राष्ट्रवादी होना और ऐसा कहने में गर्व होना

190504 Nationalists

चुनाव अपने लंबे वृत्त को पूरा करते हुए समापन पर आ गए हैं। इन चुनावों को सबसे अधिक दोषारोपण करने वाले चुनावों के रूप में देखा जा सकता है और बीते कुछ दशकों में मैंने तो हर राजनेता को इतनी व्यंग्य उक्तियों से भरे हुए भाषण देते पहले कभी नहीं देखा था,जितना इस बार देखा।

इसके अलावा अभी तक जितना “राष्ट्रवाद” या “राष्ट्रवादी”  वाक प्रचार इन चुनावों का हिस्सा बना वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। भाजपा के सभी विरोधी दल, पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार इस शब्द को भाजपा और उसके सभी अनुयायियों पर आरोप के रूप में फेंक रहे हैं जैसे कि राष्ट्रवादी होना कोई अपराध है और जिसे हर हाल में लताड़ा जाना चाहिए, अपमानित करना, ताने मारना, उपहास करना और दंड दिया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद आधुनिक आंदोलन है। पूरे इतिहास में हम देखते हैं कि लोग अपनी पैदाइशी मिट्टी, अपने माता-पिता की परंपराओं, और स्थापित क्षेत्रीय प्राधिकारी से जुड़े होते हैं। अमूमन 18 वीं शताब्दी के अंत तक राष्ट्रवाद सार्वजनिक और निजी गठन की भावना के रूप में पहचाना जाने लगा। राष्ट्रवाद को कई बार ग़लती से राजनीतिक व्यवहार का कारक माना जाता है।

राष्ट्रवादी व्यक्ति वह होता है जिसकी उसके राष्ट्र के साथ पहचान दृढ़ होती है और जो राष्ट्र के हितों का दृढ़ता से समर्थन करता है।

दुनिया भर में राष्ट्रवादी आंदोलनों ने व्यक्ति को उसकी पहचान बनाने और राष्ट्रीय हित को बनाए रखने में मदद की है। राष्ट्रवादी आंदोलनों की पहली लहर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में क्रांतियाँ लेकर आईं, जिनके चलते जर्मनी और इटली का एकीकरण हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पूर्वी और उत्तरी यूरोप के साथ ही जापान, भारत, आर्मेनिया और मिस्र में इसकी दूसरी लहर उठी। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी राष्ट्रवादी आंदोलन था जैसे दुनिया के अधिकांश अन्य हिस्सों का उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन।

पूरे विश्व में राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आंदोलन तेजी से बढ़ रहे हैं।

यह डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव से हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि वे निश्चित रुप से फिलीपींस के राष्ट्रपति डुटर्टे के राष्ट्रवादी हैं। तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन से लेकर इंडोनेशिया में राष्ट्रपति जोकोवी तक, जापान में प्रधान मंत्री शिंजो आबे से लेकर इज़राइल में प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तक। दुनिया भर के और भी कई देशों में और अधिक राष्ट्रवादी नेता चुने जाएँगे। चीनी और रूसी नेता अपने कम्युनिस्ट देशों में अपने लोगों की रैली निकालने के लिए राष्ट्रवाद के रूप का उपयोग करते हैं।

महत्वपूर्ण कारक जिसे समझा जाना चाहिए और जिसका अध्ययन होना चाहिए वह यह है कि ऐसा क्या है, जो इस तरह के राष्ट्रवादी आंदोलन लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रक्रियाओं के माध्यम से दुनिया भर में हो रहे हैं। ये आंदोलन फासीवादी या तानाशाही आंदोलन नहीं हैं जो बंदूक की ताकत पर हुए हैं।

क्या यह बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि शासन के अन्य सभी प्रकारों ने उन लोगों को कुछ नहीं दिया है जिसका उन्होंने आम लोगों से वादा किया था जो कि बड़े पैमाने पर दुनिया भर के अधिकांश देशों में थे। उनकी पैदाइशी भूमि के साथ पहचान उनकी निश्चितता है जिससे कोई भी राजनेता आम आदमी को दूर नहीं कर सकता है और इसलिए यह नागरिकों की राष्ट्रवादी मानसिकता का हर संभव कारण है।

द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने 4 मई 2019 के अंक में “राष्ट्रवादी जोश की वजह से नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल सुरक्षित रहने की संभावना है” शीर्षक से लेख छापा है। लेख के लेखक को मोदी सरकार के प्रदर्शन या उनके द्वारा शुरू की गई अन्य तमाम सामाजिक विकास योजनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की सराहना करने का कोई कारण नहीं है, जिससे 500 मिलियन लोग कवर होने वाले हैं। भारत ने विश्व में जो प्रगति की है, न तो उनकी रुचि उसमें है न ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत की सफलताओं को लेकर है।

द इकोनॉमिस्ट की तरह कई अन्य उदारवादी पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा की जीत का कारण और कुछ नहीं, केवल राष्ट्रवाद होगा। राष्ट्रवाद की उनकी सुविधाजनक व्याख्या संरक्षणवाद, अलगाववाद, विदेशी लोगों को पसंद न करना (जेनोफोबिया) और कुलीन विरोधी भाषणबाजी है। इन पत्रकारों के लिए कुछ मायने रखता है तो यह कि उनके और उनकी दुलारी जनजाति को क्या मिलता है। भारत की जनता को ध्यान में रखकर संधारित किए गए अभूतपूर्व कार्यक्रम इन पत्रकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए कोई मायने नहीं रखते है क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों से उन्हें कोई सीधा लाभ नहीं होता है।

राष्ट्रवाद की सदियों पुरानी नकारात्मक परिभाषाओं और धारणाओं को बदलना होगा। राष्ट्रवादी होने की सकारात्मकताओं को स्वीकार करने की ज़रूरत आन पड़ी है और देश को मजबूत बनाने में राष्ट्रवाद की भूमिका को मान्यता दी जानी चाहिए।

जो राष्ट्र से संबंधित है वह सब राष्ट्रवाद है और इसका राष्ट्र के किसी धर्म या आर्थिक समूह से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। इसे इससे भी कोई मतलब नहीं है कि कौन बहुसंख्यक है या कौन अल्पसंख्यक है। मुझे तब हैरानी होती है जब ऐसे पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों द्वारा भारत में राष्ट्रवाद को एक धर्म से जोड़ा जाता है।

ये पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार बड़ी आसानी से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि इन चुनावों में राष्ट्रवादी जोश चाबुक की मार की तरह लोगों पर पड़ेगा और नरेंद्र मोदी को फिर दूसरी बार सत्ता में लाने में मददगार होगा। चूँकि यह राष्ट्रवादी आंदोलन श्री मोदी और भाजपा को शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी दिलाने में मदद करेगा, इसलिए इसे ग़लत और अस्वीकार्य के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। क्या कुछ राजनीतिक दलों की जरूरतों के कारण उनका एजेंडा संचालित किया जा रहा है या वे वास्तव में शक्तिशाली चौथे स्तंभ के जिम्मेदार सदस्यों के रूप में कार्य कर रहे हैं?

अधिकांश भारतीयों की मूक सहमति उन विचारों (और संभवतः उनके वोटों के रूप में भी) उन लोगों के खिलाफ मजबूत हो रही है जो देश में अस्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सोच सीमा पार के उन आतंकवादियों के खिलाफ हो सकती है जो समय-समय पर भारत चोट पहुँचाते हैं और पहली बार भारतीयों को ऐसा कोई मजबूत नेता दिख रहा है जिसे पछाड़ना मुश्किल है। यह उन लोगों के खिलाफ भी हो सकता है जो “टुकडे – टुकडे” नारे का उपयोग कर भारत को तोड़ने की बात करते हैं। या यह उन लोगों के खिलाफ हो सकता है जो राजद्रोह करने को तैयार हैं और जो इतना कहकर नहीं रुकते बल्कि यह भी कह रहे हैं कि वे देशद्रोह के खिलाफ कानून को हटा देंगे।

जो साफ़ दिख रहा है वह यह कि भारत के नागरिक कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले सात दशकों में राजनेताओं की दोगली बातें बहुत सुन ली है। वे इस तरह के कथनों से भी आज़ीज आ गए हैं, जैसे

“हम इस तरह के घृणित कार्य की कड़ी निंदा करते हैं” या “हम नागरिकों के लचीलेपन का सम्मान करते हैं।”

इन सभी पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों से मेरा एक ही सवाल है कि राष्ट्रवादी होने में क्या गलत है?

