सेवानिवृत्ति के बाद कहाँ रहना चाहते हैं?

2. Reboot. Reinvent. Rewire Managing Retirement in the Twenty First Century

सेवानिवृत्ति के फैसले के साथ क्या आपने यह फैसला भी कर लिया है कि उसके बाद आप कहाँ रहना चाहेंगे?

क्या आपने अपना घर पहले ही खरीद रखा है? या आप सेवानिवृत्ति के करीब आते ही घर खरीदने की योजना बना रहे हैं? या आप उन व्यक्तियों में से हैं जो घर के स्वामित्व में विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि उसे किराए पर देते हैं और अपनी संपत्ति के किराये की उपज को देखना पसंद करते हैं? मैंने दर्जनों लोगों से बात की लेकिन मुझे इस बारे में कोई स्पष्ट प्रवृत्ति देखने नहीं मिली कि सेवानिवृत्ति के बाद आगे का जीवन लोग कहाँ बिताना पसंद कर रहे हैं और उनकी सोच क्या है।

यह बहुत ही व्यक्तिगत निर्णय है और मैंने ऐसे कई जोड़ों से भी बात की जिन्होंने अपने बच्चों के साथ इस पर विचार-विमर्श किया है। मैंने कई लोगों को यह निर्णय लेने में संघर्ष करते देखा है। ऐसे जोड़ों के साथ चर्चा के दौरान मुझे यह चर्चा बहुत विवादपूर्ण मुद्दा लगी। कई पुरुष अपनी जड़ों की ओर वापस जाना चाहते थे, उस जगह, जहाँ उनके माता-पिता थे या जहाँ वे पैदा हुए थे या वे राज्य थे जो उनके विस्तारित परिवार द्वारा प्रदान किए गए समर्थन नेटवर्क के थे।

महिलाएँ उस जगह पर रहना चाहती थीं, जहाँ वे सबसे लंबे समय तक रहे थे क्योंकि यह वह जगह थी जहाँ उनके दोस्त थे। क्या आपका उन दोस्तों का समूह है जो आपके हमउम्र है? जो हालिया सेवानिवृत्त हुए हैं या सेवानिवृत्त होने वाले हैं? यदि नहीं, तो आप अपने व्यस्त मित्रों के जीवन में दखल देने लगेंगे जो अभी भी कार्यरत हैं तो इससे पहले कि आप कुछ समझ पाएँ, आपके अपमानित होने की आशंका है।

कुछ युगल जहाँ उनके बच्चे रहते हैं, वहीं जाने का विकल्प चुनते हैं और जल्द ही निराश हो जाते हैं क्योंकि उनके बच्चों के पास माता-पिता के लिए उतना समय नहीं होता है जितना उन्हें देना चाहिए होता है या माता-पिता उनसे चाहते हैं। अधिकांश माता-पिता भूल जाते हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता को कितना समय दिया था लेकिन अपने बच्चों से अनुचित अपेक्षाएँ करने लगते हैं।

याद रखें कि आपकी सेवानिवृत्ति के बाद की संवेदनशील मानसिकता वाली स्थिति में, आपको ऐसे ही लोगों के साथ रहने की जरूरत है जो आपके जैसे ही दौर से गुज़र रहे हैं और जो आपको समझेंगे और न कि आप जो हैं और आपके पास जो है, उससे आपको आँकें।

जब आप सेवानिवृत्ति के बारे में सोचते हैं, तो क्या आप समुद्र तट पर, किसी पहाड़ पर, या किसी रिसॉर्ट में रहने या पूजा स्थल पर जाने की कल्पना करते हैं? बहुत से लोग तय करते हैं कि जब वे सेवानिवृत्त हो जाएँगे, वे घूमने जाएँगे। लेकिन यह चुनना कि आपको कहाँ रहना है, यह तय करने से कुछ अधिक है कि आप समुद्र तटों को पसंद करते हैं या पहाड़ों को। वास्तव में, बहुत से लोग अपनी सेवानिवृत्ति की सबसे बड़ी गलती यह तय करने में करते हैं, कि उन्हें कहाँ रहना है।

एक बार जब आप यह तय कर लेते हैं कि कहाँ रहना है और अगर यह वह शहर नहीं है जहाँ आप अब तक रहते आए थे, तो नई जगह का पूर्व परीक्षण कर लें। यदि संभव हो, तो उस स्थान पर छह महीने से एक वर्ष के लिए घर किराए पर लें। यदि आपके प्रस्तावित गंतव्य पर जाने में कुछ सप्ताह का समय है तो आप हर स्थिति का प्रबंधन कर सकते हैं, आप वर्ष के दौरान अलग-अलग समय पर वहाँ जाकर देख सकते हैं। आप जितनी बार वहाँ की यात्रा करेंगे, आप अधिक सही तरीके से समझ पाएँगे कि सेवानिवृत्ति के स्थान की अपनी पसंद के साथ आप पूरे साल ख़ुश रह सकते हैं या नहीं।

यात्रा करेंगे, आप उतने ही सटीक तरीके से आकलन कर पाएँगे कि आप अपनी सेवानिवृत्ति के बाद पसंद के साथ साल भर खुश रहेंगे या नहीं।

आपने अपने घर के लिए अच्छा-खासा धन निवेश करेंगे तो आप यह सुनिश्चित करना चाहेंगे ही कि आप सही निर्णय ले रहे हैं।

अवकाश स्थल पर जाना

अपने सपनों वाले अवकाश स्थल पर पूरे साल रहना फंतासी हो सकती है लेकिन यह आपकी छुट्टियों का विस्तार नहीं हो सकता है। कहीं भी आप जब केवल दो सप्ताह की छुट्टी पर जाते हैं, तो आप वहाँ की केवल उन सभी सकारात्मकताओं को देखते हैं, जिन्हें आप देखना चाहते हैं और उस स्थान के नकारात्मक पहलू पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। क्या वहाँ का ‘ऑफ़-सीजन’ मौसम सहनीय होता है?

यदि आप “बड़े शहर” में रहने वाले युगल हैं, तो क्या आप अपने अवकाश गंतव्य के ‘पीक सीज़न’ के बाद के ‘ऑफ़-सीजन’ में भी वहाँ रह सकते हैं, जहाँ आपके साथ मिल-बैठने के लिए कुछ स्थानीय निवासियों के अलावा कोई नहीं होगा? हमारे कई दोस्तों के बारे में हमें पता है कि जिन्होंने गोवा में बसने का फैसला लिया है, जबकि कुछ मनाली और कूर्ग के बारे में सोच रहे हैं। कुछ और साहसी दोस्त इटली, स्पेन, थाईलैंड, मलेशिया और यहाँ तक कि मकाऊ में भी घर लेने पर विचार कर रहे हैं। दो या अधिक घरों की देखरेख करना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है।

ऐसा निर्णय लेते समय खुद से अवश्य पूछिए कि क्या वहाँ ‘ऑफ़ सीजन’ के महीनों में भी पर्याप्त सुविधाएँ, सेवाएं और गतिविधियाँ होती हैं? साथ ही क्या आप उन महीनों को बर्दाश्त कर सकते हैं जब पर्यटक आपके शहर पर हावी हो जाते हैं?

सह-स्वामित्व

कई शहरों में कॉन्डोमिनियम कॉम्प्लेक्स (सह-स्वामित्व) के निर्माण के साथ, बड़ी तादाद में लोग स्वतंत्र घरों में रहते हुए भी सामुदायिक जीवन को आसान और रोज़मर्रा की झंझटों से दूर बना पा रहे हैं। जहाँ उपयोगिताओं और सुरक्षा जैसी सामान्य सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है और पड़ोसियों का एक बड़ा समुदाय होता है जिनके साथ आपका संभावित दोस्तों का “पूल” बन सकता है।

यहाँ तक कि अगर केवल आप और आपका जीवनसाथी किसी अपार्टमेंट में जाने पर विचार कर रहे हैं, तो ऐसा लें, जिसमें कम से कम तीन बेडरूम हों। आप भी चाहेंगे कि जब आपके बच्चे, नाती-पोतों और दोस्तों के आने-जाने पर उनके लिए जगह रहे, और आपको अतिरिक्त भंडार की जगह, काम करने की जगह, या यहाँ तक कि एक कार्यालय भी लग सकता है जहाँ आप अतिरिक्त आय के लिए काम करना जारी रखना चाहते हो।

उस शहर में बसना जहाँ आपके दोस्त हैं

स्थान की पसंद को प्रभावित करने वाला सामान्य धागा मित्र है। अधिकांश दंपत्तियों ने वहाँ रहना तय किया था कि उनके दोस्त हैं। ये वे लोग थे जिनके साथ वे अपने जीवन के शेष तीन विषम दशक बिताना चाहते थे।

हालाँकि, दोस्तों का बड़ा नेटवर्क होना आपकी नई अवस्थिति में आपकी खुशी के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन आप दोस्तों की देखादेखी करने का फैसला लेने से पहले अन्य कारकों जैसे कि रोजगार और रहने की लागत को अनदेखा न करें। मैं बैंगलोर के कुछ जोड़ों से मिला हूँ, जिन्होंने अपने दोस्तों की वजह से दिल्ली में बसने का फैसला किया, लेकिन जैसे-जैसे वे उम्रदराज़ होते गए, अपने परिवार के साथ वापस आने का आग्रह दोस्तों के साथ रहने की उनकी जरूरत से ज्यादा था। मैं एक ऐसे जोड़े से भी मिला, जो माता-पिता के साथ रहने के लिए दिल्ली गए थे, लेकिन जब माता-पिता का निधन हो गया, तो उनके पास शहर में कोई अन्य बंधन नहीं बचा था क्योंकि उनके सारे दोस्त चेन्नई में थे, वे यहाँ खुद को पूरी तरह बाहर का पा रहे थे।

