राहुल गाँधी – झूठे या केवल भ्रम?

190202 Rahul Gandhi

काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नामित होने के बाद लगता है कि राहुल गाँधी को अचानक अपनी आवाज़ मिल गई है, जो तब से खो गई थी, जब उनकी सरकार सत्ता में थी और संसद के अपने पहले 10 वर्षों में वे लगभग चुप या अनुपस्थित थे।

यह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे वास्तव में ऐसा लगता है कि राष्ट्र उसके पूर्वजों की वजह से उसके प्रति निष्ठा रखता है और वह हर चीज का हकदार है।

अपने परिवार के नाम के चलते वे पार्टी में शीर्ष स्थान के हक़दार हो गए। अपने पूर्वजों द्वारा किए गए त्याग और बलिदानों के कारण वे सत्ता के माया जाल और उससे जुड़ी अतिरिक्त सुविधाओं से घिरने के हक़दार बन गए। इसी वजह से वे कुछ भी कहने के हक़दार हो गए क्योंकि वे जानते हैं कि वरिष्ठ नेताओं की बड़ी टुकड़ी उनके बचाव में कूद जाएगी। इतना ही नहीं, बिना किसी जवाबदेही के देश का नेतृत्व करने की महत्त्वाकांक्षा रखने के भी हक़दार बन बैठे।

श्री गाँधी का विश्वास निश्चित रूप से इस दर्शन पर हैं कि वे यदि कोई आरोप लगाकर लंबे समय तक रोना-गाना करते हैं, कीचड़ उछालते हैं तो थोड़ा-बहुत कीचड़ तो ज़रूर चिपकेगा। उनका मानना है कि उनके अपने परिवार और पार्टी की ख़राब आर्थिक ख़्याति के चलते जहाँ उनका हर कदम कीचड़ में धँसा है, प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे बेतुके आरोपों से कलंकित हो सकते हैं। वे पहचानते हैं कि उनके और उनके परिवार को मुक्ति केवल तभी मिल सकती है, जब वे किसी भी तरह मतदाताओं को यह मनवा देते हैं कि मोदी और सत्तारूढ़ दल भी “भ्रष्ट” है!

अपने मन के गहरे भीतर वे भी जानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि इस सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है।

अत: उन्होंने झूठ की पूरी गठरी तैयार करने का फैसला किया है। यदि बार-बार और दृढ़तापूर्वक कहा जाए, तो झूठ और असत्य निश्चित ही श्रोताओं के मन में सीमित अवधि के लिए संदेह के बीज बो सकते हैं।

आइए हम उनके कुछ और हालिया झूठों और उसके बाद उनके अपने ही झूठ से पलट जाने की जाँच करें।

  1. राफेल: राफेल विमान खरीद पर राहुल गाँधी के तर्क उदात्त से हास्यास्पद की ओर बढ़ रहे हैं। उन्हें अगस्ता वेस्टलैंड एक्सपोज़र पर किसी पलटवार की आवश्यकता है जो कि जल्द ही सामने आ सकता है और बोफोर्स मामला भी अब तक मतदाताओं के दिमाग में गहरे पैठा है। नकी उकताहट भरी टिप्पणियों को शेष वरिष्ठ काँग्रेस नेता पूरी वफ़ादारी से तोता पढंत की तरह दुहरा रहे हैं, क्योंकि एक बार उनके “राजकुमार” ने बात कह दी, तो उनके पास उसके अनुपालन और बचाव के अलावा अन्य कोई विकल्प बचता नहीं है। उनके पास अपने आरोपों को स्थापित करने के लिए कुछ भी ठोस नहीं है।
  1. घोर पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म): श्री गाँधी और उनका परिवार वर्षों से कई कॉरपोरेट घरानों का लाभार्थी रहा है। अपने स्वयं के मुद्दों को छिपाने के लिए, उन्होंने प्रधान मंत्री पर घोर पूंजीवाद का इलज़ाम लगाने का मार्ग चुना है। जबकि श्री अनिल अंबानी की कंपनी की हाल ही में दिवालिएपन के लिए दायरा वाली जानकारी को श्री गाँधी ने अपनी सुविधा से नजरअंदाज कर दिया है, क्योंकि यह उनके कथन उनके खिलाफ़ है।
  1. श्री पर्रिकर: वे खुद गोवा के मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य की जानकारी लेने व्यक्तिगत दौरे पर गए थे और फिर बाद में एक चुनावी रैली में श्री पर्रिकर को गलत ठहरा दिया। जब श्री पर्रिकर ने उनके झूठ पर सवाल किया, तो उन्होंने बिना किसी मलाल के श्री मोदी पर दोष मढ़ देने की कोशिश की।
  1. ईवीएम: जब उनकी पार्टी चुनाव हार जाती है, तब राहुल गाँधी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को दोष देते हैं और जब उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वे चुप रहने का मार्ग अपनाते हैं। उनके लिए, ईवीएम और चुनाव आयोग केवल सुविधा की बात है – जिसे अपनी सुविधा से, जब उनके और उनकी पार्टी के खिलाफ़ काम हो तो गाली दे देना और तब नज़रअंदाज़ कर देना जब उनके पक्ष में काम हो रहा हो!
  1. ऋण माफी: राहुल गाँधी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव अभियानों में ऋण माफी की घोषणा की। नई सरकारों को श्रेय मिल सकें इसलिए तुरंत ऋण माफ भी कर दिए गए थे। हालाँकि, वादे का मज़ाक उड़ाते हुए गरीब किसानों के आम तौर पर 1,000 रुपए से कम के ऋण माफ किए गए थे। जो वादे किए गएँ उन पर फिर से विचार करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। ये चुनाव खत्म बीत गए और 5 साल बाद नए वादे करने होंगे।
  1. नॉनपरफॉर्मिंग एसेट्स: राहुल गाँधी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहराते रहे हैं, बिना यह समझे कि वे बकाया होने पर ऋण ही गैर-निष्पादित हो जाते हैं। ऋण आम तौर पर 5 साल के लिए दिए जाते हैं और उसके बाद चुकौती होती है। एक बार जब ऋण देय होता है और यदि पुनर्भुगतान शुरू नहीं होता है, तो ऋण को गैर-निष्पादित श्रेणी में वर्गीकृत कर दिया जाता है। इस तरह वे अनर्जक परिसंपत्ति (एनपीए) जो एनडीए के कार्यकाल के दौरान दिख रही हैं वे यूपीए के कार्यकाल के दौरान दिए गए ऋण थे।
  1. रोजगार निर्माण: उनका कोरा दावा है कि उन्होंने अगले 5 वर्षों में 70 मिलियन नौकरियों के निर्माण की योजना विकसित की है। लेकिन इसे कैसे हासिल किया जाएगा और इन नौकरियों का निर्माण किस क्षेत्र में होगा, इस बारे में कोई योजना नहीं बताई है। हालांकि, वे जो भी कहते हैं, उस पर उनसे किसी जवाबदेही की माँग नहीं की जाती है। यह तथ्य भी देखा जाना चाहिए कि यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में 17 मिलियन से भी कम नौकरियाँ ईज़ाद हुई थीं।
  1. शारदा घोटाला: राहुल गाँधी को गंभीरता से चिंतन कर इस मामले में अपना और अपनी पार्टी का पक्ष रखने की ज़रूरत है। वर्ष 2014 के नुकसान के बारे में बात करने से लेकर घोटाले पर कार्रवाई न करने के लिए ममता बनर्जी को फटकारने से लेकर अब पूरा समर्थन देने तक वास्तव में कोई नहीं जानता कि उनका पक्ष क्या होगा और उनका अगला यू-टर्न क्या होगा। ज़ाहिर है, उनकी स्थिति इस बात पर निर्धारित होती है कि उनका क्या मानना उन्हें कहाँ और कब कुछ सुर्खियाँ दिला सकता है। अतीत की गाथा उनके कृपापात्रों द्वारा गाई जाती रहेगी और उन्हें हर हाल में संरक्षित किया जाएगा।
  1. अन्य विपक्षी दलों से संबंध: यह देखना दिलचस्प है कि राहुल गाँधी कितनी आसानी से अपनी भूमिका बदल लेते हैं। किसी अन्य विपक्षी पार्टी के नेता को कोसने और गाली देने से लेकर निर्विवाद रूप से समर्थन देने तक उनकी भूमिका बिना किसी स्पष्टीकरण के निर्बाध होती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई ऐसा नेता है, जिसके साथ उन्होंने दुर्व्यवहार नहीं किया है और बाद में उसी के साथ साझेदारी करने की माँग न की हो। क्या किसी भी विपक्षी दल का कोई भी नेता वे जो कुछ भी कहते हैं उस पर विश्वास करता है, या यह चुनाव खत्म होने तक चुप रहने की सुविधा और समझदारी की बात है?

बचाव का सबसे अच्छा तरीका अपराध है।

जब कुछ और काम नहीं करता है और झूठ भी कारगर नहीं होता दिखता है, तो राहुल गाँधी बहुत आसानी से इसका-उसका नाम लेने लगते हैं। पिछले सालभर में उन्होंने  कई बार श्री मोदी को एकतरफा बहस की धमकी दी लेकिन लोकसभा में वे आश्चर्यजनक रूप से चुप रहते दिखे। उन्होंने अपनी पुस्तक में श्री मोदी के लिए जर्मन शब्द फ्यूहरर जिसका अर्थ है “लीडर” या “गाइड” से लेकर चोर से लेकर असुरक्षित तानाशाह तक हर संभव नकारात्मक विशेषण का इस्तेमाल किया है। दुर्भाग्यवश कोई भी उनकी कथा नहीं खरीद रहा और यह उन्हें और भी निराश कर रहा है।

तो क्या माननीय काँग्रेस अध्यक्ष पैदाइशी झूठे हैं जैसा कि स्मृति ईरानी कहती हैं या वे केवल भ्रम हैं?

शब्द “भ्रमजनक- डिल्यूजनल” लैटिन शब्द से बना है जिसका अर्थ है “धोखा देना।” इसलिए भ्रमपूर्ण सोच मतलब अपमानजनक बातों पर विश्वास करके खुद को धोखा देने जैसा है। भ्रम गलत विचार है। यह ऐसा विश्वास है जिसका कोई प्रमाण नहीं है। भ्रमित व्यक्ति विश्वास करता है और चाहता है कि कुछ ऐसा हो जाए, जो वास्तव में सत्य नहीं है। यह और अधिक मजबूत आशा में बदलता है कि कुछ ऐसा चमत्कारी घटित होगा जो उसकी मान्यताओं को सच कर देगा।

इस लेख के विषय के संदर्भ में यह विशेष रूप से परिचित लगता है?

जाहिर है, राहुल गांधी का एकमात्र उद्देश्य हर मुद्दे का राजनीतिकरण करना है, बजाय इसके तार्किक निष्कर्ष पर कोई मुद्दा देखना। उनसे अक्सर उन विभिन्न आरोपों के सबूत दिखाने के लिए कहा जाता है जो वे लगाते रहते हैं और राफेल पर उनकी अपनी स्वीकारोक्ति थी लेकिन वे अभी तक सबूत नहीं दिखा पाए हैं। उनका स्वयं का भ्रम उन्हें ऐसा दिखाता है कि यह साबित करने के लिए कि वे सही थे, प्रमाण स्वयं प्रकट होंगे। तब तक, वह अपनी “दागो और भागो” राजनीति अनायास ही जारी रखेंगे।

उन्हें यह विश्वास नहीं है कि वे आगामी चुनावों में शानदार जीत हासिल कर पाएँगे। मतदाताओं ने भी उन पर विश्वास करना बंद कर दिया है। यह कुछ ही समय की बात है और फिर यह भी होगा कि जब उनकी पार्टी के कार्यकर्ता भी उन पर विश्वास करना बंद कर देंगे। वह दिन दूर नहीं जब भीड़ में से कोई यह कहता दिखेगा कि “राजकुमार के पास कपड़े नहीं है!

