening because all other forms of governance have not delivered what they promised to the common people who have largely remained where they were in most countries around the World? Identification with the land of their birth is one certainty no politician can take away from the common man and therefore, there is every reason for citizens to have a nationalistic mindset.

The Economist magazine in its issue dated 4th May 2019 has an article titled “Nationalist fervour is likely to secure a second term for Narendra Modi.” The author of the article has no interest in the performance of the Modi Government, or all the social development schemes launched by him. They have no reason to applaud Ayushman Bharat, the largest health scheme in the World that will cover 500 million people. They have no interest in the strides India has made in the World or India’s successes in international diplomacy.

Like the Economist several other liberal journalists and political commentators have been trying to convince themselves that nationalism and nothing else will result in a BJP victory. Their convenient interpretation of nationalism is protectionism, isolationism, xenophobia and an anti-elite discourse. To these journalists all that matters is what is in it for them and their pampered tribe. An unprecedented outreach programme to the masses in India does not matter to these journalists and political commentators since such programmes do not directly benefit them.

The age-old negative definitions and connotations of nationalism must change. The positives of being a nationalist need to be accepted and the role of nationalism in making a country stronger must be recognised.

Nationalism has everything to do with the Nation and must not have anything to do with any religion or economic grouping in the Nation. It has nothing to do with who is in a majority or who is in a minority. It surprises me that nationalism in India is being linked to one religion by such journalists and political commentators.

These journalists and political commentators conclude very simply that Nationalist fervour being “whipped up” during these elections will help Narendra Modi win a second term. Since this nationalistic movement will help Mr Modi and the BJP to come back to power with a resounding victory, it must be categorised as bad an unacceptable. Is their agenda being driven because of the needs of some political parties or are they genuinely functioning as responsible members of the powerful fourth estate?

The silent majority of Indians are consolidating their thoughts (and possibly their votes) against those that are trying to destabilise the country. This thinking could be against terrorists from across the border who have hurt India time and time again and for the first time Indians see a strong leader who will hit back hard. It could be against those who speak about breaking up India using the “tukde – tukde” slogan. Or it could be against those who are willing to pardon sedition and are further stating that they will remove the law against sedition.

What is clear is that the citizens of India are saying they have had enough of the double speak they have been hearing from politicians for the past seven decades. They have heard enough comments like “we strongly condemn such a dastardly act” or “we respect the resilience of the citizens.”

My question to all these journalists and political commentators is what is wrong in being a nationalist?

I am a nationalist and am proud to say so.

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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ठोस मुद्दों के सामने नासमझ विपक्ष

190422 Lok Sabha Elections

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के दो दौर समाप्त हो चुके हैं।

विपक्षी नेताओं की आवाज और अधिक तीखी और तेज होती जा रही है क्योंकि उन्हें शायद दीवार पर लिखा साफ़ दिख रहा है। उनकी हताशा स्पष्ट है क्योंकि वे एक गैर-मुद्दे से दूसरे गैर-मुद्दे पर इस उम्मीद से उछल-कूद कर रहे हैं कि मतदाता मोदी सरकार के खिलाफ़ कुछ आरोप तो सुन लेंगे और स्वीकार कर लेंगे।

राजनेता सपाट चेहरों से झूठ बोल सकते हैं। वे बार-बार अपने झूठ को दोहराते हैं और एक स्तर पर आकर अपने ही झूठ को सच मानने लगते हैं।

आइए हम उन 10 शीर्ष गैर-मुद्दों को देखें और उनका मूल्यांकन करें जिनके बारे में विपक्षी दल बात करते नहीं अघाते हैं।

