सेवानिवृत्ति में अकेलेपन से जूझना

2. Reboot. Reinvent. Rewire Managing Retirement in the Twenty First Century

किसी भी उम्र में अकेलापन बड़ी समस्या होती है और सेवानिवृत्ति में खुद की कीमत कम हो जाने की भावना के साथ वित्तीय सुरक्षा से संबंधित तनाव के चलते अकेलापन गंभीर समस्या हो सकती है।

अवसाद, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं या शारीरिक बीमारी होने की एक बहुत बड़ी वजह सामाजिक अलगाव और अकेलापन भी माना जाता है। ये स्थितियाँ आमतौर पर वृद्ध लोगों से जुड़ी होती हैं, जिन्हें हो सकता है सेवानिवृत्ति में अलग-थलग पड़ जाने गंभीर अनुभव आता हो, जैसे या तो जीवनसाथी का साथ छूट जाना या बच्चों का दूर चले जाना।

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ अकेलापन, अवसाद, उच्च रक्तचाप और अन्य मनोदैहिक बीमारियों का कारण बना है। शादीशुदा सेवानिवृत्त लोगों के साथ कम से कम उनका साथी तो होता है लेकिन वे जो एकल ही हैं या जीवनसाथी से विभक्त रहते हैं या जिन्होंने अपने साथी को खो दिया है, उनकी अकेलेपन की समस्या बहुत गहरी बढ़ जाती है।

अकेलापन वह दु:ख है, जो अक्सर सेवानिवृत्त लोगों को सालता रहता है। मोटापे से भी दुगुनी बड़ी बीमारी अकेलापन है, शोधकर्ताओं के अनुसार एकांतवास की पीड़ा वृद्धों के लिए काफ़ी घातक हो सकती है।

यहाँ तक की हमेशा मित्र मंडली में रहने वाले और मिलनसार लोग भी जब खुद को अकेलेपन और छिटक जाने के अनजान परिदृश्य में पाते हैं तो वह उनके अवसाद की वजह बन जाता है। अक्सर अकेलापन जीवनसाथी की मृत्यु,करीबी दोस्त के बिछड़ जाना या कमज़ोरी लाने वाली बीमारी के विकसित होने से आता है- वे सारी बातें जिनके बारे में हम सोचना तक नहीं चाहते, लेकिन वहीं दुर्भाग्य से हमारी उम्र बढ़ने के साथ अपरिहार्य हो जाती हैं।

सेवानिवृत्त व्यक्ति अपने जीवन में कभी-कभी कई बदलावों से गुजरते हैं जो भले ही कम समय के लिए लेकिन उन्हें अकेलापन दे जाते हैं।

  1. वयस्क बच्चे घर से बाहर चले जाते हैं और कभी-कभी तो घर से बहुत दूर चले जाते हैं।
  1. इसी समय लोगों का कार्यस्थल के ज़रिए अपने आप मिलने वाला सामाजिक दायरा समाप्त हो जाता है। अधिकांश लोग कामकाजी दिनों में कार्यस्थल के बाहर सामाजिक संपर्क बनाने की ज़हमत नहीं उठाते और सेवानिवृत्ति के बाद मौजूदा सामाजिक संपर्क से बाहर निकल पाना उनके लिए कहने में जितना आसान होता है, करने में उतना ही कठिन हो जाता है।
  1. जीवन के बाद के वर्षों में किसी पड़ाव पर जीवनसाथी का साथ छूट जाना असामान्य नहीं होता। जीवनसाथी को खो देना उस व्यक्ति के जीवन का गहनतम घनीभूत पीड़ादायी अनुभव होता है।

जो लोग सामाजिक रूप से सहज और अच्छी तरह से जुड़े होते हैं, वे आसानी से नए दोस्त बना सकते हैं, लेकिन अगर आपके लिए सामाजिक बन पाना दुरुह हैं और पारंपरिक रूप से दोस्त बनाना मुश्किल होता है, तो आपको संरचित गतिविधियाँ खोजने की ज़रूरत है जो सामाजिक संपर्क बनाने में आपकी मददगार हो सकेंगी।

नए दोस्त बनाने के लिए केवल थोड़ा-सा प्रयास करना पड़ता है लेकिन यह अकेलेपन की उन भावनाओं को दूर कर देता है जो सेवानिवृत्ति में आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हो सकती हैं। इतना ही नहीं इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि सामाजिक अलगाव आपको शारीरिक रूप से भी अधिक बीमार कर देता है, अत: अकेलेपन का मुकाबला करने से आपके स्वास्थ्य में भी सुधार हो सकता है।

वरिष्ठ सेवानिवृत्तों की बढ़ती संख्या का एकमात्र साथीदार उनका अपना टेलीविजन होता है और यह एक गंभीर चुनौती है जिसका हमें सामना करने की आवश्यकता है। क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है कि हम इन बुजुर्ग नागरिकों के साथ जुड़ सकें ताकि वे कुछ लोगों के संपर्क में जीवन के अपने शेष वर्ष बिता सकें?

एक बुजुर्ग ने मुझसे बातचीत में कहा- “मानवीय संपर्क मेरे लिए प्राणवायु के समान है। मैं अपने आप को व्यस्त रखने की कोशिश करता हूँ लेकिन मानवीय संपर्क का अवसर मिलना मेरे लिए किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दूसरे इंसान का स्पर्श अधिक मायने रखता है।”

एक और बुजुर्ग ने कहा “यह मुझे दुखी करता है। मुझे नहीं लगता कि समाज के लिए अब मैं उपयोगी रह गया हूँ पर ऊपरी तौर पर मैं अपनी भावनाएँ दबाते हुए इस तरह से सोचता हूँ कि जीवन चलने का नाम। लोग कहते हैं कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ, जो अब तक मुझे सब याद है लेकिन यह मेरे लिए मददगार नहीं हो पाता। मैं अपने जीवन का अधिकतम लाभ उठा लेना चाहता हूँ।”

कई बड़े-बुजुर्ग सेवानिवृत्त लोगों से बात करने के बाद मैंने पाया कि वे अपने दोस्तों और परिवार के साथ सभी महत्वपूर्ण सामाजिक संपर्कों से चूक गए हैं। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई,वे दोनों या उनमें से एक थकता चला गया और महीन सामाजिक ताने-बाने को बुनने में नाकाम होने लगे, जो वे जीवन भर करते आ रहे थे और वे साफ़ देख पा रहे थे कि सामाजिक दायरों से वे छिटकते जा रहे थे और उन्हें कई आयोजनों के निमंत्रण आने बंद हो गए थे। इसके बाद धीरे-धीरे वे ऐसे दौर में चले गए जब ऐसे दिन भी आएँ कि उन्होंने कई हफ़्तों तक अपने घर पर काम करने आने वाले लोगों के अलावा किसी को न देखा होगा।

हमने ऐसे कई मामलों के बारे में पढ़ा है, जिसमें पड़ोसियों ने अपार्टमेंट में से “सड़ांध” आने की शिकायत की थी और पुलिस को घटनास्थल पर किसी वरिष्ठ नागरिक की मृत देह पड़ी मिली थी। सेवानिवृत्त बुजुर्गों के अकेलेपन की गंभीरता को रेखांकित करने के लिए इससे अधिक और क्या होगा कि पूछ-परख करने वाला कोई न हो और कोई अकेले मर जाएँ और उसकी मरने की ख़बर भी कई दिनों तक न लग पाएँ।

अकेलापन संक्रामक है। अकेलापन महसूस करने वाले वयोवृद्ध ऐसे तरीके अपनाने लगते हैं जिससे दूसरे लोग उनके आस-पास फटकना तक नहीं चाहते।

हाल ही में हुए सर्वेक्षण से पता चलता है कि संयुक्त परिवारों में रहने वाले केवल 10 प्रतिशत भारतीय वरिष्ठ खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं, जबकि एकल परिवारों में रहने वाले लगभग 68 प्रतिशत लोगों को अकेलापन लगता है। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले वृद्ध लोगों का सामाजिक संपर्क अधिक होता है और शहरी बुजुर्गों की तुलना में वे अकेलेपन के दर्द को कम महसूस करते हैं। यह भी पाया गया कि भारतीय वृद्ध महिलाओं की तुलना में वृद्ध पुरुषों द्वारा खुद को अकेला महसूस करने की आशंका अधिक होती है।

अकेलेपन से निपटना

बुजुर्गों और बीमारों की देखभाल करने वाले लोगों से चर्चा के आधार पर कुछ बिंदु निकलकर सामने आएँ, जिनकी मदद से अकेलेपन से निपटा जा सकता है।

