राहुल गाँधी – झूठे या केवल भ्रम?

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काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नामित होने के बाद लगता है कि राहुल गाँधी को अचानक अपनी आवाज़ मिल गई है, जो तब से खो गई थी, जब उनकी सरकार सत्ता में थी और संसद के अपने पहले 10 वर्षों में वे लगभग चुप या अनुपस्थित थे।

यह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे वास्तव में ऐसा लगता है कि राष्ट्र उसके पूर्वजों की वजह से उसके प्रति निष्ठा रखता है और वह हर चीज का हकदार है।

अपने परिवार के नाम के चलते वे पार्टी में शीर्ष स्थान के हक़दार हो गए। अपने पूर्वजों द्वारा किए गए त्याग और बलिदानों के कारण वे सत्ता के माया जाल और उससे जुड़ी अतिरिक्त सुविधाओं से घिरने के हक़दार बन गए। इसी वजह से वे कुछ भी कहने के हक़दार हो गए क्योंकि वे जानते हैं कि वरिष्ठ नेताओं की बड़ी टुकड़ी उनके बचाव में कूद जाएगी। इतना ही नहीं, बिना किसी जवाबदेही के देश का नेतृत्व करने की महत्त्वाकांक्षा रखने के भी हक़दार बन बैठे।

श्री गाँधी का विश्वास निश्चित रूप से इस दर्शन पर हैं कि वे यदि कोई आरोप लगाकर लंबे समय तक रोना-गाना करते हैं, कीचड़ उछालते हैं तो थोड़ा-बहुत कीचड़ तो ज़रूर चिपकेगा। उनका मानना है कि उनके अपने परिवार और पार्टी की ख़राब आर्थिक ख़्याति के चलते जहाँ उनका हर कदम कीचड़ में धँसा है, प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे बेतुके आरोपों से कलंकित हो सकते हैं। वे पहचानते हैं कि उनके और उनके परिवार को मुक्ति केवल तभी मिल सकती है, जब वे किसी भी तरह मतदाताओं को यह मनवा देते हैं कि मोदी और सत्तारूढ़ दल भी “भ्रष्ट” है!

अपने मन के गहरे भीतर वे भी जानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि इस सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है।

अत: उन्होंने झूठ की पूरी गठरी तैयार करने का फैसला किया है। यदि बार-बार और दृढ़तापूर्वक कहा जाए, तो झूठ और असत्य निश्चित ही श्रोताओं के मन में सीमित अवधि के लिए संदेह के बीज बो सकते हैं।

आइए हम उनके कुछ और हालिया झूठों और उसके बाद उनके अपने ही झूठ से पलट जाने की जाँच करें।

  1. राफेल: राफेल विमान खरीद पर राहुल गाँधी के तर्क उदात्त से हास्यास्पद की ओर बढ़ रहे हैं। उन्हें अगस्ता वेस्टलैंड एक्सपोज़र पर किसी पलटवार की आवश्यकता है जो कि जल्द ही सामने आ सकता है और बोफोर्स मामला भी अब तक मतदाताओं के दिमाग में गहरे पैठा है। नकी उकताहट भरी टिप्पणियों को शेष वरिष्ठ काँग्रेस नेता पूरी वफ़ादारी से तोता पढंत की तरह दुहरा रहे हैं, क्योंकि एक बार उनके “राजकुमार” ने बात कह दी, तो उनके पास उसके अनुपालन और बचाव के अलावा अन्य कोई विकल्प बचता नहीं है। उनके पास अपने आरोपों को स्थापित करने के लिए कुछ भी ठोस नहीं है।
  1. घोर पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म): श्री गाँधी और उनका परिवार वर्षों से कई कॉरपोरेट घरानों का लाभार्थी रहा है। अपने स्वयं के मुद्दों को छिपाने के लिए, उन्होंने प्रधान मंत्री पर घोर पूंजीवाद का इलज़ाम लगाने का मार्ग चुना है। जबकि श्री अनिल अंबानी की कंपनी की हाल ही में दिवालिएपन के लिए दायरा वाली जानकारी को श्री गाँधी ने अपनी सुविधा से नजरअंदाज कर दिया है, क्योंकि यह उनके कथन उनके खिलाफ़ है।
  1. श्री पर्रिकर: वे खुद गोवा के मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य की जानकारी लेने व्यक्तिगत दौरे पर गए थे और फिर बाद में एक चुनावी रैली में श्री पर्रिकर को गलत ठहरा दिया। जब श्री पर्रिकर ने उनके झूठ पर सवाल किया, तो उन्होंने बिना किसी मलाल के श्री मोदी पर दोष मढ़ देने की कोशिश की।
  1. ईवीएम: जब उनकी पार्टी चुनाव हार जाती है, तब राहुल गाँधी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को दोष देते हैं और जब उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वे चुप रहने का मार्ग अपनाते हैं। उनके लिए, ईवीएम और चुनाव आयोग केवल सुविधा की बात है – जिसे अपनी सुविधा से, जब उनके और उनकी पार्टी के खिलाफ़ काम हो तो गाली दे देना और तब नज़रअंदाज़ कर देना जब उनके पक्ष में काम हो रहा हो!
  1. ऋण माफी: राहुल गाँधी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव अभियानों में ऋण माफी की घोषणा की। नई सरकारों को श्रेय मिल सकें इसलिए तुरंत ऋण माफ भी कर दिए गए थे। हालाँकि, वादे का मज़ाक उड़ाते हुए गरीब किसानों के आम तौर पर 1,000 रुपए से कम के ऋण माफ किए गए थे। जो वादे किए गएँ उन पर फिर से विचार करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। ये चुनाव खत्म बीत गए और 5 साल बाद नए वादे करने होंगे।
  1. नॉनपरफॉर्मिंग एसेट्स: राहुल गाँधी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहराते रहे हैं, बिना यह समझे कि वे बकाया होने पर ऋण ही गैर-निष्पादित हो जाते हैं। ऋण आम तौर पर 5 साल के लिए दिए जाते हैं और उसके बाद चुकौती होती है। एक बार जब ऋण देय होता है और यदि पुनर्भुगतान शुरू नहीं होता है, तो ऋण को गैर-निष्पादित श्रेणी में वर्गीकृत कर दिया जाता है। इस तरह वे अनर्जक परिसंपत्ति (एनपीए) जो एनडीए के कार्यकाल के दौरान दिख रही हैं वे यूपीए के कार्यकाल के दौरान दिए गए ऋण थे।
  1. रोजगार निर्माण: उनका कोरा दावा है कि उन्होंने अगले 5 वर्षों में 70 मिलियन नौकरियों के निर्माण की योजना विकसित की है। लेकिन इसे कैसे हासिल किया जाएगा और इन नौकरियों का निर्माण किस क्षेत्र में होगा, इस बारे में कोई योजना नहीं बताई है। हालांकि, वे जो भी कहते हैं, उस पर उनसे किसी जवाबदेही की माँग नहीं की जाती है। यह तथ्य भी देखा जाना चाहिए कि यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में 17 मिलियन से भी कम नौकरियाँ ईज़ाद हुई थीं।
  1. शारदा घोटाला: राहुल गाँधी को गंभीरता से चिंतन कर इस मामले में अपना और अपनी पार्टी का पक्ष रखने की ज़रूरत है। वर्ष 2014 के नुकसान के बारे में बात करने से लेकर घोटाले पर कार्रवाई न करने के लिए ममता बनर्जी को फटकारने से लेकर अब पूरा समर्थन देने तक वास्तव में कोई नहीं जानता कि उनका पक्ष क्या होगा और उनका अगला यू-टर्न क्या होगा। ज़ाहिर है, उनकी स्थिति इस बात पर निर्धारित होती है कि उनका क्या मानना उन्हें कहाँ और कब कुछ सुर्खियाँ दिला सकता है। अतीत की गाथा उनके कृपापात्रों द्वारा गाई जाती रहेगी और उन्हें हर हाल में संरक्षित किया जाएगा।
  1. अन्य विपक्षी दलों से संबंध: यह देखना दिलचस्प है कि राहुल गाँधी कितनी आसानी से अपनी भूमिका बदल लेते हैं। किसी अन्य विपक्षी पार्टी के नेता को कोसने और गाली देने से लेकर निर्विवाद रूप से समर्थन देने तक उनकी भूमिका बिना किसी स्पष्टीकरण के निर्बाध होती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई ऐसा नेता है, जिसके साथ उन्होंने दुर्व्यवहार नहीं किया है और बाद में उसी के साथ साझेदारी करने की माँग न की हो। क्या किसी भी विपक्षी दल का कोई भी नेता वे जो कुछ भी कहते हैं उस पर विश्वास करता है, या यह चुनाव खत्म होने तक चुप रहने की सुविधा और समझदारी की बात है?