श्री गाँधी कब तक “भेड़िया आया-भेड़िया आया” चिल्लाते रहेंगे?

जैसा कि राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने प्रसिद्ध रूप से कहा था, “आप सभी लोगों को कुछ समय तक और कुछ लोगों को हर समय मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन आप सभी लोगों को हर समय मूर्ख नहीं बना सकते हैं।”

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।                                               

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इंदिरा गाँधी – आज कितनी प्रासंगिक हैं?

190131 indira gandhi

अंतत: काँग्रेस पार्टी द्वारा प्रियंका वढेरा (वाड्रा) को औपचारिक रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के केवल महासचिव के रूप में नियुक्त कर ही दिया। जैसे ही वे इस दौड़ में शामिल हुईं, वैसे ही विपक्षियों की टिप्पणियाँ आना भी शुरू हो गईं!

ज़ाहिरन काँग्रेसी कार्यकर्ता गले-गले तक पानी में डूबे हुए हैं और ऐसे में अब वे प्रियंका वढेरा और इंदिरा गाँधी के बीच कुछ समानताएँ खोज रहे हैं। श्रीमती वढेरा (वाड्रा) इस उम्मीद से लखनऊ काँग्रेस कार्यालय के उसी कमरे में रहेंगी, जहाँ उनकी प्रसिद्ध दादी श्रीमती गाँधी रहती थीं, कि अतीत की उपलब्धियाँ किसी दर्पण की तरह भावी आशाओं की प्रेरक बन सकें।

आइए हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या श्रीमती गाँधी आज के संदर्भ में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, विशेष रूप से युवा भारतीयों और करोड़ों भारतीयों के लिए याकि यह भी कह सकते हैं कि भारतीयों की उस पुरानी पीढ़ी के लिए जो उनके शासन काल को जी चुकी हैं।

मुझे वह दौर बहुत स्पष्ट रूप से याद है, जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं।

वर्ष 1971 में, जब उन्होंने बांग्लादेश के गठन में मदद की थीं और पाकिस्तान से दो अलग राष्ट्रों का निर्माण किया था, उस वाकये को मैं बहुत गर्व के साथ याद करता हूँ, मुख्यतः इसलिए चूँकि मेरे पिता सेना में थे और मुझे हजारों पाकिस्तानी कैदियों को प्रयागराज, पूर्व के इलाहाबाद में युद्ध शिविरों में देखने का अवसर मिला था। हम वर्ष 1971 की लड़ाई के दौर से गुज़रे थे, तब रात होने पर सारी लाइटें बंद कर दी जाती थीं और हवाई हमले के सायरन की आवाज़ हुआ करती थी। काँटेदार तार की बाड़ के उस पार रेतीले रंग की वर्दी में हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को देखना हमारे सैनिकों और हमारे देश के लिए गर्व का स्रोत था।

वर्ष 1974 से वर्ष 1977 की अवधि के दौरान जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में था, मैंने 21 महीने के आपातकाल के दौरान उनका दूसरा पक्ष देखा।

मुझे बहुत अच्छे तरीके से याद है कि हम दिल्ली विश्वविद्यालय की विशेष बसों में बैठने में कितना डरा करते थे, कोई एक शब्द भी नहीं बोलता था, दोस्तों से बातें नहीं होती थीं, लगता अगर कोई हमारी बात सुन रहा हो तो वह अधिकारियों को जाकर बता देगा। उन बसों का वह भयानक सन्नाटा आज भी मेरे कानों में घूमता रहता है।

विपक्षी नेताओं और कॉलेज के युवा छात्रों की कहानियाँ फुसफुसाहट भरी टिप्पणियों में सब ओर फैल रही थीं कि कैसे रात को उन्हें उनके घरों से उठा लिया जाता और जेल में डाला जा रहा थआ। शक्तिशाली युवाओं की पुरुष नसबंदी की आशंका भयावह परिदृश्य था जिसे लेकर हम सभी चिंतिंत रहा करते थे। आपातकाल के दौरान प्रेस पर लगा सेंसर केवल प्रधान मंत्री और उनके बेटे संजय गाँधी की अविश्वसनीय उपलब्धियों को सामने ला रहा था। युवा छात्र होने के नाते केवल दृश्यमान सकारात्मकता यह थी कि कोई पावर ब्लैकआउट नहीं था और बसें समय पर चल रही थीं!

युवा छात्रों के रूप में, हम ऐसे भारत के लिए तरस रहे थे, जहाँ हम फिर एक बार बोल पाने के लिए स्वतंत्र होंगे।

यह वह इंदिरा गाँधी है जो मुझे याद है।

मुझे नहीं पता कि वे आज कितनी प्रासंगिक है या आज उनकी तानाशाही पद्धति कितनी प्रासंगिक है। यह भी पता करना होगा कि क्या आज के युवाओं को इंदिरा गाँधी याद हैं या क्या आज का युवा उन्हें समझ सकता है? क्या किसी को उनके द्वारा की गई सारी ज्यादतियाँ याद हैं? क्या उनकी उपलब्धियाँ और ज्यादतियाँ उस राष्ट्र के लिए प्रासंगिक हैं, जो आगे बढ़ गया है और जिसने अतीत को देखते रहना बंद कर दिया है?

“गरीबी हटाओ” का उनका प्रसिद्ध चुनावी नारा केवल एक नारा बनकर रह गया क्योंकि उस भावना को लागू करने के लिए कभी कोई कदम उठाया ही नहीं गया और गरीबी आज भी जस की तस है। राहुल गाँधी अपनी न्यूनतम आय गारंटी के साथ उस नारे की ओर मुड़े हैं, बिना इसका विचार किए कि यह कैसे लागू होगा या इसकी लागत क्या आएगी (जानकारों का अनुमान है कि इससे सकल घरेलू उत्पाद का 5% सालाना खर्च हो सकता है)। वे जानते हैं कि वादे करना बहुत आसान है और बाद में या तो वे अपनी सुविधानुसार उसकी व्याख्या कर सकते हैं या उससे इनकार कर देते हैं।

पिछले 50 वर्षों में दुनिया काफी बदल गई है। उस द्विध्रुवीय दुनिया से जिसमें हमें संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) या संयुक्त राष्ट्र संघ- सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य (यूएसएसआर) की दो विचारधाराओं के बीच चयन करना था या कागज पर गुटनिरपेक्ष या तटस्थ बने रहना था और दो गटों में से किसी एक की ओर झुकना था, हम बहुत आगे निकल आए हैं। सोवियत संघ का विघटन कई स्वतंत्र राष्ट्रों में हो गया है और ट्रम्प तले संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) की सारी ताकत उसकी अपनी सीमाओं में सिमट गई है। राष्ट्रवादियों को सत्ता के लिए वोट दिया जा रहा है और हर नेता से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने राष्ट्र के लिए ख़ास जगह बनाएँ, न कि किसी गट की ओर झुकें। लोग थक गए हैं और नेताओं द्वारा किए गए वादों से तंग आ चुके हैं और वे एक बदलाव चाहते हैं।

इंदिरा गाँधी के बाद भारत में बहुत नाटकीय बदलाव आए हैं। अब देश बहुत अधिक समृद्ध हैं और युवाओं के सामने रोजगार के अधिक अवसर हैं। करोड़ों भारतीय अब खुद को दुनिया के नागरिक के रूप में समझते हैं, न कि किसी समाजवादी देश के नागरिक के रूप में, जो सोवियत संघ से करीब से जुड़ा हो और जिसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमेशा सरकार का मुँह तकते रहना हो।

काँग्रेस पार्टी भी पिछले 50 वर्षों में बदल गई है। वह पूर्व में जो थी, अब उसकी केवल एक कमजोर छाया भर रह गई है। पार्टी ने अपने सारे बल स्थान नष्ट कर दिए हैं और केवल गठबंधन सहयोगियों पर भरोसा करना सीख लिया है। नेतृत्व कमजोर और उदासीन हो गया है और ऐसे हालात में जब पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच श्रद्धा -आदर नहीं रहा है, उनके मन में अतीत के नेताओं के प्रति निष्ठा भाव जागृत कराना और भी आवश्यक हो जाता है, हालाँकि ऐसा होना काफ़ी संदिग्ध है क्योंकि यह समझना मुश्किल है कि क्या उनमें इतने कद्दावर नेताओं को समझने या उनकी पहचान करने की कुवत्त है? जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के अलावा काँग्रेस पार्टी के पास वास्तव में ऐसा कोई प्रतिष्ठित नेता नहीं बचता जिसे वे आदर्श मान सकें। राजीव गाँधी को उनकी माँ की हत्या के बाद गहरी सहानुभूति से उपजा जनादेश मिला था, लेकिन वे उस अति महत्वपूर्ण जनादेश का उपयोग करने में सक्षम नहीं थे।

नुमायान वारिस राहुल गाँधी अपनी पहली दो संसदीय पारियों को बर्बाद कर चुके हैं जब उनकी ख़ुद की सरकार सत्ता में थी और तब उन्होंने वस्तुतः कुछ अध्यादेशों को फाड़ने के अलावा और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं किया, जिसके लिए उनकी अपनी ही सरकार को बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। वर्तमान लोकसभा में भी उन्होंने काँग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अपने औपचारिक अभिषेक हो जाने तक कुछ नहीं किया।

इसका भी परीक्षण होना चाहिए कि राहुल गाँधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी या अपनी माँ के रायबरेली संसदीय क्षेत्र के लिए क्या किया है। उनके पास दिखाने के लिए ऐसा कुछ नहीं है, जो उन्होंने लोगों के लिए हासिल कमाया हो। इसकी बहुत संभावना है कि आने वाले चुनावों में काँग्रेस दोनों सीटों पर हार जाए।

एक मतरबा जब राहुल गाँधी मजबूती से मैदान में उतरे थे, तब भी उनके पास कोई ख़ास तय कार्यसूची (एजेंडा) या खेल की योजना (गेम प्लान) नहीं थी और उन्होंने हर संभव मौके पर प्रधानमंत्री को गाली देना शुरू कर दिया था। वे जानते थे कि वे बेसिर-पैर की बक़वास कर रहे हैं, पर उन्होंने खुद की ही स्वीकारोक्ति से राफेल विवाद को बिना किसी सबूत के ठूँस दिया। उनके पास कोई नया विचार नहीं है और संभवत: उन्हें लगता है कि उनकी बहन श्रीमती वढेरा (वाड्रा) खेल परिवर्तक (गेम चेंजर) होंगी,जो खेल की दिशा बदल देंगी और जिस कठिन परिस्थिति में वे आज हैं, उसमें से उन्हें निकाल सकेंगी।

चुनावों के ठीक पहले के इन कुछ महीनों में प्रियंका गाँधी वास्तव में क्या कर सकती हैं? वे उस रिले दौड़ की अंतिम धावक हैं जिसके पहले तीन धावकों ने उन्हें पिछलगा कर दिया है और अब उनसे अंतिम रेखा के समीप पहुँचे दूर के धावक को हराने के लिए गति को अविश्वसनीय तरीके से बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है!  बैटन (छड़ी) उन्हें सौंप दी गई है।

क्या ऐसा नहीं लगता कि चुनावों के बाद का पतन उनके मत्थे मढ़ने के लिए उन्हें लाया गया है ताकि युवराज के ताज को ठेस न पहुँचे और वह अगले पाँच सालों तक इसी तरह गड़बड़ी करता रहे और बहन ने जो लाज रख ली उसके साथ फिर खिलवाड़ कर सके?

क्या दादी इंदिरा गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका वढेरा (वाड्रा) को यह चुनाव जीतने में मदद कर सकती हैं? क्या उनका नाम और तस्वीरें मतदाताओं को काँग्रेस पार्टी के पक्ष में अपना कीमती वोट डालने के लिए प्रेरित करेंगी? क्या उनका नाम राहुल गाँधी को काँग्रेस पार्टी के नेता के रूप में विश्वसनीयता का आभास दिलाने में मदद करेगा?