मैं एक राष्ट्रवादी हूँ और ऐसा कहते हुए मुझे गर्व होता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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ठोस मुद्दों के सामने नासमझ विपक्ष

190422 Lok Sabha Elections

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के दो दौर समाप्त हो चुके हैं।

विपक्षी नेताओं की आवाज और अधिक तीखी और तेज होती जा रही है क्योंकि उन्हें शायद दीवार पर लिखा साफ़ दिख रहा है। उनकी हताशा स्पष्ट है क्योंकि वे एक गैर-मुद्दे से दूसरे गैर-मुद्दे पर इस उम्मीद से उछल-कूद कर रहे हैं कि मतदाता मोदी सरकार के खिलाफ़ कुछ आरोप तो सुन लेंगे और स्वीकार कर लेंगे।

राजनेता सपाट चेहरों से झूठ बोल सकते हैं। वे बार-बार अपने झूठ को दोहराते हैं और एक स्तर पर आकर अपने ही झूठ को सच मानने लगते हैं।

आइए हम उन 10 शीर्ष गैर-मुद्दों को देखें और उनका मूल्यांकन करें जिनके बारे में विपक्षी दल बात करते नहीं अघाते हैं।

  1. भ्रष्टाचार: यह जानते हुए भी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सिद्ध कर दिया है कि सरकार में कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं है, विपक्ष भ्रष्टाचार के कुछ विश्वसनीय आरोप लगाने के लिए बेताब है, गोया जिसे मतदाता स्वीकार कर सकते हैं। राहुल गाँधी ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और खुद पर लगे आरोपों पर रोते हुए कहा कि अनिल अंबानी को विमान के बड़े ऑर्डर दिए गए थे। श्री गाँधी ने राफेल की संख्याओं को बदल दिया है और अपनी इच्छा से श्रोताओं को संबोधित करते हुए हर बार इन “राफेल” निधियों का उपयोग अलग तरीके से करते हैं, बिना यह समझे कि उनके भाषण रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और जिनकी तुलना की जाती है, और कुछ नहीं तो कम से कम एक-जैसा तो कुछ कहे। ऐसे में ज़रा भी आश्चर्य नहीं है कि अन्य विपक्षी दलों में से किसी एक ने भी इस मुद्दे को या मोदी सरकार के किसी अन्य भ्रष्टाचार के मुद्दे को नहीं उठाया है।
  1. 15 लाख रु: कई विपक्षी नेताओं की एक सामान्य टिप्पणी मतदाताओं को यह याद दिलाने की कोशिश है कि श्री मोदी ने वर्ष 2014 के चुनावों में प्रत्येक मतदाता को 15 लाख रुपये देने का वादा किया था। जब छोटे पर्दे पर पक्षपाती पत्रकार साउंड बाइट्स के लिए पूछते हैं तो वे इस माँग के लिए कुछ मतदाताओं को प्रेरित कर प्राप्त करने का प्रबंधन कर लेते हैं। यह तथ्य कि विपक्षी दल श्री मोदी का वह भाषण नहीं खोज पाए हैं, जहाँ ऐसा वादा किया गया था, जो पर्याप्त सबूत होता। अगर इस तरह का वास्तव में कोई भाषण होता, तो वर्ष 2019 के चुनावों के लिए यह एकल बिंदु एजेंडा होता।
  1. किसान संकट: किसान संकट पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह ऐसी समस्या है जो पिछले 70 वर्षों में बिना किसी खास समाधान के चली आ रही है। हमें विश्वसनीय नीति की आवश्यकता है जो यह सुनिश्चित करे कि किसानों को उनकी उपज का उचित पारिश्रमिक मूल्य मिले, उन्हें अच्छी गुणवत्ता के बीज, पर्याप्त उर्वरक, उचित भंडारण सुविधाएँ और भरपूर पानी मिले। केवल मोदी सरकार ने कृषि की इन पाँच बुनियादी आवश्यकताओं को संबोधित किया है। कृषि संकट एक चुनौती है जिसे संभालने में समय लगेगा। काँग्रेस की बार-बार ऋण माफी की परिपाटी, हमारे किसानों के लिए स्थायी वित्तीय कल्याण का निर्माण करने में मदद नहीं करती है। वे पैसा कमाने का अवसर चाहते हैं और शासकीय सूचना पर निर्भर बन जाते हैं। शरद पवार और देवेगौड़ा जैसे वरिष्ठ कृषि नेताओं ने अपने नेतृत्व में अपने राज्यों में किसान संकट और किसान आत्महत्याएँ देखी हैं। जब वे सत्ता में थे तबकी उनकी टिप्पणियों को देखना दिलचस्प होगा कि कैसे उन्होंने किसान संकट को संभाला था।
  1. रोजगार निर्माण: काँग्रेस पिछले 5 वर्षों में रोजगार सृजन की कमी से जूझ रही है। वे इसे मतदान का महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं बना पाई है क्योंकि वे इससे हज़ारों साल नहीं खरीद रहे हैं। सरकार में पर्याप्त नौकरियों का सृजन नहीं हुआ है, लेकिन विशाल बुनियादी ढाँचे पर खर्च के साथ बढ़ती अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र में बहुत सारी नौकरियाँ पैदा कर रही है। भविष्य निधि लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है। स्टार्टअप उच्च स्तर पर हैं। परिवहन क्षेत्र में अब जैसी तेजी पहले कभी नहीं देखी गई है। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों से तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों को माँग में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। सरकार को भविष्य में इसी तरह के आरोपों का सामना करने के लिए निजी और असंगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन के अधिक विश्वसनीय डेटा को जल्दी से विकसित करने की आवश्यकता है।
  1. रसायन पर अंकगणित: कुछ राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी नेता साथ आ रहे हैं तो दूसरे राज्यों में वे एक-दूसरे से ही लड़ रहे हैं। मायावती और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में साथ हैं और काँग्रेस से लड़ रहे हैं और तब भी सभी पार्टियाँ साझा विपक्षी मंच पर साथ आ रही हैं। केजरीवाल और काँग्रेस दिल्ली में अपने रास्ते जाने का फैसला कर रहे हैं लेकिन हरियाणा में वे एक साथ आना चाहते हैं। इन नेताओं का मानना है कि साथ आना वर्ष 2014 के चुनावों में मतदाताओं को जोड़ने का सरल अंकगणित होगा। वे मानते हैं कि मतदाता उनके गैर-गठबंधनों और निहित विरोधाभासों के आर-पार देख नहीं सकता है और वे भूल जाते हैं कि नेता के साथ मतदाता का रसायन संख्याओं के अंकगणित से अधिक महत्वपूर्ण है।
  1. पुलवामा और बालाकोट: दुनिया भर के युद्धों का राजनेताओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। हर विपक्षी नेता पुलवामा और बालाकोट मामले में सत्तारूढ़ दल की स्थिति में रहना चाहेगा। श्री मोदी ने सशस्त्र बलों को आगे बढ़ने की अनुमति देने का निर्णय लिया और वे इस निर्णय का श्रेय लेने का अधिकार रखते हैं। इंदिरा गाँधी ने वर्ष 1971 के युद्ध का श्रेय तब लिया जब बांग्लादेश बनाया गया था। कारगिल युद्ध का श्रेय श्री वाजपेयी को मिला। श्री मोदी को बालाकोट का श्रेय लेने का पूरा अधिकार है। पुलवामा हमले और श्री मोदी की तत्काल विश्वसनीय प्रतिक्रिया न देने की कमी के बाद विपक्षी नेता अपनी टिप्पणी भूल जाते हैं। जब कार्रवाई की गई, तो वे बेईमानी से रोने लगे। इसके विपरीत, यदि ऑपरेशन सफल नहीं होता, तो क्या विपक्षी नेता भूल जाते और विफलता को चुनावी मुद्दा नहीं बनाते?
  1. विमुद्रीकरण और जीएसटी: विपक्षी नेता समझते हैं कि विमुद्रीकरण का शुरुआती दर्द भुला दिया गया है। जीएसटी ने आम आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। विमुद्रीकरण और जीएसटी अब चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है और राहुल गाँधी इस विषय पर ढोल पीटना चाहते हैं, मतदाता के पास इन विषयों पर अधिक झूठ और असत्य सुनने का समय नहीं है।
  1. लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बचाओ: ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल लोकतंत्र को बचाने और भारतीय जनता पार्टी को वोट देकर बाहर करने की आवश्यकता के बारे में चिल्लाते रहते हैं। ममता बनर्जी तानाशाही सरकार चलाती हैं, जो विपक्ष को स्वीकार नहीं करती, केजरीवाल इन चुनावों में कोई महत्व नहीं रखते हैं। विपक्षी नेता जो धार्मिक मतों के आधार पर मतदाताओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वे उसी रौ में धर्मनिरपेक्षता का सहारा ले रहे हैं। ये विपक्षी नेता चुनावों के ठीक मध्य भारत के लोकतंत्र को बचाने की चिल्ला-चोट कर रहे हैं और दुनिया सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावों की साक्षी होने जा रही है!
  1. कोई विकास नहीं: व्यापक बयानों में कहा गया है कि पिछले 5 वर्षों में भारत में कोई विकास नहीं हुआ है जबकि सभी सूचकांकों से संकेत मिलता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। सड़कों और बिजली में हुए सुधार हर कोई देख और अनुभव कर सकता है। भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और बढ़ा हुआ कद हर भारतीय को गर्वित करेगा।
  1. कमजोर नेता: प्रियंका गाँधी तार सप्तक की आवाज में कहती जा रही हैं कि मोदी अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मोदी रहे हैं। जबकि सार्वजनिक जीवन में उनकी इस तथ्य के अलावा लगभग कोई विश्वसनीयता नहीं है कि वे अपनी दादी की तरह दिखती है, कोई भी मतदाता कभी भी इस हास्यास्पद टिप्पणी पर विश्वास नहीं कर सकता है कि जिसे वे बार-बार फैलाने की कोशिश कर रही है।उदार पत्रकारों की सेनाएँ अपने पुराने आकाओं को कुछ गोला-बारूद मुहैया कराने की उम्मीद में डेटा और पिछले भाषणों को हवा दे रही हैं। मतदाताओं को साधने की कोशिश करने में बोलबाला करते हुए साक्ष्य का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन सत्तारूढ़ दल द्वारा उनका जल्दी और प्रभावी तरीके से खंडन किया जा रहा है।