सुनिश्चित करें कि आप अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं को जानते हैं। यदि आप किसी ऐसे स्थान पर जाने का निर्णय ले रहे हैं, जहाँ आपके मित्र रहने गए हैं तो पहले यह समझ लें कि उन्होंने उस स्थान पर जाने से पहले वहाँ जाने का निर्णय क्यों लिया।

आपको हैरानी हो सकती है कि उनके कारण आपके कारणों से बहुत भिन्न हैं और वे आपके लिए उतनी बार उपलब्ध नहीं हो सकते हैं जितनी बार आप चाहेंगे कि वे रहे।

सेवानिवृत्ति समुदाय

एक ओर जहाँ पश्चिम में “वृद्धाश्रम” या “सहायताप्राप्त सजीव समुदाय” आम हैं और लोग सक्रिय रूप से ऐसे समुदाय की तलाश करते हैं जिसमें वे रहना चाहते हैं, पर दूसरी ओर भारत में ऐसे विकल्प अभी-अभी दिखाई देने लगे हैं।

अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने की संभावना के बारे में हममें से अधिकांश पूर्ण रूप से समझ नहीं पाते हैं क्योंकि भारत में इसके साथ सामाजिक कलंक जुड़ा है। इसलिए, जब हम अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की योजनाओं को बनाने के बारे में सोचते हैं, तो यह हमारी योजनाओं में आसानी से नहीं होता है।

हालाँकि, घरेलू सहायता प्राप्त करने में कठिनाइयों की नई वास्तविकता को देखते हुए और यह तथ्य समझते हुए कि हममें से अधिकांश के बच्चे या तो किसी दूसरे शहर या किसी अन्य देश में अपने जीवन में व्यस्त हैं, तो जिस शहर को हमने रहने के लिए चुना है, उस शहर में सेवानिवृत्ति समुदाय में घर खरीदना कोई बुरा विचार नहीं है।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।

 

 

इमरान खान – अतिवादी राजनीतिज्ञ या सामान्य क्रिकेटर?

United Nations: Pakistan Prime Minister Imran Khan addresses at the 74th United Nations General Assembly (UNGA), at United Nations on Sep 27, 2019. (Photo: IANS)

United Nations: Pakistan Prime Minister Imran Khan addresses at the 74th United Nations General Assembly (UNGA), at United Nations on Sep 27, 2019. (Photo: IANS)

संयुक्त राष्ट्र महासभा सप्ताह समाप्त हो चुका है, और अब पाकिस्तान के चयनित प्रधानमंत्री, इमरान खान की नाट्य तकनीक (थियेट्रिक्स) का विश्लेषण किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इमरान खान के भाषण में दिखाई दी मायूसी, शेखी और परमाणु खतरे की खुली धमकी बेमिसाल है, जिसकी हर कोई निंदा कर रहा है।

इमरान खान का असली एजेंडा क्या था और वे किस बारे में बात करना चाह रहे थे? वे अपने प्रलापमय भाषण में किसे संबोधित कर रहे थे? वाक्पटुता का नमूना देता उनका भाषण गंदगी से भरा था, वे बेहद हताशा और गुस्से में गालियाँ बक रहे थे। किसी ने श्री खान के भाषण का सार प्रस्तुत किया तो उसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी का नाम 12 बार लिया था, कश्मीर का 25 बार, आतंकवाद का 28 बार और इस्लाम का 71 बार उल्लेख किया था! हत्याकांड जैसे शब्दों का प्रयोग तो पूरी तरह अस्वीकार्य है।

पाकिस्तान के नेताओं और काँग्रेस दल ने अनुभव किया है कि जब कुछ भी काम नहीं करता हो, तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) पर दोष मढ़ दो। चूँकि श्री खान और उनके आगे-पीछे घूमने वाले आरएसएस द्वारा किए जा रहे कामों के बारे में कुछ नहीं जानते-समझते, ऐसे में उनके द्वारा संयुक्त राष्ट्र में आरएसएस का मामला उठाना बहुत ही हास्यास्पद था। भारत में काँग्रेस दल के नेताओं से वे जो सुनते हैं वे केवल उसे ही तोता ज़ुबानी उगल देते हैं।

हिटलर और मुसोलिनी की बात करना और उनकी तुलना आरएसएस से करना और उनका संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रभामंडल वाले मंच से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इसके बारे में चेतावनी देना, विश्व के अधिकांश नेताओं पर इसका बहुत दीन प्रभाव पड़ा। सभी को इसका बहुत आश्चर्य हुआ कि किसी देश का प्रधानमंत्री उसे दिए समय में उन्मत्त होकर अनर्गल प्रलाप कर रहा था और दुनिया को धमकाते हुए मदद की गुहार लगा रहा था!

जिहाद में लिप्त आतंकवादियों को पाकिस्तान में सेना के समर्थन को खान सरेआम प्रोत्साहित करते हैं और उसे सही भी बताते हैं, इतना ही नहीं आतंकवादी संगठनों को अनुमति देने और बढ़ावा देने की बात करते हैं और इसलिए पाकिस्तानी सेना भारत में आतंकवादी भेजना शुरु करती है। साथ ही वे निष्पक्ष अपील भी करते हैं कि कैसे इस्लाम शांति वाला धर्म है और कैसे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का सबसे बड़ा पीड़ित पाकिस्तान है।

अरबी भाषा के शब्द जिहाद का शाब्दिक अर्थ है प्रयास करना या संघर्ष करना, खासकर उत्तम लक्ष्य के लिए कोशिश करना, लेकिन वही कब आतंकवाद, विनाश, बदला और मृत्यु का पर्यायवाची शब्द हो गया?

रोचक बात यह है कि जिस तरीके से श्री खान ने इस्लाम के विश्व नेता पद को अपनी ओर करने की कोशिश की और जब वे उसे समझा रहे थे, उनका स्वर बड़ा हताश था कि कैसे इस्लाम का पालन करने वाला तब अपमानित महसूस करता है जब दुनिया उनके धर्म के ख़िलाफ़ कुछ कहती है। यह दीगर बात है कि जो उनकी बात में विश्वास नहीं करता उसे वे काफ़िर कह देते हैं। उन्होंने एक भी बार यह नहीं कहा कि जो धर्म का पालन करते हैं उन्हें अपने में कोई बदलाव लाना चाहिए। उन्होंने बड़ी आसानी से 9/11 की समस्या का पूरा दोष अन्य समस्याओं और उसके बाद पूरी दुनिया पर डाल दिया। उन्होंने कट्टर इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्दों के इस्तेमाल की कड़ी निंदा की, लेकिन एक बार भी यह नहीं कहा कि जिहादियों पर लगाम कसने की जवाबदारी उनके जैसे नेताओं पर ही है।

एक दिन पहले उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी में बिलकुल ऐसा ही भाषण दिया था जैसा उन्होंने महासभा में दिया और उनके प्रति निष्पक्ष रहकर कहा जाए तो उन्होंने ही बताया कि एशियाटिक सोसाइटी का उनका भाषण अभ्यास भाषण था। कश्मीर, इस्लाम को छोड़ दिया जाए तो उनके पास कहने और दुनिया को धर्म के प्रति कितना कुछ करने की आवश्यकता है, इस बारे में बताने के लिए नया कुछ नहीं था।

उससे पहले की इमरान खान की अपनी तस्बीह (सुमिरनी माला) के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प से बात करते हुए की तस्वीर बड़ी विचारणीय है। उनकी देहयष्टि, उनके हाव-भाव में घबराहट बड़ी दूर थी। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हुए दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से यह उम्मीद लगाए थे कि कोई चमत्कार होगा। राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ उनकी पहली मुलाकात, जो सऊदी अरब के युवराज की अनुशंसा पर हुई थी, के बाद वे ऐसी कोई सकारात्मक टिप्पणी सुनने के लिए बेताब थे, जिसे वे “विश्व कप जीतने” की तरह अपने घर ले जा सके।

उन्होंने एक भी बार पाकिस्तान की अविश्वसनीय गरीबी, बिजली, पानी, ईंधन और खाद्य आपूर्ति की भारी कमी के बारे में बात नहीं की। उन्होंने अपने देश की अशिक्षा और बहुत खराब स्वास्थ्य रिकॉर्ड के बारे में बोलना उचित नहीं समझा। उन्होंने बलूचिस्तान की निर्लज्ज दलीलों और पाकिस्तान में अन्य दमित अल्पसंख्यकों की बात की उपेक्षा की। उन्होंने भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के चलते अपने देश के दिवालिएपन की बात नहीं की और ऐसे जताया जैसे भारत के वित्तीय कार्रवाई टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट किए जाने की संभावना ही दोषी हो।

इमरान खान खाली हाथ पाकिस्तान लौट गए। उनके समर्थक और बड़ी संख्या में पत्रकार उनकी भारत यात्रा से चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। उन्होंने उन्हें विश्वास दिलाया था कि धारा 370 रद्द करवाने के अलावा उन्हें अन्य कुछ भी स्वीकार्य नहीं होगा! न केवल उन्हें विश्व के नेताओं से कुछ मिला, जिनमें से कोई भी उनके एक शब्द तक पर विश्वास नहीं करता, इतना ही नहीं सऊदी अरब के जिस उधार के विमान पर सवार होकर वे गए थे उसने भी तकनीकी ख़राबी का हवाला देकर वापस ले जाने से इनकार कर दिया और उन्हें व्यावसायिक विमान से घर जाना पड़ा।