बहुत अप्रिय।

क्या काँग्रेस ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाल लिया है जो विपक्ष को नष्ट करते हुए खुद ही विनाश का रास्ता अपना लेगा? या यह साधारण दिवाली की आम रोशनी है कि जिसे अंधेरे आकाश में कुछ क्षण की चाँदनी बिखेरने के लिए लगाया गया है?

अब यह तो समय ही बताएगा।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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वह ब्रांड, जो आप हैं – व्यक्तिगत ब्रांडिंग

6. The Brand Called You (low res)

ब्रांडिंग उतनी ही पुरानी है जितनी की स्वयं मानवता।

यह केवल 20 वीं शताब्दी के बाद हुआ जब विपणक और विज्ञापन विशेषज्ञ यह समझने लगे थे कि वे विशिष्ट गुणों और अपने उत्पादों की विशेषताओं से उपभोक्ताओं के मन में विशिष्ट धारणा बना सकते हैं, जो इससे पहले तक केवल किसी नाम के लेबल भर थे और सामान्य उत्पाद के रूप में उपस्थित थे।

इन विशेषज्ञों ने इस “धारणा” को “ब्रांड” कहना शुरू कर दिया।

ब्रांड एक कहानी है जिसे हमेशा बताया जाता रहा है।

पर्सनल ब्रांडिंग अपने बारे में जो सच और अनोखा है उसे उजागर करने और हर उस व्यक्ति को बताने के बारे में है जो इसके बारे में जानता है।

आपका नाम, आपका ब्रांड अपने ख़ास प्रभामंडल के साथ होता है जिसके वलय में पहले आप स्वयं आते हैं, उसके बाद आपका परिवार, तदुपरांत आपका समुदाय और फिर वह वृहत समाज जिसमें आप रहते हैं। आपके द्वारा चयनित प्रभाव वलय के मूल्य आपके ब्रांड में होने चाहिए।

व्यक्ति के रूप में अपने जीवन के प्रत्येक चरण मे आप खुद को लगातार मजबूत करते रहे हैं। किसी ब्रांड को उसके लक्षित श्रोताओं/दर्शकों द्वारा व्यक्तिगत अनुभव, संचार और प्रभाव के आधार पर देखा जाता है।

यही इसकी सफलता या विफलता को निर्धारित करता है। हममें से हर एक पर यही बात लागू होती है। हम समाज में और हमारे “लक्षित श्रोताओं/दर्शकों” के साथ कैसे बने रहते हैं, यही इस बात को निर्धारित करता है कि हम कितने मूल्यवान हैं या हो सकते हैं। आपका व्यक्तिगत ब्रांड आपका व्यावसायिक डीएनए है। यह आपका पेशेवर जीन अनुक्रम है।

हर सफल व्यक्ति ने बड़ी मेहनत से अपने ब्रांड का नाम बनाया है।

याद रखें कि आपका नाम एक ब्रांड है जिसे आप वास्तव में अपना मानते हैं। आप अद्वितीय हैं। आप उतने ही अद्वितीय हैं, जैसे कि आपकी अंगुली की छाप (फिंगरप्रिंट) या आपका रेटिना स्कैन या आपका जीन अनुक्रम।

आपके नाम के साथ आपका ब्रांड आपके कर्मों और निवेशों के माध्यम से एक ब्रांड के रूप में आपके जन्म प्रमाण पत्र के माध्यम से पंजीकृत किया गया है और वह आपके व्यक्तित्व के लिए पेटेंट किया गया है, भले ही आपके समान नाम वाले सैकड़ों दूसरे लोग भी हों।

आपके जैसा दुनिया में कोई और नहीं है और इसलिए आपको अपने आप को अपने वातावरण में निवेश करना होगा और अपने कामों और कार्यों के ज़रिए अपने खुद के ब्रांड को पहचान और सम्मान दिलाना होगा। आपकी पहुँच जितनी अधिक होगी, आपके ब्रांड को इस तरह के उतने ही अधिक निवेश की आवश्यकता होगी। जितना आपका ब्रांड अधिक प्रसिद्ध और बड़ा होता चला जाएगा, भविष्य में उसके आलोचनीय होने की आशंका भी उतनी ही अधिक होगी।

आपके लिए यह जानना अधिक से अधिक विकट होता चला जाएगा कि आपके द्वारा उठाया हर कदम या आपका दिया हर बयान, आपके द्वारा की गई प्रत्येक ट्वीट, आपके द्वारा पोस्ट की गई प्रत्येक तस्वीर, आपके द्वारा लिखा गया प्रत्येक ब्लॉग, आपकी पसंद की हर पोस्ट, जिसे आप लिखते या साझा करते हैं, आपके द्वारा दी गई हर राय किसी के द्वारा पढ़ी जा रही है और उसकी व्याख्या हो रही है। आप यह जान भी नहीं पाते कि आपके हर काम का प्रभाव या आपका हर काम ‘ब्रांड आप’ के मूल्य को बढ़ा या घटा रहा है। आपके व्यक्तिगत ब्रांड को बनाना, तैयार करना और उसका विकास करना केवल आपके हाथों में ही है। इसी के साथ, ठीक इसके विपरीत, अपने खुद के ब्रांड को नष्ट करना या कम करना भी केवल आपके ही हाथों में है।

आप अपने खुद के ब्रांड नाम के साथ क्या कर सकते हैं, तो या तो उसे बहुत सफल बना सकते हैं या उतना सफल नहीं कर सकते हैं, बस इस अंतर को पाटना है। यह व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए भी उतना ही सही है जितना कि बिजनेस ब्रांडिंग के लिए। आपका ब्रांड आपकी अपनी अनूठी कहानी का सार है। एक कुंजी है जो आपके खुद के भीतर गहराई तक पहुँच रही है और प्रामाणिक, अद्वितीय “आप” को अपने स्वयं के भीतर से बाहर खींच रही है।

अन्यथा, आपका ब्रांड सिर्फ एक बहाना होगा और आप खुद विस्मित होंगे कि क्या आप उस बहाने के पीछे छिपे व्यक्ति को पहचानते हैं, जो स्वयं आप हैं।

आपके पास आपके द्वारा चुने गए करियर पथ को बनाने की स्वतंत्रता है। ऐसा रास्ता जो आपकी प्रतिभा और रुचियों को उस स्थिति से जोड़ेगा जिसमें आप फिट हैं। आपमें अपने कैरियर में ऊँचा उठने और विस्तार पाने (लंबवत और क्षैतिज रूप में) की क्षमता होनी चाहिए।

आज जो नायक है, वह आने वाले कल में शून्य हो सकता है या इसके विपरीत भी हो सकता है कि जो आज ज़ीरो है, वह कल हीरो बन जाए।

आपके ब्रांड का मूल्य ताउम्र उतार-चढ़ाव से गुज़रेगा। सफ़लतम वर्ष बीतने के बाद बड़े पैमाने पर होने वाली वेतन वृद्धि के बारे में बातचीत करने की आपकी क्षमता से अधिक आपकी क्षमता इसमें होनी चाहिए कि एक ख़राब साल बीता हो और आपके लक्ष्य पूरे न हो सके हों, तब आप क्या करेंगे।

आपके अपने ब्रांड का मूल्य वह है जो आपको वह कीमत देगा जो आप चाह रहे हैं। अच्छी तरह से बने आपके ब्रांड से आप पा सकते हैं कि प्रतिष्ठित पदोन्नति या अगली वरिष्ठ नौकरी। यह ब्रांड मूल्यांकन आपको यह निर्धारित करने में भी मदद कर सकता है कि आप अपने लिए क्या पाने में सक्षम हैं, जिस कारण आप और आपका नाम किसी और के व्यवसाय में जुड़ सकता है। यह आपके समाज में, आपके देश या पूरी दुनिया में मान्यता और स्वीकृति के रूप में भी हो सकता है।

कोई फिल्म स्टार लगातार दो हिट फिल्में देने के बाद बड़ी फीस की मांग कर सकता है, लेकिन उसे भी तब अपनी कीमतों को गिराना होगा या शायद लगातार तीन फ्लॉप फिल्मों के बाद किसी के लिए बिना पैसे लिए भी काम करना पड़ सकता है! जब तक आप अपने आपको और अपनी स्वयं की वास्तविकता को नहीं पहचानते और स्वीकार नहीं करते हैं, तब तक आपके अपने ब्रांड के बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं। सरकार या कॉरपोरेट जगत के बहुत से लोग अपने करियर में जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, यह मानने लगते हैं कि उनके संगठन के ब्रांड की पहचान उनके अपने ब्रांड नाम से है। जिसका सत्य से वास्तव में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है।

जब कोई कॉर्पोरेट प्रबंधक या सरकारी अधिकारी किसी मीटिंग (बैठक) के लिए अपना विजिटिंग कार्ड भेजता है, तो वह उस कंपनी या संस्थान के नाम का होता है जिसकी पहचान है और उसके लिए बैठक के द्वार खोले जाते हैं। कई सारे सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी और कॉर्पोरेट प्रबंधक यह स्वीकार नहीं कर पाते कि सेवानिवृत्ति के बाद उनकी अपनी पहचान खो गई है। वे “पूर्व अध्यक्ष” या सरकार के “पूर्व सचिव” के रूप में अपनी पहचान बनाए रखना चाहते हैं। यह कठिन और कमजोर धागा है जो उन्हें उनकी कथित पहचान से जोड़ता है और लोग इस बात को छोड़ नहीं पाते कि वह धागा सेवानिवृत्ति के दिन ही टूट चुका है।

आपके व्यक्तिगत ब्रांड को बनाते हुए कभी भी अहंकार को बीच में नहीं आने देना चाहिए। आपके ब्रांड के मूल्य में आपको बड़ी कुशलता से इस बात को बुनना चाहिए कि वह भौतिक रूप और व्यक्तिगत अहंकार से परे होना चाहिए।

जीवन का चक्र जारी रहेगा, और आपका व्यक्तिगत ब्रांड अपने कद और मूल्य के साथ उसी तरह बढ़ता रहेगा।

याद रखें कि दुनिया में आपके बाद आपके पीछे आपकी जो विरासत रहेगी वह केवल आपका नाम होगा और होगा- ‘आप ब्रांड’।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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चुनाव 2019 – भाजपा की वृद्धि और विकास बनाम काँग्रेस की कर्ज़ माफ़ी

181221 Elections 2019

भाजपा ने चुनावों  में 3 प्रमुख राज्यों को गवाँ दिया है और काँग्रेस ने अचानक-से थोड़ी नई गति हासिल की है। आइए देखते हैं कि लोकसभा चुनाव के अगले दौर से पहले महत्वपूर्ण चुनौतियों से किस तरह से रूबरू होने की आवश्यकता है।

क्या अगला चुनाव देश की आर्थिक सफलताओं को लेकर होगा? क्या वह जीएसटी को लेकर होगा? क्या वह विमुद्रीकरण को लेकर होगा या वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की अविश्वसनीय सफलता पर होगा, जिस पर बहुत बड़ी संख्या में भारतीयों को गर्व है?