विपक्षी नेता खुद इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उन्हें किस बारे में बात करनी चाहिए। तथ्य तो यही है कि एक भी विश्वसनीय मुद्दा नहीं है और यही वजह है कि विपक्षी दल साझा मंच पर एक साथ नहीं आ पा रहे हैं। सभी विपक्षी दलों का एकमात्र साझा एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी को हटाना है। मतदाताओं को समझाने के लिए इतना भर पर्याप्त नहीं है जो अपने जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव देख सकते हैं और यह जानते हैं कि आने वाले वर्षों में वे और अधिक विकास की उम्मीद कर सकते हैं।

श्री मोदी द्वारा वर्ष 2014 में निर्धारित एजेंडा फिर वर्ष 2019 में स्पष्ट रूप से हासिल किया जा रहा है। बहुत कुछ पूरा हो चुका है और आने वाले 5 वर्षों में बहुत कुछ किया जाना है।

भारतीय हमेशा एक मजबूत नेता चाहते रहे हैं और अब हम हमारे पास वह है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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चुनावी घोषणापत्र – भाजपा बनाम काँग्रेस

190409 Go Vote

चुनाव समीप आ गए हैं। इसी के साथ आ गए हैं चुनावी घोषणापत्र, जिनमें कई वादें और सपने हैं, बिना ये देखें-समझें कि पिछले चुनावों में क्या वादे किए गए थे और तब से अब तक उनमें से कितने पूरे हुए। इन सालों में राजनीतिक दलों ने इसे रोजनामचा जैसा बना लिया है गोया जिसे हर चुनाव से पहले पूरा करना पड़ता है। उनसे कोई नहीं पूछता कि वे ऐसा क्यों करते हैं और निर्वाचित अधिकारियों के एक बार सत्ता में आ जाने के बाद कोई उनके किए चुनावी वादों को भी नहीं देखता।

इसलिए हमें कौन-सा घोषणापत्र हमारी पसंद के अनुरूप है यह तय करने से पहले गौर से देखना होगा कि राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में जो वादे किए थे उनमें से उन्होंने कितने पूरे किए, साथ ही जिसने घोषणापत्र जारी किया उस दल के नेता की विश्वसनीयता को भी परखना होगा। इसका बाकायदा ट्रैक रिकॉर्ड रखना होगा।

आइए हम उन मुख्य मुद्दों की जाँच करें जिनका सामना हमारा राष्ट्र कर रहा है और देखें कि भाजपा और काँग्रेस उन पर किस तरह ध्यान दे रही है। हमें सारी बयानबाजी पर कैंची चलाकर प्रत्येक बिंदु को आर्थिक विवेक के लेंस से तौलना होगा।

  1. रोजगार: हमारे देश की आबादी में हर साल 28 मिलियन से अधिक लोग जुड़ते हैं, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सत्ता में जिसकी सरकार है उसे रोजगार पैदा करने हैं। लेकिन क्या यह केवल सरकारी नौकरियों से साध्य होगा? या सरकार को ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करना चाहिए जो उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने के लिए अनुकूल हो। काँग्रेस अधिक सरकारी नौकरियों का वादा कर रही है तो भाजपा अधिक उद्यमी अवसर प्रदान कर रही है। यदि हम प्रभावी नौकरशाही चाहते हैं तो सरकारी नौकरियों की संख्या हमेशा परिमित होगी।
  1. स्वास्थ्य: हमारी बढ़ती जनसंख्या की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के आगे कोई तर्क नहीं हो सकता है। यह तथ्य है कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की वस्तुस्थिति भयावह है और कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता या इसे चुनौती नहीं दे सकता है। भाजपा ने अपनी आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से जो किया है, वह विचारणीय है, जिसने हमारे देश के लगभग 40% लोगों को चिकित्सा बीमा प्रदान की है। काँग्रेस के घोषणापत्र में राइट टू हेल्थकेयर एक्ट (स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम का अधिकार) की बात की गई है, लेकिन यह सोचा जाना चाहिए कि पहले से क्या लागू किया गया है जबकि उसके सामने किसका वादा किया जा रहा है।
  1. शिक्षा: काँग्रेस के घोषणापत्र में शिक्षा के लिए वार्षिक बजट का 6% आरक्षित करने का वादा किया गया है, जबकि भाजपा के घोषणापत्र में शिक्षण संस्थानों में वृद्धि की बात की गई है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भाजपा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए हमारे शैक्षिक संस्थानों को विकसित करना चाहती है, यहाँ एक बार फिर भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश पर ध्यान केंद्रित करने की बात है।
  1. किसान: आजादी के बाद से अब तक किसानों की दुर्दशा को लेकर बहुत बातें हुई लेकिन उनके लिए काम बहुत कम हुआ है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी किसान खैरात में भोजन नहीं चाहता है। वह कड़ी मेहनत कर अपनी जमीन से आजीविका अर्जित करना चाहता है। काँग्रेस, अपनी सामान्य शैली में अधिक विज्ञप्ति पत्रक देने का वादा करती है जबकि भाजपा 2024 तक खेत की आय दुगुना करने और खेती के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराने की बात करती है। इसी के साथ भाजपा ने पहले ही नीम लगे उर्वरक और बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़- एमएसपी) योजना लागू कर दी है।
  1. सुरक्षा: राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में किसी स्पष्टीकरण या चर्चा की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है, हर भारतीय (शायद कुछ अपवादों को छोड़कर) अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा चाहता है। इसमें हमारी सीमाओं की सुरक्षा, हमारे घरों की सुरक्षा और हमारी व्यक्तिगत सुरक्षा शामिल है। काँग्रेस आतंकवाद की समस्या को हल किए बिना सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को शिथिल करना चाहती है। भाजपा का स्पष्ट रूप से विपरीत दृष्टिकोण है और हमने देखा है कि किस नेता ने बीते वर्षों में क्या कार्रवाई की है। भाजपा ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी शून्य सहनशीलता (जीरो टॉलरेंस) पर जोर दिया है। क्या हम आतंकवाद पर केवल “कड़ी निंदा” करने का जोखिम उठा सकते हैं जैसा कि हमने हमेशा हमला होने के बाद किया है या हमें पूर्ण निवारण के लिए मुँह-तोड़ जवाब देना चाहिए?
  1. राजकोषीय विवेक: काँग्रेस का घोषणापत्र स्पष्ट रूप से मजबूत अर्थव्यवस्था दिए जाने की संभावनाओं का लालच दे रहा है, जहाँ मुद्रास्फीति नियंत्रण में हो, चालू खाता घाटा अपने सबसे निचले स्तर पर है और जीडीपी में लगातार मजबूत वृद्धि देखी गई है। वे न्यूनतम आमदनी योजना (एनवाईएवाई) जैसी अपनी लोकलुभावन योजनाओं के साथ खजाने पर छापा मारने का एक शानदार अवसर देखते हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने हमेशा राजकोषीय विवेक का प्रदर्शन किया है और कठिन निर्णय लेने में संकोच नहीं किया है जब हमारे देश के लिए दीर्घकालिक राजकोषीय नीतियों को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
  1. समान नागरिक संहिता: दुनिया में शायद कोई देश ऐसा नहीं है जो अपने नागरिकों के धर्म के आधार पर लागू कानूनों की बहुलता रखता हो। सभी नागरिकों के लिए कानून समान होने चाहिए। हमारी आजादी के बाद के विकास के चलते समान नागरिक संहिता के कड़े फैसले को टालते रहना तब से चली आ रही सरकारों को अनुकूल लगा है। इससे धार्मिक समूहों के बीच बहुत सारी चुनौतियाँ आई हैं। यह समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन शुरू होने वाली एक स्वस्थ बहस शुरू करने का समय है और भाजपा ने इस मुद्दे को संबोधित किया है, जबकि काँग्रेस समझदारी से चुप है।
  1. आधारिक संरचना : स्वतंत्रता के बाद हमसे क्रमिक सरकारों ने हमेशा अच्छे बुनियादी ढाँचे का वादा किया है। “अच्छे” की परिभाषा को कभी स्पष्ट नहीं किया गया है। क्या गड्ढेदार सड़कों को अच्छा या स्वीकार्य माना जाता है? क्या शुष्क और बिजली कटौती को स्वीकार्य माना जा सकता है? आज के युवा भारतीय अच्छी सड़कें, 100% बिजली और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की सुविधा को स्वीकार मानते हैं। भाजपा के घोषणापत्र में वर्ष 2022 तक सभी के लिए बुनियादी ढाँचे और आवास में महत्वपूर्ण निवेश के बारे में बात की गई है।

राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का घोषणापत्र निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में नौकरियों के आरक्षण का वादा करता है, उसे किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है। कई और हास्यास्पद वादे होंगे जो अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा किए जाएँगे। ये अभी अभी पैदा हुए वादे हैं जिन्हें सभी जानते हैं कि इन्हें कभी लागू नहीं किया जा सकता है।

जैसे-जैसे विकसित दुनिया की आबादी सिकुड़ती जाएगी, अधिक से अधिक भारतीयों को इन विकसित राष्ट्रों में प्रवास करने का अवसर मिलेगा। क्या हमें एक ऐसे नेता की आवश्यकता नहीं है जो भारत को को ऊँचाई प्रदान करे और यह सुनिश्चित करे कि हमारा पासपोर्ट अधिक शक्तिशाली हो या हमें ऐसे नेताओं के समूह की आवश्यकता है जो अपनी आवक देख रहे हों और यह सुनिश्चित करने में लगे रहे कि विश्व भविष्य के भारतीयों का स्वागत नहीं कर पाए?