  • सामाजिक बने रहें – अकेलेपन का सामना करने के लिए चिरस्थायी संबंध बनाकर रखें। उन दोस्तों के साथ फिर से जुड़ें, जिनके साथ आपका संपर्क छूट गया हैं और अपने आस-पास के दोस्तों के साथ नियमित मेल-मिलाप की दिनचर्या बनाएँ। अपने पुराने परिचितों के साथ फिर से जुड़ने के लिए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से जुड़ें। नई दोस्ती की तुलना में लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते अकेलेपन से लड़ने में अधिक फायदेमंद होते हैं। आवास संकुलों में रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों ने सामाजिक बने रहने का मार्ग चुन लिया है और कई निवासी कल्याण संघों ने उन्हें विशिष्ट क्षेत्र प्रदान किए हैं, जहाँ वरिष्ठ नागरिक सुबह और शाम मिल-बैठकर चाय-कॉफ़ी लेते हैं।
  • नई रुचियाँ खोजें – सेवानिवृत्ति तक आते-आते संभवत: आपकी प्रतिबद्धताएँ और दायित्व कम हो गए होंगे। इसका लाभ अपनी रुचियाँ टटोलने के लिए लें, चाहे तो आप किसी स्थानीय स्कूल में ख़ुशी-ख़ुशी अपनी सेवाएँ दे सकते हैं, या किसी पुस्तक क्लब में जाना शुरू कर सकते हैं या कोई वाद्य बजा सकते हैं या लेखन करना प्रारंभ कर सकते हैं। कोई गतिविधि उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना सार्थक आपका अन्य लोगों से होने वाला संवाद होगा, क्योंकि आप सभी उम्र के दोस्तों का नया वलय विकसित करेंगे, ऐसा वलय जिसके लोग आपको पसंद करते हैं और वे आपके ही समान रुचि रखते हैं।
  • सकारात्मक रहें – अपने निराशावादी या नकारात्मक विचारों को चुनौती देने के लिए खुद से बात करना बहुत प्रभावशाली देखा गया है। वर्तमान जैविक स्थितियों की गलत या तर्कहीन व्याख्याओं के कारण अक्सर अकेलापन आता है। इन विचारों को पहचानें और उनके विपरीत तर्क दें, विपरीत साक्ष्य का उपयोग करें। यदि यह मुश्किल है या आपको सहायता की आवश्यकता है, तो आप परामर्शदाता से मिल सकते हैं या किसी ऐसे मित्र के साथ बैठ सकते हैं जिस पर आप भरोसा कर सकते हो। 
  • पालतू जानवर पाल लें – कुत्ता या बिल्ली अकेले लोगों का बड़ा साथी माना जाता है। यदि आप और आपका जीवनसाथी पालतू पशु पसंद करते हैं और किसी अन्य जीवित प्राणी की देखभाल करने की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं तो अपने घर में एक पालतू पशु ले आएँ।

मदर टेरेसा ने कहा था कि “अकेलापन और अवांछित होने की भावना सबसे भयानक गरीबी है”।

जहाँ विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने सेवानिवृत्त लोगों और वरिष्ठ नागरिकों की अकेलेपन की जरूरतों को समझ लिया है, हम भारत में अभी तक उनकी जरूरतों को समझ नहीं पाए हैं। हमें लगता हैं कि कोई व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाता है तो वह अपने पसंदीदा “धारावाहिकों” को टीवी सेट पर देखते हुए खुश रहता है और उसका साथ देने के लिए कुछ दोस्त होना पर्याप्त है। हमें अधिक देखने और सुनने की जरूरत है। वृद्ध लोग अक्सर दावा करते हैं कि वे ठीक हैं, और वे बोझ नहीं बनना चाहते हैं लेकिन ज्यादातर लोगों को मानवीय संपर्क की आवश्यकता होती है।

वृद्ध लोग खजाना हैं और उन्हें ऐसा ही माना जाना चाहिए।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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अनुवादक- स्वरांगी साने – अनुवादक होने के साथ कवि, पत्रकार, कथक नृत्यांगना, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षक, भारतीय भाषाओं के काव्य के ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ शामिल। दो काव्य संग्रह- काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित।

चिकनगुनिया, डेंगू – क्या हम तैयार हैं?

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बिहार में चमकी बुखार (इंसेफेलाइटिस) पर फौरी तरीके से काम हुआ, इसे सभी ने देखा है। हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में इस तरह की उदासीनता होना दुखद और भयावह है।

मानसून आने वाला है।

मलेरिया, जो माना जाता था कि दिल्ली से लगभग गायब हो गया है, वह विकराल रुप धरकर वापस आ गया है। चिकनगुनिया मच्छर से उत्पन्न एक उभरती हुई बीमारी है जो अल्फावायरस, चिकनगुनिया विषाणु के कारण होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से एडीज इजिप्ती और ए अल्बोपिक्टस मच्छरों द्वारा प्रेरित है, इसी प्रजाति के मच्छरों से डेंगू का संचरण होता है।

हमने देखा है कि चिकनगुनिया के परिणामस्वरूप तेज़ बुखार आता है, जिसमें बेहद कमज़ोरी लाने वाला दर्द होता है, खासकर जोड़ों में। गंभीर मामलों में चकत्ते भी देखे जा सकते हैं। कमजोरी, चक्कर आना, निरंतर होने वाली उल्टी की वजह से निर्जलीकरण, मुँह का स्वाद बहुत खराब हो जाना और खून निकलना इसके खतरनाक लक्षण होते हैं। हमें कितनी ही बार बताया गया है कि हमें कहीं भी पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए और पानी के प्रबंधन के गलत तरीकों की वजह से बहुत से लोगों का चालान भी काटा जा चुका है!

जब कभी किसी महामारी से सामना हुआ है, राजनेताओं ने नौकरशाहों को दोषी ठहराया, नौकरशाहों  ने दिल्ली नगर निगम को दोषी ठहराया और नगर निगम ने फिर राजनेताओं को दोषी बताया। मंत्रीगण इसके औचित्य को सही ठहराते हुए उन कारणों की बात करते हैं, जिसकी वजह से यह हर साल होता है और अन्य सरकारों के समय भी यह कैसे होता रहा है, यह बताने लग जाते हैं। टीवी एन्कर्स गला फाड़ कर चिल्लाते हुए जवाबदेही ठहराते हैं और समाचार पत्र इन कहानियों को अपनी सुर्खियाँ बनाते हैं, पर धीरे-धीरे वे अंदर के पन्नों में चली जाती हैं।

गरीब मरीज़ों को अपने प्रियजनों के साथ रोते-बिलखते एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में दौड़ना पड़ा।

लेकिन जीवन का अद्भुत चक्र जारी रहेगा। मानसून आता रहेगा और लौट जाएगा, सैलाब कम होता जाएगा और एक दिन सूख जाएगा, और अस्पतालों में रोगियों की संख्या कम हो जाएगी, समाचार चैनलों से ये ख़बरें ग़ायब हो जाएँगी और उम्मीद रहेगी कि अगले वर्ष तक फिर मच्छर जनित बीमारियाँ नहीं दिखेंगी। हर कोई फिर राहत की साँस लेगा और हमारे देश में जैसा कि हर महामारी या आपातकाल के बाद हमेशा होता है, उस साल की समस्या का “प्रबंध” कर लिया जाता है और जैसे कि लोगों की याददाश्त बहुत कम होती है, सो इस साल की चुनौतियां जल्द ही भुला दी जाती है।

स्वास्थ्य की डरा देने वाली बातों पर बिना सोचे प्रतिक्रियाएँ दे देना हमारे लिए अपवाद के बजाय आदर्श हैं।

मानसून, मच्छर और बीमारियाँ हर साल आती हैं। हम जानते हैं कि इस समस्या की हर साल पुनरावृत्ति होती है और जब तक हम इस रोग का उन्मूलन करने में सक्षम नहीं हो जाते है, तब तक सालों-साल यह जारी रहेगी। तो ऐसा क्यों है कि हम पहले ही योजना नहीं बना पाते और इन मच्छरों से उत्पन्न बीमारी के प्रभाव की गंभीरता को कम नहीं कर पाते? हमारी सरकारें क्यों ऐसा कोई कर्मी दल नहीं बनाती, जो केवल आने वाले वर्ष की योजना पर ध्यान केंद्रित करें?

सरकार के लिए मानसून से पहले निम्न कदम उठाना काफी सरल होगा (हालाँकि इस वर्ष के लिए पहले ही बहुत देर हो जाने की आशंका है):

  1. पहचान क्षेत्रों का नक्शा उतारना– उम्मीद है, पिछले वर्षों के अनुभव के बाद, हमारे शहरों के अधिकारियों ने उन सभी क्षेत्रों का नक्शा उतारा होगा, जिसे उन्होंने जल संग्रहण के प्रवण के रूप में पहचाना है। उचित नियोजन के साथ, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मानसून की शुरुआत से पहले ऐसे सभी क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए कदम उठाए गए हैं।
  2. महामारी संबंधी सबूत– चालू वर्ष के अभिलेखों के आधार पर हमारे स्वास्थ्य शोधकर्ता इस वायरस से संबंधित गंभीरता को जानते होंगे और इसे काबू में लाने की चिकित्सकीय आवश्यकता को पहचानते होंगे।
  3. प्रकोप की त्वरित रपट करना आवश्यक है– इसका मतलब होगा कि जिन क्षेत्रों में समस्या देखी गई, वहाँ के हालात का जायजा लेने के लिए कक्ष/ निगरानी और मूल्यांकन केंद्र स्थापित करने होंगे। जिनका पूरे उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी के साथ स्पष्ट रूप से दस्तावेजीकरण कर उसका संचारण करने की आवश्यकता है।
  4. प्रयोगशालाएँ– यह हर साल की बड़ी बाधा बन चुकी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रयोगशालाएँ ज्ञात हो और नागरिकों तक उनकी जानकारी पहुँचे। और निश्चित रूप से, हमें आवश्यक जाँचों के लिए शुल्क सूची की ज़रूरत है और उसकी अग्रिम घोषणा करनी होगी।
  5. प्रतिक्रिया– प्रयोगशालाओं से हर घंटे डेटा एकत्रित करने की आवश्यकता है और अध्ययन सुधार के लिए विश्लेषण करना होगा। कुछ रोगियों के लिए देरी घातक साबित हो सकती है। पहले से तैयार समूहों से डेटा और अध्ययन सुधार को तेजी से करने में मदद मिलेगी।
  6. अनुदान- महामारी से निपटने की तमाम कार्रवाई के लिए अनुदान पहले से ही अलग रखा होना चाहिए, जिसे अब निकाला होगा। बजट और तदर्थ स्वीकृतियों के लिए हाथ-पैर मारने में समय बर्बाद होता है और तब तो यह अस्वीकार्य है, जब वह समय नष्ट हो जाता है जिसमें मनुष्य के जीवन को बचाया जा सकता है।
  7. अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम और डॉक्टरों को पहचानकर उन्हें सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। संपर्क दूरभाष क्रमांक और परीक्षण तथा उपचार के लिए पूर्व निर्धारित कीमतों की जानकारी को व्यापक रूप से विज्ञापित किया जाना चाहिए।

