सेवानिवृत्ति और आपके जीवन साथी के साथ संबंध – भाग 2

2. Reboot. Reinvent. Rewire Managing Retirement in the Twenty First Century

कामकाजी जीवन के अंत में हम सभी को सेवानिवृत्ति के बड़े बदलाव का सामना करना पड़ता है और फिर हमारे सामने एक अलग समस्या होती है कि रोज़मर्रा का काम का तनाव न रहने पर अब इस पूरे समय को कैसे बिताया जाएँ। तिस पर जीवनसाथी के साथ 24 घंटे तारतम्य बैठाने के तनाव से भी साबका होता है।

किसी समय आप दोनों केवल सुबह-शाम ही एक-दूसरे से मिला करते थे, आपके पास बच्चों और अपने काम के तनाव के बारे में करने के लिए बहुत-सी बातें हुआ करती थीं लेकिन अब अचानक आपके पास बहुत सारा समय होता है और आपके पास काम के बारे में बात करने जैसा कुछ खास नहीं रह जाता।

इन दो बातों को समायोजित करने का परिणाम आपको तनाव देने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

इस लेख के पहले भाग की निरंतरता को बनाए रखते हुए मैंने अपने और अपने दोस्तों के जीवन से कुछ अनुभवों को लिया है जिससे आप दोनों घर-परिवार में वैवाहिक माधुर्य को बरकरार रख सकते हैं :