बचाव का सबसे अच्छा तरीका अपराध है।

जब कुछ और काम नहीं करता है और झूठ भी कारगर नहीं होता दिखता है, तो राहुल गाँधी बहुत आसानी से इसका-उसका नाम लेने लगते हैं। पिछले सालभर में उन्होंने  कई बार श्री मोदी को एकतरफा बहस की धमकी दी लेकिन लोकसभा में वे आश्चर्यजनक रूप से चुप रहते दिखे। उन्होंने अपनी पुस्तक में श्री मोदी के लिए जर्मन शब्द फ्यूहरर जिसका अर्थ है “लीडर” या “गाइड” से लेकर चोर से लेकर असुरक्षित तानाशाह तक हर संभव नकारात्मक विशेषण का इस्तेमाल किया है। दुर्भाग्यवश कोई भी उनकी कथा नहीं खरीद रहा और यह उन्हें और भी निराश कर रहा है।

तो क्या माननीय काँग्रेस अध्यक्ष पैदाइशी झूठे हैं जैसा कि स्मृति ईरानी कहती हैं या वे केवल भ्रम हैं?

शब्द “भ्रमजनक- डिल्यूजनल” लैटिन शब्द से बना है जिसका अर्थ है “धोखा देना।” इसलिए भ्रमपूर्ण सोच मतलब अपमानजनक बातों पर विश्वास करके खुद को धोखा देने जैसा है। भ्रम गलत विचार है। यह ऐसा विश्वास है जिसका कोई प्रमाण नहीं है। भ्रमित व्यक्ति विश्वास करता है और चाहता है कि कुछ ऐसा हो जाए, जो वास्तव में सत्य नहीं है। यह और अधिक मजबूत आशा में बदलता है कि कुछ ऐसा चमत्कारी घटित होगा जो उसकी मान्यताओं को सच कर देगा।

इस लेख के विषय के संदर्भ में यह विशेष रूप से परिचित लगता है?

जाहिर है, राहुल गांधी का एकमात्र उद्देश्य हर मुद्दे का राजनीतिकरण करना है, बजाय इसके तार्किक निष्कर्ष पर कोई मुद्दा देखना। उनसे अक्सर उन विभिन्न आरोपों के सबूत दिखाने के लिए कहा जाता है जो वे लगाते रहते हैं और राफेल पर उनकी अपनी स्वीकारोक्ति थी लेकिन वे अभी तक सबूत नहीं दिखा पाए हैं। उनका स्वयं का भ्रम उन्हें ऐसा दिखाता है कि यह साबित करने के लिए कि वे सही थे, प्रमाण स्वयं प्रकट होंगे। तब तक, वह अपनी “दागो और भागो” राजनीति अनायास ही जारी रखेंगे।

उन्हें यह विश्वास नहीं है कि वे आगामी चुनावों में शानदार जीत हासिल कर पाएँगे। मतदाताओं ने भी उन पर विश्वास करना बंद कर दिया है। यह कुछ ही समय की बात है और फिर यह भी होगा कि जब उनकी पार्टी के कार्यकर्ता भी उन पर विश्वास करना बंद कर देंगे। वह दिन दूर नहीं जब भीड़ में से कोई यह कहता दिखेगा कि “राजकुमार के पास कपड़े नहीं है!

श्री गाँधी कब तक “भेड़िया आया-भेड़िया आया” चिल्लाते रहेंगे?

जैसा कि राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने प्रसिद्ध रूप से कहा था, “आप सभी लोगों को कुछ समय तक और कुछ लोगों को हर समय मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन आप सभी लोगों को हर समय मूर्ख नहीं बना सकते हैं।”

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।                                               

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Rahul Gandhi – Congenital Liar or Simply Delusional?

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Rahul Gandhi, since being nominated the President of the Congress Party, seems to have suddenly found his voice after remaining virtually silent or absent in the first 10 years of Parliament when his Government was in power.

Here is an individual who genuinely believes that the nation owes him allegiance because of his ancestors and that he is entitled to everything.

Entitled to the top position in his party because of his family’s name. Entitled to all the trappings of power and the accompanying perquisites because of the sacrifices of his ancestors. Entitled to say anything he wants knowing that an army of senior leaders will jump to his defence. And of course, entitled to aspire to lead the country with no accountability.

Mr Gandhi seems to depend on the philosophy that if he shouts out an allegation, crying himself hoarse long enough, some of the dirt may stick. He assumes that because of the financially dirty reputation of his own family and party, whereby he and his family have had a sticky finger in virtually every pie, Prime Minister Modi can also be tarnished with such nonsensical allegations. He recognises that the only salvation for him and his family is to somehow convince the electorate that Mr Modi and the ruling party is “also corrupt”!

Deep inside he recognises that this will not happen, since there has been no case of corruption in this Government.

Therefore, he has decided to invent a pack of lies. If told repeatedly and convincingly, lies and untruths can certainly sow a seed of doubt in the mind of the listener for a limited period.

Let us examine some of his more recent lies and about turns.