नागरिकों की शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना चाहिए न कि तब तक राह देखनी चाहिए जब तक समस्या सिर न उठा लें। इन क्षेत्रों में शिक्षित करने की आवश्यकता है, जैसे किस बात पर गौर करें और बीमारी की रपट कहाँ करें। लोगों को साथ ही शिक्षित करना होगा कि वे अपने घरों को मच्छर मुक्त रखें। घर के सभी कमरों में  सुरक्षित एयरोसोल का स्प्रे करें, मच्छरदानी का उपयोग करें, पानी के बर्तनों को ढाँक कर रखें, पानी के टैंक, पालतू जानवर के कटोरे और गमलों के नीचे रखी प्लेटों को सूखी रखें और पानी को जमा न रहने दें तथा  इस तरह के अन्य निवारक कदम उठाएँ।

एक बार स्पष्ट रूप से प्रलेखित योजना पर सहमती बन गई,तो इसे सक्रिय रूप से क्रियान्वित करना अपेक्षाकृत आसान और तेज़ हो जाएगा।

यदि श्रीलंका, मलेरिया के सबसे बुरे शिकारों में से एक, मलेरिया मुक्त हो सकता है, जैसा कि सितंबर 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित किया गया है, तो क्या यह आशा करना बहुत कठिन है कि भारत भी स्वच्छता के स्तर तक पहुंच सकता है, जहाँ मलेरिया और अन्य मच्छरों की वजह से होने वाली अन्य बीमारियाँ हमारे नागरिकों को प्रताड़ित नहीं करेंगी?

अंत में, बड़े पैमाने पर कोई स्वास्थ्य कार्यक्रम तब तक काम नहीं कर सकता जब तक कि स्पष्ट उत्तरदायित्व स्थापित न हो। किसी राजनेता, नौकरशाह या स्वास्थ्य कर्मचारी को अपने हाथ खड़े कर देने या कंधे झटकने की अनुमति नहीं मिल सकती है।

स्वास्थ्य किसी एक राज्य का विषय हो सकता है, लेकिन भारत की नागरिकता किसी राज्य भर की बात नहीं है।

अगर महामारी पर नियंत्रण पाना है तो केंद्र और राज्य के बीच सहयोग जरूरी है।

आरोप-प्रत्यारोप का खेल तुरंत रोकना होगा।

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लेखक कार्यकारी कोच, कथा वाचक (स्टोरी टेलर) और एंजेल निवेशक हैं। वे अत्यधिक सफल पॉडकास्ट के मेजबान हैं जिसका शीर्षक है द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You, राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक हैं और कई ऑनलाइन समाचार पत्रों के लिए लिखते हैं।

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भाजपा की लोकसभा 2019 में जीत के 12 कारण

 

190422 Lok Sabha Elections

चुनाव हो गए और परिणाम भी आ गए हैं। ज़ाहिरन श्री मोदी के नेतृत्व ने नए दम से खड़ी भाजपा को रिकॉर्ड तोड़ जीत दिलाई है। यह ऐसा चुनाव था, जिसमें मतदाताओं ने घरों से निकलकर श्री मोदी के लिए मतदान किया, श्री मोदी के उन कामों के लिए मतदान किया, जो उन्होंने किए या जिनका शुभारंभ वे वर्ष 2014 में कर चुके थे और अब मतदाताओं ने उन कामों को पूरा करने के लिए समय दिया है।

कुछ पत्रकारों द्वारा फैलाए गए झूठ और बेबुनियाद ख़बरों को मतदाताओं ने सिरे से खारिज कर दिया है। विपक्ष का संदेश “मोदी हटाओ” खारिज किया जा चुका है। राजद्रोह के लिए कानून बनाने का काँग्रेस का वादा स्वीकार नहीं किया गया है। उनके भगवा आतंक के दावे को खारिज कर दिया गया है। विपक्षी नेताओं का यह दावा कि राष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौता किया गया, उसे भी दृढ़ता से खारिज किया जा चुका है। लोकतंत्र पर मंडराते तथाकथित खतरे को अस्वीकार कर दिया गया है।

दूसरी ओर, श्री मोदी के कथन “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” पर भरोसा और विश्वास जताकर उसे गले से लगाया गया है।

इन चुनावों से स्पष्ट है कि मुख्य रूप औसत भारतीय मतदाता अपने लिए क्या चाहता है:

  1. स्वच्छ प्रशासन: विभिन्न गैर-भाजपा सरकारों के पिछले 70 वर्षों के अति भ्रष्टाचार की अविश्वसनीय चरम सीमा से हम सब नाराज और क्षुब्ध हो चुके हैं।
  1. देश का मजबूत आर्थिक विकास जिससे संपदा और रोजगार का सृजन होगा।
  1. सुरक्षित वातावरण, न कि लगातार संभावित खतरों की आशंकाएँ, जो हमें और हमारे परिवारों को शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचा सकती है। हमें अपने कंधों पर कोई बोझ होने का डर न हो। न हम किसी अज्ञात बैग की आशंका से मेज और कुर्सियों के नीचे बैठने से पहले देखना चाहते हैं।
  1. जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ स्वच्छ वातावरण ताकि हम अपने परिवारों के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

आइए हम उन कारणों की पड़ताल और जाँच करें जिनसे व्यक्तिगत रूप से श्री मोदी के खिलाफ विपक्षी नेताओं की इतनी नकारात्मकता के बावजूद भाजपा ने चुनावों की लहर को अपनी ओर कर लिया।