श्री खान को विमान उधार देते समय, सऊदी अरब ने भारत को आश्वासन दिया कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि भारत को तेल की किसी भी तरह की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। सऊदी अरब ने चोट के साथ अपमान को और जोड़ दिया है जिसके तहत हाल ही में उसने भारत में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश पैकेज की घोषणा की है। (श्री खान इसकी केवल 25% राशि पाने के लिए बड़ी राजी-ख़ुशी पूरा पाकिस्तान सऊदी अरब को बेच सकते हैं।)

इमरान खान को एक ही बार में पूरी तरह से आतंकवाद का खात्मा करने की ज़रूरत है लेकिन ऐसा करना अब कठिन है क्योंकि उन्होंने अपनी ताकतों के ही पर कतर दिए हैं। उन्हें अपनी सेना से सौदा करने की ज़रूरत है, जो अभी भी भुट्टो की भारत को “हजार घावों” से आहत करने की धमकी से प्रेरित लगती है। यदि सेना उनकी तरफ़ है तो उन्हें आतंकवाद के अपने कारखाने बंद करने की आवश्यकता है। इससे न केवल विश्व, बल्कि उनके अपने लोग भी राहत की साँस लेंगे, जो उनके ही द्वारा दिए जा रहे इन प्रवेशों से सबसे ज़्यादा पीड़ित है।

इमरान खान, अगर वास्तव में विश्व नेता के रूप में कद हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें पाकिस्तान के लोगों के लिए काम करना चाहिए। उन्हें अपने देश के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उस विश्वसनीयता को वापस लाना चाहिए, जिसमें तीन दशक पहले उनका देश, विश्व के साथ आनंद लेता था।

उन्हें भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करने और धमकी देने के बजाय भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। मददगार भारत उनके टूटे और दुर्बल देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है। व्यापार फिर से शुरू किया जाना चाहिए, और लोगों के बीच आपसी बातचीत में सुधार लाना चाहिए। सुरक्षित पाकिस्तान उन लाखों पर्यटकों के लिए दरवाजे खोल सकता है जो पाकिस्तान में घूमना पसंद करेंगे। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा।

केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पाकिस्तान ही राष्ट्रों के बीच सम्मानजनक स्थान पाने की उम्मीद कर सकता है।

क्या चुने गए प्रधानमंत्री इमरान खान को सेना द्वारा नचाया जा रहा है? या मुस्लिम विश्व के नेता उन्हें नचा रहे हैं? या कट्टरपंथी इस्लामी आंदोलन के नेता? या वे ऐसा प्लेबॉय है, जिसने क्रिकेट विश्व कप जीता और कैंसर अस्पताल बनाया? या तहरीक-ए-इंसाफ के नेता, जिनके बारे में पाकिस्तान ने सोचा था कि वह उन्हें पिछले नेताओं से मिली सभी चुनौतियों से मुक्ति दिलाएगा? या क्या वे केवल ” डूबो देने वाले (इम द डिम)” हैं , जैसाकि कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा उन्हें आमतौर से कहा जाता है?

क्या असली इमरान खान कृपा कर गिने जाने के लिए खड़े होंगे?

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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“हाउडी मोदी” का पुनर्निर्माण

190924 Howdy Modi 2

भारत के कतिपय विपक्षी नेताओं और पाकिस्तान के अमूमन सारे राजनेताओं और पत्रकारों को छोड़ दे तो हर कोई इस तथ्य को स्वीकार रहा है कि ह्यूस्टन टेक्सास में प्रधानमंत्री मोदी का भाषण, भारत के संदर्भ में बाजी पलटकर रख देने वाला है।

लगभग हर किसी ने प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बाद हुए डोनाल्ड ट्रम्प के भाषण के बारे में लिखा लेकिन लगता है किसी ने भी प्रधानमंत्री मोदी के प्रारंभिक भाषण पर कोई टिप्पणी नहीं दी, जिसके ज़रिए उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प का आह्वान किया था। आइए इन दो नेताओं ने जिन कई मुद्दों पर बात की उसके पुनर्पाठ से पहले श्री मोदी ने जो परिचय दिया, उससे शुरुआत करते हैं।

दो नेताओं ने मंच पर प्रवेश किया तब श्री ट्रम्प का हाथ श्री मोदी के कंधे पर था। यह तीसरा अवसर था जब वर्ष 2019 में थोड़े अंतराल के बाद वे मिल रहे थे और दोनों की ख़ुशमिज़ाजी उनके हाव-भाव से साफ़ झलक रही थी।

प्रधानमंत्री मोदी आगंतुक थे, न कि ह्यूस्टन, टेक्सास में मेजबान। राष्ट्रपति ट्रम्प के आगमन से पहले कई अमेरिकी नेताओं ने उनका परिचय दिया और उनका सम्मान किया। जैसे ही राष्ट्रपति का आगमन हुआ, श्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रम्प का परिचय देने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली, गोकि श्री मोदी ही उस कार्यक्रम के मेजबान हो। उनके द्वारा पूरी तैयारी के साथ दिया गया परिचय, राष्ट्रपति के चेहरे पर मुस्कान ले आया और जिन विभिन्न मुद्दों के बारे में श्री मोदी ने कहा उस पर राष्ट्रपति ने सहमति दर्शाई।

श्री मोदी ने वर्णन किया कि कैसे राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ उनकी पहली मुलाकात में उनका परिचय ट्रम्प परिवार से करवाया गया था और उन्होंने कहा कि अब उनकी बारी थी कि वे राष्ट्रपति का परिचय अपने परिवार से कराए और ऐसा कहकर वे स्टेडियम के सभी श्रोताओं से मुखातिब हुए और उन श्रोताओं को अपना परिवार बताया जिस पर सभी ने जोश-ख़रोश में जयकारे लगाए-“मोदी मोदी”। यह वास्तव में उसी बात का प्रतिनिधित्व कर रहा था जिसका जिक्र वे हमेशा भारतीय दर्शन के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (विश्व एक परिवार है) के रूप में करते हैं।

उनकी टिप्पणियों “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (अमेरिका को फिर महान् बनाया जाए)” और “अबकी बार ट्रम्प सरकार” को भारत के विपक्षी नेताओं ने ग़लत तरीके से समझा और ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया, ये वे ही लोग हैं जो बिना सोचे-समझे किसी भी बात को अपने पक्ष में करवा लेने की कोशिश करते हैं। इन लोगों ने अपनी सहुलियत से इस बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया कि श्री मोदी राष्ट्रपति ट्रम्प के वर्ष 2016 के चुनाव अभियान के संदर्भ में यह जिक्र कर रहे थे। श्री मोदी ने बड़ी सावधानी से इन शब्दों को ” उम्मीदवार (कैंडिडेट) ट्रम्प” के साथ रखा था। इस परिचय के समय श्री ट्रम्प और श्री मोदी साथ-साथ खड़े थे और इन शब्दों से उनका श्री ट्रम्प के साथ सुर एकदम जुड़ गया।

प्रधानमंत्री मोदी को साफ़-साफ़ पता था कि वे किस बारे में बोलने वाले हैं और जिस लाजवाब तरीके से उन्होंने तैयारी की थी और जो उनकी सोच थी, जिसे लेकर उन्होंने संवाद साधा था उसकी प्रशंसा हर कोई करेगा। एक ही भाषण में वे कई मतदाता वर्ग को संबोधित करते लग रहे थे:

  1. बड़ी तादाद में भारतीय अमेरिकियों ने उन्हें सुनने के लिए पाँच घंटे से अधिक समय तक इंतज़ार किया, उन 4 मिलियन भारतीय अमेरिकियों के साथ, जिन्होंने जबसे श्री मोदी को कद्दावर नेता के रूप में देखा है तब से उन्हें पूरा समर्थन दिया है, जो उनके देश, उनकी भूमि को लेकर उन्हें गौरवान्वित अनुभव कराता है।
  2. उनके पूरे भाषण के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति वहाँ उपस्थित थे।
  3. स्टेडियम में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के कई प्रतिनिधि और नेता मौजूद थे।
  4. लाखों भारतीय उनका भाषण सुनने के लिए वहाँ रुके थे, जबकि बहुत रात हो गई थी। उनमें से निश्चित रूप से कई विपक्षी दलों के नेता थे, जिन्होंने एक वक्तव्य से दूसरे वक्तव्य के बीच के अंतर के विस्तार को पहचाना होगा।
  5. पाकिस्तान के दर्शकों के लिए श्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में कुछ सख्त टिप्पणियाँ भी की थीं।

ट्रम्प का परिचय दिए जाने के बाद श्री ट्रम्प ख़ुद उन्हें मंच के छोर तक ले गए ताकि वे स्थानापन्न हो राष्ट्रपति को सुन सकें।

श्री ट्रम्प ने बड़े उदार मन से प्रशस्त टिप्पणियाँ कीं और उन्होंने दो-तीन बार कहा कि व्हाइट हाउस में भारत सच्चा मित्र है। अमेरिका के लगभग 4 मिलियन भारतीयों से श्री मोदी ने जो अतुलनीय अपील की, राष्ट्रपति ने उसे पहचाना। कहीं न कहीं श्री ट्रम्प के मानस पटल में चल रहा होगा कि पिछले चुनावों में 77% भारतीय अमेरिकियों ने डेमोक्रेटिक की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को मतदान किया था। यदि वे यह विश्वास दिला सकें कि वे भारत का समर्थन करेंगे और इस तरह वे इतनी बड़ी संख्या में इन मतदाताओं को अपनी ओर कर पाने में सफल हो पाएँ तो, उनके लिए निश्चित ही मददगार होगा।