जहाँ तक आर्थिक सफलता का सवाल है विपक्षी दल और ख़ासकर राहुल गाँधी जानते हैं कि उनके पास प्रधानमंत्री और भाजपा से प्रतिस्पर्धा करने का कोई मार्ग नहीं है और न ही वे पिछले 4 वर्षों की तमाम उपलब्धियों पर सवाल उठा सकते हैं।

इसलिए, एकमात्र बात जो वे कर सकते हैं, वह है कि किसी भी तरह से पूरी कहानी ही बदल दी जाएँ और यह कहानी कैसे बदली जाएगी? गुजरात दंगों के पिछले सभी आरोपों से काम नहीं बना। श्री मोदी का नाम बदनाम करने और उन पर लाँछन लगाने से भी मतदाताओं का मानस बदलता नहीं दिखा है। प्रधानमंत्री के ख़िलाफ व्यक्तिगत आरोप और वक्रोक्तियाँ भी काम न आ पाईं।

वे चाहते थे कि किसी भी तरह से भ्रष्टाचार के आरोप उन पर लग जाएँ। राफेल सौदे से काँग्रेस को बड़ी उम्मीदें थीं, हालाँकि विपक्षी नेताओं ने इस पर ‘मिले सुर मेरा-तुम्हारा’ नहीं कहा था और वैसे भी देश के उच्चतम न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया है। राहुल गाँधी और उनके करीबी माने जाते लोग इस सरकार के किसी भी कैबिनेट मंत्री के खिलाफ़ भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं खोज पाए हैं,

इसलिए, उन्होंने उसी बात का सहारा लिया है जिसे काँग्रेस ने हमेशा बख़ूबी किया है।

कृषि ऋण माफ़ कर देना और उसके लिए राज्य के राजकोष का प्रयोग करना।

कृषि ऋण माफ़ कर देना बहुत अच्छी किस्सागोई है और यह बड़ा एजेंडा बनने जा रहा है जिसका अगले कुछ महीनों में राहुल गाँधी जोर-शोर से प्रचार करने वाले हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने पहला निर्णय यह लिया कि ऋण माफ़ करने की घोषणा की जाए। यह दीगर बात है कि कर्नाटक राज्य में 44,000 करोड़ रुपए के ऋण माफ़ किए गए लेकिन केवल 800 किसानों को उसका फायदा हुआ जबकि 2.50 लाख रुपए वाले बड़ी संख्या में गरीब किसान श्री गाँधी की योजनाओं से अमीर किसानों को मिलने वाले बड़े पैमाने के फायदे के बाद अपनी बारी आने का धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे हैं। इन अन्य 3 राज्यों की कहानी भी कुछ अलग नहीं होगी और अमीर किसान सारा पैसा उड़ा लेंगे।

श्री गाँधी समझ नहीं सकते हैं, न ही वे इस बात की परवाह करते हैं कि कर्ज़ माफ़ी के बाद उन राज्यों की आर्थिक स्थिति वे किस तरह सुधार पाएँगे। वे जानते हैं कि जब काँग्रेस शासित इन राज्यों में भारी ऋण छूट की वजह से वित्तीय संकट गहराएगा, तो वे केजरीवाल वाले तरीके से उसका दोष प्रधानमंत्री के सिर मढ़ देंगे।

वे बड़े शहीदाना तरीके से यह कहने तक में नहीं सकुचाएँगे कि मैं तो किसानों की मदद करना चाहता था, लेकिन केंद्र सरकार को ही परवाह नहीं है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ऋण माफ़ी बार-बार करते रहना होगी और हर थोड़े वर्षों में इन ऋणों को माफ करते रहना पड़ेगा। ऋण माफ़ी की उनकी घोषणा के बाद, साधन-संपन्न किसानों ने भी बैंकों का ऋण चुकाना बंद कर दिया है। इस ऋण छूट की बात करें तो इसका अनुमान लगभग 1.64 लाख करोड़ रुपए या लगभग 25 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर लगाया जा है! मुझे हैरानी नहीं होगी यदि वे किसी निश्चित सीमा से नीचे सभी आवास ऋण और वाहन ऋण भी माफ़ कर दें! आखिरकार जो परिवार ऋण लेते हैं उनसे उन्हें जो परेशानी होती है,वह भी इससे कुछ अलग नहीं है।

देश की सबसे शक्तिशाली शीर्ष नौकरी के दरवाजे तक पहुँचने के लिए श्री गांधी इतने बेताब हैं कि वे कुछ भी कर देने पर आमदा हैं। उनके आस-पास के सभी वरिष्ठ नेता इस समस्या को समझते हैं, लेकिन गाँधी घराने के युवा की अपरिपक्व महत्वाकांक्षा के सामने झुक गए हैं।

श्री गांधी अधिक नौकरियाँ ईज़ाद करने की किसी भी योजना के बारे में बात नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि उनकी पार्टी सत्ता में आने के बाद नौकरियाँ कैसे दिलाएगी? अमेठी और रायबरेली की सारी परिस्थितियाँ और विकास की दयनीय स्थिति सभी देख चुके हैं। वे यह भी जानते हैं कि नई नौकरियाँ एक झटके में खड़ी नहीं हो सकती है।

राहुल गांधी की रणनीति काफ़ी सरल है। यदि वे जीत जाते हैं, तो उनके पास इन ऋण छूटों से होने वाले नुकसान की भरपाई करने उसे ठीक करने की कोशिश के लिए 5 साल हैं। यदि वे हार जाते हैं, तो समस्या का हल विजेता द्वारा किया जाएगा! राहुल गाँधी किसी भी कीमत पर चुनाव में जीत हासिल करना चाहते हैं भले ही उसके लिए बड़े परिश्रम से अर्जित देश के भंडार को ही क्यों न दाँव पर लगाना पड़ जाए।

राहुल गाँधी के लिए जीत के मायने यदि वे अपने महागठबंधन को समझाने में सक्षम हो जाते हैं तो केवल देश की शीर्ष नौकरी को पाने की संभावना भर नहीं है बल्कि अपने और अपने परिवार की आत्मरक्षा का एकमात्र अवसर भी है, जो लंबे समय से भ्रष्टाचार से जुड़े हर तरह के विवादों में फँसा हुआ है।

लोगों की याददाश्त बहुत कम होती है और अगर भाजपा के नेता अतीत की बात करना छोड़ दें तो चार राज्यों (कर्नाटक सहित) में इस साल हुई भाजपा की हार लोकसभा चुनावों में बहुत आसानी से जीत में बदल सकती है, उन्हें आगे देखना होगा और कर्जमाफी होते हुए भी विकास की बातें करना होंगी।

भाजपा को भी पूरी तरह से पता होना चाहिए कि लोकसभा चुनावों में श्री मोदी की वापसी थोड़ी कठिन है,सो उन्हें विकास और लंबे दौर तक प्रभावी स्थायी वृद्धि के एजेंडे को जारी रखना चाहिए।

  1. भाजपा को राहुल गाँधी की पहल को हथिया लेने की आवश्यकता है और यदि ज़रूरी हो, तो ऋण माफी की भी घोषणा कर देना चाहिए। यदि मतदाताओं को लुभाने का यही एकमात्र तरीका है, तो ऐसा भी किया जा सकता है। राहुल गाँधी कर्जमाफी का पूरा श्रेय लेने की हर संभव कोशिश करेंगे और बहुत मजबूती से उसका जवाब देने की ज़रूरत है।
  2. मध्यम वर्ग के लिए आने वाले बजट में आयकर में छूट को लागू किया जाना चाहिए।
  3. एमएसएमई क्षेत्र के लिए ऋण की आसान शर्तों की आवश्यकता है और इसे देर-सबेर जल्द से जल्द उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  4. कॉरपोरेट क्षेत्र को अपनी ओर आकर्षित करने की जरूरत है और इसके लिए कॉरपोरेट करों में कमी से मदद मिलेगी। जीएसटी को स्वीकार कर लिया गया है और कॉर्पोरेट क्षेत्र में यह अच्छे परिणाम दे रहा है।
  5. भाजपा के वरिष्ठ मंत्रियों का खुलकर सामने आना और अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करते हुए देखना अच्छा लग रहा है। पहले 4 वर्षों तक सरकार और अंग्रेजी भाषी प्रेस के एक बहुत बड़े वर्ग के बीच लगभग कोई संवाद नहीं था। अब यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि प्रेस से जुड़े सभी सदस्य अपनी व्यक्तिगत निष्ठा, पसंद-नापसंद के बावजूद भाजपा द्वारा लुभाये जाएँ।
  6. भाजपा के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वह शिवसेना की तरह अन्य प्रमुख गठबंधन सहयोगियों को अपने साथ वापस ला सकें। उन्हें इसे लेकर भी आशवस्त होना होगा कि अकाली दल, श्री पासवान और श्री नीतीश कुमार का समर्थन उन्हें मिलता रखना चाहिए। तमिलनाडु में राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं और इसलिए भाजपा को रजनीकांत के साथ गठबंधन करने की आवश्यकता है क्योंकि दूसरे सुपरस्टार कमल हासन काँग्रेस में चले गए हैं। आंध्र प्रदेश में केसीआर का दबदबा है और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि भाजपा इस राज्य के चुनाव से पूर्व गठबंधन में शामिल हो जाए।
  7. अंत में, सभी संबद्ध संगठनों को चुनाव जीतने की आवश्यकता को समझना होगा और इसलिए किसी भी तरह के पथांतरित मुद्दों फिर भले ही वह अति सतर्कता से जुड़ा हो, बचना होगा। इन नेताओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे किसी भी तरह का विवादास्पद वक्तव्य न दें और श्री मोदी के नेतृत्व में हुए सभी अतुलनीय विकासकार्यों के बारे में बात करने के एकल बिंदु एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करें। अनावश्यक बयानबाजी बंद की जानी चाहिए।

बीजेपी के प्रबुद्ध मंडल (थिंक टैंक्स) को याद रखना होगा कि जैसे-जैसे हम चुनावों के करीब पहुँच रहे हैं धारणाएँ बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण होती चली जाती हैं।

ये उपाय भाजपा सरकार की सोच के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन जीतने के लिए ये जरूरी हैं और इसके लिए कठिन निर्णय लेने की जरूरत है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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सेवानिवृत्त लोगों के लिए नए साल के संकल्प!

2. Reboot. Reinvent. Rewire Managing Retirement in the Twenty First Century

नया साल अगले मुहाने पर खड़ा है और यह उन संकल्पों के बारे में फ़िर से सोचने का समय है! फ़िर चाहे आप अधिक माक़ूल या स्वस्थ बने रहने का संकल्प करें, अधिक सामाजिक होने पर विचार करें या अपनी बकेट लिस्ट के उन कुछ बिंदुओं को चिह्नित करें,जिन्हें जाते साल में करना रहना गया और उन्हें आने वाले वर्ष में करने के बारे में सोचा जा सकता है। नीचे कुछ विचार दिए गए हैं और आप नए साल के संकल्पों की अपनी सूची में उनमें से कुछ या सभी को जोड़ने पर विचार कर सकते हैं।

अपने स्वास्थ्य के लिए लें बेहतर आहार

अपनी सेहत का जिम्मा अपने हाथों में ले लीजिए। अपने भोजन का स्वरूप बदलें। सही खाना खाने की दिशा में छोटे कदम बढ़ाए। आखिरकार, यदि आप अपनी खाद्य आदतों के प्रति लापरवाह हैं, तो उन्हें रातोंरात नहीं बदल सकते हैं।

हमेशा ज्यादातर लोगों को कम वसा एवं अधिक रेशेदार फल, सब्जियाँ और सूखे मेवों के स्वस्थ मिश्रण का सेवन करने की सलाह दी जाती है। बुज़ुर्ग होने के नाते हमारे आहार को नियंत्रित करने के लिए यह और भी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाता है। दिन में कई बार स्वल्पाहार लें। ज्यादातर विशेषज्ञ दिन में 5 बार खाने की सलाह देते हैं लेकिन कम मात्रा में। जैसा कि कुछ विद्वान लोग कहते हैं, “आप अपना पूरा खाना होने से ठीक पहले खाना बंद कर दीजिए!” अन्य कहते हैं कि आपकी कम से कम आधी प्लेट फल और सब्जियों से भरी होनी चाहिए।

अपने सामान्य आहार के माध्यम से आप जो प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं उसे संतुलित करने के लिए अपने आहार में विटामिन और अन्य पूरक जोड़ें।