  1. Rafale: Rahul Gandhi’s arguments on the Rafale aircraft purchase are moving from the sublime to the ridiculous. He needs a counter to the Augusta Westland exposures that are likely to happen and the Bofors matter that has sunk into the minds of the electorate. His shrill comments are being loyally parroted by the senior Congress leaders because once their ”Prince” has spoken, they have no option but to comply and defend. They have nothing concrete to establish their allegations.
  1. Crony Capitalism: Mr Gandhi and his family have been beneficiaries from several corporate houses over the years. In order to hide their own issues, he has chosen to make the charge of crony capitalism on the Prime Minister. The fact that Mr Anil Ambani’s company has recently filed for bankruptcy has been conveniently ignored by Mr Gandhi since this goes against his narrative.
  1. Mr Parrikar: He made a personal visit to the Goa Chief Minister purportedly to enquire about his health and then promptly misquoted Mr Parrikar at an election rally. When his lie was questioned by Mr Parrikar, he tried to shift the blame to Mr Modi without any compunction.
  1. EVM’s: Rahul Gandhi blames the Electronic Voting Machines when his party loses an election and maintains a studied silence when his party wins an election. For him, EVM’s and the Election Commission are simply a matter of convenience – to be abused when they are perceived to be working against him and his party and to be ignored when they work in his favour!
  1. Loan Waivers: Rahul Gandhi announced loan waivers through the election campaigns in Rajasthan and Madhya Pradesh. To the credit of the new Governments, the loans were waived immediately. However, the poor farmers generally received loan waivers of less than Rs 1,000 making a mockery of the promises. No one has bothered to revisit the commitments made. These elections are over and new promises will need to be made after 5 years.
  1. Non-Performing Assets: Rahul Gandhi has been busy blaming the Prime Minister for non-performing assets without understanding that loans become non-performing after they are due. Loans are normally given for say 5 years and after that repayment is due. Once the loan is due and if repayment is not commenced, loans are categorised non-performing. Therefore, NPA’s during the NDA tenure were loans given during the UPA tenure.
  1. Job Creation: He has just claimed that he has developed a plan to create 70 million jobs in the next 5 years. No plans have been announced on how this will be achieved and which sectors these jobs will be created. However, no accountability is sought from him on anything he says. It is worth looking at the fact that less than 17 million jobs were created during the 10-year term of the UPA.
  1. Saradha Scam: Rahul Gandhi needs to make up his mind on where he and his party stand on this matter. From talking about the losses in 2014 to castigating Mamata Banerjee for not taking action on the scam to now offering full support, no one really knows where he stands and what his next U-turn will be. Clearly, his position is based on what he believes may get him some headlines in the here and now. The past will be addressed by his minions and he will be protected at all costs.
  1. Relations with other opposition parties: It is interesting to see how easily, Rahul Gandhi changes his position. From cursing and abusing another opposition party leader to extending unquestioned support happens seamlessly and without any explanation. It would be interesting to see if there is any leader who he has not abused and later sought to partner with. Does any opposition party leader believe anything he says or is it simply a matter of convenience and prudence to stay silent till the elections are over?

The best form of defence is offence.

When nothing else works and the lies do not seem to stick, Rahul Gandhi very easily, resorts to name calling. Over the past year he has threatened Mr Modi to unilateral debates but kept surprisingly quiet in the Lok Sabha. He has used every possible negative adjective in his book for Mr Modi from Fuehrer to Chor to Insecure Dictator. Unfortunately, no one is buying into his narrative and this is frustrating him even more.

So is the honourable Congress President a congenital liar as suggested by Smriti Irani or is he simply delusional?

The word “delusional” comes from a Latin word meaning “deceiving.” So delusional thinking is like deceiving yourself by believing outrageous things. A delusion is a false idea. It is a belief that has no evidence. A delusional person believes and wants to be true something that is actually not true. More so in the strong hope that something miraculous will happen that will make his beliefs come true.

Sounds familiar specially in context of the subject matter of this article?

Clearly, Rahul Gandhi’s only objective is to politicise every issue rather than see even a single issue to its logical conclusion. He has often been asked to show proof of the various allegations he keeps making and by his own admission on Rafale, he does not yet have proof. His delusional self seems to believe that proof will appear on its own to establish that he was right. Till then, he will continue with his “shoot and scoot” politics unabashedly.

He does not seem to have the confidence that he will be able to pull off a spectacular victory in the coming elections. The electorate has stopped believing him. It is only a matter of time before his party workers stop believing in him as well. The day is not far when someone from the crowd will should out that the prince has no clothes!

How long will Mr Gandhi keep crying “wolf wolf”?

As President Abraham Lincoln had famously said, “You can fool all the people some of the time, and some of the people all the time, but you cannot fool all the people all the time.”

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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इंदिरा गाँधी – आज कितनी प्रासंगिक हैं?

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अंतत: काँग्रेस पार्टी द्वारा प्रियंका वढेरा (वाड्रा) को औपचारिक रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के केवल महासचिव के रूप में नियुक्त कर ही दिया। जैसे ही वे इस दौड़ में शामिल हुईं, वैसे ही विपक्षियों की टिप्पणियाँ आना भी शुरू हो गईं!

ज़ाहिरन काँग्रेसी कार्यकर्ता गले-गले तक पानी में डूबे हुए हैं और ऐसे में अब वे प्रियंका वढेरा और इंदिरा गाँधी के बीच कुछ समानताएँ खोज रहे हैं। श्रीमती वढेरा (वाड्रा) इस उम्मीद से लखनऊ काँग्रेस कार्यालय के उसी कमरे में रहेंगी, जहाँ उनकी प्रसिद्ध दादी श्रीमती गाँधी रहती थीं, कि अतीत की उपलब्धियाँ किसी दर्पण की तरह भावी आशाओं की प्रेरक बन सकें।

आइए हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या श्रीमती गाँधी आज के संदर्भ में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, विशेष रूप से युवा भारतीयों और करोड़ों भारतीयों के लिए याकि यह भी कह सकते हैं कि भारतीयों की उस पुरानी पीढ़ी के लिए जो उनके शासन काल को जी चुकी हैं।

मुझे वह दौर बहुत स्पष्ट रूप से याद है, जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं।

वर्ष 1971 में, जब उन्होंने बांग्लादेश के गठन में मदद की थीं और पाकिस्तान से दो अलग राष्ट्रों का निर्माण किया था, उस वाकये को मैं बहुत गर्व के साथ याद करता हूँ, मुख्यतः इसलिए चूँकि मेरे पिता सेना में थे और मुझे हजारों पाकिस्तानी कैदियों को प्रयागराज, पूर्व के इलाहाबाद में युद्ध शिविरों में देखने का अवसर मिला था। हम वर्ष 1971 की लड़ाई के दौर से गुज़रे थे, तब रात होने पर सारी लाइटें बंद कर दी जाती थीं और हवाई हमले के सायरन की आवाज़ हुआ करती थी। काँटेदार तार की बाड़ के उस पार रेतीले रंग की वर्दी में हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को देखना हमारे सैनिकों और हमारे देश के लिए गर्व का स्रोत था।

वर्ष 1974 से वर्ष 1977 की अवधि के दौरान जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में था, मैंने 21 महीने के आपातकाल के दौरान उनका दूसरा पक्ष देखा।

मुझे बहुत अच्छे तरीके से याद है कि हम दिल्ली विश्वविद्यालय की विशेष बसों में बैठने में कितना डरा करते थे, कोई एक शब्द भी नहीं बोलता था, दोस्तों से बातें नहीं होती थीं, लगता अगर कोई हमारी बात सुन रहा हो तो वह अधिकारियों को जाकर बता देगा। उन बसों का वह भयानक सन्नाटा आज भी मेरे कानों में घूमता रहता है।

विपक्षी नेताओं और कॉलेज के युवा छात्रों की कहानियाँ फुसफुसाहट भरी टिप्पणियों में सब ओर फैल रही थीं कि कैसे रात को उन्हें उनके घरों से उठा लिया जाता और जेल में डाला जा रहा थआ। शक्तिशाली युवाओं की पुरुष नसबंदी की आशंका भयावह परिदृश्य था जिसे लेकर हम सभी चिंतिंत रहा करते थे। आपातकाल के दौरान प्रेस पर लगा सेंसर केवल प्रधान मंत्री और उनके बेटे संजय गाँधी की अविश्वसनीय उपलब्धियों को सामने ला रहा था। युवा छात्र होने के नाते केवल दृश्यमान सकारात्मकता यह थी कि कोई पावर ब्लैकआउट नहीं था और बसें समय पर चल रही थीं!