जब राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस्लामिक आतंकवाद का मुकाबला करने की बात की, तो विशेष रूप से दिलचस्प था कि उन्होंने अमेरिका और भारत इन दोनों देशों के बीच पहली बार हुए त्रिकोणीय रक्षा अभ्यास का उल्लेख किया।

उसके बाद श्री मोदी को राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा मंच पर आमंत्रित किया गया। यह देखना भी बड़ा दिलचस्प था कि इन दो विश्व नेताओं के बीच कोई तीसरा पक्ष नहीं था। श्री मोदी ने अमेरिकी निवेश आमंत्रित करने के लिए अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बात की, लेकिन उनका मुख्य संवाद पाकिस्तान और कश्मीर के बारे में था।

श्री मोदी उत्कृष्ट वक्ता हैं और शत्रु पर वार करने की उनकी अपनी ख़ास शैली है, वे लगातार 9-11 और 26-11 के बारे में इन हमलों के पीछे किसी देश या नेता का नाम लिए बिना सवाल पूछ रहे थे और लोगों की बढ़-चढ़कर प्रतिक्रियाएँ मिल रही थीं। इसका राष्ट्रपति ट्रम्प पर निश्चित ही गहरा प्रभाव पड़ा होगा क्योंकि इससे पहले वे इमरान ख़ान के साथ की पत्रकार वार्ता में भारी भीड़ की प्रतिक्रियाओं का अनुभव ले चुके थे। उस समय प्रधानमंत्री मोदी आतंकवाद पर लगातार तीखा हमला और कटाक्ष कर रहे थे और अब वे दोषियों के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई के मुद्दे पर आ गए थे, जो वहाँ की भारी भीड़ में बैठे हर श्रोता तक गुंजायमान हो गया था और उनके सम्मान में वहाँ उपस्थित विशाल जनसमुदाय ने खड़े होकर तालियाँ बजाकर उनका अभिवादन किया।

जब बात धारा 370 के विषय में आई तो प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार संसद में दोनों सदनों द्वारा इस पर विस्तार से टेलीविजित बहस हुई थी और जिसे दुनिया भर के लोगों ने देखा था और इन बहसों के बाद ही दो-तिहाई बहुमत से यह कानून पारित किया गया था। श्री मोदी ने वास्तव में इस तथ्य की पुष्टि के लिए विभिन्न भाषाओं में श्री ट्रम्प और अन्य नेताओं को सूचित किया कि भारत में “सब ठीक है”। यह बात वास्तव में उन चंद नेताओं तक भी पहुँचानी थी जो पाकिस्तानी सोच पर “तोता रटंत” करते आ रहे हैं।

अपने भाषण के अंत में, श्री मोदी ट्रम्प के पास गए और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर राष्ट्रपति के साथ पूरे स्टेडियम की विजयी परिक्रमा लगाई।

यह श्री मोदी का विश्व के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के सामने भारत की नरम शक्ति का प्रदर्शन करने का तरीका था और जिन मुद्दों को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में उठाया था उन पर निहित सहमति प्राप्त करना था। बहुत आश्चर्य नहीं होगा यदि हम 26 जनवरी 2020 के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति ट्रम्प और प्रथम महिला को देखें।

स्पष्ट रूप से श्री मोदी ने अमेरिका और श्री ट्रम्प के साथ इतने मजबूत संबंध बनाने के लिए बहुत श्रम किया है। यदि यह मानकर चले कि श्री ट्रम्प फिर से चुने जाते हैं, तो वे भारत के लिए ऐसे बन सकते हैं जैसे निक्सन, चीन के लिए थे। अगर ऐसा होता है, तो भारत 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की एकदम सही राह पर होगा और हम सभी को इसके लिए श्री मोदी को धन्यवाद देना होगा।

अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर से ही सभी कठोर फैसले लेने की जल्दी में हैं। चाहे हम उन्हें चाहें या उनसे नफरत करें, उनके पास 56 महीने से अधिक का समय है जब वे तीसरे कार्यकाल की चाह में फिर से चुनाव में खड़े होते हैं।

यह ‘मेक इंडिया ग्रेट अगेन’ (भारत को पुन: श्रेष्ठ) बनाने के लिए वर्ष 2014 से अब तक किए गए सभी परिवर्तनों को लागू करने और उनके परिणामों को देखने के लिए पर्याप्त समय है।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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सेवानिवृत्ति में अकेलेपन से जूझना

2. Reboot. Reinvent. Rewire Managing Retirement in the Twenty First Century

किसी भी उम्र में अकेलापन बड़ी समस्या होती है और सेवानिवृत्ति में खुद की कीमत कम हो जाने की भावना के साथ वित्तीय सुरक्षा से संबंधित तनाव के चलते अकेलापन गंभीर समस्या हो सकती है।

अवसाद, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं या शारीरिक बीमारी होने की एक बहुत बड़ी वजह सामाजिक अलगाव और अकेलापन भी माना जाता है। ये स्थितियाँ आमतौर पर वृद्ध लोगों से जुड़ी होती हैं, जिन्हें हो सकता है सेवानिवृत्ति में अलग-थलग पड़ जाने गंभीर अनुभव आता हो, जैसे या तो जीवनसाथी का साथ छूट जाना या बच्चों का दूर चले जाना।

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ अकेलापन, अवसाद, उच्च रक्तचाप और अन्य मनोदैहिक बीमारियों का कारण बना है। शादीशुदा सेवानिवृत्त लोगों के साथ कम से कम उनका साथी तो होता है लेकिन वे जो एकल ही हैं या जीवनसाथी से विभक्त रहते हैं या जिन्होंने अपने साथी को खो दिया है, उनकी अकेलेपन की समस्या बहुत गहरी बढ़ जाती है।

अकेलापन वह दु:ख है, जो अक्सर सेवानिवृत्त लोगों को सालता रहता है। मोटापे से भी दुगुनी बड़ी बीमारी अकेलापन है, शोधकर्ताओं के अनुसार एकांतवास की पीड़ा वृद्धों के लिए काफ़ी घातक हो सकती है।

यहाँ तक की हमेशा मित्र मंडली में रहने वाले और मिलनसार लोग भी जब खुद को अकेलेपन और छिटक जाने के अनजान परिदृश्य में पाते हैं तो वह उनके अवसाद की वजह बन जाता है। अक्सर अकेलापन जीवनसाथी की मृत्यु,करीबी दोस्त के बिछड़ जाना या कमज़ोरी लाने वाली बीमारी के विकसित होने से आता है- वे सारी बातें जिनके बारे में हम सोचना तक नहीं चाहते, लेकिन वहीं दुर्भाग्य से हमारी उम्र बढ़ने के साथ अपरिहार्य हो जाती हैं।

सेवानिवृत्त व्यक्ति अपने जीवन में कभी-कभी कई बदलावों से गुजरते हैं जो भले ही कम समय के लिए लेकिन उन्हें अकेलापन दे जाते हैं।

  1. वयस्क बच्चे घर से बाहर चले जाते हैं और कभी-कभी तो घर से बहुत दूर चले जाते हैं।
  1. इसी समय लोगों का कार्यस्थल के ज़रिए अपने आप मिलने वाला सामाजिक दायरा समाप्त हो जाता है। अधिकांश लोग कामकाजी दिनों में कार्यस्थल के बाहर सामाजिक संपर्क बनाने की ज़हमत नहीं उठाते और सेवानिवृत्ति के बाद मौजूदा सामाजिक संपर्क से बाहर निकल पाना उनके लिए कहने में जितना आसान होता है, करने में उतना ही कठिन हो जाता है।
  1. जीवन के बाद के वर्षों में किसी पड़ाव पर जीवनसाथी का साथ छूट जाना असामान्य नहीं होता। जीवनसाथी को खो देना उस व्यक्ति के जीवन का गहनतम घनीभूत पीड़ादायी अनुभव होता है।

जो लोग सामाजिक रूप से सहज और अच्छी तरह से जुड़े होते हैं, वे आसानी से नए दोस्त बना सकते हैं, लेकिन अगर आपके लिए सामाजिक बन पाना दुरुह हैं और पारंपरिक रूप से दोस्त बनाना मुश्किल होता है, तो आपको संरचित गतिविधियाँ खोजने की ज़रूरत है जो सामाजिक संपर्क बनाने में आपकी मददगार हो सकेंगी।

नए दोस्त बनाने के लिए केवल थोड़ा-सा प्रयास करना पड़ता है लेकिन यह अकेलेपन की उन भावनाओं को दूर कर देता है जो सेवानिवृत्ति में आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हो सकती हैं। इतना ही नहीं इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि सामाजिक अलगाव आपको शारीरिक रूप से भी अधिक बीमार कर देता है, अत: अकेलेपन का मुकाबला करने से आपके स्वास्थ्य में भी सुधार हो सकता है।

वरिष्ठ सेवानिवृत्तों की बढ़ती संख्या का एकमात्र साथीदार उनका अपना टेलीविजन होता है और यह एक गंभीर चुनौती है जिसका हमें सामना करने की आवश्यकता है। क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है कि हम इन बुजुर्ग नागरिकों के साथ जुड़ सकें ताकि वे कुछ लोगों के संपर्क में जीवन के अपने शेष वर्ष बिता सकें?