भाजपा का घोषणापत्र भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विकसित राष्ट्र बनाने की बात करता है। काँग्रेस हमारे देश को गरीबी और अशिक्षा में रखना पसंद करेगी क्योंकि इसी तरह वे चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। लेकिन भारत बदल गया है, और युवा भारतीय जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए।

पर मिलियन डॉलर का सवाल बना हुआ है। क्या चुनावी घोषणापत्र का मतदाता से कोई मतलब होता है या वह विभिन्न नेताओं के अहंकार को फुगाने में अधिक उचित होता है? क्या हम ऐसा घोषणापत्र चाहते हैं, जिसे लागू करने पर कुछ राजनेताओं के अल्पकालिक व्यक्तिगत लक्ष्यों को पूरा करने के लिए देश के खजाने पर छापा पड़ेगा?

हमें अपने स्थानीय राजनेता और हमारे राजनीतिक नेताओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन “लोकतंत्र के त्योहार” की प्रतीक्षा करने के बजाय 5 साल तक करना चाहिए। यह एक आकलन है जो सत्ता में जो पार्टी है और जो विपक्ष में पार्टी है उसका होना चाहिए। एक नेता को अपने वादों को पूरा करने के लिए सरकार में रहने की आवश्यकता नहीं होती है।

जिम्मेदार मतदाताओं के रूप में, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि एक सरकार को कम से कम 2 मौके देने की आवश्यकता होती है  ताकि जो उसने शुरू किया है वह लागू हो। अगर 10 साल के अंत तक भी वादे नहीं निभाए गए, तो मतदाता को बदलने का पूरा अधिकार है। यूपीए को 10 साल दिए गए थे। एनडीए भी इसका हकदार है।

अंत में, जैसी कि पुरानी कहावत है, एक आदमी को मछली दें तो उसके एक दिन के लिए पर्याप्त होगी। एक आदमी को मछली पकड़ना सिखाया तो वह अपने सारे जीवन (सभी शाकाहारियों से माफी के साथ) खा सकेगा। हम देख सकते हैं कि कौन सा घोषणापत्र हमें खाने के लिए मछली दे रहा है और कौन सा घोषणापत्र हमें मछली पकड़ना सिखाने का वादा कर रहा है!

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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  • अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।

10 कारण जिनकी वजह से हमें गठबंधन सरकार को वोट नहीं देना चाहिए

190401 Mahagathbandhan

चुनावों में भाजपा की लोकप्रियता में वृद्धि के आवेग को देखते हुए, इसे समझना आसान है कि किस तरह विपक्षी नेताओं को चिंता हो रही होगी, जो अपने राजवंशों और उनकी प्रासंगिकता को बचाने की जद्दोजहद में हैं। वहीं यह भी काफ़ी आश्चर्यजनक है कि लेखकों ने ऐसे लेखों को लिखना शुरू कर दिया है, जिसमें गठबंधन को महिमामंडित किया जा रहा है और केंद्र में गठबंधन सरकार के आने की उम्मीदें की जा रही हैं।

गठबंधन को व्यक्तियों के ऐसे समूह के अधिनियम के रूप में परिभाषित किया जाता है जो समान मूल्यों पर चलते या सामान्य दृष्टि साझा करते हैं। राजनीतिक गठबंधन ने गठबंधन के अर्थ को किसी संयुक्त कार्य को पूरा करने के अस्थायी गठबंधन की तरह अनुकूलित कर लिया है, लेकिन तब भी अपने घटकों के बड़े हित हासिल करने के साझे लक्ष्यों के साथ।

आगामी चुनावों में निष्क्रिय महागठबंधन का अब एकल बिंदु एजेंडा केंद्र में भाजपा को हटाना है। बस इतना ही। इसके पूर्व के गठबंधनों के विपरीत, इस बार महागठबंधन के घटक एक सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम के साथ भी नहीं आ पाए हैं। गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर भी कोई सहमत नहीं हो सका है। वे राज्यों में आर-पार लड़ते हैं और केंद्र में सहयोग करते हैं।

दुनिया भर में गठबंधन सरकारें हमेशा कमजोर और कम निर्णायक रही हैं। लगभग सभी गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म समझौता और सहिष्णुता है, जहाँ समायोजन और पारिश्रमिक जरूरतों को स्वीकार करना राष्ट्रीय आवश्यकताओं पर प्राथमिकता है। सबसे अधिक गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म है, जहाँ राष्ट्रीय आवश्यकताओं से ऊपर समायोजन और संकुचित जरूरतों को स्वीकारना प्राथमिकता होती है।

आइए हम गठबंधन सरकार की खामियों को परखते हैं क्योंकि इसके साक्ष्य न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में स्पष्ट दिखते हैं और उसके बाद अपना आकलन कर मतदान के लिए कदम बढ़ाते हैं।

  1. यह संघीय संरचना के साथ समझौता है: गठबंधन सरकारें अपनी परिभाषा के अनुसार छोटी पार्टियों का समूह है जो साथ आता है क्योंकि कोई भी अकेली पार्टी सरकार नहीं बना सकती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती होती है कि नेतृत्व कौन करेगा। हमने मुख्यमंत्रियों को चक्रीय क्रम में देखा है ताकि उनके व्यक्तिगत एजेंडे पूरे किए जा सकें। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम व्यक्तिगत क्षेत्रीय पार्टी एजेंडा को अपने राष्ट्र का मार्ग निर्धारित करने की अनुमति न दें।
  1. मजबूत बनाम लंगड़ा घोड़ा प्रधान मंत्री: पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टेलीकॉम घोटाले के बारे में पूछे जाने पर प्रसिद्ध टिप्पणी की थी कि उन्होंने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था और इसलिए वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। नेता के पास तब समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है, जब उसका सामना ऐसी चुनौती से होता है जो किसी एक पार्टी के लिए हो, पर देश के लिए नहीं। जीएसटी, दिवालियापन संहिता, जन हित योजनाएँ जैसे आधार, जन धन योजना, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना और अन्य ऐसी योजनाएँ जो पिछले 2 दशकों से सरकार के एजेंडे में थीं, लेकिन गठबंधन सरकारों की वजह से उन्हें लागू नहीं किया जा सका था।
  1. भारत का संविधान: संविधान ने उन 100 क्षेत्रों को निर्धारित है जिन्हें केवल संसद द्वारा तय किया जा सकता है, राज्यों द्वारा नहीं; इनमें रक्षा, विदेश नीति, सामान्य मुद्रा, न्यायपालिका, संघीय कर, वायुमार्ग और कई अन्य शामिल हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में गठबंधन सरकारों के निहित हित होते हैं। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव लाने की आवश्यकता होती है और वे हमेशा इन क्षेत्रों को अपने हिसाब से मोड़ने के तरीके खोजते रहते हैं।
  1. राजकोषीय विवेक से समझौता होना: अपने गठबंधन सहयोगियों की अलग-अलग वित्तीय माँगों को पूरा करने के लिए ऐसी सरकारों का राजकोषीय विवेक के साथ समझौता करना देखा गया है। क्षेत्रीय और राज्य की आवश्यकताएँ अग्रता क्रम में आ जाती हैं। मुद्रास्फीति की उच्च दर और उच्च राजकोषीय घाटे को देखना आम है जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के गंभीर संरचनात्मक दोषों को जन्म देता है।
  1. वादे पूरा करने के इरादे से नहीं किए जाते: मतदाताओं के सामने स्पष्ट जवाबदेही होना चाहिए ताकि वे अपने नेताओं से उनके द्वारा किए चुनावी वादों को पूरा करने के लिए कह सकें। गठबंधन सहयोगियों के पास हमेशा अपने किए वादों को पूरा न करने का कोई न कोई विश्वसनीय बहाना अवश्य होता है। भ्रष्टाचार को विभिन्न राजनीतिक दलों की जरूरतों को पूरा करने के स्वीकार्य अभ्यास के रूप में भी देखा जाता है जो अपने उसमें से अपने हिस्से माँग करते हैं। किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
  1. स्वास्थ्य और शिक्षा: राज्य नियंत्रित विषय जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा भी एक मामला है। हर कोई सर्वसम्मति से स्वीकार करता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा पर सभी को ध्यान देने की आवश्यकता है। हम राज्यों में मौजूद भारी असमानताओं को देख सकते हैं। हमारे राजनेता ऐसा क्यों मानते हैं कि सभी लोग समान नहीं हैं, और कुछ राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा है और अन्य राज्यों में नहीं? यही बात उन अधिकांश अन्य क्षेत्रों पर लागू होती है जिन्हें राज्य स्तर पर शासन के लिए सौंपा गया है।
  1. व्यक्तिगत एजेंडा निर्णय लेने की प्रबल प्रेरणा: संसद की 5 साल की अवधि और उससे भी कम गठबंधन के आपसी तालमेल की छोटी अवधि को देखते हुए, राजनीतिक दलों को पता है कि उनके पास अपने संबंधित समूहों के वित्तीय लाभों को अधिकतम कर सकने के का लघु गवाक्ष है। यह हमने यूपीए सरकार के वर्ष 2004 से वर्ष 2014 तक के कार्यकाल में देखा है और मुझे ज़रा भी भरोसा नहीं है कि वर्ष 2019 में सत्ता में आने पर यह सोच बदल जाएगी।
  1. विदेश नीति: विश्व राजनीति सीमाहीन दुनिया से ऐसी दुनिया में बदल रही है जहाँ फिर से सीमाएँ खींची जाने लगी हैं। मजबूत नेताओं के मजबूत देश ही इस नई दुनिया में ऐसी जगह बना पाएँगे जहाँ मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और मजबूत रक्षा क्षमताओं का सम्मान होगा। हमने उरी और बालाकोट की आलोचना होते देखी है। अगर कश्मीर में धारा 370 को लेकर कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे पहले ही हम तोड़-फोड़ की घटनाओं के बारे में सुन चुके हैं। गठबंधन सरकार, अपनी परिभाषा से ही हमेशा कमजोर रहेगी और इसलिए राष्ट्रीय पटल पर देश के हितों के साथ समझौता करेगी।
  1. निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी: ज़ाहिरन जब ऐसे दर्जनों लोग होंगे जो मानते हो कि वे गठबंधन में दूसरों की तुलना में राष्ट्र का बेहतर नेतृत्व कर सकते हैं, तो हर विषय पर उनके विचार अलग-अलग होंगे। इसलिए सबसे सरलतम मामलों पर भी निर्णय लेने के लिए सभी के समर्थन की आवश्यकता होती है और इस प्रकार निर्णय लेने की गति धीमी हो जाती है।
  1. कोई भी दल पल्ला झाड़ सकता है: गठबंधन सरकारें कमजोर होती हैं और हमेशा बर्फ की महीन सिल्ली पर चलती हैं, जिसमें जाने कब दरारें दिखाई देने लगे। वे ऐसे व्यक्तियों के समूह द्वारा समर्थित होते हैं जिनकी कोई सर्वसामान्य विचारधारा नहीं होती है। पहला कदम गठबंधन के खिलाफ बयान देने लगता है, फिर रूठना-मनाना शुरू होता है और अंतिम चरण इस तरह समर्थन खींचना होता है जिससे सुनिश्चित हो जाए कि ताश के पत्तों का महल बिखर जाएगा। सरकारों के ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जब सरकार खुद या उसके मूल्यों के साथ समझौता किया गया है और आगे भी ऐसे कई मामले देखे जा सकेंगे।