याद रखें कि बेहतर भोजन ही आपके वजन को कम करने का एकमात्र विकल्प है।

कोई नई, स्वस्थ गतिविधि खोजें

जैसे-जैसे हम बड़े होते चले जाते हैं, चाहे हम पहले सक्रिय रहे हो या नहीं, लेकिन अब सक्रिय रहना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। व्यायाम या योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ। टेनिस या गोल्फ खेलने का दौर, हर दिन कम से कम 30 मिनट तक तेज चलना (चलने के लिए प्रति सप्ताह 150 मिनट न्यूनतम अनुशंसित है), यौगिक श्वास अभ्यास, तैराकी या साइकिल चलाना आपकी दिनचर्या में शामिल हो तो बहुत अच्छा होगा।

मैंने ऐसे कई वरिष्ठ नागरिकों से मुलाक़ात की है, जिन्होंने अपनी उम्र के लोगों के साथ दौड़ना और दौड़ लगाना शुरू कर दिया है। उन्हें सेहतमंद रहने की इस प्रक्रिया में समान विचारधारा के और उत्साही मित्रों का नया समुदाय भी मिल गया है। अपने व्यक्तित्व और गतिविधि स्तर के आधार पर सही गतिविधि आज़माना और खोजना सर्वोत्तम है।

अपनी बकेट लिस्ट के कुछ बिंदुओं को पूरा करें

खुद को ब्रेक दें। आपने इसे अर्जित किया है। सालों-साल हमारी बकेट लिस्ट में कई बातें जमा होती जा रही हैं। यह लिस्ट लंबे समय तक वैसी की वैसी पड़ी है क्योंकि हम अपने कामकाजी जीवन में समय नहीं निकाल पाए।

आने वाले वर्ष में अपनी बकेट लिस्ट में से कम से कम दो महत्वपूर्ण बातें पूरा करने के लिए हल खोज निकालिए।

दोस्तों और परिवार के साथ और अधिक जुड़ें

अपने काम-काज के चलते व्यस्तता भरे दिनों में जिन पुराने लोगों से मेल-मुलाक़ात बंद हो गई थी, उनसे फ़िर से जुड़िए। पहला कदम उठाने के लिए किसी और की प्रतीक्षा मत कीजिए। एक बार अपने परिवार और दोस्तों से जाकर मिलने तो लगिए, आप हैरान रह जाएँगे कि आपको उनसे कितनी ऊष्मा-उर्जा मिल रही है। यह देखना बहुत दिलचस्प है कि कितने ही लोग फेसबुक और लिंक्डइन का उपयोग कर अपने स्कूल और कॉलेज के पुराने दोस्तों को फिर से खोज रहे हैं।

दोस्तों के साथ कभी-कभार दोपहर का साप्ताहिक भोजन या सुबह की कॉफ़ी या दुनिया भर में फैले हुए आपके परिवार के सदस्यों के साथ व्हाट्सएप या स्काइप कॉल फिर से जुड़ने के शानदार तरीके हैं। उन लोगों के साथ बात करने और हँसने में बिताया गया समय सबसे अच्छे तरीके से बिताया गया समय होगा।

अपना सामान कम करें

अपने कपड़ों की अलमारी और घर साफ करने का तरीका खोजें। इस अभ्यास को शुरू करने से पहले “इच्छा” और “ज़रूरत” के बीच के अंतर के बारे में सोचें। जिन चीजों की आपको आवश्यकता है उन्हें रहने दें और जिनकी आपको चाहना हैं, उन्हें छोड़ दें। यह दार्शनिक लग सकता है लेकिन आजमाएँ, पिछले एक साल से जो भी आपने उपयोग नहीं किया है उसे अलग कर दें। आपके सामने चुनौती यह है कि आपको हमेशा यह लग सकता है कि यदि अचानक उस वस्तु की आवश्यकता आन पड़ी तो-“क्या होगा”। यदि आपने एक बार उसे दूर कर देने का निर्णय ले लिया है, तो उसे अगले आने वाले वर्ष तक सक्रिय संकल्प के रूप में रखें और फिर मूल्यांकन करें कि क्या आपको उस वस्तु (ओं) की आवश्यकता महसूस हुई या नहीं,जिसे आपने दूर कर दिया था। जबकि संभावना तो यह है कि आपको उन वस्तुओं की कभी याद भी नहीं आएगी।

इसके अलावा इससे बेतरतीब पड़े सामान को व्यवस्थित करने और समय-समय पर आपके घर को साफ़ करने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी।

नई तकनीक आजमा कर देखें

प्रौद्योगिकी से जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं हमारी दुनिया बदल रही है। यदि आप फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य सारे माध्यमों से संचार और कनेक्शन के कई रूपों को पहले नहीं समझ पाए हैं तो अब ऐसा करने का समय है। अपने फोन और अन्य उपकरणों के ऑपरेटिंग सिस्टम से परिचित हो जाइए। आइए इन मंचों को जानने और समझने की कोशिश करें क्योंकि हमारा जीवन अधिक से अधिक ऐसे मंचों पर विकसित होने वाले अनुप्रयोगों और इस तरह के संचार माध्यमों के आसपास घूमने वाला है।

अपने ज्ञान और कौशल को धारदार बनाने के लिए आपके हर संभावित प्रश्न के उत्तरों के ऑन-लाइन ट्यूटोरियल हैं। आप अपने घर के या पड़ोस के किसी युवा से अनुरोध भी कर सकते हैं कि वह

आपको सिखा दें।

अपनी कहानी साझा कीजिए

आपने अद्भुत और भरापूरा जीवन जीया है और अब आपकी कहानी सबको बताने का समय आ गया है। अपना ब्लॉग लिखें और इसे दैनिक या साप्ताहिक आधार पर प्रकाशित करें। अपने जीवन के सभी उपाख्यानों के बारे में सोचें और उनके बारे में लिखें। अपने करियर के मील के पत्थर और बच्चे के रूप में बिताए गए समय के बारे में सोचें और उन्हें दर्ज करें। अपने माता-पिता और विस्तारित परिवार के बारे में सोचें और उन यादों को ध्यान से लिखित रूप में संग्रहित करें।

यदि आप ब्लॉग लिखने में सहज नहीं हैं, तो इसे अपने मोबाइल फोन पर बोलकर लिखवा लें। अधिकांश फोन में अब “वॉयस टू टेक्स्ट” की सुविधा है जो आपकी वॉयस रिकॉर्डिंग को तेज़ी से लिखित में बदलना जानती है। यदि यह भी काम नहीं करता है, तो रिकॉर्डिंग को किसी को भेजें जो इसे बहुत ही कम शुल्क लेकर ट्रांसक्रिप्ट कर देगा। वह तय ब्लॉग भावी पीढ़ी के लिए भी आपकी आवाज़ सुरक्षित रखेगा।

यह न केवल आपकी यादों और विचारों को दर्ज करेगा, बल्कि यह भावी पीढ़ियों के लिए आपके परिवार के इतिहास का दस्तावेज भी बन सकता है।

मस्तिष्क को भी व्यायाम दें

जितना अधिक आप अपने मस्तिष्क का प्रयोग करेंगे, उतना ही यह आपके शरीर की तरह मजबूत बनेगा। ध्यान दें कि इन दिनों मस्तिष्क की बीमारियाँ जैसे डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर के मरीज़ बढ़ रहे हैं।

अपने दैनिक समाचार पत्र के अलावा भी दूसरा बहुत कुछ पढ़ें। जिन विषयों में आपकी रुचि है उनसे संबंधित चर्चा समूहों में शामिल हों या ऐसे विषयों के समूह प्रारंभ करें। सुडोकू, शतरंज, प्रश्नोत्तरी या स्क्रैबल आज़माएँ। ये सभी खेल आपके स्मार्ट फोन पर निःशुल्क उपलब्ध हैं। जिन्हें आप नहीं जानते, उन लोगों के साथ ऑनलाइन खेलें और सर्वोत्तम को टक्कर दें। अपनी दिमाग शक्ति का उपयोग करें न कि मांसपेशियों के बल का, फिर तो आपको इस क्षेत्र में या कि यूँ कह लें दुनिया में कुछ भी सबसे अच्छा करने से आपको कोई नहीं रोक सकता है।

एक बार जब आप नेतृत्व कर लेंगे तो आपको बहुत से अनुयायी मिल जाएंगे जो आपके साथ खेलना चाहते हैं लेकिन आगे आने में संकोच कर रहे थे।

अपने जीवन से नकारात्मकता और चिंता दूर करें

जीवन बहुत छोटा है और जीवन के जिस मुकाम पर हम हैं, वहाँ हम पहले से ही गोल्फ के “अंतिम नौ” (बैक नाइन सीधे गोल्फ के दौर के अंत को देखने से संबंधित है) के दौर पर हैं! अब हमारे सामने वह समय है जब हमें अपने भीतर परिवार के लोगों, दोस्तों और दुनिया को लेकर जितनी भी नकारात्मकता है वह सारी ख़त्म कर देना चाहिए। इस सारी नकारात्मकता से हम केवल खुद को चोट पहुँचाते हैं।

यदि आप किसी बारे में चिंतित महसूस कर रहे हैं, तो अपने परिवार और दोस्तों से उस बारे में बात करें। इसे अंदर ही अंदर बोतलबंद कर देने पर आपके लिए ही इससे निपटना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

छोटी से छोटी जो भी खुशी आपके पास आए, उसे मनाना ठान लें और ऐसा करने से ख़ुद को न रोकें।

पर्याप्त नींद लें

ज्यादातर लोग उस कपोल कल्पना पर विश्वास रखते हैं कि जब आप बूढ़े हो जाते हैं तो आपको कम नींद की आवश्यकता होती है। सच्चाई से इसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यदि आप देर तक सो रहे हैं या बहुत जल्दी उठ रहे हैं, तो आमतौर पर जितना समय आप बिस्तर पर रहते हैं उससे अधिक समय तक बिस्तर पर रहें और देखेंगे कि जल्द ही आप लंबे समय तक सो रहे होंगे और अधिक आराम कर रहे होंगे। शुरुआती दिनों में तब तक दिन में नींद लेने से बचें जब तक कि आपकी रात को समय पर सोने की आदत सामान्य न हो जाए। फिर आप आसानी से अपनी दोपहर की झपकी भी ले सकते हैं!

नियमित चिकित्सकीय जाँचपड़ताल करवाते रहें

नियमित रूप से और व्यवस्थित तरीके से अपना रक्तचाप, रक्त में शकर की मात्रा और अपना वजन नियंत्रित, प्रबंधित और दर्ज करें। यदि आपके सामने ऐसी कोई भी चुनौती नहीं है, तो इसे आशीर्वाद मानें। आपके लिए ज़रूरी है कि आप सालाना चिकित्सकीय जाँच-पड़ताल करवाते रहे और यदि आपने इस साल जाँच नहीं की है, तो नए साल में व्यापक जाँच करवाने का संकल्प लें।

यात्रा करें और नए स्थानों की खोज करें

अपने पूरे कामकाजी जीवन में आप नए स्थानों को देखना चाहते थे लेकिन अपने कार्य से जुड़ी प्रतिबद्धताओं या पारिवारिक प्रतिबद्धताओं के कारण समय नहीं निकाल पा रहे थे। अब उन सभी सपनों को साकार करने का समय आ गया है। आप और आपके जीवनसाथी नए शहरों या नए देशों की यात्रा कर सकते हैं या यहाँ तक कि आप जिस शहर में रहते हैं उसके ही नए हिस्सों को भी खोज सकते हैं।

नए स्थानों की खोज, नए व्यंजन, नए रिवाज और नए दोस्त बनाना बहुत ही उत्साही अनुभव होगा।

और अंत में, चूँकि आप अपने प्रियजनों के साथ इस त्यौहार के मौसम का जश्न मना रहे हैं, तो आने वाले साल के नाम एक जाम ले लें, पर छोटे पेग के साथ!