युवा छात्रों के रूप में, हम ऐसे भारत के लिए तरस रहे थे, जहाँ हम फिर एक बार बोल पाने के लिए स्वतंत्र होंगे।

यह वह इंदिरा गाँधी है जो मुझे याद है।

मुझे नहीं पता कि वे आज कितनी प्रासंगिक है या आज उनकी तानाशाही पद्धति कितनी प्रासंगिक है। यह भी पता करना होगा कि क्या आज के युवाओं को इंदिरा गाँधी याद हैं या क्या आज का युवा उन्हें समझ सकता है? क्या किसी को उनके द्वारा की गई सारी ज्यादतियाँ याद हैं? क्या उनकी उपलब्धियाँ और ज्यादतियाँ उस राष्ट्र के लिए प्रासंगिक हैं, जो आगे बढ़ गया है और जिसने अतीत को देखते रहना बंद कर दिया है?

“गरीबी हटाओ” का उनका प्रसिद्ध चुनावी नारा केवल एक नारा बनकर रह गया क्योंकि उस भावना को लागू करने के लिए कभी कोई कदम उठाया ही नहीं गया और गरीबी आज भी जस की तस है। राहुल गाँधी अपनी न्यूनतम आय गारंटी के साथ उस नारे की ओर मुड़े हैं, बिना इसका विचार किए कि यह कैसे लागू होगा या इसकी लागत क्या आएगी (जानकारों का अनुमान है कि इससे सकल घरेलू उत्पाद का 5% सालाना खर्च हो सकता है)। वे जानते हैं कि वादे करना बहुत आसान है और बाद में या तो वे अपनी सुविधानुसार उसकी व्याख्या कर सकते हैं या उससे इनकार कर देते हैं।

पिछले 50 वर्षों में दुनिया काफी बदल गई है। उस द्विध्रुवीय दुनिया से जिसमें हमें संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) या संयुक्त राष्ट्र संघ- सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य (यूएसएसआर) की दो विचारधाराओं के बीच चयन करना था या कागज पर गुटनिरपेक्ष या तटस्थ बने रहना था और दो गटों में से किसी एक की ओर झुकना था, हम बहुत आगे निकल आए हैं। सोवियत संघ का विघटन कई स्वतंत्र राष्ट्रों में हो गया है और ट्रम्प तले संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) की सारी ताकत उसकी अपनी सीमाओं में सिमट गई है। राष्ट्रवादियों को सत्ता के लिए वोट दिया जा रहा है और हर नेता से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने राष्ट्र के लिए ख़ास जगह बनाएँ, न कि किसी गट की ओर झुकें। लोग थक गए हैं और नेताओं द्वारा किए गए वादों से तंग आ चुके हैं और वे एक बदलाव चाहते हैं।

इंदिरा गाँधी के बाद भारत में बहुत नाटकीय बदलाव आए हैं। अब देश बहुत अधिक समृद्ध हैं और युवाओं के सामने रोजगार के अधिक अवसर हैं। करोड़ों भारतीय अब खुद को दुनिया के नागरिक के रूप में समझते हैं, न कि किसी समाजवादी देश के नागरिक के रूप में, जो सोवियत संघ से करीब से जुड़ा हो और जिसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमेशा सरकार का मुँह तकते रहना हो।

काँग्रेस पार्टी भी पिछले 50 वर्षों में बदल गई है। वह पूर्व में जो थी, अब उसकी केवल एक कमजोर छाया भर रह गई है। पार्टी ने अपने सारे बल स्थान नष्ट कर दिए हैं और केवल गठबंधन सहयोगियों पर भरोसा करना सीख लिया है। नेतृत्व कमजोर और उदासीन हो गया है और ऐसे हालात में जब पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच श्रद्धा -आदर नहीं रहा है, उनके मन में अतीत के नेताओं के प्रति निष्ठा भाव जागृत कराना और भी आवश्यक हो जाता है, हालाँकि ऐसा होना काफ़ी संदिग्ध है क्योंकि यह समझना मुश्किल है कि क्या उनमें इतने कद्दावर नेताओं को समझने या उनकी पहचान करने की कुवत्त है? जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के अलावा काँग्रेस पार्टी के पास वास्तव में ऐसा कोई प्रतिष्ठित नेता नहीं बचता जिसे वे आदर्श मान सकें। राजीव गाँधी को उनकी माँ की हत्या के बाद गहरी सहानुभूति से उपजा जनादेश मिला था, लेकिन वे उस अति महत्वपूर्ण जनादेश का उपयोग करने में सक्षम नहीं थे।

नुमायान वारिस राहुल गाँधी अपनी पहली दो संसदीय पारियों को बर्बाद कर चुके हैं जब उनकी ख़ुद की सरकार सत्ता में थी और तब उन्होंने वस्तुतः कुछ अध्यादेशों को फाड़ने के अलावा और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं किया, जिसके लिए उनकी अपनी ही सरकार को बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। वर्तमान लोकसभा में भी उन्होंने काँग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अपने औपचारिक अभिषेक हो जाने तक कुछ नहीं किया।

इसका भी परीक्षण होना चाहिए कि राहुल गाँधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी या अपनी माँ के रायबरेली संसदीय क्षेत्र के लिए क्या किया है। उनके पास दिखाने के लिए ऐसा कुछ नहीं है, जो उन्होंने लोगों के लिए हासिल कमाया हो। इसकी बहुत संभावना है कि आने वाले चुनावों में काँग्रेस दोनों सीटों पर हार जाए।

एक मतरबा जब राहुल गाँधी मजबूती से मैदान में उतरे थे, तब भी उनके पास कोई ख़ास तय कार्यसूची (एजेंडा) या खेल की योजना (गेम प्लान) नहीं थी और उन्होंने हर संभव मौके पर प्रधानमंत्री को गाली देना शुरू कर दिया था। वे जानते थे कि वे बेसिर-पैर की बक़वास कर रहे हैं, पर उन्होंने खुद की ही स्वीकारोक्ति से राफेल विवाद को बिना किसी सबूत के ठूँस दिया। उनके पास कोई नया विचार नहीं है और संभवत: उन्हें लगता है कि उनकी बहन श्रीमती वढेरा (वाड्रा) खेल परिवर्तक (गेम चेंजर) होंगी,जो खेल की दिशा बदल देंगी और जिस कठिन परिस्थिति में वे आज हैं, उसमें से उन्हें निकाल सकेंगी।