क्या भारत गठबंधन के नेताओं की कमजोर, अस्थिर और स्वार्थी जोड़-तोड़ को स्वीकार कर सकता है जिनके अपने निजी और व्यक्तिगत एजेंडा हैं और पिछले 5 वर्षों में हमारे हिस्से आई सभी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दरकिनार हो जाना बर्दाश्त कर सकता है?

पुरातन बात याद रखें कि “बहुत सारे रसोइए शोरबा खराब कर देते हैं?” क्या हम प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए संगीतमय कुर्सी का खेल देखना चाहते हैं? क्या हम हर 6 महीने में एक नया प्रधान मंत्री देखने को तैयार हैं?

अधिकांश सरकारें 40% से कम वोटों से चुनी जाती हैं। हालाँकि, सरल गणित काम नहीं करता है। यदि पिछले चुनावों में युद्धरत दो दल अपने वोटों की साँठ-गाँठ करते हैं, तो वे अपने आप यह मान लेंगे कि वे अगले चुनावों में जीत हासिल कर कर लेंगे। वे यह भी मानते हैं कि उनका मतदाता इतना नासमझ है कि संयुक्त पार्टी के लिए मतदान कर देगा और अतीत में एक दूसरे के खिलाफ उनके बाहुबली नेताओं द्वारा कही गई सारी बातों को भूला चुका होगा।

हमें एक ऐसी पार्टी की आवश्यकता है जिसके पास संसद में आवश्यक 272 सीटें हों। इससे सुनिश्चित होगा कि नेताओं को निर्णय लेने के लिए समझौता नहीं करना पड़ेगा जो छोटे क्षेत्रों के लिए तो चल सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि राष्ट्र हित में हो।

हमें अपने दिमाग का उपयोग कर वोट करने की ज़रूरत है जिससे सुनिश्चित हों कि हम एक मजबूत नेता के साथ एक ही पार्टी को वोट दें, जो लाखों युवाओं को उनके सपने सच में बदलने में मदद कर सकता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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अंतरिक्ष – अंतिम सरहद, लक्ष्य शक्ति

190328 Mission Shakti 2

सैकड़ों सालों से इंसान यह सोचकर विस्मित होता रहा है कि अंतरिक्ष में चल क्या रहा है।

खगोलविद कई नए खगोलीय पिंडों की खोज कर यह समझने की कोशिश करते रहे हैं कि ब्रह्मांड कैसे बना है। ज्योतिषियों का अंतरिक्ष को देखने का अलग दृष्टिकोण है, वे आकाश में स्थित खगोलीय पिंडों की उस भूमिका की खोज करते आ रहे हैं जिसके चलते उनके होने से पृथ्वी ग्रह पर हमारे दैनिक जीवन पर असर पड़ता है। चाँद पर हजारों कविताएँ लिखी गई हैं। चाँद की पूजा-अर्चना की जाती है। चँद्रमा आधारित कैलेंडर का पालन हममें से कई लोग करते हैं। अज्ञात उड़न खटोले (यूएफओ), अंतरिक्ष गेलेक्टिक मूवीज और कार्टून और वह सब, जो अंतरिक्ष के साथ जुड़ा है, हमें हमेशा रोमांचित करता है।

लेकिन तब भी जब वर्ष 1969 में नील आर्मस्ट्रांग चाँद पर उतरे थे, क्या अंतरिक्ष के प्रति आधुनिक मानव की रुचि वास्तव में शांत हो पाई थी। उनका कहा प्रसिद्ध वाक्य “मनुष्य का एक छोटा कदम, मानव जाति का एक विशाल कदम ” संभवत: अंतरिक्ष से संबंधित विश्व का सबसे अधिक याद किया जाने वाला उद्धरण होगा। मुझे याद है मैंने माँ से वर्ष 1969 की करवा चौथ पर पूछा था कि क्या चाँद इसके बाद भी पहले की तरह ही पवित्र रहेगा जबकि उस व्यक्ति ने 16 जुलाई 1969 को उस पर कदम रखा था!

जब प्रधान मंत्री मोदी ने 27 मार्च 2019 को मिशन शक्ति के सफल परीक्षण के बारे में भारत की घोषणा की और संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के साथ चार के चुनिंदा क्लब में भारत को शामिल करवाया तो यह वास्तव में भारत का एक विशाल कदम था, अंतरिक्ष में हमारे अधिकारों और हमारी सीमाओं की रक्षा करने का।

हर सही सोच वाले भारतीय को इस पर बहुत गर्व होना चाहिए। मैं ऐसे किसी भी भारतीय से मिलने पर दंग हो जाऊँगा जो देश की सर्वोत्तम संभव सुरक्षा नहीं चाहता है या यह नहीं चाहता है कि भारत को सुपर पावर के रूप में उसका सही स्थान मिले। केवल वे ही इस तरह नहीं सोच पाएँगे जो इस सरकार द्वारा उठाए हर कदम को आगामी चुनाव के निकटवर्ती चश्मा पहन देख रहे हैं।

कई विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएँ चौंका देने वाली और आश्चर्यजनक थीं। इन लोगों ने प्रक्षेपण की लागत की तुलना हमारे देश की भूखमरी को कम करने से की और बड़े कुटील तरीके से सफल परीक्षण की घोषणा को विमुद्रीकरण से जोड़ दिया, विपक्षी राजनेता और इन राजनेताओं से सहानुभूति रखने वाले पत्रकारों ने अपनी किताब में ऐसा कोई भी नकारात्मक विशेषण नहीं छोड़ा, जिसका उपयोग वे सरकार द्वारा उठाए गए किसी कदम से तुलना करने के लिए कर सकें। “केवल 300 किलोमीटर” या “केवल एक उपग्रह” जैसी टिप्पणियों से इन व्यक्तियों ने अपनी पूर्ण अज्ञानता का ही प्रदर्शन किया।