  1. सकारात्मक रिपोर्ट कार्ड: पिछले चुनावों के दौरान वर्ष 2014 में श्री मोदी ने वादा किया था कि वे वर्ष 2019 में अपने रिपोर्ट कार्ड के साथ निर्वाचन क्षेत्र में वापस आएँगे। पहले पाँच साल के कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुल मिलाकर, मतदाता श्री मोदी के शासन और भारत के लिए निर्धारित दिशा से संतुष्ट थे। मतदाताओं ने सरकार की सभी योजनाओं का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने अपने जीवन में इन योजनाओं के प्रभाव का अनुभव किया है। उन्होंने उन नीतियों की निरंतरता के लिए मतदान किया है। मतदाताओं ने श्री मोदी को एक मौका और दिया है।
  1. अर्थव्यवस्था: अब भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और क्रय शक्ति समानता के मामले में दूसरी सबसे बड़ी ताकत है। श्री मोदी भारत को अगले दशक के त्वरित विकास के लिए पटरी पर ले आए हैं। यह ऐसा नेता है जो हर संभव मजबूत निर्णय लेने में संकोच नहीं करता है चाहे वे निर्णय अर्थव्यवस्था से संबंधित हों या मौलिक संहिता सुधार के जैसे कि दिवालियापन संहिता। इन सुधारों का प्रभाव अब आने वाले 5 वर्षों में पूरी तरह से महसूस किया जा सकेगा।
  1. स्वच्छ सरकार: श्री मोदी ने अपने बाधकों के मन में भी स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया है कि वे साफ-सुथरे हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया है कि उनकी सरकार में कोई भ्रष्टाचार न हो। पिछले पाँच वर्षों में छोटा- बड़ा कोई घोटाला नहीं हुआ है। राफेल सौदे की चर्चाओं ने मतदाताओं पर कोई प्रभाव नहीं डाला और श्री मोदी के खिलाफ़ श्री गाँधी के भ्रष्टाचार के आरोपों ने काम नहीं किया। जितना अधिक श्री गाँधी ने श्री मोदी के बारे में दुष्प्रचार किया, उतना ही उन्होंने मतदाताओं को श्री मोदी के करीब कर दिया।
  1. विदेश नीति: भारत अब राष्ट्र मंडली में कद्दावर हुआ है। पाकिस्तान को छोड़ दे तो भारत सभी पड़ोसी देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध विकसित करने में कामयाब रहा है। साथ ही भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस तथा उसी तरह ईरान और इजरायल के साथ स्वतंत्र और मजबूत एवं चीन के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत रखने में सफल रहा है। मतदाता ने भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते सम्मान को माना है। इन नीतियों का प्रभाव भारतीय पासपोर्ट के प्रति बढ़ते सम्मान में देखा जा सकता है। 
  1. महागठबंधन: महागठबंधन काम न आ सका। निश्चित रूप से उस तरीके से नहीं, जिस तरह राहुल गांधी ने खुद ही सभी के एक नेता के रूप में खुद को ताज पहनाया था। क्षेत्रीय नेताओं के इस अभिप्रेरक समूह के किसी भी घटक के पास कोई सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम नहीं था और न ही उन्होंने मतदाताओं के सामने समान मूल्यों के मानक समुच्चय को प्रस्तुत करता प्रतिनिधित्व दिया था। महागठबंधन के युद्धरत नेताओं ने अपने असली रंग दिखाए क्योंकि वे नुकीली ज़ुबान से बात करते रहे। एक ही रौ में वे अपने गठबंधन सहयोगियों की आलोचना भी करते रहे और प्रशंसा भी। इन राजनीतिक दलों के नेताओं को जितना लगता है कि मतदाता उन पर विश्वास करता है उससे कहीं अधिक भारतीय मतदाता चाणाक्ष हैं।
  1. राहुल गाँधी: जब यह लेख छपने के लिए तैयार था तभी, श्री गाँधी अमेठी में 17,000 से अधिक वोटों से पीछे चल रहे थे। यह नुकसान इसे भी स्थापित करेगा कि कैसे वे कोई भी परिणाम दिलवाने में सक्षम नहीं है। यद्यपि वे यह मानना चाहते हैं कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में उनकी जीत केवल उनके खाते में थी, अगर कोई लोकसभा चुनाव में पड़े मतों को देखे, तो वह संख्या अलग कहानी बताती है। श्री गाँधी ने भारत के लिए कोई भी स्पष्ट दृष्टिकोण या नए मार्ग की घोषणा नहीं की। उनकी न्याय योजना की बिना किसी विचार के घोषणा कर दी गई और उनके सलाहकार सैम पित्रोदा ने उनकी कोई मदद नहीं की, नियमित अंतराल पर उनके मुँह से गोले ही बरसते रहे। प्रियंका गाँधी ने वोटों को तोड़ने में थोड़ी कामयाबी हासिल की, जैसा कि उन्होंने कहा था, लेकिन यह सपा-बसपा गठबंधन के लिए हुआ।
  1. हिंदी के गढ़ और पश्चिमी भारत: हिंदी के गढ़ और महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों की जनता के दिलों में अभी भी श्री मोदी हैं। उन्होंने तीन राज्यों में भाजपा को मत देकर बाहर कर दिया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने बाहर निकलकर मोदी के लिए बहुत बड़ी संख्या में मतदान किया, जो आज देश के सबसे बड़े नेता हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा ने भी श्री मोदी का स्वागत किया है। विभाजनकारी राजनीति को मतदाताओं ने नकार दिया है और यह आने वाले वर्षों में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। 
  1. बुनियादी ढाँचा: भारत के बुनियादी ढाँचे में सुधार दिख रहा है। नई सड़कों के निर्माण से लेकर हवाई अड्डों तक और बेहतर बिजली आपूर्ति से लेकर सुपर-फास्ट ट्रेनों तक, सभी के लिए बेहतर बुनियादी ढाँचे की दिशा का मार्ग दिख रहा है। वर्ष 2014 से पहले, हमने अपने दैनिक जीवन के एक हिस्से के रूप में “लोड शेडिंग” को स्वीकार कर लिया था। जो अब बंद हो गया है। मतदाताओं का मानना है कि अभी और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है और उन्होंने श्री मोदी को इसके लिए एक और कार्यकाल का समय दिया है ताकि जो काम शुरू हुए थे, उन्हें पूर्णत्व की ओर ले जाया जा सकें। 
  1. मिलियन समर्थन: वर्ष 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले 80 मिलियन नए मतदाताओं ने मोदी के पक्ष में भारी मतदान किया। इन युवा भारतीयों का अयोध्या या राम मंदिर से कोई संबंध नहीं है, लेकिन श्री मोदी में, ये मिलियन युवा एक ऐसा नेता देख रहे हैं, जो उनके सपनों का भारत दिलवा सकता है। वे अपनी जीवन शैली में समग्र सुधार देखते हैं, और वे भारत के प्रति वैश्विक रवैये में परिवर्तन देख सकते हैं। 
  1. आतंक पर सख्त: पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमले का परिणाम सभी के सामने हैं। अगर पुलवामा हमले के बाद विपक्ष ने सरकार की आलोचना नहीं की होती, तो उन्हें बालाकोट हवाई हमलों के बाद धूल चाटनी नहीं पड़ती। मतदाता यह स्वीकार करता है कि केवल श्री मोदी को कड़ी टक्कर देने की हिम्मत थी और वे ऐसा नेता चाहते हैं जो देश की सीमाओं की रक्षा कर सके। 
  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था: हालाँकि विपक्षी दल चाहेंगे कि हम दूसरे तरीके को सही मानें लेकिन तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों के आँकड़े ग्रामीण भारत में अपनी बिक्री में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हैं। कुछ भी हो, श्री मोदी ने गरीबों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। न्याय योजना आसमान में एक कौड़ी भर थी, जबकि किसानों को सीधे लाभ हस्तांतरण ने बदलाव दिखा दिया। अधिक करने की आवश्यकता है और श्री मोदी निश्चित रूप से अपने एजेंडे में शीर्ष पर होंगे। 
  1. राजवंशीय राजनीति खारिज: भले ही काँग्रेस को 2014 के चुनाव के बाद से कोई विकास नहीं दिख रहा है। लेकिन काँग्रेस नेताओं को इस बारे में गंभीर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या उन्हें “परिवार” के सदस्य को नेता बनाये रखा जाना चाहिए या फिर स्वयंसेवकों को फिर से सक्रिय करने के लिए नए खून का संचार करना चाहिए। 22 विपक्षी दलों के नेता जो अपनी पार्टियों पर अपने परिवार की पकड़ को बनाए रखने के लिए दृढ़ थे, उन्हें भी खारिज कर दिया गया है। क्या अब ये नेता अपने काँटेदार पैतरे दिखाना शुरू कर देंगे क्योंकि उनके मतभेद खुलकर सामने आएँगे या फिर भी वे एक मंच पर हाथ से हाथ मिला रहने में सक्षम होंगे, यह दिखाने के लिए कि वे एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं!

विपक्षी नेता चुनाव प्राधिकरण बदलने की माँग, पक्षपातपूर्ण चुनाव आयोग, नकारात्मक चुनाव और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की वापसी जैसे बहाने बनाते रहेंगे, लेकिन वे भी थोड़े समय में ही महसूस करेंगे कि ये खुद को समझाने के बहाने हैं। कोई भी मतदाता उनके किसी भी बहाने पर विश्वास नहीं करता। विपक्षी नेताओं के लिए, आत्मनिरीक्षण का समय आ गया है।

श्री मोदी के नेतृत्व में भारत को सर्वोत्कृष्ट मिलना अभी शेष है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं। 

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राष्ट्रवादी होना और ऐसा कहने में गर्व होना

190504 Nationalists

चुनाव अपने लंबे वृत्त को पूरा करते हुए समापन पर आ गए हैं। इन चुनावों को सबसे अधिक दोषारोपण करने वाले चुनावों के रूप में देखा जा सकता है और बीते कुछ दशकों में मैंने तो हर राजनेता को इतनी व्यंग्य उक्तियों से भरे हुए भाषण देते पहले कभी नहीं देखा था,जितना इस बार देखा।

इसके अलावा अभी तक जितना “राष्ट्रवाद” या “राष्ट्रवादी”  वाक प्रचार इन चुनावों का हिस्सा बना वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। भाजपा के सभी विरोधी दल, पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार इस शब्द को भाजपा और उसके सभी अनुयायियों पर आरोप के रूप में फेंक रहे हैं जैसे कि राष्ट्रवादी होना कोई अपराध है और जिसे हर हाल में लताड़ा जाना चाहिए, अपमानित करना, ताने मारना, उपहास करना और दंड दिया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद आधुनिक आंदोलन है। पूरे इतिहास में हम देखते हैं कि लोग अपनी पैदाइशी मिट्टी, अपने माता-पिता की परंपराओं, और स्थापित क्षेत्रीय प्राधिकारी से जुड़े होते हैं। अमूमन 18 वीं शताब्दी के अंत तक राष्ट्रवाद सार्वजनिक और निजी गठन की भावना के रूप में पहचाना जाने लगा। राष्ट्रवाद को कई बार ग़लती से राजनीतिक व्यवहार का कारक माना जाता है।

राष्ट्रवादी व्यक्ति वह होता है जिसकी उसके राष्ट्र के साथ पहचान दृढ़ होती है और जो राष्ट्र के हितों का दृढ़ता से समर्थन करता है।

दुनिया भर में राष्ट्रवादी आंदोलनों ने व्यक्ति को उसकी पहचान बनाने और राष्ट्रीय हित को बनाए रखने में मदद की है। राष्ट्रवादी आंदोलनों की पहली लहर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में क्रांतियाँ लेकर आईं, जिनके चलते जर्मनी और इटली का एकीकरण हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पूर्वी और उत्तरी यूरोप के साथ ही जापान, भारत, आर्मेनिया और मिस्र में इसकी दूसरी लहर उठी। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी राष्ट्रवादी आंदोलन था जैसे दुनिया के अधिकांश अन्य हिस्सों का उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन।

पूरे विश्व में राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आंदोलन तेजी से बढ़ रहे हैं।

यह डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव से हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि वे निश्चित रुप से फिलीपींस के राष्ट्रपति डुटर्टे के राष्ट्रवादी हैं। तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन से लेकर इंडोनेशिया में राष्ट्रपति जोकोवी तक, जापान में प्रधान मंत्री शिंजो आबे से लेकर इज़राइल में प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तक। दुनिया भर के और भी कई देशों में और अधिक राष्ट्रवादी नेता चुने जाएँगे। चीनी और रूसी नेता अपने कम्युनिस्ट देशों में अपने लोगों की रैली निकालने के लिए राष्ट्रवाद के रूप का उपयोग करते हैं।

महत्वपूर्ण कारक जिसे समझा जाना चाहिए और जिसका अध्ययन होना चाहिए वह यह है कि ऐसा क्या है, जो इस तरह के राष्ट्रवादी आंदोलन लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रक्रियाओं के माध्यम से दुनिया भर में हो रहे हैं। ये आंदोलन फासीवादी या तानाशाही आंदोलन नहीं हैं जो बंदूक की ताकत पर हुए हैं।