चुनावों के ठीक पहले के इन कुछ महीनों में प्रियंका गाँधी वास्तव में क्या कर सकती हैं? वे उस रिले दौड़ की अंतिम धावक हैं जिसके पहले तीन धावकों ने उन्हें पिछलगा कर दिया है और अब उनसे अंतिम रेखा के समीप पहुँचे दूर के धावक को हराने के लिए गति को अविश्वसनीय तरीके से बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है!  बैटन (छड़ी) उन्हें सौंप दी गई है।

क्या ऐसा नहीं लगता कि चुनावों के बाद का पतन उनके मत्थे मढ़ने के लिए उन्हें लाया गया है ताकि युवराज के ताज को ठेस न पहुँचे और वह अगले पाँच सालों तक इसी तरह गड़बड़ी करता रहे और बहन ने जो लाज रख ली उसके साथ फिर खिलवाड़ कर सके?

क्या दादी इंदिरा गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका वढेरा (वाड्रा) को यह चुनाव जीतने में मदद कर सकती हैं? क्या उनका नाम और तस्वीरें मतदाताओं को काँग्रेस पार्टी के पक्ष में अपना कीमती वोट डालने के लिए प्रेरित करेंगी? क्या उनका नाम राहुल गाँधी को काँग्रेस पार्टी के नेता के रूप में विश्वसनीयता का आभास दिलाने में मदद करेगा?

बहुत अप्रिय।

क्या काँग्रेस ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाल लिया है जो विपक्ष को नष्ट करते हुए खुद ही विनाश का रास्ता अपना लेगा? या यह साधारण दिवाली की आम रोशनी है कि जिसे अंधेरे आकाश में कुछ क्षण की चाँदनी बिखेरने के लिए लगाया गया है?

अब यह तो समय ही बताएगा।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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Indira Gandhi – How relevant is she today?


190131 indira gandhi

Priyanka Vadra has finally been formally anointed in the Congress Party albeit only as a General Secretary for Eastern Uttar Pradesh. Once she is in the race, opposition comments have started!

Understandably the Congress cadres are going overboard and drawing parallels between Priyanka Vadra and Indira Gandhi. Mrs Vadra will occupy the same room as her famous grandmother Mrs Gandhi, in the Congress office in Lucknow, in the hope of invoking the achievements of the past as a mirror of what to expect in the future.

Let us try and understand whether Mrs Gandhi is relevant in today’s context, particularly with the younger Indians and the millennials or for that matter, even the older generation of Indians who would have lived through the years of her rule.

I remember the period when Indira Gandhi was the Prime Minister very clearly.

In 1971, when she engineered the formation of Bangladesh and created two nations out of Pakistan, I remember her with a lot of pride, primarily because my father was in the army and I had the opportunity to see thousands of Pakistani Prisoners of War in camps in Prayagraj, earlier Allahabad. We had lived through the 1971 war, switching off all lights at night and getting used to the sounds of the air raid sirens. The sight of thousands of Pakistani soldiers in their sand coloured uniforms behind barbed wire fences was a source of pride for our soldiers and our country.

When I was in Delhi University during the period 1974 to 1977, I saw the other side of her during the 21 months of emergency.

I clearly remember how scared we used to be sitting in the Delhi University Special buses, not uttering a sound, not talking to friends, just in case someone was listening to us and would report back to the authorities. The eerie silence in these buses still rings in my ears.

Stories of opposition leaders and young college students being picked up at night from their homes and put in jail would circulate all over, through whispered comments. Possible vasectomy of able-bodied young men was a frightening scenario that all of us used to worry about. The censored press was only extolling the incredible achievements of the Prime Minister and her son Sanjay Gandhi during the emergency. As a young student, the only visible positives were that there were no power blackouts and the buses ran on time!

As young students, we craved an India where we would be free to speak once again.

This is the Indira Gandhi that I remember.

I wonder how relevant she is today or how relevant are her dictatorial methodologies today. It is also worth exploring whether Indira Gandhi is remembered or even understood by the youth of today. Does anyone remember all her excesses? Are her achievements and excesses relevant in a nation that has moved on and stopped looking at the past?

Her famous election slogan of “Garibi Hatao” only remained a slogan since no action was ever taken to implement its spirit and poverty has continued to this day. Rahul Gandhi has turned to the same slogan with his Minimum Income Guarantee without any idea of how this will be implemented or what it will cost (someone has estimated that this could cost upto 5% of GDP annually). He knows that it is very easy to make promises and later, either interpret it according to his convenience or deny he actually said it!

The world has changed considerably in the last 50 years. From a bipolar world where we had to choose between the two ideologies of USA or USSR or remain nonaligned on paper and lean towards one of the two blocs. The USSR has imploded into several independent nations and USA under Trump is focusing all its energies within its own borders. Nationalists are being voted to power and each leader is expected to carve out a space for his nation rather than ally with some bloc. People are tired and fed up of the promises made by politicians and they want a change.

India has changed dramatically since Indira Gandhi. There is much greater prosperity and significantly more job opportunities for the young. The Indian millennials now think of themselves as citizens of the world and not as citizens from a socialist country closely allied to the Soviet Union, who must keep seeking Government favours to move forward in life.

The Congress Party too has changed in the last 50 years. It is a weak shadow of what it used to be. It has destroyed all its advantages and learned to rely on coalition partners. The leadership is weak and indifferent and while the party cadres may, out of reverence, be required to pay allegiance to their leaders of the past it is doubtful whether they have any understanding or identification with such leaders. The Congress party, other than Jawaharlal Nehru and Indira Gandhi, have not really had any iconic leader they can look up to. Rajiv Gandhi got an enviable sympathy mandate after the assassination of his mother but was not able to utilise this very significant mandate.

The heir apparent, Rahul Gandhi wasted the first two parliamentary terms when his government was in power and virtually did nothing significant other than tear up some ordinances which resulted in a major embarrassment to his own government. In the current Lok Sabha, he did nothing till he was formally anointed the Congress President.

It is also worth examining what Rahul Gandhi has done for his parliamentary constituency Amethi or the parliamentary constituency of his mother Rae Bareli. There is very little for him to show in terms of what he has achieved for the people. It is very likely that the Congress will lose both the seats in the coming elections.

Once Rahul Gandhi was firmly in the saddle, with no specific agenda or game plan, he started to abuse the Prime Minister at every possible opportunity. Realising he was making no headway, he stoked up the Rafale controversy not backed by any proof, by his own admission. He has run out of ideas and probably believes that his sister, Mrs Vadra will be the game changer and will bail him out of the difficult situation he is in.

What can Priyanka Gandhi really do in the last few months before the elections? She is the last runner in a relay race where the first three runners have left her trailing and are now looking towards her to bring out an incredible burst of speed to beat the front runners who are near nearing the finishing line! The baton has been handed over to her.