फिर निश्चित रूप से ऐसे लोग भी हैं जो हमारे देश में उठाए गए हर सकारात्मक कदम का श्रेय भारत के “प्रथम परिवार” को देते हैं। ये हमारे पहले प्रधानमंत्री द्वारा किए गए भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और उनके द्वारा स्थापित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के बारे में बातें करने से कभी नहीं अघाते।

आइए हम समझने की कोशिश करते हैं कि मिशन (लक्ष्य) शक्ति हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है।

  1. वर्ष बीतने के साथ हमने अंतर्राष्ट्रीय समुद्र के क्षेत्रीय अधिकारों वाले देशों को स्वीकार करना सीखा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा क्षेत्रीय समुद्र को तटीय राज्य की आधार रेखा से 12 समुद्री मील या 22.2 किलोमीटर के रूप में परिभाषित किया गया है। ऐसी कोई परिभाषा अंतरिक्ष के लिए मौजूद नहीं है और संयुक्त राष्ट्र ने यह भी निर्दिष्ट किया है कि कोई भी देश हमारे चंद्रमा और हमारे ग्रहों सहित किसी भी खगोलीय निकाय पर क्षेत्रीय अधिकारों का दावा नहीं कर सकता है।
  1. अंतरिक्ष का निरीक्षण संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाह्य अंतरिक्ष मामलों द्वारा किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुसार, उस पर हस्ताक्षर किए 102 देशों में से कोई भी देश चंद्रमा पर संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता है। शुरुआती खोजकर्ताओं जैसे क्रिस्टोफर कोलंबस और आदि जिन्होंने सदियों उनका अनुसरण किया और अपने देशों के लिए नए महाद्वीपों और व्यापारिक ठिकानों और उपनिवेशों की स्थापना की। इसलिए, न केवल चंद्रमा पर बल्कि अब मंगल पर भी पहुँचने और वहाँ स्थापित होने की हौड़ लगी है।
  1. बहुत कम देशों ने उपग्रहों के निर्माण और प्रक्षेपण की क्षमता विकसित की है और भारत इन चुनिंदा देशों में से एक है। यहाँ तक कि केवल कुछ ही देशों ने मनुष्य को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता विकसित करने में कामयाबी हासिल की है और भारत इस क्षमता को भी तेजी से विकसित कर रहा है।
  1. निरंतर माँग रखने वाली मानव जाति के लिए अंतरिक्ष अगला मोर्चा है जहाँ लगातार अधिक चुनौतियों की तलाश है। भारत के लिए, अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति के प्रबंधन की मजबूत क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष निकायों में से एक है।
  1. यह भी समझने योग्य है कि रॉकेट का विकास राष्ट्र की रक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है। रॉकेट को इस तरह समझा जा सकता है कि वह कुछ और न होकर एक विशाल “निर्देशित मिसाइल” है और यह तकनीक नाटकीय रूप से अपनी सीमाओं को मजबूत करने के लिए भारत के पास उपलब्ध है। मिशन शक्ति हमें भविष्य में दुष्ट उपग्रहों को लक्षित करने की बहुत आवश्यक क्षमता प्रदान करती है।
  1. जो पहले जीत लेगा उसे अंतरिक्ष बहुत बड़ी संपत्ति का वादा दे सकता है। यही कारण है कि एलोन मस्क और रिचर्ड ब्रैनसन बड़ी रकम का निवेश कर रहे हैं। यदि कोई किन्हीं खगोलीय पिंडों तक पहुँचने और वहाँ से पृथ्वी पर लौटने का किफायती तरीका विकसित कर सकता है, तो उन अविश्वसनीय खनन अवसरों के बारे में सोचिए जिन्हें उत्पन्न किया जा सकता है। ये व्यवसायी पहले से ही अंतरिक्ष में मानव बस्तियाँ बसाने की बात कर रहे हैं और ऐसे व्यक्तियों की लंबी कतार है जो मंगल की “एक-तरफ़ा” यात्रा करने के लिए तैयार है।

अंतरिक्ष की खोज करना महँगी प्रक्रिया है जो बहुत अधिक जोखिमों से भी भरी है। चुनाव के संदर्भ में निंदनीय प्रतिक्रियाएँ समझ में आती हैं, लेकिन अंतरिक्ष की खोज की लागत के साथ हमारे ग्रह पर भोजन और आवास की उपलब्धता से उसकी तुलना करना अल्पकालिक और पूरी तरह से संदर्भ रहित है।

अपने अपोलो कार्यक्रम के कुछ असफल प्रक्षेपणों के बाद नासा ने अपना अधिकांश धन खो दिया? राष्ट्रपति ओबामा ने विफलता के डर से नासा का वित्त पोषण कम कर दिया। राष्ट्रपति ट्रम्प ने नासा को फिर से मजबूत किया है और 2024 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर वापस भेजे जाने का आह्वान किया है।

राष्ट्र ने अंतरिक्ष में हमारे अधिकारों की रक्षा की नई क्षमता विकसित की है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। हमेशा सत्ता में जिसकी सरकार होगी, श्रेय उसे ही जाएगा और विपक्षी नेताओं के पास इस कठोर वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

अंतरिक्ष अनुसंधान में निवेश करना महँगा है। पर यह हमारा भविष्य है और इसके लिए बहुत सरकारी धन की आवश्यकता लाज़मी भी है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए सरकार की इच्छा शक्ति की आवश्यकता होगी ताकि उसमें उचित निवेश हो। मिशन शक्ति, चँद्रमा और मंगल पर हमारे मिशन, निम्न पृथ्वी कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट-एलईओ) और भू स्थैतिक कक्षा (जियो स्टेशनरी ऑर्बिट- जीईओ) की हमारी सफल प्रक्षेपण क्षमताएँ अंतरिक्ष में बढ़ती उपस्थिति का प्रबंधन करने की हमारी क्षमताओं को दर्शाती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के पास ज्ञान और अनुभव है और हमारे हितों की चरम सीमा तक का पता लगा सकते हैं।

केवल कोई मजबूत सरकार ही हमारे अतिआवश्यक अंतरिक्ष कार्यक्रम का समर्थन कर उसके लिए आवश्यक वित्त पोषण जारी रख सकती है।

ऐसी सरकार को हमारे समर्थन की ज़रूरत है।

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12 कारण जिनसे मोदी 2019 में फिर से पीएम बनेंगे

190314 Elections 2019

चुनावी बिगुल बज चुका है और मोदी सरकार की तमाम उपलब्धियों के बारे में पहले ही लिखा जा चुका है। श्री मोदी अपने पहले पाँच साल के कार्यकाल में जिन कामों को पूरा नहीं कर पाए हैं, उनके बारे में भी बहुत कुछ लिखा गया है।

औसत भारतीय मतदाता मुख्य रूप से जो प्राप्त करना चाहता है, वह है :

  1. साफ-सुथरा प्रशासन, क्योंकि हम गैर-भाजपाई सरकारों के चलते पिछले 70 वर्षों में भ्रष्टाचार की पराकोटी की अधिकता से बहुत नाराज और निराश हैं।
  1. देश का मजबूत आर्थिक विकास जिससे धन वृद्धि और रोजगार का सृजन होगा।
  1. सुरक्षित वातावरण जहाँ हम लगातार खतरों की आशंका के बिना रह सकें कि कहीं कोई हमें और हमारे परिवारों को शारीरिक रूप से नुकसान तो नहीं पहुंचा देगा। हम अपने कंधों को बिना भय के देखना चाहते हैं। क्या अब हम फिर मेज और कुर्सियों के नीचे अज्ञात बैग के डर को देखना चाहते हैं।
  1. जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ स्वच्छ वातावरण ताकि हम अपने परिवारों के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

आइए हम उन कारणों की पड़ताल और जाँच करें जिसकी वजह से मेरा यह मानना है कि न केवल मोदी को सत्ता में वापस आना चाहिए, बल्कि मुझे विश्वास है कि मतदाताओं के मतों से वे ही सत्ता में वापस आएँगे।