  • घर पर अपने लिए जगह बनाएँ – यह हमेशा अच्छा होता है कि आप अपने घर में कुछ ऐसी जगहें निर्धारित करें जो केवल ‘आपकी’ हो। हो सकता है वह कोई कुर्सी हो जिस पर बैठकर केवल आप, अख़बार पढ़ते हो या कोई मेज जिस पर आप अपने दोस्तों के साथ पत्ते खेल सकें या लिखने की कोई छोटी डेस्क, जिसे आप अपनी कह सके। अपने ही घर में आपके पास ऐसी जगह होनी चाहिए, जहाँ, जब भी आपका मन चाहे आप वहाँ बैठकर अपनी ‘छोटी-छोटी खुशियाँ’ पा सकें।
  • थोड़ समय “अपने” “अकेले” के लिए निकालें – कभी-कभी अकेले रहना बहुत ज़रूरी होता है ताकि आप खुद को कुछ समय दे सकें, अपने आप से बात कर सकें और मनन कर सकें। आपके साथी ने आपके लिए जो कुछ किया उसकी प्रशंसा में भी आप इस समय का सदुपयोग कर सकते हैं। दंपत्तियों के पास अलग-अलग कमरों में अलग-अलग कंप्यूटर या टीवी होना चाहिए। इससे आप ख़ुद-ब-ख़ुद कुछ समय अपने लिए अलग से निकाल पाएँगे। आपको एक साथ रहने और अकेले रहने के बीच के संतुलन को स्थापित करने की आवश्यकता है। हर चीज़ एक साथ करना और पूरे समय साथ-साथ रहना कुछ युगलों के लिए कारगर हो सकता है, लेकिन आम तौर पर साँस लेने जितनी थोड़ी खुली जगह रिश्ते में ताज़गी लाती है खासकर सेवानिवृत्ति के बाद।
  • अपने साथी की ज़रूरतों का सम्मान करें – यदि आपका साथी देर से सोना पसंद करता है और आप सुबह जल्दी उठने वालों में से है, तो सुबह उठने पर आपको जो चीज़ें लगने वाली हैं उन्हें अलग कमरे में रखना शुरू कर दीजिए और साथी की नींद ख़राब किए बिना आहिस्ता-से कमरे के बाहर निकलिए। इससे आपकी साथी की नज़र में आपका स्थान निश्चित ही और ऊँचा हो जाएगा।
  • हर सुबह तैयार रहें – पुरुषों के लिए यह बात ख़ासकर लागू होती है कि उन्हें अब भी हर सुबह वैसे ही तैयार हो जाना चाहिए जैसे वे काम पर निकलने के लिए हुआ करते थे, न कि दोपहर के भोजन के समय तक बीती रात के कपड़ों में अलसाते हुए इधर-उधर घूमते रहे। इससे आप घर की दिनचर्या को गड़बड़ा कर रख देंगे,चूँकि आप सेवानिवृत्त हो चुके है तो वैसे भी यह एक तयशुदा कारण है जो आपके साथी के तनाव को बढ़ा रहा है। इतना ही नहीं, यह दिनचर्या आपको पूरे दिन कुछ अधिक सार्थक करने का विचार करते रहने में सहायक सिद्ध होगी।
  • कुछ काम तय कर लें, जो आप करेंगे – यह ख़ासकर उन पुरुषों के लिए अधिक प्रासंगिक है जिन्होंने अभी तक घर पर ज़्यादा काम न किया हो। उनके लिए अच्छा होगा कि वे हर दिन के किसी एक काम का जिम्मा अपने ऊपर ले ले जैसे सुबह की पहली चाय बनाना या वाशिंग मशीन चलाना या कुत्ते को सैर पर ले जाना या ऐसा कोई भी काम जिसके लिए आप दोनों सहमत हो। मैंने यह भी देखा है कि कई सेवानिवृत्त पुरुष बाहर के कामों की जवाबदारी उठाते हैं जैसे कुछ खरीदारी करना हो या सब्जी लाना हो- जो इससे पहले उन्होंने कभी नहीं किए थे। कुछ लोग तो ऐसे काम करना इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि ये काम उन्हें बाहर जाने और लोगों से मिलने का मौका देते हैं।
  • अलग टॉयलेट प्रयोग करना शुरू करें – शादी के कई साल बीतने के बाद भी घर में किसी भी वजह से चिड़चिड़ाहट हो सकती है जैसे टॉयलेट भी घर के तनाव बढ़ाने का अहम कारण हो सकता है। नहाने के बाद तौलिया सूखाने नहीं डाला या सुबह नहाने के बाद वाशरूम का सिंक साफ़ नहीं किया- दंपत्तियों के बीच कोई भी मुद्दा हो सकता है जिसका पता उन्हें शादी के तीन दशकों बाद अब जाकर चलता है और जिस पर वे इन दिनों एक-दूसरे से झगड़ते पाए जा सकते हैं! यदि आपके घर में दो टॉयलेट हैं तो एक अपने लिए और एक अपने साथी के लिए अलग-अलग तय कर दें।
  • अपनी रूचियाँ अलग रखें – यदि आप दोनों की सभी रूचियाँ समान है तो जीवन निरस हो जाएगा और आप ऐसा नहीं चाहेंगे। घर पर बात करने के लिए कुछ भी नहीं रहेगा। यदि एक गोल्फ खेलता है और दूसरा ब्रिज तो इसे बढ़ावा दें। अपनी अलग-अलग रूचियों के बारे में चाय पर या खाना खाते हुए किया गया वार्तालाप धीरे-धीरे आपको अधिक सार्थक संवाद की ओर ले जाएगा जो आपको आपस में बाँधे रखेगा।
  • कुछ दोस्ती-यारी अलग रखें – यद्यपि आप दोनों के बीच हमेशा मजबूत रिश्ता बना रहेगा और आपका दूसरे लोगों से मिलना-जुलना भी लगभग साथ-साथ होगा, पर आप दोनों की समझदारी इसी में है कि अपने कुछ दोस्त अलग रहने दें। यह आपकी खुद की व्यक्तिगत उन्नति के लिए बेहतर होगा और आपकी अपनी पहचान भी बनी रहेगी। पुरुषों के सामने अधिक बड़ी चुनौती होती है क्योंकि आम तौर पर उनके कामकाजी जीवन में अल्पकालिन कार्यालयीन रिश्ते होते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं, यदि कई पुरुष सेवानिवृत्ति के बाद अपने स्कूल या कॉलेज के दोस्तों की खोजबीन शुरू कर देते हो।
  • बहस – शादी के बाद से अब तक आपके पास असहमतियों का पिटारा होगा क्योंकि आप एक-दूसरे का साथ इतने लंबे समय से निभाते चले आ रहे हैं। आप दोनों के पास इतना समय तो नहीं रहा होगा कि ऑफ़िस के लिए दूर जाने या व्यावसायिक यात्रा करने से पहले आप इस बात की राह देखें कि कब माहौल शांत हो। इतने सालों के साथ ने आपको एक-दूसरे के मूड को अच्छी तरह से समझा दिया होगा और यह भी जानते होंगे कि कौन किस बात पर भड़क सकता है। इस तरह की चर्चाओं से परहेज़ करें और यदि आपको लगता है कि ऐसा कुछ घटित हो रहा है तो पहल करते हुए वहाँ से उठकर कहीं और चले जाएँ। अच्छा होगा कि असहमति पर सहमत हो, न कि एक-दूसरे से लगातार झगड़ते रहे और अगले कुछ दिनों तक के लिए दोनों का जीना दुर्भर हो जाएँ!