एक बुजुर्ग ने मुझसे बातचीत में कहा- “मानवीय संपर्क मेरे लिए प्राणवायु के समान है। मैं अपने आप को व्यस्त रखने की कोशिश करता हूँ लेकिन मानवीय संपर्क का अवसर मिलना मेरे लिए किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दूसरे इंसान का स्पर्श अधिक मायने रखता है।”

एक और बुजुर्ग ने कहा “यह मुझे दुखी करता है। मुझे नहीं लगता कि समाज के लिए अब मैं उपयोगी रह गया हूँ पर ऊपरी तौर पर मैं अपनी भावनाएँ दबाते हुए इस तरह से सोचता हूँ कि जीवन चलने का नाम। लोग कहते हैं कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ, जो अब तक मुझे सब याद है लेकिन यह मेरे लिए मददगार नहीं हो पाता। मैं अपने जीवन का अधिकतम लाभ उठा लेना चाहता हूँ।”

कई बड़े-बुजुर्ग सेवानिवृत्त लोगों से बात करने के बाद मैंने पाया कि वे अपने दोस्तों और परिवार के साथ सभी महत्वपूर्ण सामाजिक संपर्कों से चूक गए हैं। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई,वे दोनों या उनमें से एक थकता चला गया और महीन सामाजिक ताने-बाने को बुनने में नाकाम होने लगे, जो वे जीवन भर करते आ रहे थे और वे साफ़ देख पा रहे थे कि सामाजिक दायरों से वे छिटकते जा रहे थे और उन्हें कई आयोजनों के निमंत्रण आने बंद हो गए थे। इसके बाद धीरे-धीरे वे ऐसे दौर में चले गए जब ऐसे दिन भी आएँ कि उन्होंने कई हफ़्तों तक अपने घर पर काम करने आने वाले लोगों के अलावा किसी को न देखा होगा।

हमने ऐसे कई मामलों के बारे में पढ़ा है, जिसमें पड़ोसियों ने अपार्टमेंट में से “सड़ांध” आने की शिकायत की थी और पुलिस को घटनास्थल पर किसी वरिष्ठ नागरिक की मृत देह पड़ी मिली थी। सेवानिवृत्त बुजुर्गों के अकेलेपन की गंभीरता को रेखांकित करने के लिए इससे अधिक और क्या होगा कि पूछ-परख करने वाला कोई न हो और कोई अकेले मर जाएँ और उसकी मरने की ख़बर भी कई दिनों तक न लग पाएँ।

अकेलापन संक्रामक है। अकेलापन महसूस करने वाले वयोवृद्ध ऐसे तरीके अपनाने लगते हैं जिससे दूसरे लोग उनके आस-पास फटकना तक नहीं चाहते।

हाल ही में हुए सर्वेक्षण से पता चलता है कि संयुक्त परिवारों में रहने वाले केवल 10 प्रतिशत भारतीय वरिष्ठ खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं, जबकि एकल परिवारों में रहने वाले लगभग 68 प्रतिशत लोगों को अकेलापन लगता है। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले वृद्ध लोगों का सामाजिक संपर्क अधिक होता है और शहरी बुजुर्गों की तुलना में वे अकेलेपन के दर्द को कम महसूस करते हैं। यह भी पाया गया कि भारतीय वृद्ध महिलाओं की तुलना में वृद्ध पुरुषों द्वारा खुद को अकेला महसूस करने की आशंका अधिक होती है।

अकेलेपन से निपटना

बुजुर्गों और बीमारों की देखभाल करने वाले लोगों से चर्चा के आधार पर कुछ बिंदु निकलकर सामने आएँ, जिनकी मदद से अकेलेपन से निपटा जा सकता है।

  • सामाजिक बने रहें – अकेलेपन का सामना करने के लिए चिरस्थायी संबंध बनाकर रखें। उन दोस्तों के साथ फिर से जुड़ें, जिनके साथ आपका संपर्क छूट गया हैं और अपने आस-पास के दोस्तों के साथ नियमित मेल-मिलाप की दिनचर्या बनाएँ। अपने पुराने परिचितों के साथ फिर से जुड़ने के लिए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से जुड़ें। नई दोस्ती की तुलना में लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते अकेलेपन से लड़ने में अधिक फायदेमंद होते हैं। आवास संकुलों में रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों ने सामाजिक बने रहने का मार्ग चुन लिया है और कई निवासी कल्याण संघों ने उन्हें विशिष्ट क्षेत्र प्रदान किए हैं, जहाँ वरिष्ठ नागरिक सुबह और शाम मिल-बैठकर चाय-कॉफ़ी लेते हैं।
  • नई रुचियाँ खोजें – सेवानिवृत्ति तक आते-आते संभवत: आपकी प्रतिबद्धताएँ और दायित्व कम हो गए होंगे। इसका लाभ अपनी रुचियाँ टटोलने के लिए लें, चाहे तो आप किसी स्थानीय स्कूल में ख़ुशी-ख़ुशी अपनी सेवाएँ दे सकते हैं, या किसी पुस्तक क्लब में जाना शुरू कर सकते हैं या कोई वाद्य बजा सकते हैं या लेखन करना प्रारंभ कर सकते हैं। कोई गतिविधि उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना सार्थक आपका अन्य लोगों से होने वाला संवाद होगा, क्योंकि आप सभी उम्र के दोस्तों का नया वलय विकसित करेंगे, ऐसा वलय जिसके लोग आपको पसंद करते हैं और वे आपके ही समान रुचि रखते हैं।
  • सकारात्मक रहें – अपने निराशावादी या नकारात्मक विचारों को चुनौती देने के लिए खुद से बात करना बहुत प्रभावशाली देखा गया है। वर्तमान जैविक स्थितियों की गलत या तर्कहीन व्याख्याओं के कारण अक्सर अकेलापन आता है। इन विचारों को पहचानें और उनके विपरीत तर्क दें, विपरीत साक्ष्य का उपयोग करें। यदि यह मुश्किल है या आपको सहायता की आवश्यकता है, तो आप परामर्शदाता से मिल सकते हैं या किसी ऐसे मित्र के साथ बैठ सकते हैं जिस पर आप भरोसा कर सकते हो। 
  • पालतू जानवर पाल लें – कुत्ता या बिल्ली अकेले लोगों का बड़ा साथी माना जाता है। यदि आप और आपका जीवनसाथी पालतू पशु पसंद करते हैं और किसी अन्य जीवित प्राणी की देखभाल करने की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं तो अपने घर में एक पालतू पशु ले आएँ।

मदर टेरेसा ने कहा था कि “अकेलापन और अवांछित होने की भावना सबसे भयानक गरीबी है”।

जहाँ विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने सेवानिवृत्त लोगों और वरिष्ठ नागरिकों की अकेलेपन की जरूरतों को समझ लिया है, हम भारत में अभी तक उनकी जरूरतों को समझ नहीं पाए हैं। हमें लगता हैं कि कोई व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाता है तो वह अपने पसंदीदा “धारावाहिकों” को टीवी सेट पर देखते हुए खुश रहता है और उसका साथ देने के लिए कुछ दोस्त होना पर्याप्त है। हमें अधिक देखने और सुनने की जरूरत है। वृद्ध लोग अक्सर दावा करते हैं कि वे ठीक हैं, और वे बोझ नहीं बनना चाहते हैं लेकिन ज्यादातर लोगों को मानवीय संपर्क की आवश्यकता होती है।

वृद्ध लोग खजाना हैं और उन्हें ऐसा ही माना जाना चाहिए।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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चिकनगुनिया, डेंगू – क्या हम तैयार हैं?

170514 Aedes Mosquito

बिहार में चमकी बुखार (इंसेफेलाइटिस) पर फौरी तरीके से काम हुआ, इसे सभी ने देखा है। हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में इस तरह की उदासीनता होना दुखद और भयावह है।

मानसून आने वाला है।

मलेरिया, जो माना जाता था कि दिल्ली से लगभग गायब हो गया है, वह विकराल रुप धरकर वापस आ गया है। चिकनगुनिया मच्छर से उत्पन्न एक उभरती हुई बीमारी है जो अल्फावायरस, चिकनगुनिया विषाणु के कारण होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से एडीज इजिप्ती और ए अल्बोपिक्टस मच्छरों द्वारा प्रेरित है, इसी प्रजाति के मच्छरों से डेंगू का संचरण होता है।

हमने देखा है कि चिकनगुनिया के परिणामस्वरूप तेज़ बुखार आता है, जिसमें बेहद कमज़ोरी लाने वाला दर्द होता है, खासकर जोड़ों में। गंभीर मामलों में चकत्ते भी देखे जा सकते हैं। कमजोरी, चक्कर आना, निरंतर होने वाली उल्टी की वजह से निर्जलीकरण, मुँह का स्वाद बहुत खराब हो जाना और खून निकलना इसके खतरनाक लक्षण होते हैं। हमें कितनी ही बार बताया गया है कि हमें कहीं भी पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए और पानी के प्रबंधन के गलत तरीकों की वजह से बहुत से लोगों का चालान भी काटा जा चुका है!