क्या यह बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि शासन के अन्य सभी प्रकारों ने उन लोगों को कुछ नहीं दिया है जिसका उन्होंने आम लोगों से वादा किया था जो कि बड़े पैमाने पर दुनिया भर के अधिकांश देशों में थे। उनकी पैदाइशी भूमि के साथ पहचान उनकी निश्चितता है जिससे कोई भी राजनेता आम आदमी को दूर नहीं कर सकता है और इसलिए यह नागरिकों की राष्ट्रवादी मानसिकता का हर संभव कारण है।

द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने 4 मई 2019 के अंक में “राष्ट्रवादी जोश की वजह से नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल सुरक्षित रहने की संभावना है” शीर्षक से लेख छापा है। लेख के लेखक को मोदी सरकार के प्रदर्शन या उनके द्वारा शुरू की गई अन्य तमाम सामाजिक विकास योजनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की सराहना करने का कोई कारण नहीं है, जिससे 500 मिलियन लोग कवर होने वाले हैं। भारत ने विश्व में जो प्रगति की है, न तो उनकी रुचि उसमें है न ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत की सफलताओं को लेकर है।

द इकोनॉमिस्ट की तरह कई अन्य उदारवादी पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा की जीत का कारण और कुछ नहीं, केवल राष्ट्रवाद होगा। राष्ट्रवाद की उनकी सुविधाजनक व्याख्या संरक्षणवाद, अलगाववाद, विदेशी लोगों को पसंद न करना (जेनोफोबिया) और कुलीन विरोधी भाषणबाजी है। इन पत्रकारों के लिए कुछ मायने रखता है तो यह कि उनके और उनकी दुलारी जनजाति को क्या मिलता है। भारत की जनता को ध्यान में रखकर संधारित किए गए अभूतपूर्व कार्यक्रम इन पत्रकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए कोई मायने नहीं रखते है क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों से उन्हें कोई सीधा लाभ नहीं होता है।

राष्ट्रवाद की सदियों पुरानी नकारात्मक परिभाषाओं और धारणाओं को बदलना होगा। राष्ट्रवादी होने की सकारात्मकताओं को स्वीकार करने की ज़रूरत आन पड़ी है और देश को मजबूत बनाने में राष्ट्रवाद की भूमिका को मान्यता दी जानी चाहिए।

जो राष्ट्र से संबंधित है वह सब राष्ट्रवाद है और इसका राष्ट्र के किसी धर्म या आर्थिक समूह से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। इसे इससे भी कोई मतलब नहीं है कि कौन बहुसंख्यक है या कौन अल्पसंख्यक है। मुझे तब हैरानी होती है जब ऐसे पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों द्वारा भारत में राष्ट्रवाद को एक धर्म से जोड़ा जाता है।

ये पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार बड़ी आसानी से निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि इन चुनावों में राष्ट्रवादी जोश चाबुक की मार की तरह लोगों पर पड़ेगा और नरेंद्र मोदी को फिर दूसरी बार सत्ता में लाने में मददगार होगा। चूँकि यह राष्ट्रवादी आंदोलन श्री मोदी और भाजपा को शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी दिलाने में मदद करेगा, इसलिए इसे ग़लत और अस्वीकार्य के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। क्या कुछ राजनीतिक दलों की जरूरतों के कारण उनका एजेंडा संचालित किया जा रहा है या वे वास्तव में शक्तिशाली चौथे स्तंभ के जिम्मेदार सदस्यों के रूप में कार्य कर रहे हैं?

अधिकांश भारतीयों की मूक सहमति उन विचारों (और संभवतः उनके वोटों के रूप में भी) उन लोगों के खिलाफ मजबूत हो रही है जो देश में अस्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सोच सीमा पार के उन आतंकवादियों के खिलाफ हो सकती है जो समय-समय पर भारत चोट पहुँचाते हैं और पहली बार भारतीयों को ऐसा कोई मजबूत नेता दिख रहा है जिसे पछाड़ना मुश्किल है। यह उन लोगों के खिलाफ भी हो सकता है जो “टुकडे – टुकडे” नारे का उपयोग कर भारत को तोड़ने की बात करते हैं। या यह उन लोगों के खिलाफ हो सकता है जो राजद्रोह करने को तैयार हैं और जो इतना कहकर नहीं रुकते बल्कि यह भी कह रहे हैं कि वे देशद्रोह के खिलाफ कानून को हटा देंगे।

जो साफ़ दिख रहा है वह यह कि भारत के नागरिक कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले सात दशकों में राजनेताओं की दोगली बातें बहुत सुन ली है। वे इस तरह के कथनों से भी आज़ीज आ गए हैं, जैसे

“हम इस तरह के घृणित कार्य की कड़ी निंदा करते हैं” या “हम नागरिकों के लचीलेपन का सम्मान करते हैं।”

इन सभी पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों से मेरा एक ही सवाल है कि राष्ट्रवादी होने में क्या गलत है?

मैं एक राष्ट्रवादी हूँ और ऐसा कहते हुए मुझे गर्व होता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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ठोस मुद्दों के सामने नासमझ विपक्ष

190422 Lok Sabha Elections

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के दो दौर समाप्त हो चुके हैं।

विपक्षी नेताओं की आवाज और अधिक तीखी और तेज होती जा रही है क्योंकि उन्हें शायद दीवार पर लिखा साफ़ दिख रहा है। उनकी हताशा स्पष्ट है क्योंकि वे एक गैर-मुद्दे से दूसरे गैर-मुद्दे पर इस उम्मीद से उछल-कूद कर रहे हैं कि मतदाता मोदी सरकार के खिलाफ़ कुछ आरोप तो सुन लेंगे और स्वीकार कर लेंगे।

राजनेता सपाट चेहरों से झूठ बोल सकते हैं। वे बार-बार अपने झूठ को दोहराते हैं और एक स्तर पर आकर अपने ही झूठ को सच मानने लगते हैं।

आइए हम उन 10 शीर्ष गैर-मुद्दों को देखें और उनका मूल्यांकन करें जिनके बारे में विपक्षी दल बात करते नहीं अघाते हैं।