Is it possible that she has been set up to take the fall after the elections so that the Crown Prince is not affected and can continue to muddle along for another 5 years with his tattered reputation covered up by his sister?

Can grand mother Indira Gandhi help Rahul Gandhi and Priyanka Vadra win these elections? Will her name and photographs fire up the voters to cast their precious vote in favour of the Congress Party? Will her name help Rahul Gandhi to establish a semblance of credibility as the leader of the Congress party?

Very unlikely.

Has the Congress fired its brahamastra which will leave a trail of destruction while destroying the opposition? Or is this a simple Diwali havai that has been fired to momentarily light up a dark sky?

Only time will tell.

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer and commentator, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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Elections 2019 – BJP’s Development and Growth versus Congress’ Loan Waivers

181221 Elections 2019

The BJP has lost 3 key state elections and the Congress has suddenly gained some new momentum. Let us look at what are the key challenges that need to be addressed before the next round of Lok Sabha elections.

Is it going to be the economic successes of the country? Is it going to be GST? Will it be demonetisation or will it be the incredible success India has had internationally, thus making a very large number of Indians proud? Will it be about the infrastructure development all across the country?

The opposition parties and more particularly Rahul Gandhi know that they have no way to compete with the Prime Minister and the BJP as far as economic success is concerned nor can they question all the achievements in the last 4 years.

Therefore, the only thing they can do is to change the narrative completely and what is this narrative going to be? All the previous allegations of the Gujarat riots have not worked. The name calling and abusing Mr Modi is not getting the voters to change their mind. Personal allegations and innuendos against the prime minister are not working.

They need to somehow, make some corruption charges stick. The Rafale deal which seemed promising to the Congress, though the opposition leaders did not echo the same, has been dismissed by the supreme court of the country. Rahul Gandhi and his bunch of merry men cannot find a single corruption charge against any cabinet minister of this Government,

So, they have resorted to what the Congress has always done well.

Use the state exchequer to write off farm loans.

Waiving farm loans makes a very good story and this is going to be a major agenda that Rahul Gandhi is going to shout out loud for the next few months. The first decision the Chief Ministers of Madhya Pradesh, Rajasthan and Chhattisgarh have done is to announce loan write offs. It is another thing that in the state of Karnataka Rs 44,000 crores has been written off and only 800 farmers have benefited while the large majority of Rs 2.50 lakhs poor farmers are waiting patiently for their turn after the wealthy farmers have benefited from the largesse of Mr Gandhi’s plans. The story in the other 3 states will not be aby different and wealthy farmers will take away all the money.

Mr Gandhi does not understand, nor does he care about what loan waivers will do to the economy of the states they are managing. He knows that when these Congress run States with huge loan waivers run in to financial distress all that he will do, in a Kejriwalesque manner, is to blame the Prime Minister.

He will not hesitate to martyr himself and say that he wanted to help the farmers, but the central government does not care. What he does not seem to understand is that loan waivers are repetitive and every few years loans will need to be waived. Since his announcement to waive loans, even the good farmers have stopped repaying banks. The size of the loan waiver is estimated at Rs 1.64 lakh crores or almost USD 25 billion! I wonder if he will waive all housing loans and vehicle loans below a certain limit! After all there is no difference in the distress loans cause to the families who take them.

Mr Gandhi is so desperate that he will do anything to get a foot in the door into the very powerful top job on the country. All the senior leaders who surround him understand the problem but have bowed down in front of the raw ambition of the young Gandhi scion.

Mr Gandhi will not talk about any scheme to develop more jobs because he has no idea how to do that once his party is in power. After all the situation of Amethi and Rae Bareli and the pathetic state of development is there for everyone to see. He also knows that there are no quick fixes to create new jobs.

Rahul Gandhi’s strategy is simple. If he wins, he has 5 years to try and correct the damage caused by these loan waivers. If he loses, the problem has to be sorted out by the winner! Rahul Gandhi is waiting to throw away all the hard-earned reserves of the country to get elected at any cost.

For Rahul Gandhi victory does not only mean a possibility of the top job if he is able to convince his mahagathbandhan but also the only opportunity for self-preservation for him and his family who are mired in all kinds of corruption controversies.

Public memory is very short and the four states (including Karnataka) that the BJP has lost this year can very easily swing back to them in the Lok Sabha elections if the BJP leaders stop talking about the past, look forward and talk about development coupled with loan waivers.

So, what should the BJP do in the run up to the Lok Sabha elections knowing fully well that it is critical for Mr Modi to be voted back to power to continue the agenda of development and long-term sustainable growth?

  1. BJP needs to wrest the initiative back from Rahul Gandhi and if necessary, announce loan waivers as well. If this is the only way the electorate can be wooed, so be it. Rahul Gandhi will desperately attempt to take credit for all loan waivers and this needs to be countered very strongly.
  2. For the middle class, a reduction in income tax must be implemented in the coming budget.
  3. The MSME sector needs easier credit terms and this must be made available sooner than later.
  4. The corporate sector needs to be wooed and a reduction in corporate taxes will help. GST has been accepted and is delivering good results for the corporate sector.
  5. It is good to see senior BJP ministers coming out and talking about their achievements. For the first 4 years there was almost no communication between the government and a very large section of the English-speaking press. It is important to make sure that all members of the press, irrespective of their loyalties are wooed by the BJP.
  6. It is also critical for the BJP to bring back the key alliance partners like the Shiv Sena. They need to ensure the Akali Dal, Mr Paswan and Mr Nitish Kumar continue to support them. The political equations are changing in Tamilnadu and therefore the BJP needs to seal a quick alliance with Rajnikanth since the other superstar, Kamal Haasan seems to have gone with the Congress. Andhra Pradesh has gone with KCR and it is important to ensure that the BJP gets into a pre-poll alliance in this state.
  7. Finally, all the affiliated organisations must understand the need to win the elections and therefore stop any diversionary issues including vigilantism of any kind. These leaders must also make sure that they do not speak of anything controversial and focus on a single point agenda of talking about all the incredible development that has been done under the leadership of Mr Modi. The unnecessary rhetoric must stop.

BJP think tanks must remember that perceptions are far more important as we get closer to elections.

These measures may go against the thinking of the BJP Government, but it is necessary to win and difficult decisions need to be taken.

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The author is an Executive Coach and an Angel Investor. A keen political observer, he is also the founder Chairman of Guardian Pharmacies. He is the author of 6 best-selling books, The Brand Called You; Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. 

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राफेल के साथ राहुल गाँधी और उनकी काँग्रेस कहाँ जा रही है?

 

181116 Rahul and Rafale

आख़िर ऐसी क्या वजह है कि जिसके चलते राफेल पर राहुल गाँधी अपने तथाकथित राजनीतिक करियर के साथ सबकुछ दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं?