हम आपके लिए बहुत ही ख़ुशनुमा, सेहतमंद और समृद्ध नए साल की कामना करते हैं।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों ब्रांड कॉल्ड यूThe Brand Called You रीबूट– Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; बक स्टॉप्स हीयर– The Buck Stops Here लर्निंग ऑफ़ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and बक स्टॉप्स हीयरमाय जर्नी फ़्राम मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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नया साल अगले मुहाने पर खड़ा है और यह उन संकल्पों के बारे में फ़िर से सोचने का समय है! फ़िर चाहे आप अधिक माक़ूल या स्वस्थ बने रहने का संकल्प करें, अधिक सामाजिक होने पर विचार करें या अपनी बकेट लिस्ट के उन कुछ बिंदुओं को चिह्नित करें,जिन्हें जाते साल में करना रहना गया और उन्हें आने वाले वर्ष में करने के बारे में सोचा जा सकता है। नीचे कुछ विचार दिए गए हैं और आप नए साल के संकल्पों की अपनी सूची में उनमें से कुछ या सभी को जोड़ने पर विचार कर सकते हैं।

अपने स्वास्थ्य के लिए लें बेहतर आहार

अपनी सेहत का जिम्मा अपने हाथों में ले लीजिए। अपने भोजन का स्वरूप बदलें। सही खाना खाने की दिशा में छोटे कदम बढ़ाए। आखिरकार, यदि आप अपनी खाद्य आदतों के प्रति लापरवाह हैं, तो उन्हें रातोंरात नहीं बदल सकते हैं।

हमेशा ज्यादातर लोगों को कम वसा एवं अधिक रेशेदार फल, सब्जियाँ और सूखे मेवों के स्वस्थ मिश्रण का सेवन करने की सलाह दी जाती है। बुज़ुर्ग होने के नाते हमारे आहार को नियंत्रित करने के लिए यह और भी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाता है। दिन में कई बार स्वल्पाहार लें। ज्यादातर विशेषज्ञ दिन में 5 बार खाने की सलाह देते हैं लेकिन कम मात्रा में। जैसा कि कुछ विद्वान लोग कहते हैं, “आप अपना पूरा खाना होने से ठीक पहले खाना बंद कर दीजिए !” अन्य कहते हैं कि आपकी कम से कम आधी प्लेट फल और सब्जियों से भरी होनी चाहिए।

अपने सामान्य आहार के माध्यम से आप जो प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं उसे संतुलित करने के लिए अपने आहार में विटामिन और अन्य पूरक जोड़ें।

याद रखें कि बेहतर भोजन ही आपके वजन को कम करने का एकमात्र विकल्प है।

कोई नई, स्वस्थ गतिविधि खोजें

जैसे-जैसे हम बड़े होते चले जाते हैं, चाहे हम पहले सक्रिय रहे हो या नहीं, लेकिन अब सक्रिय रहना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। व्यायाम या योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ। टेनिस या गोल्फ खेलने का दौर, हर दिन कम से कम 30 मिनट तक तेज चलना (चलने के लिए प्रति सप्ताह 150 मिनट न्यूनतम अनुशंसित है), यौगिक श्वास अभ्यास, तैराकी या साइकिल चलाना आपकी दिनचर्या में शामिल हो तो बहुत अच्छा होगा।

मैंने ऐसे कई वरिष्ठ नागरिकों से मुलाक़ात की है, जिन्होंने अपनी उम्र के लोगों के साथ दौड़ना और दौड़ लगाना शुरू कर दिया है। उन्हें सेहतमंद रहने की इस प्रक्रिया में समान विचारधारा के और उत्साही मित्रों का नया समुदाय भी मिल गया है। अपने व्यक्तित्व और गतिविधि स्तर के आधार पर सही गतिविधि आज़माना और खोजना सर्वोत्तम है।

अपनी बकेट लिस्ट के कुछ बिंदुओं को पूरा करें

खुद को ब्रेक दें। आपने इसे अर्जित किया है। सालों-साल हमारी बकेट लिस्ट में कई बातें जमा होती जा रही हैं। यह लिस्ट लंबे समय तक वैसी की वैसी पड़ी है क्योंकि हम अपने कामकाजी जीवन में समय नहीं निकाल पाए।

आने वाले वर्ष में अपनी बकेट लिस्ट में से कम से कम दो महत्वपूर्ण बातें पूरा करने के लिए हल खोज निकालिए।

दोस्तों और परिवार के साथ और अधिक जुड़ें

अपने काम-काज के चलते व्यस्तता भरे दिनों में जिन पुराने लोगों से मेल-मुलाक़ात बंद हो गई थी, उनसे फ़िर से जुड़िए। पहला कदम उठाने के लिए किसी और की प्रतीक्षा मत कीजिए। एक बार अपने परिवार और दोस्तों से जाकर मिलने तो लगिए, आप हैरान रह जाएँगे कि आपको उनसे कितनी ऊष्मा-उर्जा मिल रही है। यह देखना बहुत दिलचस्प है कि कितने ही लोग फेसबुक और लिंक्डइन का उपयोग कर अपने स्कूल और कॉलेज के पुराने दोस्तों को फिर से खोज रहे हैं।

दोस्तों के साथ कभी-कभार दोपहर का साप्ताहिक भोजन या सुबह की कॉफ़ी या दुनिया भर में फैले हुए आपके परिवार के सदस्यों के साथ व्हाट्सएप या स्काइप कॉल फिर से जुड़ने के शानदार तरीके हैं। उन लोगों के साथ बात करने और हँसने में बिताया गया समय सबसे अच्छे तरीके से बिताया गया समय होगा।

अपना सामान कम करें

अपने कपड़ों की अलमारी और घर साफ करने का तरीका खोजें। इस अभ्यास को शुरू करने से पहले “इच्छा” और “ज़रूरत” के बीच के अंतर के बारे में सोचें। जिन चीजों की आपको आवश्यकता है उन्हें रहने दें और जिनकी आपको चाहना हैं, उन्हें छोड़ दें। यह दार्शनिक लग सकता है लेकिन आजमाएँ, पिछले एक साल से जो भी आपने उपयोग नहीं किया है उसे अलग कर दें। आपके सामने चुनौती यह है कि आपको हमेशा यह लग सकता है कि यदि अचानक उस वस्तु की आवश्यकता आन पड़ी तो-“क्या होगा”। यदि आपने एक बार उसे दूर कर देने का निर्णय ले लिया है, तो उसे अगले आने वाले वर्ष तक सक्रिय संकल्प के रूप में रखें और फिर मूल्यांकन करें कि क्या आपको उस वस्तु (ओं) की आवश्यकता महसूस हुई या नहीं,जिसे आपने दूर कर दिया था। जबकि संभावना तो यह है कि आपको उन वस्तुओं की कभी याद भी नहीं आएगी।

इसके अलावा इससे बेतरतीब पड़े सामान को व्यवस्थित करने और समय-समय पर आपके घर को साफ़ करने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी।

नई तकनीक आजमा कर देखें

प्रौद्योगिकी से जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं हमारी दुनिया बदल रही है। यदि आप फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य सारे माध्यमों से संचार और कनेक्शन के कई रूपों को पहले नहीं समझ पाए हैं तो अब ऐसा करने का समय है। अपने फोन और अन्य उपकरणों के ऑपरेटिंग सिस्टम से परिचित हो जाइए। आइए इन मंचों को जानने और समझने की कोशिश करें क्योंकि हमारा जीवन अधिक से अधिक ऐसे मंचों पर विकसित होने वाले अनुप्रयोगों और इस तरह के संचार माध्यमों के आसपास घूमने वाला है।

अपने ज्ञान और कौशल को धारदार बनाने के लिए आपके हर संभावित प्रश्न के उत्तरों के ऑन-लाइन ट्यूटोरियल हैं। आप अपने घर के या पड़ोस के किसी युवा से अनुरोध भी कर सकते हैं कि वह

आपको सिखा दें।

अपनी कहानी साझा कीजिए

आपने अद्भुत और भरापूरा जीवन जीया है और अब आपकी कहानी सबको बताने का समय आ गया है। अपना ब्लॉग लिखें और इसे दैनिक या साप्ताहिक आधार पर प्रकाशित करें। अपने जीवन के सभी उपाख्यानों के बारे में सोचें और उनके बारे में लिखें। अपने करियर के मील के पत्थर और बच्चे के रूप में बिताए गए समय के बारे में सोचें और उन्हें दर्ज करें। अपने माता-पिता और विस्तारित परिवार के बारे में सोचें और उन यादों को ध्यान से लिखित रूप में संग्रहित करें।

यदि आप ब्लॉग लिखने में सहज नहीं हैं, तो इसे अपने मोबाइल फोन पर बोलकर लिखवा लें। अधिकांश फोन में अब “वॉयस टू टेक्स्ट” की सुविधा है जो आपकी वॉयस रिकॉर्डिंग को तेज़ी से लिखित में बदलना जानती है। यदि यह भी काम नहीं करता है, तो रिकॉर्डिंग को किसी को भेजें जो इसे बहुत ही कम शुल्क लेकर ट्रांसक्रिप्ट कर देगा। वह तय ब्लॉग भावी पीढ़ी के लिए भी आपकी आवाज़ सुरक्षित रखेगा।

यह न केवल आपकी यादों और विचारों को दर्ज करेगा, बल्कि यह भावी पीढ़ियों के लिए आपके परिवार के इतिहास का दस्तावेज भी बन सकता है।

मस्तिष्क को भी व्यायाम दें

जितना अधिक आप अपने मस्तिष्क का प्रयोग करेंगे, उतना ही यह आपके शरीर की तरह मजबूत बनेगा। ध्यान दें कि इन दिनों मस्तिष्क की बीमारियाँ जैसे डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर के मरीज़ बढ़ रहे हैं।

अपने दैनिक समाचार पत्र के अलावा भी दूसरा बहुत कुछ पढ़ें। जिन विषयों में आपकी रुचि है उनसे संबंधित चर्चा समूहों में शामिल हों या ऐसे विषयों के समूह प्रारंभ करें। सुडोकू, शतरंज, प्रश्नोत्तरी या स्क्रैबल आज़माएँ। ये सभी खेल आपके स्मार्ट फोन पर निःशुल्क उपलब्ध हैं। जिन्हें आप नहीं जानते, उन लोगों के साथ ऑनलाइन खेलें और सर्वोत्तम को टक्कर दें। अपनी दिमाग शक्ति का उपयोग करें न कि मांसपेशियों के बल का, फिर तो आपको इस क्षेत्र में या कि यूँ कह लें दुनिया में कुछ भी सबसे अच्छा करने से आपको कोई नहीं रोक सकता है।

एक बार जब आप नेतृत्व कर लेंगे तो आपको बहुत से अनुयायी मिल जाएंगे जो आपके साथ खेलना चाहते हैं लेकिन आगे आने में संकोच कर रहे थे।

अपने जीवन से नकारात्मकता और चिंता दूर करें

जीवन बहुत छोटा है और जीवन के जिस मुकाम पर हम हैं, वहाँ हम पहले से ही गोल्फ के “अंतिम नौ” (बैक नाइन सीधे गोल्फ के दौर के अंत को देखने से संबंधित है) के दौर पर हैं! अब हमारे सामने वह समय है जब हमें अपने भीतर परिवार के लोगों, दोस्तों और दुनिया को लेकर जितनी भी नकारात्मकता है वह सारी ख़त्म कर देना चाहिए। इस सारी नकारात्मकता से हम केवल खुद को चोट पहुँचाते हैं।

यदि आप किसी बारे में चिंतित महसूस कर रहे हैं, तो अपने परिवार और दोस्तों से उस बारे में बात करें। इसे अंदर ही अंदर बोतलबंद कर देने पर आपके लिए ही इससे निपटना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

छोटी से छोटी जो भी खुशी आपके पास आए, उसे मनाना ठान लें और ऐसा करने से ख़ुद को न रोकें।

पर्याप्त नींद लें

ज्यादातर लोग उस कपोल कल्पना पर विश्वास रखते हैं कि जब आप बूढ़े हो जाते हैं तो आपको कम नींद की आवश्यकता होती है। सच्चाई से इसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यदि आप देर तक सो रहे हैं या बहुत जल्दी उठ रहे हैं, तो आमतौर पर जितना समय आप बिस्तर पर रहते हैं उससे अधिक समय तक बिस्तर पर रहें और देखेंगे कि जल्द ही आप लंबे समय तक सो रहे होंगे और अधिक आराम कर रहे होंगे। शुरुआती दिनों में तब तक दिन में नींद लेने से बचें जब तक कि आपकी रात को समय पर सोने की आदत सामान्य न हो जाए। फिर आप आसानी से अपनी दोपहर की झपकी भी ले सकते हैं!