जब कभी किसी महामारी से सामना हुआ है, राजनेताओं ने नौकरशाहों को दोषी ठहराया, नौकरशाहों  ने दिल्ली नगर निगम को दोषी ठहराया और नगर निगम ने फिर राजनेताओं को दोषी बताया। मंत्रीगण इसके औचित्य को सही ठहराते हुए उन कारणों की बात करते हैं, जिसकी वजह से यह हर साल होता है और अन्य सरकारों के समय भी यह कैसे होता रहा है, यह बताने लग जाते हैं। टीवी एन्कर्स गला फाड़ कर चिल्लाते हुए जवाबदेही ठहराते हैं और समाचार पत्र इन कहानियों को अपनी सुर्खियाँ बनाते हैं, पर धीरे-धीरे वे अंदर के पन्नों में चली जाती हैं।

गरीब मरीज़ों को अपने प्रियजनों के साथ रोते-बिलखते एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में दौड़ना पड़ा।

लेकिन जीवन का अद्भुत चक्र जारी रहेगा। मानसून आता रहेगा और लौट जाएगा, सैलाब कम होता जाएगा और एक दिन सूख जाएगा, और अस्पतालों में रोगियों की संख्या कम हो जाएगी, समाचार चैनलों से ये ख़बरें ग़ायब हो जाएँगी और उम्मीद रहेगी कि अगले वर्ष तक फिर मच्छर जनित बीमारियाँ नहीं दिखेंगी। हर कोई फिर राहत की साँस लेगा और हमारे देश में जैसा कि हर महामारी या आपातकाल के बाद हमेशा होता है, उस साल की समस्या का “प्रबंध” कर लिया जाता है और जैसे कि लोगों की याददाश्त बहुत कम होती है, सो इस साल की चुनौतियां जल्द ही भुला दी जाती है।

स्वास्थ्य की डरा देने वाली बातों पर बिना सोचे प्रतिक्रियाएँ दे देना हमारे लिए अपवाद के बजाय आदर्श हैं।

मानसून, मच्छर और बीमारियाँ हर साल आती हैं। हम जानते हैं कि इस समस्या की हर साल पुनरावृत्ति होती है और जब तक हम इस रोग का उन्मूलन करने में सक्षम नहीं हो जाते है, तब तक सालों-साल यह जारी रहेगी। तो ऐसा क्यों है कि हम पहले ही योजना नहीं बना पाते और इन मच्छरों से उत्पन्न बीमारी के प्रभाव की गंभीरता को कम नहीं कर पाते? हमारी सरकारें क्यों ऐसा कोई कर्मी दल नहीं बनाती, जो केवल आने वाले वर्ष की योजना पर ध्यान केंद्रित करें?

सरकार के लिए मानसून से पहले निम्न कदम उठाना काफी सरल होगा (हालाँकि इस वर्ष के लिए पहले ही बहुत देर हो जाने की आशंका है):

  1. पहचान क्षेत्रों का नक्शा उतारना– उम्मीद है, पिछले वर्षों के अनुभव के बाद, हमारे शहरों के अधिकारियों ने उन सभी क्षेत्रों का नक्शा उतारा होगा, जिसे उन्होंने जल संग्रहण के प्रवण के रूप में पहचाना है। उचित नियोजन के साथ, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मानसून की शुरुआत से पहले ऐसे सभी क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए कदम उठाए गए हैं।
  2. महामारी संबंधी सबूत– चालू वर्ष के अभिलेखों के आधार पर हमारे स्वास्थ्य शोधकर्ता इस वायरस से संबंधित गंभीरता को जानते होंगे और इसे काबू में लाने की चिकित्सकीय आवश्यकता को पहचानते होंगे।
  3. प्रकोप की त्वरित रपट करना आवश्यक है– इसका मतलब होगा कि जिन क्षेत्रों में समस्या देखी गई, वहाँ के हालात का जायजा लेने के लिए कक्ष/ निगरानी और मूल्यांकन केंद्र स्थापित करने होंगे। जिनका पूरे उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी के साथ स्पष्ट रूप से दस्तावेजीकरण कर उसका संचारण करने की आवश्यकता है।
  4. प्रयोगशालाएँ– यह हर साल की बड़ी बाधा बन चुकी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रयोगशालाएँ ज्ञात हो और नागरिकों तक उनकी जानकारी पहुँचे। और निश्चित रूप से, हमें आवश्यक जाँचों के लिए शुल्क सूची की ज़रूरत है और उसकी अग्रिम घोषणा करनी होगी।
  5. प्रतिक्रिया– प्रयोगशालाओं से हर घंटे डेटा एकत्रित करने की आवश्यकता है और अध्ययन सुधार के लिए विश्लेषण करना होगा। कुछ रोगियों के लिए देरी घातक साबित हो सकती है। पहले से तैयार समूहों से डेटा और अध्ययन सुधार को तेजी से करने में मदद मिलेगी।
  6. अनुदान- महामारी से निपटने की तमाम कार्रवाई के लिए अनुदान पहले से ही अलग रखा होना चाहिए, जिसे अब निकाला होगा। बजट और तदर्थ स्वीकृतियों के लिए हाथ-पैर मारने में समय बर्बाद होता है और तब तो यह अस्वीकार्य है, जब वह समय नष्ट हो जाता है जिसमें मनुष्य के जीवन को बचाया जा सकता है।
  7. अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम और डॉक्टरों को पहचानकर उन्हें सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। संपर्क दूरभाष क्रमांक और परीक्षण तथा उपचार के लिए पूर्व निर्धारित कीमतों की जानकारी को व्यापक रूप से विज्ञापित किया जाना चाहिए।

नागरिकों की शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना चाहिए न कि तब तक राह देखनी चाहिए जब तक समस्या सिर न उठा लें। इन क्षेत्रों में शिक्षित करने की आवश्यकता है, जैसे किस बात पर गौर करें और बीमारी की रपट कहाँ करें। लोगों को साथ ही शिक्षित करना होगा कि वे अपने घरों को मच्छर मुक्त रखें। घर के सभी कमरों में  सुरक्षित एयरोसोल का स्प्रे करें, मच्छरदानी का उपयोग करें, पानी के बर्तनों को ढाँक कर रखें, पानी के टैंक, पालतू जानवर के कटोरे और गमलों के नीचे रखी प्लेटों को सूखी रखें और पानी को जमा न रहने दें तथा  इस तरह के अन्य निवारक कदम उठाएँ।

एक बार स्पष्ट रूप से प्रलेखित योजना पर सहमती बन गई,तो इसे सक्रिय रूप से क्रियान्वित करना अपेक्षाकृत आसान और तेज़ हो जाएगा।

यदि श्रीलंका, मलेरिया के सबसे बुरे शिकारों में से एक, मलेरिया मुक्त हो सकता है, जैसा कि सितंबर 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित किया गया है, तो क्या यह आशा करना बहुत कठिन है कि भारत भी स्वच्छता के स्तर तक पहुंच सकता है, जहाँ मलेरिया और अन्य मच्छरों की वजह से होने वाली अन्य बीमारियाँ हमारे नागरिकों को प्रताड़ित नहीं करेंगी?

अंत में, बड़े पैमाने पर कोई स्वास्थ्य कार्यक्रम तब तक काम नहीं कर सकता जब तक कि स्पष्ट उत्तरदायित्व स्थापित न हो। किसी राजनेता, नौकरशाह या स्वास्थ्य कर्मचारी को अपने हाथ खड़े कर देने या कंधे झटकने की अनुमति नहीं मिल सकती है।

स्वास्थ्य किसी एक राज्य का विषय हो सकता है, लेकिन भारत की नागरिकता किसी राज्य भर की बात नहीं है।

अगर महामारी पर नियंत्रण पाना है तो केंद्र और राज्य के बीच सहयोग जरूरी है।

आरोप-प्रत्यारोप का खेल तुरंत रोकना होगा।

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भाजपा की लोकसभा 2019 में जीत के 12 कारण

 

190422 Lok Sabha Elections

चुनाव हो गए और परिणाम भी आ गए हैं। ज़ाहिरन श्री मोदी के नेतृत्व ने नए दम से खड़ी भाजपा को रिकॉर्ड तोड़ जीत दिलाई है। यह ऐसा चुनाव था, जिसमें मतदाताओं ने घरों से निकलकर श्री मोदी के लिए मतदान किया, श्री मोदी के उन कामों के लिए मतदान किया, जो उन्होंने किए या जिनका शुभारंभ वे वर्ष 2014 में कर चुके थे और अब मतदाताओं ने उन कामों को पूरा करने के लिए समय दिया है।

कुछ पत्रकारों द्वारा फैलाए गए झूठ और बेबुनियाद ख़बरों को मतदाताओं ने सिरे से खारिज कर दिया है। विपक्ष का संदेश “मोदी हटाओ” खारिज किया जा चुका है। राजद्रोह के लिए कानून बनाने का काँग्रेस का वादा स्वीकार नहीं किया गया है। उनके भगवा आतंक के दावे को खारिज कर दिया गया है। विपक्षी नेताओं का यह दावा कि राष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौता किया गया, उसे भी दृढ़ता से खारिज किया जा चुका है। लोकतंत्र पर मंडराते तथाकथित खतरे को अस्वीकार कर दिया गया है।

दूसरी ओर, श्री मोदी के कथन “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” पर भरोसा और विश्वास जताकर उसे गले से लगाया गया है।

इन चुनावों से स्पष्ट है कि मुख्य रूप औसत भारतीय मतदाता अपने लिए क्या चाहता है:

  1. स्वच्छ प्रशासन: विभिन्न गैर-भाजपा सरकारों के पिछले 70 वर्षों के अति भ्रष्टाचार की अविश्वसनीय चरम सीमा से हम सब नाराज और क्षुब्ध हो चुके हैं।
  1. देश का मजबूत आर्थिक विकास जिससे संपदा और रोजगार का सृजन होगा।
  1. सुरक्षित वातावरण, न कि लगातार संभावित खतरों की आशंकाएँ, जो हमें और हमारे परिवारों को शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचा सकती है। हमें अपने कंधों पर कोई बोझ होने का डर न हो। न हम किसी अज्ञात बैग की आशंका से मेज और कुर्सियों के नीचे बैठने से पहले देखना चाहते हैं।
  1. जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ स्वच्छ वातावरण ताकि हम अपने परिवारों के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

आइए हम उन कारणों की पड़ताल और जाँच करें जिनसे व्यक्तिगत रूप से श्री मोदी के खिलाफ विपक्षी नेताओं की इतनी नकारात्मकता के बावजूद भाजपा ने चुनावों की लहर को अपनी ओर कर लिया।

  1. सकारात्मक रिपोर्ट कार्ड: पिछले चुनावों के दौरान वर्ष 2014 में श्री मोदी ने वादा किया था कि वे वर्ष 2019 में अपने रिपोर्ट कार्ड के साथ निर्वाचन क्षेत्र में वापस आएँगे। पहले पाँच साल के कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुल मिलाकर, मतदाता श्री मोदी के शासन और भारत के लिए निर्धारित दिशा से संतुष्ट थे। मतदाताओं ने सरकार की सभी योजनाओं का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने अपने जीवन में इन योजनाओं के प्रभाव का अनुभव किया है। उन्होंने उन नीतियों की निरंतरता के लिए मतदान किया है। मतदाताओं ने श्री मोदी को एक मौका और दिया है।
  1. अर्थव्यवस्था: अब भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और क्रय शक्ति समानता के मामले में दूसरी सबसे बड़ी ताकत है। श्री मोदी भारत को अगले दशक के त्वरित विकास के लिए पटरी पर ले आए हैं। यह ऐसा नेता है जो हर संभव मजबूत निर्णय लेने में संकोच नहीं करता है चाहे वे निर्णय अर्थव्यवस्था से संबंधित हों या मौलिक संहिता सुधार के जैसे कि दिवालियापन संहिता। इन सुधारों का प्रभाव अब आने वाले 5 वर्षों में पूरी तरह से महसूस किया जा सकेगा।
  1. स्वच्छ सरकार: श्री मोदी ने अपने बाधकों के मन में भी स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया है कि वे साफ-सुथरे हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया है कि उनकी सरकार में कोई भ्रष्टाचार न हो। पिछले पाँच वर्षों में छोटा- बड़ा कोई घोटाला नहीं हुआ है। राफेल सौदे की चर्चाओं ने मतदाताओं पर कोई प्रभाव नहीं डाला और श्री मोदी के खिलाफ़ श्री गाँधी के भ्रष्टाचार के आरोपों ने काम नहीं किया। जितना अधिक श्री गाँधी ने श्री मोदी के बारे में दुष्प्रचार किया, उतना ही उन्होंने मतदाताओं को श्री मोदी के करीब कर दिया।
  1. विदेश नीति: भारत अब राष्ट्र मंडली में कद्दावर हुआ है। पाकिस्तान को छोड़ दे तो भारत सभी पड़ोसी देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध विकसित करने में कामयाब रहा है। साथ ही भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस तथा उसी तरह ईरान और इजरायल के साथ स्वतंत्र और मजबूत एवं चीन के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत रखने में सफल रहा है। मतदाता ने भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते सम्मान को माना है। इन नीतियों का प्रभाव भारतीय पासपोर्ट के प्रति बढ़ते सम्मान में देखा जा सकता है। 
  1. महागठबंधन: महागठबंधन काम न आ सका। निश्चित रूप से उस तरीके से नहीं, जिस तरह राहुल गांधी ने खुद ही सभी के एक नेता के रूप में खुद को ताज पहनाया था। क्षेत्रीय नेताओं के इस अभिप्रेरक समूह के किसी भी घटक के पास कोई सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम नहीं था और न ही उन्होंने मतदाताओं के सामने समान मूल्यों के मानक समुच्चय को प्रस्तुत करता प्रतिनिधित्व दिया था। महागठबंधन के युद्धरत नेताओं ने अपने असली रंग दिखाए क्योंकि वे नुकीली ज़ुबान से बात करते रहे। एक ही रौ में वे अपने गठबंधन सहयोगियों की आलोचना भी करते रहे और प्रशंसा भी। इन राजनीतिक दलों के नेताओं को जितना लगता है कि मतदाता उन पर विश्वास करता है उससे कहीं अधिक भारतीय मतदाता चाणाक्ष हैं।
  1. राहुल गाँधी: जब यह लेख छपने के लिए तैयार था तभी, श्री गाँधी अमेठी में 17,000 से अधिक वोटों से पीछे चल रहे थे। यह नुकसान इसे भी स्थापित करेगा कि कैसे वे कोई भी परिणाम दिलवाने में सक्षम नहीं है। यद्यपि वे यह मानना चाहते हैं कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में उनकी जीत केवल उनके खाते में थी, अगर कोई लोकसभा चुनाव में पड़े मतों को देखे, तो वह संख्या अलग कहानी बताती है। श्री गाँधी ने भारत के लिए कोई भी स्पष्ट दृष्टिकोण या नए मार्ग की घोषणा नहीं की। उनकी न्याय योजना की बिना किसी विचार के घोषणा कर दी गई और उनके सलाहकार सैम पित्रोदा ने उनकी कोई मदद नहीं की, नियमित अंतराल पर उनके मुँह से गोले ही बरसते रहे। प्रियंका गाँधी ने वोटों को तोड़ने में थोड़ी कामयाबी हासिल की, जैसा कि उन्होंने कहा था, लेकिन यह सपा-बसपा गठबंधन के लिए हुआ।
  1. हिंदी के गढ़ और पश्चिमी भारत: हिंदी के गढ़ और महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों की जनता के दिलों में अभी भी श्री मोदी हैं। उन्होंने तीन राज्यों में भाजपा को मत देकर बाहर कर दिया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने बाहर निकलकर मोदी के लिए बहुत बड़ी संख्या में मतदान किया, जो आज देश के सबसे बड़े नेता हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा ने भी श्री मोदी का स्वागत किया है। विभाजनकारी राजनीति को मतदाताओं ने नकार दिया है और यह आने वाले वर्षों में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। 
  1. बुनियादी ढाँचा: भारत के बुनियादी ढाँचे में सुधार दिख रहा है। नई सड़कों के निर्माण से लेकर हवाई अड्डों तक और बेहतर बिजली आपूर्ति से लेकर सुपर-फास्ट ट्रेनों तक, सभी के लिए बेहतर बुनियादी ढाँचे की दिशा का मार्ग दिख रहा है। वर्ष 2014 से पहले, हमने अपने दैनिक जीवन के एक हिस्से के रूप में “लोड शेडिंग” को स्वीकार कर लिया था। जो अब बंद हो गया है। मतदाताओं का मानना है कि अभी और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है और उन्होंने श्री मोदी को इसके लिए एक और कार्यकाल का समय दिया है ताकि जो काम शुरू हुए थे, उन्हें पूर्णत्व की ओर ले जाया जा सकें। 
  1. मिलियन समर्थन: वर्ष 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले 80 मिलियन नए मतदाताओं ने मोदी के पक्ष में भारी मतदान किया। इन युवा भारतीयों का अयोध्या या राम मंदिर से कोई संबंध नहीं है, लेकिन श्री मोदी में, ये मिलियन युवा एक ऐसा नेता देख रहे हैं, जो उनके सपनों का भारत दिलवा सकता है। वे अपनी जीवन शैली में समग्र सुधार देखते हैं, और वे भारत के प्रति वैश्विक रवैये में परिवर्तन देख सकते हैं। 
  1. आतंक पर सख्त: पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमले का परिणाम सभी के सामने हैं। अगर पुलवामा हमले के बाद विपक्ष ने सरकार की आलोचना नहीं की होती, तो उन्हें बालाकोट हवाई हमलों के बाद धूल चाटनी नहीं पड़ती। मतदाता यह स्वीकार करता है कि केवल श्री मोदी को कड़ी टक्कर देने की हिम्मत थी और वे ऐसा नेता चाहते हैं जो देश की सीमाओं की रक्षा कर सके। 
  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था: हालाँकि विपक्षी दल चाहेंगे कि हम दूसरे तरीके को सही मानें लेकिन तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों के आँकड़े ग्रामीण भारत में अपनी बिक्री में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हैं। कुछ भी हो, श्री मोदी ने गरीबों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। न्याय योजना आसमान में एक कौड़ी भर थी, जबकि किसानों को सीधे लाभ हस्तांतरण ने बदलाव दिखा दिया। अधिक करने की आवश्यकता है और श्री मोदी निश्चित रूप से अपने एजेंडे में शीर्ष पर होंगे। 
  1. राजवंशीय राजनीति खारिज: भले ही काँग्रेस को 2014 के चुनाव के बाद से कोई विकास नहीं दिख रहा है। लेकिन काँग्रेस नेताओं को इस बारे में गंभीर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या उन्हें “परिवार” के सदस्य को नेता बनाये रखा जाना चाहिए या फिर स्वयंसेवकों को फिर से सक्रिय करने के लिए नए खून का संचार करना चाहिए। 22 विपक्षी दलों के नेता जो अपनी पार्टियों पर अपने परिवार की पकड़ को बनाए रखने के लिए दृढ़ थे, उन्हें भी खारिज कर दिया गया है। क्या अब ये नेता अपने काँटेदार पैतरे दिखाना शुरू कर देंगे क्योंकि उनके मतभेद खुलकर सामने आएँगे या फिर भी वे एक मंच पर हाथ से हाथ मिला रहने में सक्षम होंगे, यह दिखाने के लिए कि वे एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं!