मुझे यकीन है कि राजनेता होने के नाते वे जानते होंगे या उन्हें इस बात की सलाह भी दी गई होगी कि उन्हें सारे तीर एक ही तरक़श में नहीं रखने चाहिए। मतदाताओं के बीच उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता हमेशा कम ही रही है और ससंद में और संसद के बाहर भी वे गड़बड़ करते नज़र आए हैं और सोशल मीडिया पर तो वे लगातार मंडराते ही रहते हैं। ऐसे में मुझे हैरत होगी यदि उन्हें इस बारे में कुछ पता न हो।

आगामी प्रादेशिक और लोकसभा चुनावों में व्यक्तिगत रूप से उनका बहुत कुछ दाँव पर लगा है। यदि कर्नाटक की बात छोड़ दे तो काँग्रेस ने राहुल गाँधी के नेतृत्व में लगभग हर चुनाव में मुँह की खाई है और कर्नाटक में भी सरकार बनाने के लिए गठबंधन सहयोगी का समर्थन लेना पड़ा और सहयोगी दल को गठबंधन के नेता के रूप में स्वीकार करने पर सत्ता मिल पाई। निश्चित ही अपनी शिकस्तों को काँग्रेस पार्टी पूरी तरह से अलग परिप्रेक्ष्य में पेश करेगी और केवल कुछ उप-चुनावों में मिली जीत की बात करती है।

मंदिर यात्राओं के दौरान किताब में और नर्म हिंदुत्व को दर्शाते हुए अपनी पहचान हिंदू समुदाय के साथ एक ओर तकनीकी तौर पर “जेनऊ धारी” के रूप में करने की वे हर संभव कोशिश करते हैं और दूसरी ओर सरकार के हर कदम पर सवाल उठाते हैं। ख़ास तौर पर जो विस्मित करती है, वह है उनकी असंसदीय (अशोभनीय) भाषा, जो चुनावों के करीब आने के साथ और अधिक से अधिक विशेषण एकत्रित करती प्रतीत होती है।

बात करने के लिए बहुत कम मुद्दे हैं, पिछले पूरे 4 वर्षों में भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा सामने नहीं आया है और सरकार के कई महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलावों के चलते कोंसने का कोई मौका नहीं मिल रहा है, ऐसे में राहुल गाँधी और उनके दल-बल ने राफेल मुद्दे को एकल बिंदु एजेंडे के रूप में उठा रखा है। इसी के साथ, उन्होंने प्रधान मंत्री मोदी को व्यक्तिगत तौर पर लक्षित करने का फैसला कर लिया है क्योंकि उनका मानना है कि अगर वे मोदी को चोट पहुँचाते हैं, तो वे अपने आप भारतीय जनता पार्टी को भी चोट दे सकेंगे।

राफेल विमान खरीद पर राहुल गाँधी के तर्क उदात्त से हास्यास्पद हो रहे हैं। उनकी उकताहट भरी टिप्पणियों को शेष वरिष्ठ काँग्रेस नेता पूरी वफ़ादारी से तोता पढंत की तरह दुहरा रहे हैं, क्योंकि एक बार उनके “राजकुमार” ने बात कह दी, तो उनके पास उसके अनुपालन, दोहराव और बचाव के अलावा अन्य कोई विकल्प बचता नहीं है। वरिष्ठों के सामने लगाए गए आरोपों को सत्यापित करने का कोई ठोस मार्ग नहीं है, पर उनकी पूरी रणनीति किसी भी तरह मतदाताओं के दिमाग में संदेह के बीज बोने की है।

श्री गाँधी का विश्वास निश्चित रूप से इस दर्शन पर हैं कि वे यदि कोई आरोप लगाकर लंबे समय तक रोना-गाना करते हैं, कीचड़ उछालते हैं तो थोड़ा-बहुत कीचड़ तो ज़रूर चिपकेगा। उनका मानना है कि उनके अपने परिवार और पार्टी की ख़राब आर्थिक ख़्याति के चलते जहाँ उनका हर कदम कीचड़ में धँसा है, प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे बेतुके आरोपों से कलंकित हो सकते हैं। वे पहचानते हैं कि उनके और उनके परिवार को मुक्ति केवल तभी मिल सकती है, जब वे किसी भी तरह मतदाताओं को यह मनवा देते हैं कि मोदी और सत्तारूढ़ दल भी “भ्रष्ट” हैं!

विपक्षी पार्टियों में से अब लगभग मृत प्राय: सीपीआई (एम) को छोड़कर अन्य कोई भी इस मामले को उठाने का फैसला नहीं कर रहा है क्योंकि राहुल गाँधी के तर्क में किसी को भी कोई औचित्य नहीं दिख रहा है।

श्री गाँधी किसी पौराणिक अनुबंध की चीर-फाड़ करते रहते हैं कि यूपीए सरकार ऐसे कोई हस्ताक्षर करने की योजना बना रही थी लेकिन किए नहीं। वे यह तुलना इसलिए करते हैं कि मानो ऐसा कोई अनुबंध एनडीए सरकार द्वारा पहले से ही निष्पादित किया गया हो और उनकी सरकार ने उस पर काम किया था। उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि यूपीए सरकार के 10 वर्षों में इस पर हस्ताक्षर क्यों नहीं हुए थे? क्या कांग्रेस इस सौदे से पैसे कमाना चाहती थी, जैसे बोफोर्स मामले में किया था लेकिन संतोषजनक सौदा करने में असमर्थ रहे थे?

विशेषज्ञों के तार्किक तर्कों का मतलब उनके लिए कुछ भी नहीं है। सरकार द्वारा विस्तृत स्पष्टीकरण प्रदान किए जा चुके हैं, लेकिन उन्हें राहुल गाँधी और उनके वफादार प्रवक्ताओं ने बड़ी तत्परता से खारिज कर दिया। श्री गाँधी मनमोहन सिंह की अगुवाई में अपनी ही सरकार द्वारा बनाए कानून को खत्म करने में लगे थे, तब उनसे सत्ताधारी पार्टी के शब्दों पर विश्वास करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है!

रक्षा मंत्री के वक्तव्य का मतलब उनके और उनकी पार्टी के लिए कुछ भी नहीं है। डेसॉल्ट के सीईओ श्री एरिक ट्रैपियर द्वारा दिए गए वक्तव्यों को धांधली माना जा रहा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति के वक्तव्य को तज दिया गया है और प्रेरित बताकर परे कर दिया गया है। वे अपने आपके अलावा किसी पर भी विश्वास नहीं करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि कीमत पर चर्चा नहीं की जाएगी और श्री गाँधी ने अदालत के मजबूत प्रतिशोध से डरते हुए बुद्धिमानी दिखाकर इस मामले में चुप रहने का विकल्प चुना है और सम्माननीय न्यायालय के विचारों पर आक्षेप नहीं किया है।

उनके पास अनुभव और समझ की बेहद कमी है और वे किसी भी कीमत पर प्रधान मंत्री बनने की अपक्व महत्वाकांक्षा रखते हैं, इसका प्रदर्शन हो चुका है। राफेल के सभी ब्योरों का खुलासा पड़ोसी देशों के साथ करने में भी उन्हें कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस सौदे में कुछ तो ऐसा है जो शायद छिपाया गया है। फिर भले ही देश की सुरक्षा भाड़ में जाए।