नियमित चिकित्सकीय जाँचपड़ताल करवाते रहें

नियमित रूप से और व्यवस्थित तरीके से अपना रक्तचाप, रक्त में शकर की मात्रा और अपना वजन नियंत्रित, प्रबंधित और दर्ज करें। यदि आपके सामने ऐसी कोई भी चुनौती नहीं है, तो इसे आशीर्वाद मानें। आपके लिए ज़रूरी है कि आप सालाना चिकित्सकीय जाँच-पड़ताल करवाते रहे और यदि आपने इस साल जाँच नहीं की है, तो नए साल में व्यापक जाँच करवाने का संकल्प लें।

यात्रा करें और नए स्थानों की खोज करें

अपने पूरे कामकाजी जीवन में आप नए स्थानों को देखना चाहते थे लेकिन अपने कार्य से जुड़ी प्रतिबद्धताओं या पारिवारिक प्रतिबद्धताओं के कारण समय नहीं निकाल पा रहे थे। अब उन सभी सपनों को साकार करने का समय आ गया है। आप और आपके जीवनसाथी नए शहरों या नए देशों की यात्रा कर सकते हैं या यहाँ तक कि आप जिस शहर में रहते हैं उसके ही नए हिस्सों को भी खोज सकते हैं।

नए स्थानों की खोज, नए व्यंजन, नए रिवाज और नए दोस्त बनाना बहुत ही उत्साही अनुभव होगा।

और अंत में, चूँकि आप अपने प्रियजनों के साथ इस त्यौहार के मौसम का जश्न मना रहे हैं, तो आने वाले साल के नाम एक जाम ले लें, पर छोटे पेग के साथ!

हम आपके लिए बहुत ही ख़ुशनुमा, सेहतमंद और समृद्ध नए साल की कामना करते हैं।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों ब्रांड कॉल्ड यूThe Brand Called You रीबूट– Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; बक स्टॉप्स हीयर– The Buck Stops Here लर्निंग ऑफ़ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and बक स्टॉप्स हीयरमाय जर्नी फ़्राम मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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भारत में आगामी चुनाव – जवाबों से अधिक हैं सवाल

181110 Elections

भाजपा ने बेल्लारी में एक और सीट खो दी है और काँग्रेस ने अविश्वसनीय नेतृत्व की विजयी तुरही को पहले ही बजा दिया है, जिसे उनके “युवा” नेता देश को उपलब्ध करा रहे हैं!

जब भाजपा में “चिंतन बैठकें” चलेंगी तब भाजपा के विचारक (थिंक) टैंक को इस पर भी विचार करना चाहिए कि असल में मतदाताओं के दिमाग में क्या चल रहा है और क्यों ऐसा लग रहा है कि उनके अपने निर्वाचन क्षेत्रों के हाल उनके कानों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।

स्पष्ट रूप से कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर निरंतर हमले की विपक्षी रणनीति मतदाताओं के दिमाग को प्रभावित करने लगी है, मतदाताओं की बहुत ही आम प्रतिक्रिया है कि “बिना आग के धुआँ नहीं उठता”। प्रधानमंत्री मोदी पर बार-बार चलकर जाने की विपक्षी रणनीति भाजपा को चोट पहुँचाने लगी है।

तमाम राजनीतिक तफ़सीलों को हवाओं में उड़ा दिया गया है और विपक्ष के लिए प्रधानमंत्री मोदी मतलब “अर्जुन के लिए मछली की आँख” की तरह है। उन्हें भ्रष्ट से लेकर बिच्छू और हिटलर से लेकर एनाकोंडा तक न जाने क्या-क्या कहकर बुलाया जा चुका है और विपक्ष ने उनके लिए किताब का कोई नकारात्मक विशेषण बकाया नहीं रखा है।

अधिकांश विपक्षी नेता अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री पर हमला बोलने का इरादा योग्य है, जिन्हें वर्तमान समय के सबसे कद्दावर नेता के रूप में देखा जा रहा है। वे इसे लेकर भी निश्चिंत नहीं हैं कि वे किस विषय का आधार लेकर हमले कर सकते हैं।

तथाकथित महागठबंधन अपने तरीके से चलते हुए लगता है अपने पागलपन की कगार तक पहुँच गया है। हालाँकि उनके द्वारा बार-बार किए जाने वाले हमले मतदाताओं तक पहुँच रहे हैं, तथापि मतदाता इस कथा को स्वीकार करेंगे या नहीं, यह अब भी काफ़ी अस्पष्ट है।

हालाँकि, क्या असल में कोई महागठबंधन है?

क्या सीपीआई (एम) और तृणमूल काँग्रेस या समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे पूरी तरह से भिन्न विचारधारा वाले राजनीतिक दल वास्तव में किसी साझा मंच पर आ सकते हैं? क्या वे कभी भी आम आर्थिक एजेंडे और शासन की भ्रष्टाचार मुक्त प्रणाली पर सहमत हो पाएँगे?

भारत के चतुर मतदाता पहचानते हैं कि उनके सामने ऐसी स्थिति नहीं हो सकती जब राजनेता भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी के साथ संगीत कुर्सी का खेल खेलें और जिसके प्रमुख खिलाड़ी मायावती, ममता बनर्जी, राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और चंद्रबाबू नायडू हो।

हर कोई स्वीकार कर रहा है कि अगर मोदी को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलता है तो वह बड़ी आपदा होगी क्योंकि राजनीतिक दलों की भीड़ में नियमित आवर्तन पर हर साल एक नया प्रधानमंत्री मिलने के विकल्प की डरावनी आशंका है। हर 12 महीने में नया प्रधानमंत्री और संभावित रूप से पूरी तरह फिर नए संशोधित मंत्रिमंडल की कल्पना तक करना भयानक है!

काँग्रेस जानती है कि अगले चुनावों के बाद तक जीवित बने रहने के लिए उनका एकमात्र आसरा आक्रामक होना है। भाजपा पर हमला करने के लिए मंदिर दर्शन और नर्म हिंदुत्व के अलावा राहुल गाँधी छत्तीसगढ़ में शराब पर प्रतिबंध लगाने के लिए ऋण छूट देने का वादा करने तक कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।

उनके हमले आम तौर पर आरएसएस, राफेल, विमुद्रीकरण, घोर पूंजीवाद, जीएसटी और गैर-निष्पादित संपत्ति के आसपास केंद्रित होते हैं। आरएसएस पर हमला हास्यास्पद है। आरएसएस से जुड़े तमाम लोग राहुल गाँधी जो भी आरोप लगाते हैं, उनमें से किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। वे जो आरएसएस से न भी जुड़े हैं, वे भी इस बात से सहमत हैं कि हिंदू कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकते हैं। क्या आम मतदाता को पता भी है कि राफेल सौदा है क्या?

क्या कोई भी वास्तव में राहुल गाँधी द्वारा उठाए गए भ्रष्टाचार के मामलों पर विश्वास करता है, क्योंकि वे अपने भाषणों में अपनी सहूलियत से एक बार एक बात कहते हैं फिर ठोकर लगने पर दूसरी गलती करते हैं। क्या यह ऐसा ही नहीं कि कोयले की कोठरी में रहने वाला कहे कि काजल काला है? चुनावों को लेकर काँग्रेस की रणनीति क्या है सिवाय मोदी को गाली देने और भ्रष्टाचार के ढेरों अस्तित्वहीन आरोप लगाने के?

क्या राहुल गाँधी अब न केवल काँग्रेस की बल्कि महागठबंधन की भी बड़ी देयता नहीं बन गए हैं? क्या काँग्रेस के भीतर का असंतोष उसके नेताओं को एक दिशा में एक साथ खींचने में सक्षम होगा? क्या राहुल गाँधी की सावधानीपूर्वक बनाई गई योजनाएँ तेजी से अलग-थलग हो रही हैं क्योंकि वास्तव में कोई भी उन पर या उनकी क्षमताओं पर भरोसा नहीं कर रहा है।

क्या राहुल गाँधी चुनावी खेल में बहुत जल्दी “मुरझा” रहे हैं और क्या उनके तरकश वर्ष 2019 की पहली तिमाही के अंत तक कमान पर चढ़े तीरों से भरे होंगे या वे पहले से चलाए गए या बोथरे तीरों का इस्तेमाल करेंगे?

सरकार द्वारा लिए गए हर निर्णय की काँग्रेस के नेताओं और उनसे जुड़े उन पत्रकारों द्वारा बार-बार पड़ताल की जाती है जिन पत्रकारों को भाजपा ने पिछले 4 सालों में छोड़ दिया है। जैसे-जैसे चुनाव पास आएँगे यह चढ़ाई और जोर पकड़ेगी। यह स्थिति लगभग इस तरह दिखती है जहाँ राहुल गाँधी और उनकी टीम हर दिन अख़बारों के पन्ने पलटती है और “चटपटे जायके” की तरह मसाला खोजती है कि कैसे हमला किया जा सकता है।

भाजपा प्रवक्ताओं का इन हमलों पर कोई जवाब सुनने में नहीं आता है गोयाकि वे अपने डेसीबल स्तर और तिज़ारती हमले को बढ़ाने की कोशिश करें और उससे भी बढ़कर यह कह दें कि, “ठीक है, पर वे भी तब ऐसा कर सकते थे, जब वे सत्ता में थे”।

भाजपा मोदी के मजबूत नेतृत्व तले विकास करने और भ्रष्टाचार को हटाने के मंच पर सत्ता में आई। पिछले 54 महीनों में कई ठोस विकास कार्य हुए हैं और बचाव करने के बजाय सफलताओं पर जोर देना अधिक महत्वपूर्ण है।

ऐसे में यह सवाल पूछा जाना लाज़मी है कि क्या यह सारा मोदी विरोधी प्रचार और शोर भाजपा के पीछे खड़े हिंदू वोट को मजबूत करने के लिए हैं क्योंकि कोई भी मोदी के खिलाफ लगाए जाने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों पर वास्तव में विश्वास नहीं कर रहा है?