  1. सकारात्मक रिपोर्ट कार्ड: पिछले चुनावों के दौरान 2014 में श्री मोदी ने वादा किया था कि वे 2019 में अपने रिपोर्ट कार्ड के साथ निर्वाचन क्षेत्र में वापस आएँगे। पहले पाँच साल के कार्यकाल की उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कुल मिलाकर मतदाता श्री मोदी के शासन और भारत के लिए उनके द्वारा निर्धारित की गई दिशा से संतुष्ट है। विपक्षी नेताओं में से कुछ को छोड़ दें तो और कोई भी एक कार्यकाल में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करता है।
  1. अर्थव्यवस्था: भारत अब दुनिया की छठी सबसे बड़ी और क्रय शक्ति समानता के मामले में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि श्री मोदी भारत को अगले दशक में त्वरित वृद्धि की राह पर ले आए हैं। यहाँ ऐसा नेता है जो हर संभव सभी मजबूत निर्णय लेने से नहीं हिचकिचाया है, चाहे वे अर्थव्यवस्था से संबंधित हों या मौलिक संहिता सुधार हो जैसे कि दिवालियापन कोड।
  1. स्वच्छ सरकार: श्री मोदी ने उन्हें धमकाने वालों के दिमाग में भी स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया है कि वे बहुत साफ हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया है कि उनकी सरकार में कोई भ्रष्टाचार न हो। पिछले पाँच वर्षों में छोटा- बड़ा कोई घोटाला नहीं हुआ है। हममें से ज्यादातर लोग उसके लिए भी भुगतान करने के आदी हैं, जो अमूमनन हमारे अधिकार हैं। ड्राइविंग लाइसेंस या नया पासपोर्ट प्राप्त करना हमारी सरल आवश्यकताएँ हैं, जिसके लिए भी हम दलालों की तलाश करते थे। अब यह पूरी तरह से बंद हो गया है।
  1. भारतीय पासपोर्ट: स्पष्ट रूप से 30 साल पहले की तुलना में भारतीय पासपोर्ट आज अधिक सम्मानित है। मैं यह कह रहा हूँ दुनिया भर में यात्रा करने वाले अपने पिछले चार दशकों के काफी व्यक्तिगत अनुभव के साथ। इससे पहले, भारतीय पासपोर्ट को दुनिया भर के आव्रजन अधिकारियों द्वारा स्वेच्छा से और इतने सारे सवालों के बिना लिया नहीं जाता था। 
  1. विदेश नीति: भारत अब राष्ट्र मंडल में कद्दावर हुआ है। भारत पाकिस्तान को छोड़कर सभी पड़ोसी राज्यों के साथ बहुत अच्छे संबंध विकसित करने में कामयाब रहा है। साथ ही भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस, ईरान और इजरायल के साथ-साथ चीन के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाए रखने में सफल रहा है। ईरान पर प्रतिबंध लगाते हुए भी संयुक्त राज्य अमेरिका भारत को उनसे तेल खरीदना जारी रखने के लिए सहमत हुआ। एयर इंडिया अब सऊदी अरब से इजरायल के लिए उड़ान भर सकता है और जब श्री मोदी ने जॉर्डन से फिलिस्तीन के लिए उड़ान भरी, तो इजरायली विमान ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की। 
  1. महागठबंधन: स्पष्ट रूप से महागठबंधन काम नहीं कर रहा है। निश्चित रूप से उस तरीके से नहीं जिस तरह राहुल गाँधी ने उनसे एक और सभी के नेता के रूप में ताज पहनवाया था। क्षेत्रीय नेताओं के इस अभिप्रेरक समूह के किसी भी घटक के पास कोई सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम नहीं है और न ही वे ऐसे किन्हीं मूल्यों के समान सेट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे वे मतदाताओं के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं। महागठबंधन के युद्धरत नेता जली-कटी बातें करते हुए अपना असली रंग दिखा रहे हैं। वे एक ही सांस में अपने गठबंधन सहयोगियों की आलोचना भी कर रहे हैं और प्रशंसा भी। उनका एकमात्र एकल बिंदु एजेंडा श्री मोदी को हटाना भर है। विपक्षी नेताओं ने खुले तौर पर कहा है कि लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन हो सकता है लेकिन प्रादेशिक चुनावों के लिए नहीं। ये राजनीतिक दल जितना समझते हैं, उससे कहीं अधिक भारतीय मतदाता होशियार है। क्या वे वास्तव में सोचते हैं कि हम मतदाता इतने मूर्ख हैं? 
  1. राहुल गाँधी: श्री गाँधी ऐसा कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं जिसका कुछ नतीजा निकले और तब भी वे यह मानना चाहते हैं कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में उनकी जीत केवल उनके खाते में थी, लेकिन अगर कोई चुनावी मतदानों को देखें तो वह संख्या कुछ अलग कहानी कहती है। श्री गाँधी ने भारत के लिए किसी भी स्पष्ट दृष्टिकोण या मार्ग की घोषणा नहीं की है। उनके पास अपने पूर्ववर्तियों की उपलब्धियों के राग आलापने के अलावा कुछ भी सकारात्मक नहीं है। वे बस राफेल सौदे पर भरोसा करते हैं और उम्मीद रखते हैं कि कुछ भ्रष्टाचार के आरोप श्री मोदी पर लग सकेंगे। जबकि कोई उन पर विश्वास नहीं करता। वे न केवल मतदाताओं के लिए बल्कि उनकी पार्टी के अधिकांश सदस्यों के लिए भी हँसी के पात्र बनते जा रहे हैं। 
  1. हिंदी केंद्रीय स्थल: हिंदी के केंद्रीय स्थलों का दिल अभी भी श्री मोदी के साथ हैं। हाँ, उन्होंने तीन राज्यों में भाजपा को मतदान कर बाहर कर दिया, लेकिन जब राष्ट्रीय चुनाव होंगे, तो वे बाहर आएँगे और श्री मोदी के लिए बहुत बड़ी संख्या में मतदान करेंगे, जो स्पष्ट रूप से आज देश के सबसे बड़े नेता हैं। बड़ी संख्या में मतदाताओं के मन में राम मंदिर एक बड़ा मुद्दा है, यही वजह है कि श्री गाँधी के वफादार प्रवक्ताओं ने यह नारा लगाना शुरू कर दिया है कि केवल काँग्रेस ही मंदिर का निर्माण कर सकती है। जब मंदिर की बात आती है, तो सभी जानते हैं कि केवल भाजपा ही अपने तार्किक निष्कर्ष के माध्यम से इसे देख सकती है। 
  1. आधारभूत संरचना: भारत के बुनियादी ढाँचे में दृश्यमान सुधार दिखता है। नई सड़कों के निर्माण से लेकर हवाई अड्डों तक और बिजली की बेहतर आपूर्ति से लेकर सुपर-फास्ट ट्रेनों तक, सबके लिए बेहतर बुनियादी ढाँचे की दिशा का रास्ता दिख रहा है। वर्ष 2014 से पहले, हमने अपने दैनिक जीवन के एक हिस्से के रूप में “लोड शेडिंग” को शामिल कर लिया था। जो अब बंद हो गया है। मतदाता का मानना है कि अभी और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है और श्री मोदी ने जो शुरू किया उसे पूरा करने के लिए वे उन्हें समय देने को तैयार हैं। 
  1. आतंक पर सख्त: चुनाव आयोग ने अनुमान लगाया है कि 80 मिलियन से अधिक नए मतदाता हैं जो वर्ष 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। उनका अयोध्या या राम मंदिर से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इन मिलियनों को श्री मोदी में एक ऐसा नेता दिखाई देता है, जिसमें साहस है, जो तेजी पलटवार और कठोर वार करता है। वे उनकी जीवनशैली में समग्र सुधार देखते हैं, और वे भारत के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण में परिवर्तन भी देख पा रहे हैं। यही वह है जो उन्हें चुनाव के दिन “कमल” के प्रति प्रेरित करेगा। 
  1. पुलवामा और बालाकोट: हालाँकि किसी को भी राष्ट्रीय सुरक्षा और सशस्त्र बलों का उपयोग राजनीतिक हितों के लिए नहीं करना चाहिए, पर पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमले की वास्तविकता सभी को दिख रही है। अगर विपक्ष ने श्री मोदी के 56 इंच के सीने की बात करते हुए पुलवामा हमले के बाद अपनी नाक नहीं घुसाई होती तो उन्हें हवाई हमले के बाद अपनी नाक नहीं कटवानी पड़ती। यह स्पष्ट रूप से मतदान के दिन मतदाता के दिमाग में होगा। 
  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था: हालाँकि विपक्षी दल चाहेंगे कि हम कुछ और विश्वास करें अन्यथा, तेजी से आगे बढ़ने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों के आँकड़े ग्रामीण भारत में अपनी बिक्री में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हैं। तीव्र तनाव होने पर यह संभव नहीं हो सकता था। यदि कुछ है तो वह यह कि श्री मोदी ने गरीबों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। हाँ, ग्रामीण भारत में और काम किए जाने की जरूरत है।

पिछले कुछ महीनों में एक नई हवा आई है जो भारतीय जनता पार्टी में बड़ी उम्मीदें भर रही है और यह पार्टी नए सिरे से आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही है। सहयोगी दल वापस आ रहे हैं और विपक्षी दलों के नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं।

यहाँ तक कि सबसे कड़े विपक्षी समर्थकों को पता है कि कई विपक्षी दलों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे विकल्प के बारे में न के बराबर कुछ कहना तक भयावह है। वे हर महीने, जैसे ही संगीत बंद हो जाए,नए संगीत के साथ प्रधानमंत्री की स्थिति के लिए संगीत कुर्सी के खेल की कल्पना नहीं कर सकते!

मतदाता, जो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने के साथ अंतिम निर्णय लेंगे, वे जानते हैं कि वे मोदी को चुनाव हारने नहीं दे सकते।

अभी तो इससे भी अच्छा होना बाकी है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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पाकिस्तान – अब आगे क्या

 

190303 Pakistan terrorism map

 विंग कमांडर अभिनंदन वापस आ गए हैं। पाकिस्तानी एफ़ 16 गिरा दिया गया और एक पायलट की मौत हो गई। पुलवामा का बदला जैश-ए-मोहम्मद (जेएम) के आतंकवादी शिविरों का विनाश कर ले लिया गया है। और अब हमारे देश के वे लोग जो क्षमा की प्रार्थना करते रहते हैं वे फिर से तत्काल शांति वार्ता शुरू करने की उत्कंठा लिए बैठ गए हैं।

पाकिस्तान कहाँ है – भारत के संबंध प्रगाड़ हो रहे हैं और ऐसे में पाकिस्तान के लिए आगे क्या बदा है?