विपक्षी नेता चुनाव प्राधिकरण बदलने की माँग, पक्षपातपूर्ण चुनाव आयोग, नकारात्मक चुनाव और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की वापसी जैसे बहाने बनाते रहेंगे, लेकिन वे भी थोड़े समय में ही महसूस करेंगे कि ये खुद को समझाने के बहाने हैं। कोई भी मतदाता उनके किसी भी बहाने पर विश्वास नहीं करता। विपक्षी नेताओं के लिए, आत्मनिरीक्षण का समय आ गया है।

श्री मोदी के नेतृत्व में भारत को सर्वोत्कृष्ट मिलना अभी शेष है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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राष्ट्रवादी होना और ऐसा कहने में गर्व होना

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चुनाव अपने लंबे वृत्त को पूरा करते हुए समापन पर आ गए हैं। इन चुनावों को सबसे अधिक दोषारोपण करने वाले चुनावों के रूप में देखा जा सकता है और बीते कुछ दशकों में मैंने तो हर राजनेता को इतनी व्यंग्य उक्तियों से भरे हुए भाषण देते पहले कभी नहीं देखा था,जितना इस बार देखा।

इसके अलावा अभी तक जितना “राष्ट्रवाद” या “राष्ट्रवादी”  वाक प्रचार इन चुनावों का हिस्सा बना वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। भाजपा के सभी विरोधी दल, पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार इस शब्द को भाजपा और उसके सभी अनुयायियों पर आरोप के रूप में फेंक रहे हैं जैसे कि राष्ट्रवादी होना कोई अपराध है और जिसे हर हाल में लताड़ा जाना चाहिए, अपमानित करना, ताने मारना, उपहास करना और दंड दिया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद आधुनिक आंदोलन है। पूरे इतिहास में हम देखते हैं कि लोग अपनी पैदाइशी मिट्टी, अपने माता-पिता की परंपराओं, और स्थापित क्षेत्रीय प्राधिकारी से जुड़े होते हैं। अमूमन 18 वीं शताब्दी के अंत तक राष्ट्रवाद सार्वजनिक और निजी गठन की भावना के रूप में पहचाना जाने लगा। राष्ट्रवाद को कई बार ग़लती से राजनीतिक व्यवहार का कारक माना जाता है।

राष्ट्रवादी व्यक्ति वह होता है जिसकी उसके राष्ट्र के साथ पहचान दृढ़ होती है और जो राष्ट्र के हितों का दृढ़ता से समर्थन करता है।

दुनिया भर में राष्ट्रवादी आंदोलनों ने व्यक्ति को उसकी पहचान बनाने और राष्ट्रीय हित को बनाए रखने में मदद की है। राष्ट्रवादी आंदोलनों की पहली लहर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में क्रांतियाँ लेकर आईं, जिनके चलते जर्मनी और इटली का एकीकरण हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पूर्वी और उत्तरी यूरोप के साथ ही जापान, भारत, आर्मेनिया और मिस्र में इसकी दूसरी लहर उठी। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी राष्ट्रवादी आंदोलन था जैसे दुनिया के अधिकांश अन्य हिस्सों का उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन।

पूरे विश्व में राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आंदोलन तेजी से बढ़ रहे हैं।

यह डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव से हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि वे निश्चित रुप से फिलीपींस के राष्ट्रपति डुटर्टे के राष्ट्रवादी हैं। तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन से लेकर इंडोनेशिया में राष्ट्रपति जोकोवी तक, जापान में प्रधान मंत्री शिंजो आबे से लेकर इज़राइल में प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तक। दुनिया भर के और भी कई देशों में और अधिक राष्ट्रवादी नेता चुने जाएँगे। चीनी और रूसी नेता अपने कम्युनिस्ट देशों में अपने लोगों की रैली निकालने के लिए राष्ट्रवाद के रूप का उपयोग करते हैं।

महत्वपूर्ण कारक जिसे समझा जाना चाहिए और जिसका अध्ययन होना चाहिए वह यह है कि ऐसा क्या है, जो इस तरह के राष्ट्रवादी आंदोलन लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रक्रियाओं के माध्यम से दुनिया भर में हो रहे हैं। ये आंदोलन फासीवादी या तानाशाही आंदोलन नहीं हैं जो बंदूक की ताकत पर हुए हैं।

क्या यह बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि शासन के अन्य सभी प्रकारों ने उन लोगों को कुछ नहीं दिया है जिसका उन्होंने आम लोगों से वादा किया था जो कि बड़े पैमाने पर दुनिया भर के अधिकांश देशों में थे। उनकी पैदाइशी भूमि के साथ पहचान उनकी निश्चितता है जिससे कोई भी राजनेता आम आदमी को दूर नहीं कर सकता है और इसलिए यह नागरिकों की राष्ट्रवादी मानसिकता का हर संभव कारण है।

द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने 4 मई 2019 के अंक में “राष्ट्रवादी जोश की वजह से नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल सुरक्षित रहने की संभावना है” शीर्षक से लेख छापा है। लेख के लेखक को मोदी सरकार के प्रदर्शन या उनके द्वारा शुरू की गई अन्य तमाम सामाजिक विकास योजनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की सराहना करने का कोई कारण नहीं है, जिससे 500 मिलियन लोग कवर होने वाले हैं। भारत ने विश्व में जो प्रगति की है, न तो उनकी रुचि उसमें है न ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत की सफलताओं को लेकर है।

द इकोनॉमिस्ट की तरह कई अन्य उदारवादी पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा की जीत का कारण और कुछ नहीं, केवल राष्ट्रवाद होगा। राष्ट्रवाद की उनकी सुविधाजनक व्याख्या संरक्षणवाद, अलगाववाद, विदेशी लोगों को पसंद न करना (जेनोफोबिया) और कुलीन विरोधी भाषणबाजी है। इन पत्रकारों के लिए कुछ मायने रखता है तो यह कि उनके और उनकी दुलारी जनजाति को क्या मिलता है। भारत की जनता को ध्यान में रखकर संधारित किए गए अभूतपूर्व कार्यक्रम इन पत्रकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए कोई मायने नहीं रखते है क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों से उन्हें कोई सीधा लाभ नहीं होता है।

राष्ट्रवाद की सदियों पुरानी नकारात्मक परिभाषाओं और धारणाओं को बदलना होगा। राष्ट्रवादी होने की सकारात्मकताओं को स्वीकार करने की ज़रूरत आन पड़ी है और देश को मजबूत बनाने में राष्ट्रवाद की भूमिका को मान्यता दी जानी चाहिए।

जो राष्ट्र से संबंधित है वह सब राष्ट्रवाद है और इसका राष्ट्र के किसी धर्म या आर्थिक समूह से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। इसे इससे भी कोई मतलब नहीं है कि कौन बहुसंख्यक है या कौन अल्पसंख्यक है। मुझे तब हैरानी होती है जब ऐसे पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों द्वारा भारत में राष्ट्रवाद को एक धर्म से जोड़ा जाता है।

ये पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार बड़ी आसानी से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि इन चुनावों में राष्ट्रवादी जोश चाबुक की मार की तरह लोगों पर पड़ेगा और नरेंद्र मोदी को फिर दूसरी बार सत्ता में लाने में मददगार होगा। चूँकि यह राष्ट्रवादी आंदोलन श्री मोदी और भाजपा को शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी दिलाने में मदद करेगा, इसलिए इसे ग़लत और अस्वीकार्य के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। क्या कुछ राजनीतिक दलों की जरूरतों के कारण उनका एजेंडा संचालित किया जा रहा है या वे वास्तव में शक्तिशाली चौथे स्तंभ के जिम्मेदार सदस्यों के रूप में कार्य कर रहे हैं?

अधिकांश भारतीयों की मूक सहमति उन विचारों (और संभवतः उनके वोटों के रूप में भी) उन लोगों के खिलाफ मजबूत हो रही है जो देश में अस्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सोच सीमा पार के उन आतंकवादियों के खिलाफ हो सकती है जो समय-समय पर भारत चोट पहुँचाते हैं और पहली बार भारतीयों को ऐसा कोई मजबूत नेता दिख रहा है जिसे पछाड़ना मुश्किल है। यह उन लोगों के खिलाफ भी हो सकता है जो “टुकडे – टुकडे” नारे का उपयोग कर भारत को तोड़ने की बात करते हैं। या यह उन लोगों के खिलाफ हो सकता है जो राजद्रोह करने को तैयार हैं और जो इतना कहकर नहीं रुकते बल्कि यह भी कह रहे हैं कि वे देशद्रोह के खिलाफ कानून को हटा देंगे।

जो साफ़ दिख रहा है वह यह कि भारत के नागरिक कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले सात दशकों में राजनेताओं की दोगली बातें बहुत सुन ली है। वे इस तरह के कथनों से भी आज़ीज आ गए हैं, जैसे

“हम इस तरह के घृणित कार्य की कड़ी निंदा करते हैं” या “हम नागरिकों के लचीलेपन का सम्मान करते हैं।”

इन सभी पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों से मेरा एक ही सवाल है कि राष्ट्रवादी होने में क्या गलत है?

मैं एक राष्ट्रवादी हूँ और ऐसा कहते हुए मुझे गर्व होता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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