  1. भ्रष्टाचार: यह जानते हुए भी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सिद्ध कर दिया है कि सरकार में कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं है, विपक्ष भ्रष्टाचार के कुछ विश्वसनीय आरोप लगाने के लिए बेताब है, गोया जिसे मतदाता स्वीकार कर सकते हैं। राहुल गाँधी ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और खुद पर लगे आरोपों पर रोते हुए कहा कि अनिल अंबानी को विमान के बड़े ऑर्डर दिए गए थे। श्री गाँधी ने राफेल की संख्याओं को बदल दिया है और अपनी इच्छा से श्रोताओं को संबोधित करते हुए हर बार इन “राफेल” निधियों का उपयोग अलग तरीके से करते हैं, बिना यह समझे कि उनके भाषण रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और जिनकी तुलना की जाती है, और कुछ नहीं तो कम से कम एक-जैसा तो कुछ कहे। ऐसे में ज़रा भी आश्चर्य नहीं है कि अन्य विपक्षी दलों में से किसी एक ने भी इस मुद्दे को या मोदी सरकार के किसी अन्य भ्रष्टाचार के मुद्दे को नहीं उठाया है।
  1. 15 लाख रु: कई विपक्षी नेताओं की एक सामान्य टिप्पणी मतदाताओं को यह याद दिलाने की कोशिश है कि श्री मोदी ने वर्ष 2014 के चुनावों में प्रत्येक मतदाता को 15 लाख रुपये देने का वादा किया था। जब छोटे पर्दे पर पक्षपाती पत्रकार साउंड बाइट्स के लिए पूछते हैं तो वे इस माँग के लिए कुछ मतदाताओं को प्रेरित कर प्राप्त करने का प्रबंधन कर लेते हैं। यह तथ्य कि विपक्षी दल श्री मोदी का वह भाषण नहीं खोज पाए हैं, जहाँ ऐसा वादा किया गया था, जो पर्याप्त सबूत होता। अगर इस तरह का वास्तव में कोई भाषण होता, तो वर्ष 2019 के चुनावों के लिए यह एकल बिंदु एजेंडा होता।
  1. किसान संकट: किसान संकट पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह ऐसी समस्या है जो पिछले 70 वर्षों में बिना किसी खास समाधान के चली आ रही है। हमें विश्वसनीय नीति की आवश्यकता है जो यह सुनिश्चित करे कि किसानों को उनकी उपज का उचित पारिश्रमिक मूल्य मिले, उन्हें अच्छी गुणवत्ता के बीज, पर्याप्त उर्वरक, उचित भंडारण सुविधाएँ और भरपूर पानी मिले। केवल मोदी सरकार ने कृषि की इन पाँच बुनियादी आवश्यकताओं को संबोधित किया है। कृषि संकट एक चुनौती है जिसे संभालने में समय लगेगा। काँग्रेस की बार-बार ऋण माफी की परिपाटी, हमारे किसानों के लिए स्थायी वित्तीय कल्याण का निर्माण करने में मदद नहीं करती है। वे पैसा कमाने का अवसर चाहते हैं और शासकीय सूचना पर निर्भर बन जाते हैं। शरद पवार और देवेगौड़ा जैसे वरिष्ठ कृषि नेताओं ने अपने नेतृत्व में अपने राज्यों में किसान संकट और किसान आत्महत्याएँ देखी हैं। जब वे सत्ता में थे तबकी उनकी टिप्पणियों को देखना दिलचस्प होगा कि कैसे उन्होंने किसान संकट को संभाला था।
  1. रोजगार निर्माण: काँग्रेस पिछले 5 वर्षों में रोजगार सृजन की कमी से जूझ रही है। वे इसे मतदान का महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं बना पाई है क्योंकि वे इससे हज़ारों साल नहीं खरीद रहे हैं। सरकार में पर्याप्त नौकरियों का सृजन नहीं हुआ है, लेकिन विशाल बुनियादी ढाँचे पर खर्च के साथ बढ़ती अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र में बहुत सारी नौकरियाँ पैदा कर रही है। भविष्य निधि लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है। स्टार्टअप उच्च स्तर पर हैं। परिवहन क्षेत्र में अब जैसी तेजी पहले कभी नहीं देखी गई है। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों से तेजी से आगे बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों को माँग में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। सरकार को भविष्य में इसी तरह के आरोपों का सामना करने के लिए निजी और असंगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन के अधिक विश्वसनीय डेटा को जल्दी से विकसित करने की आवश्यकता है।
  1. रसायन पर अंकगणित: कुछ राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी नेता साथ आ रहे हैं तो दूसरे राज्यों में वे एक-दूसरे से ही लड़ रहे हैं। मायावती और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में साथ हैं और काँग्रेस से लड़ रहे हैं और तब भी सभी पार्टियाँ साझा विपक्षी मंच पर साथ आ रही हैं। केजरीवाल और काँग्रेस दिल्ली में अपने रास्ते जाने का फैसला कर रहे हैं लेकिन हरियाणा में वे एक साथ आना चाहते हैं। इन नेताओं का मानना है कि साथ आना वर्ष 2014 के चुनावों में मतदाताओं को जोड़ने का सरल अंकगणित होगा। वे मानते हैं कि मतदाता उनके गैर-गठबंधनों और निहित विरोधाभासों के आर-पार देख नहीं सकता है और वे भूल जाते हैं कि नेता के साथ मतदाता का रसायन संख्याओं के अंकगणित से अधिक महत्वपूर्ण है।
  1. पुलवामा और बालाकोट: दुनिया भर के युद्धों का राजनेताओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। हर विपक्षी नेता पुलवामा और बालाकोट मामले में सत्तारूढ़ दल की स्थिति में रहना चाहेगा। श्री मोदी ने सशस्त्र बलों को आगे बढ़ने की अनुमति देने का निर्णय लिया और वे इस निर्णय का श्रेय लेने का अधिकार रखते हैं। इंदिरा गाँधी ने वर्ष 1971 के युद्ध का श्रेय तब लिया जब बांग्लादेश बनाया गया था। कारगिल युद्ध का श्रेय श्री वाजपेयी को मिला। श्री मोदी को बालाकोट का श्रेय लेने का पूरा अधिकार है। पुलवामा हमले और श्री मोदी की तत्काल विश्वसनीय प्रतिक्रिया न देने की कमी के बाद विपक्षी नेता अपनी टिप्पणी भूल जाते हैं। जब कार्रवाई की गई, तो वे बेईमानी से रोने लगे। इसके विपरीत, यदि ऑपरेशन सफल नहीं होता, तो क्या विपक्षी नेता भूल जाते और विफलता को चुनावी मुद्दा नहीं बनाते?
  1. विमुद्रीकरण और जीएसटी: विपक्षी नेता समझते हैं कि विमुद्रीकरण का शुरुआती दर्द भुला दिया गया है। जीएसटी ने आम आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। विमुद्रीकरण और जीएसटी अब चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है और राहुल गाँधी इस विषय पर ढोल पीटना चाहते हैं, मतदाता के पास इन विषयों पर अधिक झूठ और असत्य सुनने का समय नहीं है।
  1. लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बचाओ: ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल लोकतंत्र को बचाने और भारतीय जनता पार्टी को वोट देकर बाहर करने की आवश्यकता के बारे में चिल्लाते रहते हैं। ममता बनर्जी तानाशाही सरकार चलाती हैं, जो विपक्ष को स्वीकार नहीं करती, केजरीवाल इन चुनावों में कोई महत्व नहीं रखते हैं। विपक्षी नेता जो धार्मिक मतों के आधार पर मतदाताओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वे उसी रौ में धर्मनिरपेक्षता का सहारा ले रहे हैं। ये विपक्षी नेता चुनावों के ठीक मध्य भारत के लोकतंत्र को बचाने की चिल्ला-चोट कर रहे हैं और दुनिया सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावों की साक्षी होने जा रही है!
  1. कोई विकास नहीं: व्यापक बयानों में कहा गया है कि पिछले 5 वर्षों में भारत में कोई विकास नहीं हुआ है जबकि सभी सूचकांकों से संकेत मिलता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। सड़कों और बिजली में हुए सुधार हर कोई देख और अनुभव कर सकता है। भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और बढ़ा हुआ कद हर भारतीय को गर्वित करेगा।
  1. कमजोर नेता: प्रियंका गाँधी तार सप्तक की आवाज में कहती जा रही हैं कि मोदी अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मोदी रहे हैं। जबकि सार्वजनिक जीवन में उनकी इस तथ्य के अलावा लगभग कोई विश्वसनीयता नहीं है कि वे अपनी दादी की तरह दिखती है, कोई भी मतदाता कभी भी इस हास्यास्पद टिप्पणी पर विश्वास नहीं कर सकता है कि जिसे वे बार-बार फैलाने की कोशिश कर रही है।उदार पत्रकारों की सेनाएँ अपने पुराने आकाओं को कुछ गोला-बारूद मुहैया कराने की उम्मीद में डेटा और पिछले भाषणों को हवा दे रही हैं। मतदाताओं को साधने की कोशिश करने में बोलबाला करते हुए साक्ष्य का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन सत्तारूढ़ दल द्वारा उनका जल्दी और प्रभावी तरीके से खंडन किया जा रहा है।

विपक्षी नेता खुद इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उन्हें किस बारे में बात करनी चाहिए। तथ्य तो यही है कि एक भी विश्वसनीय मुद्दा नहीं है और यही वजह है कि विपक्षी दल साझा मंच पर एक साथ नहीं आ पा रहे हैं। सभी विपक्षी दलों का एकमात्र साझा एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी को हटाना है। मतदाताओं को समझाने के लिए इतना भर पर्याप्त नहीं है जो अपने जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव देख सकते हैं और यह जानते हैं कि आने वाले वर्षों में वे और अधिक विकास की उम्मीद कर सकते हैं।

श्री मोदी द्वारा वर्ष 2014 में निर्धारित एजेंडा फिर वर्ष 2019 में स्पष्ट रूप से हासिल किया जा रहा है। बहुत कुछ पूरा हो चुका है और आने वाले 5 वर्षों में बहुत कुछ किया जाना है।

भारतीय हमेशा एक मजबूत नेता चाहते रहे हैं और अब हम हमारे पास वह है।

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चुनावी घोषणापत्र – भाजपा बनाम काँग्रेस

190409 Go Vote

चुनाव समीप आ गए हैं। इसी के साथ आ गए हैं चुनावी घोषणापत्र, जिनमें कई वादें और सपने हैं, बिना ये देखें-समझें कि पिछले चुनावों में क्या वादे किए गए थे और तब से अब तक उनमें से कितने पूरे हुए। इन सालों में राजनीतिक दलों ने इसे रोजनामचा जैसा बना लिया है गोया जिसे हर चुनाव से पहले पूरा करना पड़ता है। उनसे कोई नहीं पूछता कि वे ऐसा क्यों करते हैं और निर्वाचित अधिकारियों के एक बार सत्ता में आ जाने के बाद कोई उनके किए चुनावी वादों को भी नहीं देखता।

इसलिए हमें कौन-सा घोषणापत्र हमारी पसंद के अनुरूप है यह तय करने से पहले गौर से देखना होगा कि राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में जो वादे किए थे उनमें से उन्होंने कितने पूरे किए, साथ ही जिसने घोषणापत्र जारी किया उस दल के नेता की विश्वसनीयता को भी परखना होगा। इसका बाकायदा ट्रैक रिकॉर्ड रखना होगा।

आइए हम उन मुख्य मुद्दों की जाँच करें जिनका सामना हमारा राष्ट्र कर रहा है और देखें कि भाजपा और काँग्रेस उन पर किस तरह ध्यान दे रही है। हमें सारी बयानबाजी पर कैंची चलाकर प्रत्येक बिंदु को आर्थिक विवेक के लेंस से तौलना होगा।