श्री गाँधी बहुत ही हताश स्थिति में हैं। अपनी पार्टी की कमजोर स्थिति के चलते उन्हें चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी नेताओं को साथ लेना होगा, पर वे महागठबंधन के नेतृत्व की चाहना करते हैं।

यदि काँग्रेस पार्टी तथाकथित महागठबंधन पर सवार होकर भी सत्ता में नहीं आती है, तो यह मानना मुश्किल नहीं होगा कि काँग्रेस पार्टी के अन्य सक्षम नेता उभरने लगेंगे और श्री गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाएँगे। काँग्रेस का विघटन हो सकता है या नेताओं के अन्य समूह के साथ अहम पुनर्गठन का दौर चल सकता है।

काँग्रेस पार्टी अपने भीतर होने वाले इस तरह के विनाशकारी परिवर्तनों से परिचित है।

आखिरकार, श्री राहुल गाँधी की दादी श्रीमती इंदिरा गाँधी ने भी वर्ष 1969  में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को विभाजित कर काँग्रेस (इंदिरा) के उस पार्टी के अग्रदूत का गठन किया था, जिसका नेतृत्व आज श्री गाँधी के पास है। मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम, पी.वी. नरसिम्हा राव और ऐसे ही तमाम अन्य लोगों के नाम अब कहाँ हैं, जिन्हें पार्टी से बाहर फेंक दिया गया और भूला दिया गया।

राहुल गाँधी लंबे समय से “भेड़िया आया-भेड़िया आया” चिल्ला रहे हैं और अब यह केवल कुछ समय की बात है, उसके बाद मतदाता उनकी किसी भी बात पर विश्वास करना बंद कर देंगे। जैसे कि पुरानी कहावत है, श्री गाँधी भी कुछ लोगों को हर बार मूर्ख बना सकते हैं या वे कुछ देर के लिए सभी लोगों को मूर्ख बना सकते हैं लेकिन वे निश्चित रूप से हर बार सभी को मूर्ख नहीं बना सकते!

श्रीमती सोनिया गाँधी ने हाल ही में जिस नेहरू विरासत की बात की थी क्या राहुल गाँधी उसकी आखिरी कड़ी है?

क्या राफेल की इस तरह की एक और कथा बन जाएगी जो कहे  “राजकुमार के पास पहनने के लिए कपड़े नहीं है”?

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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Where is Rahul Gandhi and his Congress going with Rafale?

181116 Rahul and Rafale

What is driving Rahul Gandhi to stake everything, including possibly his political career on Rafale?

As a politician, I am sure he knows or has been advised that he must never put all his eggs in one basket. He has always been low on personal credibility with the electorate and his gaffes in Parliament and outside are constantly doing the rounds on social media. I would be surprised if he is not aware of this.

The stakes are very high for him personally in the coming State and Lok Sabha elections. The Congress has lost virtually every election under Rahul Gandhi’s leadership barring Karnataka where it had to support its coalition partner to form the Government and saty in power albeit with their partner as the leader of the coalition. Of course, the Congress party will present a completely different perspective on these losses and only speak about some of the bye-election wins.

Mr Gandhi is trying everything in the book from temple visits and soft Hindutva to identifying his “janeo dhari” self with the Hindu community to technology on the one hand and questioning every step the Government takes on the other. What is particularly surprising is his unparliamentary language which seems to be gathering more and more adjectives as the elections draw nearer.

With very few issues to speak about, no corruption issues at all over the past 4 years and faced with significant positives of the Government that he no way to counter, Rahul Gandhi and his band of merry men have picked up Rafale as their single point agenda. Coupled with this, they have decided to target Prime Minister Modi as a single individual because they believe if they hurt Mr Modi, they will hurt the Bhartiya Janata Party.

Rahul Gandhi’s arguments on the Rafale aircraft purchase are moving from the sublime to the ridiculous. His shrill comments are being loyally parroted by the senior Congress leaders because once their ”Prince” has spoken, they have no option but to comply, repeat and defend. They have nothing concrete to establish their allegations, but their entire strategy is to somehow, sow some seeds of doubt in the minds of the electorate.

Mr Gandhi certainly believes in the philosophy that if he shouts out an allegation crying himself hoarse long enough, some of the dirt may stick. He assumes that because of the financially dirty reputation of his own family and party, whereby he and his family have had a sticky finger in every pie, Prime Minister Modi can also be tarnished with such nonsensical allegations. He recognises that the only salvation for him and his family is to somehow convince the electorate that Mr Modi and the ruling party is “also corrupt”!

None of the other opposition parties, barring the now almost defunct CPI(M), have chosen to rake up this matter since no one sees any merit in Mr Rahul Gandhi’s argument.

Mr Gandhi keeps pulling out some mythical contract that the UPA Government was planning to sign but did not. He does this to compare what his Government may have done with a contract that has already been executed by the NDA Government. The question to ask is why this was not signed in 10 years of the UPA Government? Did the Congress want to make money from this deal, like they did with Bofors and were unable to close a satisfactory deal?

Logical arguments from experts mean nothing to him. Detailed explanations have been provided by the Government, but these are discarded very promptly by Rahul Gandhi and his loyal spokespersons. Mr Gandhi is used to tearing up legislation of his own Government led by Mr Manmohan Singh so how can he be expected to believe the words of the ruling party!

Statements by the Defence Minister mean nothing to him and his party. Statements by Mr Eric Trappier, the CEO of Dassault are deemed to be rigged. Statements from the French President are discarded and thrown away as motivated. He believes no one except himself.

The Supreme Court has taken a view that the price will not be discussed and Mr Gandhi, fearing a strong reprisal from the Court, has wisely chosen to stay silent on this matter and not cast aspersions on the views of the honourable Court.

His complete lack of experience and understanding coupled with his raw ambition to become the Prime Minister at any cost is on display. He has no worries about disclosing all details of Rafale to our neighbouring countries because he thinks there is something that maybe hidden in the deal. Security of the country be damned.

Mr Gandhi is in a very desperate position. He needs to get opposition leaders together to fight elections and despite the weak position of his own party, he wants to assume leadership of the mahagathbandhan.

If the Congress party does not come to power even after riding on the back of the so called mahagathbandhan, it would not be hard to assume that other competent leaders in the Congress party will start to emerge and question Mr Gandhi’s leadership. The Congress may disintegrate or go through a serious reorganisation under another set of leaders.

The Congress party is familiar with such cataclysmic changes within itself.

After all, Mrs Indira Gandhi, Mr Rahul Gandhi’s grandmother, split the Indian National Congress in 1969 and formed Congress (Indira) the precursor to the party that Mr Gandhi leads today. Where are the tall leaders like Morarji Desai, Babu Jagjivan Ram, PV Narasimha Rao and so many others who were thrown out of the party and forgotten.

Rahul Gandhi has cried “wolf-wolf” too long and it is only a matter of time before the electorate will stop believing anything he says. As the old saying goes, Mr Gandhi can fool some people all the time or he can fool all the people for some time but he certainly cannot fool all the people all the time!

Will Mr Rahul Gandhi be the last of the Nehru legacy that Mrs Sonia Gandhi recently spoke about?

Will Rafale become another celebrated story of the “Prince has no clothes”?

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