पुलवामा हमलों के बाद पूरा देश निराशा और गर्त में डूब गया था और सभी के मन में बदला लेने का भाव था। कुछ ही दिन बीते थे कि विपक्षी नेताओं ने व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दी थीं। बारह दिनों बाद भारतीय वायु सेना ने कड़ी टक्कर दी और पाकिस्तान में घुसकर उसके जैश-ए-मोहम्मद के तीन प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट कर दिया और जिन 300 से 400 आतंकवादियों को वहाँ प्रशिक्षित किया जा रहा था, उन्हें तक मार गिराया। मारे गए आतंकवादियों में संगठन के 25 नेता भी शामिल थे। इस ओर ध्यान देना दिलचस्प होगा कि वे मुख्य रूप से अजहर मसूद के “पारिवारिक” सदस्य थे जो नेतृत्व के पदों पर थे (यहाँ इसका दूसरा और कोई अर्थ नहीं है)!

इस हमले की पूरे देश में सराहना हुई। यह भी आश्चर्यजनक था कि हर विपक्षी नेता भारतीय वायु सेना को बधाई दे रहा था, जो वास्तव में उसकी हक़दार भी थी, लेकिन इनमें से किसी भी राजनेता ने प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए मजबूत निर्णय को स्वीकार नहीं किया। तिस पर विडंबना यह है कि हमलों के बारे में इतना शोर करने के बाद, ये राजनीतिक दल अब भारतीय वायुसेना की कार्रवाई का राजनीतिकरण करने के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

उसके अगले दिन पाकिस्तानी एफ़ 16 लड़ाकू जेट विमानों ने भारतीय आकाशी क्षेत्र (इंडियन एयर स्पेस) में प्रवेश करने की कोशिश की और जिन्हें हमारे जाँबाजों ने आगे बढ़ने से रोक दिया। इनमें से एक आधुनिक जेट को विंग कमांडर अभिनंदन ने ध्वस्त कर दिया, जिसे उन्होंने बंदी बना लिया। जिनेवा सम्मेलन में तय मसौदों के तहत और बहुत सारे कूटनीतिक और राजनीतिक पैंतरे अपनाए जाने के बाद उन्हें युद्ध नायक के रूप में छोड़ दिया गया।

तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रेस के कुछ लोग दूसरी बाजू हो गए?

इमरान खान कैसे राजनयिक कूटनीतिज्ञ बन गए और क्या हुआ कि हमारे कई पत्रकार और विपक्षी राजनेता पाकिस्तान को इतना श्रेय देने लगे।

  1. यह मुझे हैरत में डाल देता है कि प्रेस के कुछ वर्गों ने यह टिप्पणी करना शुरू कर दी है कि युद्ध क्यों कभी कोई जवाब नहीं होता है। विपत्तियों के अमानवीय पुलिंदे से कोई कैसे इनकार कर सकता है। और तब जब आप देखते हैं कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा कितने ही वर्षों से हमारे देश को कितनी चोट पहुँचाई गई है, तो क्या ये पत्रकार हमें पीछे खींचने और यथास्थिति में वापस जाने की बात कर सकते हैं?
  1. कुछ पत्रकार सवाल कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री अपने सामान्य कार्य दिवसों में कैसे लौट गए। पर उन्हें क्यों नहीं लौटना चाहिए? मुझे यकीन है कि वे हर स्थिति का बारीकी से जायजा ले रहे हैं और उनके पास उत्कृष्ट नेताओं की टीम है जो इस मामले को अधिक मुस्तैदी से सीधे तौर पर संभाल रही है। यदि प्रधानमंत्री इसी मामले पर सारा समय लगा देते तो यहीं पत्रकार उनसे ऐसा पूछते हुए देखे जा सकते थे कि वे वैसा क्यों कर रहे हैं!
  1. कुछ पत्रकार पूछ रहे हैं कि क्या भारत के पास कोई रक्षा मंत्री है? मैं इस टिप्पणी को नहीं समझ पा रहा था। रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अलावा, तीनों सेनाओं के प्रमुखों से मिलकर बना दल है और यह वही कोर टीम है जिसे प्रधान मंत्री की प्रत्यक्ष देखरेख में हर मुद्दे को विस्तार से संभालना होता है।
  1. कुछ राजनेता हड़कंप मचा रहे हैं कि प्रधान मंत्री द्वारा सभी राजनीतिक गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। क्या उन लोगों ने अपनी तरफ से सारी राजनीतिक गतिविधियों को रोक दिया है? इसका उत्तर स्पष्टत: ‘ना’ है।
  1. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने उनकी पार्टी राज्य में कितनी सीटें जीतेगी, इसकी घोषणा कर दी है। मुझे लगता है कि यह बहुत ही असंवेदनशील टिप्पणी है और इसकी हर हाल में निंदा की जानी चाहिए।
  1. इसके अलावा एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं जो बेलगाम बोले जा रहे हैं कि कैसे पुलवामा का पूरा घटनाक्रम सत्तारूढ़ दल द्वारा खेला गया नाटक था। ऐसी सोच की हर संभव तरीके से कड़ी आलोचना, निंदा होनी चाहिए। यह केवल उस मुख्यमंत्री की सोच को दर्शाता है।

मैं दृढ़ता से आग्रह करूँगा कि हमें अपनी चुनी हुई सरकार को उसका काम करने देना चाहिए।

दूसरी ओर, पाकिस्तान गंभीर संकट में है।

  1. उनकी अर्थव्यवस्था दिवालिया हो चुकी है, और हालाँकि उन्हें संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और चीन से कुछ पैसे मिल जाते थे, लेकिन अब यह सारा पैसा अटक गया है। अब उनके लिए मुफ़्त की दावत नहीं है और वे आज जो दरियादिली दिखा रहे हैं उसे किसी दिन उनसे निचोड़कर ले लिया जाएगा।
  1. प्रधान मंत्री इमरान खान वहाँ की शक्तिशाली सेना की कठपुतली मात्र है जिसका एकल बिंदु एजेंडा केवल भारत के खिलाफ युद्ध जारी रखना है। उनके पास उनके बने होने का और कोई कारण भी नहीं है।
  1. पाकिस्तान ने अपनी तमाम सीमाओं ईरान, अफगानिस्तान और भारत की ओर से खुद परेशानी मोल ले ली है। उसका मौसमी मित्र चीन केवल ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी)’ के कारण उससे स्वार्थी वित्तीय साझेदारी को निभा रहा है।
  1. कोई भी निवेशक पाकिस्तान में आने और निवेश करने के लिए तैयार नहीं है।
  1. ढेर सारे वादे करने के बावजूद, पाकिस्तान की ओर से उसकी सेना द्वारा समर्थित आतंकवादी शिविरों के खिलाफ कोई विश्वसनीय कार्रवाई किए जाने की उम्मीद नहीं है।
  1. अंतत: सेना को हर बार इस देश पर शिकंजा कसते रहना पड़ेगा और जब भी कोई राजनेता उनका सिर ऊँचा उठाने की कोशिश करेगा, ये लोग उसे गिरा देंगे या नियंत्रित कर डालेंगे।

इस विषय पर अंतिम शब्द नहीं लिखे गए हैं। अंतिम गोली अभी नहीं चली है और हमने अंतिम जान नहीं खोई है। यह एक लंबी लड़ाई है जिसने कई लोगों को लहूलूहान कर दिया है और आगे भी कई लोगों की जानें जाती रहेंगी।

पाकिस्तान को कुछ गंभीर विश्वास निर्माण उपाय करने की आवश्यकता है जिनमें शामिल हैं:

  1. चीन को अजहर मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने और उसे ट्रायल के लिए सौंपने की अनुमति प्रदान करने देना।
  1. हाफिज सैय्यद को 26/11 हमले के मुकदमे के लिए भारत को सौंपना।
  1. मुंबई हमलों के सूत्रधार दाऊद इब्राहिम को सौंपना।

इन तीनों आतंकवादियों को सौंपने को प्रारंभक के तौर पर देखना होगा, लेकिन पाकिस्तान के बारे में जो लोकप्रिय राय है, उसे देते हुए इसकी संभावना बहुत कम है कि पाकिस्तान सेना कभी भी अपनी प्रमुख आतंकवादी भुजाओं को सौंपने के लिए सहमत होगी!

इस कार्रवाई के बाद ही उन्हें कश्मीर पर बातचीत करने के लिए कहा जाना चाहिए।

हमारे लिए पुलवामा को जल्द भूला पाना और सभी को माफ कर हमसे आगे बढ़ने की उम्मीद करना अवास्तविक है।

जैसा कि कहा जाता रहा है, मैं कहना चाहूँगा कि हमें उन्हें माफ कर देना चाहिए अगर वे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं लेकिन हमें उन नुकसानों को कभी नहीं भूलना चाहिए जो उनकी वजह से हमें हुए हैं।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।                                                       

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अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।