  1. रोजगार: हमारे देश की आबादी में हर साल 28 मिलियन से अधिक लोग जुड़ते हैं, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सत्ता में जिसकी सरकार है उसे रोजगार पैदा करने हैं। लेकिन क्या यह केवल सरकारी नौकरियों से साध्य होगा? या सरकार को ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करना चाहिए जो उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने के लिए अनुकूल हो। काँग्रेस अधिक सरकारी नौकरियों का वादा कर रही है तो भाजपा अधिक उद्यमी अवसर प्रदान कर रही है। यदि हम प्रभावी नौकरशाही चाहते हैं तो सरकारी नौकरियों की संख्या हमेशा परिमित होगी।
  1. स्वास्थ्य: हमारी बढ़ती जनसंख्या की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के आगे कोई तर्क नहीं हो सकता है। यह तथ्य है कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की वस्तुस्थिति भयावह है और कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता या इसे चुनौती नहीं दे सकता है। भाजपा ने अपनी आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से जो किया है, वह विचारणीय है, जिसने हमारे देश के लगभग 40% लोगों को चिकित्सा बीमा प्रदान की है। काँग्रेस के घोषणापत्र में राइट टू हेल्थकेयर एक्ट (स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम का अधिकार) की बात की गई है, लेकिन यह सोचा जाना चाहिए कि पहले से क्या लागू किया गया है जबकि उसके सामने किसका वादा किया जा रहा है।
  1. शिक्षा: काँग्रेस के घोषणापत्र में शिक्षा के लिए वार्षिक बजट का 6% आरक्षित करने का वादा किया गया है, जबकि भाजपा के घोषणापत्र में शिक्षण संस्थानों में वृद्धि की बात की गई है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भाजपा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए हमारे शैक्षिक संस्थानों को विकसित करना चाहती है, यहाँ एक बार फिर भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश पर ध्यान केंद्रित करने की बात है।
  1. किसान: आजादी के बाद से अब तक किसानों की दुर्दशा को लेकर बहुत बातें हुई लेकिन उनके लिए काम बहुत कम हुआ है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी किसान खैरात में भोजन नहीं चाहता है। वह कड़ी मेहनत कर अपनी जमीन से आजीविका अर्जित करना चाहता है। काँग्रेस, अपनी सामान्य शैली में अधिक विज्ञप्ति पत्रक देने का वादा करती है जबकि भाजपा 2024 तक खेत की आय दुगुना करने और खेती के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराने की बात करती है। इसी के साथ भाजपा ने पहले ही नीम लगे उर्वरक और बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़- एमएसपी) योजना लागू कर दी है।
  1. सुरक्षा: राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में किसी स्पष्टीकरण या चर्चा की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है, हर भारतीय (शायद कुछ अपवादों को छोड़कर) अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा चाहता है। इसमें हमारी सीमाओं की सुरक्षा, हमारे घरों की सुरक्षा और हमारी व्यक्तिगत सुरक्षा शामिल है। काँग्रेस आतंकवाद की समस्या को हल किए बिना सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को शिथिल करना चाहती है। भाजपा का स्पष्ट रूप से विपरीत दृष्टिकोण है और हमने देखा है कि किस नेता ने बीते वर्षों में क्या कार्रवाई की है। भाजपा ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी शून्य सहनशीलता (जीरो टॉलरेंस) पर जोर दिया है। क्या हम आतंकवाद पर केवल “कड़ी निंदा” करने का जोखिम उठा सकते हैं जैसा कि हमने हमेशा हमला होने के बाद किया है या हमें पूर्ण निवारण के लिए मुँह-तोड़ जवाब देना चाहिए?
  1. राजकोषीय विवेक: काँग्रेस का घोषणापत्र स्पष्ट रूप से मजबूत अर्थव्यवस्था दिए जाने की संभावनाओं का लालच दे रहा है, जहाँ मुद्रास्फीति नियंत्रण में हो, चालू खाता घाटा अपने सबसे निचले स्तर पर है और जीडीपी में लगातार मजबूत वृद्धि देखी गई है। वे न्यूनतम आमदनी योजना (एनवाईएवाई) जैसी अपनी लोकलुभावन योजनाओं के साथ खजाने पर छापा मारने का एक शानदार अवसर देखते हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने हमेशा राजकोषीय विवेक का प्रदर्शन किया है और कठिन निर्णय लेने में संकोच नहीं किया है जब हमारे देश के लिए दीर्घकालिक राजकोषीय नीतियों को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
  1. समान नागरिक संहिता: दुनिया में शायद कोई देश ऐसा नहीं है जो अपने नागरिकों के धर्म के आधार पर लागू कानूनों की बहुलता रखता हो। सभी नागरिकों के लिए कानून समान होने चाहिए। हमारी आजादी के बाद के विकास के चलते समान नागरिक संहिता के कड़े फैसले को टालते रहना तब से चली आ रही सरकारों को अनुकूल लगा है। इससे धार्मिक समूहों के बीच बहुत सारी चुनौतियाँ आई हैं। यह समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन शुरू होने वाली एक स्वस्थ बहस शुरू करने का समय है और भाजपा ने इस मुद्दे को संबोधित किया है, जबकि काँग्रेस समझदारी से चुप है।
  1. आधारिक संरचना : स्वतंत्रता के बाद हमसे क्रमिक सरकारों ने हमेशा अच्छे बुनियादी ढाँचे का वादा किया है। “अच्छे” की परिभाषा को कभी स्पष्ट नहीं किया गया है। क्या गड्ढेदार सड़कों को अच्छा या स्वीकार्य माना जाता है? क्या शुष्क और बिजली कटौती को स्वीकार्य माना जा सकता है? आज के युवा भारतीय अच्छी सड़कें, 100% बिजली और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की सुविधा को स्वीकार मानते हैं। भाजपा के घोषणापत्र में वर्ष 2022 तक सभी के लिए बुनियादी ढाँचे और आवास में महत्वपूर्ण निवेश के बारे में बात की गई है।

राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का घोषणापत्र निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में नौकरियों के आरक्षण का वादा करता है, उसे किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है। कई और हास्यास्पद वादे होंगे जो अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा किए जाएँगे। ये अभी अभी पैदा हुए वादे हैं जिन्हें सभी जानते हैं कि इन्हें कभी लागू नहीं किया जा सकता है।

जैसे-जैसे विकसित दुनिया की आबादी सिकुड़ती जाएगी, अधिक से अधिक भारतीयों को इन विकसित राष्ट्रों में प्रवास करने का अवसर मिलेगा। क्या हमें एक ऐसे नेता की आवश्यकता नहीं है जो भारत को को ऊँचाई प्रदान करे और यह सुनिश्चित करे कि हमारा पासपोर्ट अधिक शक्तिशाली हो या हमें ऐसे नेताओं के समूह की आवश्यकता है जो अपनी आवक देख रहे हों और यह सुनिश्चित करने में लगे रहे कि विश्व भविष्य के भारतीयों का स्वागत नहीं कर पाए?

भाजपा का घोषणापत्र भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विकसित राष्ट्र बनाने की बात करता है। काँग्रेस हमारे देश को गरीबी और अशिक्षा में रखना पसंद करेगी क्योंकि इसी तरह वे चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। लेकिन भारत बदल गया है, और युवा भारतीय जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए।

पर मिलियन डॉलर का सवाल बना हुआ है। क्या चुनावी घोषणापत्र का मतदाता से कोई मतलब होता है या वह विभिन्न नेताओं के अहंकार को फुगाने में अधिक उचित होता है? क्या हम ऐसा घोषणापत्र चाहते हैं, जिसे लागू करने पर कुछ राजनेताओं के अल्पकालिक व्यक्तिगत लक्ष्यों को पूरा करने के लिए देश के खजाने पर छापा पड़ेगा?

हमें अपने स्थानीय राजनेता और हमारे राजनीतिक नेताओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन “लोकतंत्र के त्योहार” की प्रतीक्षा करने के बजाय 5 साल तक करना चाहिए। यह एक आकलन है जो सत्ता में जो पार्टी है और जो विपक्ष में पार्टी है उसका होना चाहिए। एक नेता को अपने वादों को पूरा करने के लिए सरकार में रहने की आवश्यकता नहीं होती है।

जिम्मेदार मतदाताओं के रूप में, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि एक सरकार को कम से कम 2 मौके देने की आवश्यकता होती है  ताकि जो उसने शुरू किया है वह लागू हो। अगर 10 साल के अंत तक भी वादे नहीं निभाए गए, तो मतदाता को बदलने का पूरा अधिकार है। यूपीए को 10 साल दिए गए थे। एनडीए भी इसका हकदार है।

अंत में, जैसी कि पुरानी कहावत है, एक आदमी को मछली दें तो उसके एक दिन के लिए पर्याप्त होगी। एक आदमी को मछली पकड़ना सिखाया तो वह अपने सारे जीवन (सभी शाकाहारियों से माफी के साथ) खा सकेगा। हम देख सकते हैं कि कौन सा घोषणापत्र हमें खाने के लिए मछली दे रहा है और कौन सा घोषणापत्र हमें मछली पकड़ना सिखाने का वादा कर रहा है!

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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10 कारण जिनकी वजह से हमें गठबंधन सरकार को वोट नहीं देना चाहिए

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चुनावों में भाजपा की लोकप्रियता में वृद्धि के आवेग को देखते हुए, इसे समझना आसान है कि किस तरह विपक्षी नेताओं को चिंता हो रही होगी, जो अपने राजवंशों और उनकी प्रासंगिकता को बचाने की जद्दोजहद में हैं। वहीं यह भी काफ़ी आश्चर्यजनक है कि लेखकों ने ऐसे लेखों को लिखना शुरू कर दिया है, जिसमें गठबंधन को महिमामंडित किया जा रहा है और केंद्र में गठबंधन सरकार के आने की उम्मीदें की जा रही हैं।

गठबंधन को व्यक्तियों के ऐसे समूह के अधिनियम के रूप में परिभाषित किया जाता है जो समान मूल्यों पर चलते या सामान्य दृष्टि साझा करते हैं। राजनीतिक गठबंधन ने गठबंधन के अर्थ को किसी संयुक्त कार्य को पूरा करने के अस्थायी गठबंधन की तरह अनुकूलित कर लिया है, लेकिन तब भी अपने घटकों के बड़े हित हासिल करने के साझे लक्ष्यों के साथ।

आगामी चुनावों में निष्क्रिय महागठबंधन का अब एकल बिंदु एजेंडा केंद्र में भाजपा को हटाना है। बस इतना ही। इसके पूर्व के गठबंधनों के विपरीत, इस बार महागठबंधन के घटक एक सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम के साथ भी नहीं आ पाए हैं। गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर भी कोई सहमत नहीं हो सका है। वे राज्यों में आर-पार लड़ते हैं और केंद्र में सहयोग करते हैं।