  1. भ्रष्टाचार: यह जानते हुए भी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सिद्ध कर दिया है कि सरकार में कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं है, विपक्ष भ्रष्टाचार के कुछ विश्वसनीय आरोप लगाने के लिए बेताब है, गोया जिसे मतदाता स्वीकार कर सकते हैं। राहुल गाँधी ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और खुद पर लगे आरोपों पर रोते हुए कहा कि अनिल अंबानी को विमान के बड़े ऑर्डर दिए गए थे। श्री गाँधी ने राफेल की संख्याओं को बदल दिया है और अपनी इच्छा से श्रोताओं को संबोधित करते हुए हर बार इन “राफेल” निधियों का उपयोग अलग तरीके से करते हैं, बिना यह समझे कि उनके भाषण रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और जिनकी तुलना की जाती है, और कुछ नहीं तो कम से कम एक-जैसा तो कुछ कहे। ऐसे में ज़रा भी आश्चर्य नहीं है कि अन्य विपक्षी दलों में से किसी एक ने भी इस मुद्दे को या मोदी सरकार के किसी अन्य भ्रष्टाचार के मुद्दे को नहीं उठाया है।
  1. 15 लाख रु: कई विपक्षी नेताओं की एक सामान्य टिप्पणी मतदाताओं को यह याद दिलाने की कोशिश है कि श्री मोदी ने वर्ष 2014 के चुनावों में प्रत्येक मतदाता को 15 लाख रुपये देने का वादा किया था। जब छोटे पर्दे पर पक्षपाती पत्रकार साउंड बाइट्स के लिए पूछते हैं तो वे इस माँग के लिए कुछ मतदाताओं को प्रेरित कर प्राप्त करने का प्रबंधन कर लेते हैं। यह तथ्य कि विपक्षी दल श्री मोदी का वह भाषण नहीं खोज पाए हैं, जहाँ ऐसा वादा किया गया था, जो पर्याप्त सबूत होता। अगर इस तरह का वास्तव में कोई भाषण होता, तो वर्ष 2019 के चुनावों के लिए यह एकल बिंदु एजेंडा होता।
  1. किसान संकट: किसान संकट पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह ऐसी समस्या है जो पिछले 70 वर्षों में बिना किसी खास समाधान के चली आ रही है। हमें विश्वसनीय नीति की आवश्यकता है जो यह सुनिश्चित करे कि किसानों को उनकी उपज का उचित पारिश्रमिक मूल्य मिले, उन्हें अच्छी गुणवत्ता के बीज, पर्याप्त उर्वरक, उचित भंडारण सुविधाएँ और भरपूर पानी मिले। केवल मोदी सरकार ने कृषि की इन पाँच बुनियादी आवश्यकताओं को संबोधित किया है। कृषि संकट एक चुनौती है जिसे संभालने में समय लगेगा। काँग्रेस की बार-बार ऋण माफी की परिपाटी, हमारे किसानों के लिए स्थायी वित्तीय कल्याण का निर्माण करने में मदद नहीं करती है। वे पैसा कमाने का अवसर चाहते हैं और शासकीय सूचना पर निर्भर बन जाते हैं। शरद पवार और देवेगौड़ा जैसे वरिष्ठ कृषि नेताओं ने अपने नेतृत्व में अपने राज्यों में किसान संकट और किसान आत्महत्याएँ देखी हैं। जब वे सत्ता में थे तबकी उनकी टिप्पणियों को देखना दिलचस्प होगा कि कैसे उन्होंने किसान संकट को संभाला था।
  1. रोजगार निर्माण: काँग्रेस पिछले 5 वर्षों में रोजगार सृजन की कमी से जूझ रही है। वे इसे मतदान का महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं बना पाई है क्योंकि वे इससे हज़ारों साल नहीं खरीद रहे हैं। सरकार में पर्याप्त नौकरियों का सृजन नहीं हुआ है, लेकिन विशाल बुनियादी ढाँचे पर खर्च के साथ बढ़ती अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र में बहुत सारी नौकरियाँ पैदा कर रही है। भविष्य निधि लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है। स्टार्टअप उच्च स्तर पर हैं। परिवहन क्षेत्र में अब जैसी तेजी पहले कभी नहीं देखी गई है। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों से तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों को माँग में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। सरकार को भविष्य में इसी तरह के आरोपों का सामना करने के लिए निजी और असंगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन के अधिक विश्वसनीय डेटा को जल्दी से विकसित करने की आवश्यकता है।
  1. रसायन पर अंकगणित: कुछ राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी नेता साथ आ रहे हैं तो दूसरे राज्यों में वे एक-दूसरे से ही लड़ रहे हैं। मायावती और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में साथ हैं और काँग्रेस से लड़ रहे हैं और तब भी सभी पार्टियाँ साझा विपक्षी मंच पर साथ आ रही हैं। केजरीवाल और काँग्रेस दिल्ली में अपने रास्ते जाने का फैसला कर रहे हैं लेकिन हरियाणा में वे एक साथ आना चाहते हैं। इन नेताओं का मानना है कि साथ आना वर्ष 2014 के चुनावों में मतदाताओं को जोड़ने का सरल अंकगणित होगा। वे मानते हैं कि मतदाता उनके गैर-गठबंधनों और निहित विरोधाभासों के आर-पार देख नहीं सकता है और वे भूल जाते हैं कि नेता के साथ मतदाता का रसायन संख्याओं के अंकगणित से अधिक महत्वपूर्ण है।