तब भी, भाजपा इससे जुड़े सभी सकारात्मक पहलुओं का लाभ उठाने में सक्षम नहीं दिख रही है और विपक्षी नेताओं के गिरोह द्वारा बनाए झमेलों में उलझी हुई है, जिनका एकमात्र लक्ष्य है- हर कीमत पर जीत हासिल करना, फिर परिणाम भले ही कुछ भी हो।

भाजपा केवल यह उम्मीद कर सकती है कि विपक्षी रणनीति की धार बहुत जल्दी ख़त्म हो जाएगी क्योंकि ख़ुद के कहे का विरोधाभास न करते हुए बार-बार झूठ बोलते रहना काफी कठिन होता है।

राजनीति और चुनाव महज़ धारणाओं के खेल हैं।

भ्रष्टाचार वह विषय है जिसे भारतीय मतदाता समझते हैं और तुच्छ मानते हैं। भाजपा ने स्थापित किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश में भ्रष्टाचार को काफी कम कर दिया है।

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनाव क्या वास्तव में वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में क्या हो सकता है उस संभावना की ओर इशारा करते हैं? लोकसभा चुनाव अभी 6 महीने दूर हैं। विभिन्न समाचार चैनलों द्वारा की जा रही मतदाताओं की गणना के बहुत ही विविध परिणाम आ रहे हैं और हम जानते हैं कि ये परिणाम अगले कुछ महीनों में बदलते रहेंगे।

जैसा कि कहा जा रहा है, देश को विकास की आवश्यकता है और मतदाताओं की उनके नेताओं से यही उम्मीद है। लेकिन 5 साल की अवधि में जो विकास हुआ है वह चुनाव में जीत नहीं दिलवा पाता है। पिछले कुछ दिनों में चुनाव में जीत या हार इस पर निर्भर हो रही है कि सीमांत मतदाता क्या तय कर रहे हैं।

धारणाएँ, झूठ और भ्रष्टाचार के आरोप मतदाताओं के दिमाग में संदेह पैदा करते हैं और उसका तुरंत जवाब देने और बड़े पुरज़ोर तरीके से जवाब देने की आवश्यकता होती है जैसे कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने व्यापमं मामले में किया था, जिसके बाद राहुल गाँधी को अपना बयान वापस लेना पड़ा था।

भ्रष्टाचार के आरोपों पर चुप रहना या जवाब देने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना झूठ को मजबूत करता है और मतदाता मौन के कारण पर सवाल पूछने लगते हैं।

अगले कुछ महीनों में भाजपा की किस्मत अच्छी नज़र आ रही है, जो तेल की कीमतों में गिरावट के साथ शुरू हो रही है। अच्छी बारिश और किसानों के हाथों में अधिक पैसा कहानी को अचानक भाजपा के पक्ष में कर देगा। भाजपा को अब यह भी करना होगा कि उसके नेताओं को शहरों, स्थानों और तत्सम विषयों के नाम बदलने जैसे विविधीय विषयों की बात करना बंद करना होगा, जिससे कहानी में भटकाव आए और उसे विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे से दूर ले जाएँ।

सत्तारूढ़ दल को हमेशा विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और विपक्ष जानता है कि हवा उसी दिशा में बह रही है, जिस ओर उसकी नाव जा रही है। इस पड़ाव पर अब उत्तरों से अधिक प्रश्न हैं।

हालाँकि स्पष्ट है कि भाजपा को अपनी कथा बदलने की और शीघ्रताशीघ्र बदलने की जरूरत है। जो भी मौलिक परिवर्तन किए गए हैं, उन सभी के परिणाम अगले पाँच वर्षों में देखे जा सकेंगे।

भाजपा के लिए यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण ” जीतना ही होगा” जैसा है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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राफेल के साथ राहुल गाँधी और उनकी काँग्रेस कहाँ जा रही है?

 

181116 Rahul and Rafale

आख़िर ऐसी क्या वजह है कि जिसके चलते राफेल पर राहुल गाँधी अपने तथाकथित राजनीतिक करियर के साथ सबकुछ दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं?

मुझे यकीन है कि राजनेता होने के नाते वे जानते होंगे या उन्हें इस बात की सलाह भी दी गई होगी कि उन्हें सारे तीर एक ही तरक़श में नहीं रखने चाहिए। मतदाताओं के बीच उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता हमेशा कम ही रही है और ससंद में और संसद के बाहर भी वे गड़बड़ करते नज़र आए हैं और सोशल मीडिया पर तो वे लगातार मंडराते ही रहते हैं। ऐसे में मुझे हैरत होगी यदि उन्हें इस बारे में कुछ पता न हो।

आगामी प्रादेशिक और लोकसभा चुनावों में व्यक्तिगत रूप से उनका बहुत कुछ दाँव पर लगा है। यदि कर्नाटक की बात छोड़ दे तो काँग्रेस ने राहुल गाँधी के नेतृत्व में लगभग हर चुनाव में मुँह की खाई है और कर्नाटक में भी सरकार बनाने के लिए गठबंधन सहयोगी का समर्थन लेना पड़ा और सहयोगी दल को गठबंधन के नेता के रूप में स्वीकार करने पर सत्ता मिल पाई। निश्चित ही अपनी शिकस्तों को काँग्रेस पार्टी पूरी तरह से अलग परिप्रेक्ष्य में पेश करेगी और केवल कुछ उप-चुनावों में मिली जीत की बात करती है।

मंदिर यात्राओं के दौरान किताब में और नर्म हिंदुत्व को दर्शाते हुए अपनी पहचान हिंदू समुदाय के साथ एक ओर तकनीकी तौर पर “जेनऊ धारी” के रूप में करने की वे हर संभव कोशिश करते हैं और दूसरी ओर सरकार के हर कदम पर सवाल उठाते हैं। ख़ास तौर पर जो विस्मित करती है, वह है उनकी असंसदीय (अशोभनीय) भाषा, जो चुनावों के करीब आने के साथ और अधिक से अधिक विशेषण एकत्रित करती प्रतीत होती है।

बात करने के लिए बहुत कम मुद्दे हैं, पिछले पूरे 4 वर्षों में भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा सामने नहीं आया है और सरकार के कई महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलावों के चलते कोंसने का कोई मौका नहीं मिल रहा है, ऐसे में राहुल गाँधी और उनके दल-बल ने राफेल मुद्दे को एकल बिंदु एजेंडे के रूप में उठा रखा है। इसी के साथ, उन्होंने प्रधान मंत्री मोदी को व्यक्तिगत तौर पर लक्षित करने का फैसला कर लिया है क्योंकि उनका मानना है कि अगर वे मोदी को चोट पहुँचाते हैं, तो वे अपने आप भारतीय जनता पार्टी को भी चोट दे सकेंगे।

राफेल विमान खरीद पर राहुल गाँधी के तर्क उदात्त से हास्यास्पद हो रहे हैं। उनकी उकताहट भरी टिप्पणियों को शेष वरिष्ठ काँग्रेस नेता पूरी वफ़ादारी से तोता पढंत की तरह दुहरा रहे हैं, क्योंकि एक बार उनके “राजकुमार” ने बात कह दी, तो उनके पास उसके अनुपालन, दोहराव और बचाव के अलावा अन्य कोई विकल्प बचता नहीं है। वरिष्ठों के सामने लगाए गए आरोपों को सत्यापित करने का कोई ठोस मार्ग नहीं है, पर उनकी पूरी रणनीति किसी भी तरह मतदाताओं के दिमाग में संदेह के बीज बोने की है।

श्री गाँधी का विश्वास निश्चित रूप से इस दर्शन पर हैं कि वे यदि कोई आरोप लगाकर लंबे समय तक रोना-गाना करते हैं, कीचड़ उछालते हैं तो थोड़ा-बहुत कीचड़ तो ज़रूर चिपकेगा। उनका मानना है कि उनके अपने परिवार और पार्टी की ख़राब आर्थिक ख़्याति के चलते जहाँ उनका हर कदम कीचड़ में धँसा है, प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे बेतुके आरोपों से कलंकित हो सकते हैं। वे पहचानते हैं कि उनके और उनके परिवार को मुक्ति केवल तभी मिल सकती है, जब वे किसी भी तरह मतदाताओं को यह मनवा देते हैं कि मोदी और सत्तारूढ़ दल भी “भ्रष्ट” हैं!

विपक्षी पार्टियों में से अब लगभग मृत प्राय: सीपीआई (एम) को छोड़कर अन्य कोई भी इस मामले को उठाने का फैसला नहीं कर रहा है क्योंकि राहुल गाँधी के तर्क में किसी को भी कोई औचित्य नहीं दिख रहा है।

श्री गाँधी किसी पौराणिक अनुबंध की चीर-फाड़ करते रहते हैं कि यूपीए सरकार ऐसे कोई हस्ताक्षर करने की योजना बना रही थी लेकिन किए नहीं। वे यह तुलना इसलिए करते हैं कि मानो ऐसा कोई अनुबंध एनडीए सरकार द्वारा पहले से ही निष्पादित किया गया हो और उनकी सरकार ने उस पर काम किया था। उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि यूपीए सरकार के 10 वर्षों में इस पर हस्ताक्षर क्यों नहीं हुए थे? क्या कांग्रेस इस सौदे से पैसे कमाना चाहती थी, जैसे बोफोर्स मामले में किया था लेकिन संतोषजनक सौदा करने में असमर्थ रहे थे?

विशेषज्ञों के तार्किक तर्कों का मतलब उनके लिए कुछ भी नहीं है। सरकार द्वारा विस्तृत स्पष्टीकरण प्रदान किए जा चुके हैं, लेकिन उन्हें राहुल गाँधी और उनके वफादार प्रवक्ताओं ने बड़ी तत्परता से खारिज कर दिया। श्री गाँधी मनमोहन सिंह की अगुवाई में अपनी ही सरकार द्वारा बनाए कानून को खत्म करने में लगे थे, तब उनसे सत्ताधारी पार्टी के शब्दों पर विश्वास करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है!

रक्षा मंत्री के वक्तव्य का मतलब उनके और उनकी पार्टी के लिए कुछ भी नहीं है। डेसॉल्ट के सीईओ श्री एरिक ट्रैपियर द्वारा दिए गए वक्तव्यों को धांधली माना जा रहा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति के वक्तव्य को तज दिया गया है और प्रेरित बताकर परे कर दिया गया है। वे अपने आपके अलावा किसी पर भी विश्वास नहीं करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि कीमत पर चर्चा नहीं की जाएगी और श्री गाँधी ने अदालत के मजबूत प्रतिशोध से डरते हुए बुद्धिमानी दिखाकर इस मामले में चुप रहने का विकल्प चुना है और सम्माननीय न्यायालय के विचारों पर आक्षेप नहीं किया है।

उनके पास अनुभव और समझ की बेहद कमी है और वे किसी भी कीमत पर प्रधान मंत्री बनने की अपक्व महत्वाकांक्षा रखते हैं, इसका प्रदर्शन हो चुका है। राफेल के सभी ब्योरों का खुलासा पड़ोसी देशों के साथ करने में भी उन्हें कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस सौदे में कुछ तो ऐसा है जो शायद छिपाया गया है। फिर भले ही देश की सुरक्षा भाड़ में जाए।

श्री गाँधी बहुत ही हताश स्थिति में हैं। अपनी पार्टी की कमजोर स्थिति के चलते उन्हें चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी नेताओं को साथ लेना होगा, पर वे महागठबंधन के नेतृत्व की चाहना करते हैं।

यदि काँग्रेस पार्टी तथाकथित महागठबंधन पर सवार होकर भी सत्ता में नहीं आती है, तो यह मानना मुश्किल नहीं होगा कि काँग्रेस पार्टी के अन्य सक्षम नेता उभरने लगेंगे और श्री गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाएँगे। काँग्रेस का विघटन हो सकता है या नेताओं के अन्य समूह के साथ अहम पुनर्गठन का दौर चल सकता है।

काँग्रेस पार्टी अपने भीतर होने वाले इस तरह के विनाशकारी परिवर्तनों से परिचित है।

आखिरकार, श्री राहुल गाँधी की दादी श्रीमती इंदिरा गाँधी ने भी वर्ष 1969  में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को विभाजित कर काँग्रेस (इंदिरा) के उस पार्टी के अग्रदूत का गठन किया था, जिसका नेतृत्व आज श्री गाँधी के पास है। मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम, पी.वी. नरसिम्हा राव और ऐसे ही तमाम अन्य लोगों के नाम अब कहाँ हैं, जिन्हें पार्टी से बाहर फेंक दिया गया और भूला दिया गया।

राहुल गाँधी लंबे समय से “भेड़िया आया-भेड़िया आया” चिल्ला रहे हैं और अब यह केवल कुछ समय की बात है, उसके बाद मतदाता उनकी किसी भी बात पर विश्वास करना बंद कर देंगे। जैसे कि पुरानी कहावत है, श्री गाँधी भी कुछ लोगों को हर बार मूर्ख बना सकते हैं या वे कुछ देर के लिए सभी लोगों को मूर्ख बना सकते हैं लेकिन वे निश्चित रूप से हर बार सभी को मूर्ख नहीं बना सकते!

श्रीमती सोनिया गाँधी ने हाल ही में जिस नेहरू विरासत की बात की थी क्या राहुल गाँधी उसकी आखिरी कड़ी है?

क्या राफेल की इस तरह की एक और कथा बन जाएगी जो कहे  “राजकुमार के पास पहनने के लिए कपड़े नहीं है”?

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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