दुनिया भर में गठबंधन सरकारें हमेशा कमजोर और कम निर्णायक रही हैं। लगभग सभी गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म समझौता और सहिष्णुता है, जहाँ समायोजन और पारिश्रमिक जरूरतों को स्वीकार करना राष्ट्रीय आवश्यकताओं पर प्राथमिकता है। सबसे अधिक गठबंधन सरकारों का सामान्य धर्म है, जहाँ राष्ट्रीय आवश्यकताओं से ऊपर समायोजन और संकुचित जरूरतों को स्वीकारना प्राथमिकता होती है।

आइए हम गठबंधन सरकार की खामियों को परखते हैं क्योंकि इसके साक्ष्य न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में स्पष्ट दिखते हैं और उसके बाद अपना आकलन कर मतदान के लिए कदम बढ़ाते हैं।

  1. यह संघीय संरचना के साथ समझौता है: गठबंधन सरकारें अपनी परिभाषा के अनुसार छोटी पार्टियों का समूह है जो साथ आता है क्योंकि कोई भी अकेली पार्टी सरकार नहीं बना सकती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती होती है कि नेतृत्व कौन करेगा। हमने मुख्यमंत्रियों को चक्रीय क्रम में देखा है ताकि उनके व्यक्तिगत एजेंडे पूरे किए जा सकें। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम व्यक्तिगत क्षेत्रीय पार्टी एजेंडा को अपने राष्ट्र का मार्ग निर्धारित करने की अनुमति न दें।
  1. मजबूत बनाम लंगड़ा घोड़ा प्रधान मंत्री: पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टेलीकॉम घोटाले के बारे में पूछे जाने पर प्रसिद्ध टिप्पणी की थी कि उन्होंने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था और इसलिए वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। नेता के पास तब समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है, जब उसका सामना ऐसी चुनौती से होता है जो किसी एक पार्टी के लिए हो, पर देश के लिए नहीं। जीएसटी, दिवालियापन संहिता, जन हित योजनाएँ जैसे आधार, जन धन योजना, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना और अन्य ऐसी योजनाएँ जो पिछले 2 दशकों से सरकार के एजेंडे में थीं, लेकिन गठबंधन सरकारों की वजह से उन्हें लागू नहीं किया जा सका था।
  1. भारत का संविधान: संविधान ने उन 100 क्षेत्रों को निर्धारित है जिन्हें केवल संसद द्वारा तय किया जा सकता है, राज्यों द्वारा नहीं; इनमें रक्षा, विदेश नीति, सामान्य मुद्रा, न्यायपालिका, संघीय कर, वायुमार्ग और कई अन्य शामिल हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में गठबंधन सरकारों के निहित हित होते हैं। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव लाने की आवश्यकता होती है और वे हमेशा इन क्षेत्रों को अपने हिसाब से मोड़ने के तरीके खोजते रहते हैं।
  1. राजकोषीय विवेक से समझौता होना: अपने गठबंधन सहयोगियों की अलग-अलग वित्तीय माँगों को पूरा करने के लिए ऐसी सरकारों का राजकोषीय विवेक के साथ समझौता करना देखा गया है। क्षेत्रीय और राज्य की आवश्यकताएँ अग्रता क्रम में आ जाती हैं। मुद्रास्फीति की उच्च दर और उच्च राजकोषीय घाटे को देखना आम है जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के गंभीर संरचनात्मक दोषों को जन्म देता है।
  1. वादे पूरा करने के इरादे से नहीं किए जाते: मतदाताओं के सामने स्पष्ट जवाबदेही होना चाहिए ताकि वे अपने नेताओं से उनके द्वारा किए चुनावी वादों को पूरा करने के लिए कह सकें। गठबंधन सहयोगियों के पास हमेशा अपने किए वादों को पूरा न करने का कोई न कोई विश्वसनीय बहाना अवश्य होता है। भ्रष्टाचार को विभिन्न राजनीतिक दलों की जरूरतों को पूरा करने के स्वीकार्य अभ्यास के रूप में भी देखा जाता है जो अपने उसमें से अपने हिस्से माँग करते हैं। किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
  1. स्वास्थ्य और शिक्षा: राज्य नियंत्रित विषय जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा भी एक मामला है। हर कोई सर्वसम्मति से स्वीकार करता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा पर सभी को ध्यान देने की आवश्यकता है। हम राज्यों में मौजूद भारी असमानताओं को देख सकते हैं। हमारे राजनेता ऐसा क्यों मानते हैं कि सभी लोग समान नहीं हैं, और कुछ राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा है और अन्य राज्यों में नहीं? यही बात उन अधिकांश अन्य क्षेत्रों पर लागू होती है जिन्हें राज्य स्तर पर शासन के लिए सौंपा गया है।
  1. व्यक्तिगत एजेंडा निर्णय लेने की प्रबल प्रेरणा: संसद की 5 साल की अवधि और उससे भी कम गठबंधन के आपसी तालमेल की छोटी अवधि को देखते हुए, राजनीतिक दलों को पता है कि उनके पास अपने संबंधित समूहों के वित्तीय लाभों को अधिकतम कर सकने के का लघु गवाक्ष है। यह हमने यूपीए सरकार के वर्ष 2004 से वर्ष 2014 तक के कार्यकाल में देखा है और मुझे ज़रा भी भरोसा नहीं है कि वर्ष 2019 में सत्ता में आने पर यह सोच बदल जाएगी।
  1. विदेश नीति: विश्व राजनीति सीमाहीन दुनिया से ऐसी दुनिया में बदल रही है जहाँ फिर से सीमाएँ खींची जाने लगी हैं। मजबूत नेताओं के मजबूत देश ही इस नई दुनिया में ऐसी जगह बना पाएँगे जहाँ मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और मजबूत रक्षा क्षमताओं का सम्मान होगा। हमने उरी और बालाकोट की आलोचना होते देखी है। अगर कश्मीर में धारा 370 को लेकर कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे पहले ही हम तोड़-फोड़ की घटनाओं के बारे में सुन चुके हैं। गठबंधन सरकार, अपनी परिभाषा से ही हमेशा कमजोर रहेगी और इसलिए राष्ट्रीय पटल पर देश के हितों के साथ समझौता करेगी।
  1. निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी: ज़ाहिरन जब ऐसे दर्जनों लोग होंगे जो मानते हो कि वे गठबंधन में दूसरों की तुलना में राष्ट्र का बेहतर नेतृत्व कर सकते हैं, तो हर विषय पर उनके विचार अलग-अलग होंगे। इसलिए सबसे सरलतम मामलों पर भी निर्णय लेने के लिए सभी के समर्थन की आवश्यकता होती है और इस प्रकार निर्णय लेने की गति धीमी हो जाती है।
  1. कोई भी दल पल्ला झाड़ सकता है: गठबंधन सरकारें कमजोर होती हैं और हमेशा बर्फ की महीन सिल्ली पर चलती हैं, जिसमें जाने कब दरारें दिखाई देने लगे। वे ऐसे व्यक्तियों के समूह द्वारा समर्थित होते हैं जिनकी कोई सर्वसामान्य विचारधारा नहीं होती है। पहला कदम गठबंधन के खिलाफ बयान देने लगता है, फिर रूठना-मनाना शुरू होता है और अंतिम चरण इस तरह समर्थन खींचना होता है जिससे सुनिश्चित हो जाए कि ताश के पत्तों का महल बिखर जाएगा। सरकारों के ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जब सरकार खुद या उसके मूल्यों के साथ समझौता किया गया है और आगे भी ऐसे कई मामले देखे जा सकेंगे।

क्या भारत गठबंधन के नेताओं की कमजोर, अस्थिर और स्वार्थी जोड़-तोड़ को स्वीकार कर सकता है जिनके अपने निजी और व्यक्तिगत एजेंडा हैं और पिछले 5 वर्षों में हमारे हिस्से आई सभी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दरकिनार हो जाना बर्दाश्त कर सकता है?

पुरातन बात याद रखें कि “बहुत सारे रसोइए शोरबा खराब कर देते हैं?” क्या हम प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए संगीतमय कुर्सी का खेल देखना चाहते हैं? क्या हम हर 6 महीने में एक नया प्रधान मंत्री देखने को तैयार हैं?

अधिकांश सरकारें 40% से कम वोटों से चुनी जाती हैं। हालाँकि, सरल गणित काम नहीं करता है। यदि पिछले चुनावों में युद्धरत दो दल अपने वोटों की साँठ-गाँठ करते हैं, तो वे अपने आप यह मान लेंगे कि वे अगले चुनावों में जीत हासिल कर कर लेंगे। वे यह भी मानते हैं कि उनका मतदाता इतना नासमझ है कि संयुक्त पार्टी के लिए मतदान कर देगा और अतीत में एक दूसरे के खिलाफ उनके बाहुबली नेताओं द्वारा कही गई सारी बातों को भूला चुका होगा।

हमें एक ऐसी पार्टी की आवश्यकता है जिसके पास संसद में आवश्यक 272 सीटें हों। इससे सुनिश्चित होगा कि नेताओं को निर्णय लेने के लिए समझौता नहीं करना पड़ेगा जो छोटे क्षेत्रों के लिए तो चल सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि राष्ट्र हित में हो।

हमें अपने दिमाग का उपयोग कर वोट करने की ज़रूरत है जिससे सुनिश्चित हों कि हम एक मजबूत नेता के साथ एक ही पार्टी को वोट दें, जो लाखों युवाओं को उनके सपने सच में बदलने में मदद कर सकता है।

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लेखक कार्यकारी कोच और एंजेल निवेशक हैं। राजनीतिक समीक्षक और टीकाकार के साथ वे गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं। वे 6 बेस्ट सेलर पुस्तकों – द ब्रांड कॉल्ड यू- The Brand Called You रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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