  1. पुलवामा और बालाकोट: दुनिया भर के युद्धों का राजनेताओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। हर विपक्षी नेता पुलवामा और बालाकोट मामले में सत्तारूढ़ दल की स्थिति में रहना चाहेगा। श्री मोदी ने सशस्त्र बलों को आगे बढ़ने की अनुमति देने का निर्णय लिया और वे इस निर्णय का श्रेय लेने का अधिकार रखते हैं। इंदिरा गाँधी ने वर्ष 1971 के युद्ध का श्रेय तब लिया जब बांग्लादेश बनाया गया था। कारगिल युद्ध का श्रेय श्री वाजपेयी को मिला। श्री मोदी को बालाकोट का श्रेय लेने का पूरा अधिकार है। पुलवामा हमले और श्री मोदी की तत्काल विश्वसनीय प्रतिक्रिया न देने की कमी के बाद विपक्षी नेता अपनी टिप्पणी भूल जाते हैं। जब कार्रवाई की गई, तो वे बेईमानी से रोने लगे। इसके विपरीत, यदि ऑपरेशन सफल नहीं होता, तो क्या विपक्षी नेता भूल जाते और विफलता को चुनावी मुद्दा नहीं बनाते?
  1. विमुद्रीकरण और जीएसटी: विपक्षी नेता समझते हैं कि विमुद्रीकरण का शुरुआती दर्द भुला दिया गया है। जीएसटी ने आम आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। विमुद्रीकरण और जीएसटी अब चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है और राहुल गाँधी इस विषय पर ढोल पीटना चाहते हैं, मतदाता के पास इन विषयों पर अधिक झूठ और असत्य सुनने का समय नहीं है।
  1. लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बचाओ: ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल लोकतंत्र को बचाने और भारतीय जनता पार्टी को वोट देकर बाहर करने की आवश्यकता के बारे में चिल्लाते रहते हैं। ममता बनर्जी तानाशाही सरकार चलाती हैं, जो विपक्ष को स्वीकार नहीं करती, केजरीवाल इन चुनावों में कोई महत्व नहीं रखते हैं। विपक्षी नेता जो धार्मिक मतों के आधार पर मतदाताओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वे उसी रौ में धर्मनिरपेक्षता का सहारा ले रहे हैं। ये विपक्षी नेता चुनावों के ठीक मध्य भारत के लोकतंत्र को बचाने की चिल्ला-चोट कर रहे हैं और दुनिया सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावों की साक्षी होने जा रही है!
  1. कोई विकास नहीं: व्यापक बयानों में कहा गया है कि पिछले 5 वर्षों में भारत में कोई विकास नहीं हुआ है जबकि सभी सूचकांकों से संकेत मिलता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। सड़कों और बिजली में हुए सुधार हर कोई देख और अनुभव कर सकता है। भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और बढ़ा हुआ कद हर भारतीय को गर्वित करेगा।
  1. कमजोर नेता: प्रियंका गाँधी तार सप्तक की आवाज में कहती जा रही हैं कि मोदी अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मोदी रहे हैं। जबकि सार्वजनिक जीवन में उनकी इस तथ्य के अलावा लगभग कोई विश्वसनीयता नहीं है कि वे अपनी दादी की तरह दिखती है, कोई भी मतदाता कभी भी इस हास्यास्पद टिप्पणी पर विश्वास नहीं कर सकता है कि जिसे वे बार-बार फैलाने की कोशिश कर रही है।उदार पत्रकारों की सेनाएँ अपने पुराने आकाओं को कुछ गोला-बारूद मुहैया कराने की उम्मीद में डेटा और पिछले भाषणों को हवा दे रही हैं। मतदाताओं को साधने की कोशिश करने में बोलबाला करते हुए साक्ष्य का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन सत्तारूढ़ दल द्वारा उनका जल्दी और प्रभावी तरीके से खंडन किया जा रहा है।

विपक्षी नेता खुद इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उन्हें किस बारे में बात करनी चाहिए। तथ्य तो यही है कि एक भी विश्वसनीय मुद्दा नहीं है और यही वजह है कि विपक्षी दल साझा मंच पर एक साथ नहीं आ पा रहे हैं। सभी विपक्षी दलों का एकमात्र साझा एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी को हटाना है। मतदाताओं को समझाने के लिए इतना भर पर्याप्त नहीं है जो अपने जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव देख सकते हैं और यह जानते हैं कि आने वाले वर्षों में वे और अधिक विकास की उम्मीद कर सकते हैं।

श्री मोदी द्वारा वर्ष 2014 में निर्धारित एजेंडा फिर वर्ष 2019 में स्पष्ट रूप से हासिल किया जा रहा है। बहुत कुछ पूरा हो चुका है और आने वाले 5 वर्षों में बहुत कुछ किया जाना है।

भारतीय हमेशा एक मजबूत नेता चाहते रहे हैं और अब हम हमारे पास वह है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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  • अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।