किसी ने टिप्पणी की कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी शादी में शांति किस तरह बनाए रखी है:

“ मैं पिछले 33 सालों से अपनी शादी से ख़ुश हूँ। मेरा रहस्य? दो तौलिए। मेरी पत्नी को सुबह नहाने के बाद दो साफ़ तौलिए लगते हैं। हर रात सोने जाने से पहले मैं दो धूले हुए तौलिए निकालकर बाथरूम में रख देता हूँ। इस तरीके से उसे भी यह अहसास होता है कि मैं सोने जाने से पहले आख़री बात उसी के बारे में सोचता हूँ।”

पर शायद, महिलाओं को मैं सबसे अच्छी सलाह यह देना चाहूँगा वे शांत रहें और पति के घर पर होने का आनंद ले। पति के लिए ख़ुश हो जाएँ कि अब उन्हें रोज़ सुबह उठकर जल्दी-जल्दी काम के लिए भागना नहीं पड़ता। जीवन भर काम करने और अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के बदले अब उन्हें यह आराम नसीब हुआ है। अपनी झुंझलाहट और खिंचाव को हल्का करते हुए उसमें से सुकून तलाशे। ऐसी योजनाएँ बनाइएँ जिसे आप दोनों कर सकें या पति को कोई शौक पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखिए, उन्हें खाली बैठे रहने की आदत नहीं है और वे आपकी सलाह की अवश्य सराहना करेंगे। पहले-पहले सेवानिवृत्ति की राह उबड़-खाबड़ लग सकती है लेकिन सालभर या कुछ और समय बीत जाने के बाद आपकी दिनचर्या नियमित हो जाएगी।

आपका वैवाहिक नाता अटूट है। आप दोनों स्वतंत्र व्यक्ति हैं। शादी में समझौता और एक-दूसरे को स्वीकारना, आपको पहले से कहीं अधिक करना होगा क्योंकि आप दोनों इसके बाद का पूरा जीवन “दु:खी रहने लगे” वाला नहीं चाहेंगे।

कई सेवानिवृत्त दंपत्ति पहली बार एक ऐसी जीवनशैली जीना सीखते हैं जिसका दोनों आनंद ले सकते हैं और जिससे दोनों की भावनात्मक ज़रूरतें पूरी होती है। वे अपनी उन आदतों को बदल डालते हैं जिनकी वजह से दशकों तक उनका रिश्ता कष्टप्रद था। एक-दूसरे को चोट देते रहने से बचना, एक-दूसरे की भावनात्मक ज़रूरतों को समझना…ये सब सीखते हुए अब जीवन के हर दूसरे दिन वे एक-दूसरे से ख़ौफ़ खाए नहीं रहते।

अपने जीवन बचे हुए वर्षों को देखते हुए ख़ुशी-ख़ुशी जीने के लिए समायोजन कीजिए।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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Retirement and the relationship with your Spouse – Part 2

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Retirement is a major change that each one of us have to face towards the end of our working life and as we adjust our lives to handling our time without the daily pressures of work, we have the to face the additional pressure of adjusting our lives to spending 24 hours with our spouse.

From meeting one another in the morning and evening, talking about children and one’s work pressures, you are suddenly faced with a lot of time and not much to talk about relating to your work.

These two adjustments can result in substantial stress.

In continuation to part 1 of this article, I have made some observations to keep marital accord in the home between the two of you, from my own life and that of my friends:

  • Build personal space at home – It is always good to earmark small areas in your home that “belong” to each of you. This could be a chair where you sit to read your newspaper or a table where you play cards with your friends or a writing desk, which you call your own. Within your home, you should have the ability to “retreat” to your space when you wish to have your own space.
  • Keep some “alone” or “personal” time – It is very important to be alone sometimes so as to be able to give yourself space, allow you to introspect and think. You can also use this time to appreciate all that your spouse does for you. Couples should have separate computers and separate televisions in separate rooms. This will automatically enable you to some spend time alone. You need to strike a balance between togetherness and staying apart. Doing everything together and being together all the time may work for some couples but generally, some mutual breathing space always adds value to a relationship particularly post retirement.
  • Respect your partner’s needs – If your partner likes to sleep late and you are an early riser, start to keep what you need in the morning in another room and tip toe out of your bedroom without disturbing your partner’s sleep. You will earn a lot of brownie points for this from your partner!
  • Dress up every morning – It is particularly important for men to ensure that they dress up every morning like they used to when they were working rather than laze around almost upto lunch in their night clothes. Upsetting the routine at home because you have retired is a guaranteed cause for increasing stress with your spouse. Besides, this routine will also help you to think of doing something more meaningful during the day!
  • Designate tasks that you will do – This is more relevant for the men who may not normally have done too much work at home. It would help them to get a routine like making morning tea or running the washing machine or taking the dog out for a walk or anything that both of you agree with one another. I have also found a lot of retired men take on outdoor responsibilities such as buying provisions and vegetables – something that they had never done earlier. Some actually look forward to this activity because it gives them a chance to get out and meet people.
  • Start using separate toilets – Anything can become an irritant at home after a long marriage and toilet usage is as good a reason as any for stress at home. From a simple matter of not putting the towel out in the sun after your shower to not cleaning the washroom sink after your morning ablutions – everything can become an issue among a couple who are struggling to rediscover one another after three decades of marriage! If you have two toilets at home earmark one for yourself and the other for your partner.
  • Pursue separate interests – if both of you have all the same set of interests, life could become very boring and you don’t want that. There will be nothing to talk about at home. If one person plays golf and the other plays bridge, encourage this. Conversation about your separate interests over a cup of tea or at the dining table will gradually evolve into more meaningful conversations that bind the two of you.
  • Maintain a few separate friendships – While there will always be a strong bond between both of you and most of your socializing will be together, it is wise for both of you to have some friends who are separate for your own personal growth and to help in maintaining your identity. Men will face a bigger challenge because they have generally had short term work related relationships through their working lives. It is no surprise that a lot of men reach out and discover their school and college mates post retirement.
  • Arguments – There are bound to be disagreements in your marriage as you adjust with one another for a much longer period of time every day. You also do not have the luxury of going away to your office or travelling on a business trip waiting for both of you to “cool” down. Having spent so much time together, you should be able to gauge the other person’s moods as well as understand the “hot” buttons that provoke your partner. Steer away from such discussions and if you are confronted with such a scenario, take the lead and walk away. It is better to agree to disagree rather than clash with one another and make both miserable for a few days!

Someone commented about how they have managed to keep sanity in their marriage post retirement:

“I have been happily married for 33 years. My secret? Two towels. My wife likes having two fresh towels for her shower in the morning. Every night the last thing I do before I go to bed is get two fresh towels and put them in the bathroom. That way she knows the last thing I’m thinking of before I go to sleep is her.”

But probably the best advice I can give women is to relax and enjoy having him at home. Be glad for him that he doesn’t have to get up every morning and head out to work anymore. He can reap the rewards of a life spent working and providing for his family. Make light of the annoyances and distractions, find amusement in them. Plan things that you can do together, or encourage him to create a hobby. Remember, he is not used to free time and he may appreciate your suggestions. Retirement can be a bumpy road at first, but after a year or so, a routine will develop.

You have had a strong marriage. You are both independent people. Compromise and accept in your marriage now more than ever because you do not want to live “unhappily ever after” for the rest of your lives.

Several retired couples learn to create, for the first time, a lifestyle that they both enjoy and that meets the emotional needs of both of them. They learn to eliminate personal habits that had made their relationship miserable for decades. After they learn to avoid hurting each other, and learn to meet each other’s emotional needs, they no longer dread being with one other day in and day out for the rest of their lives.

Look at the remaining years and make adjustments to live happily.

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies and the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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सक्रियतावाद और राजनीति- घनिष्ठ संबंध?

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किसी कार्यकर्ता को शब्दकोश में उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो किसी ख़ास उद्देश्य की वकालत पूरे दम-ख़म से करता है। इस लिहाज़ से, राजनीतिक कार्यकर्ता वह व्यक्ति होना चाहिए जो राजनीतिक उद्देश्य की पैरवी करे। नतीजन, यदि वकालत करने वाला ही लाभ पाने वाला हो जाए, तो आम तौर पर इसमें स्वार्थ का बड़ा संघर्ष माना जाएगा। हमारे अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता अपने आंदोलनों से लाभ पाना चाहते हैं।

बीते दिनों पुणे में भड़की हिंसा, जिसने पूरे महाराष्ट्र में रौद्र रूप ले लिया, में हैरतअंगेज बात दिखी कि जहाँ सक्रियतावाद अनगढ़ राजनीतिक महत्वाकांक्षा के रूप में विकसित हो रहा था। जबकि इसके ठीक विपरीत, राजनीतिक अवसरों की कमी या गिरावट कैसे प्रासंगिकता हासिल करने के लिए सक्रियतावाद में परिणीत हो जाती है? क्या यह ऐसा दुष्चक्र है, जिसे आने वाले वर्षों में हमें लगातार बार-बार देखना पड़ सकता है?

किसी भी विपक्षी दल के लिए बहुत आसान होता है कि वह सत्तारूढ़ दल की आलोचना करे और उसे आड़े हाथों ले। वर्ष 2019 के चुनावों से पहले ही लगता है राहुल गाँधी को ये दोनों काम एक साथ मिल गए हैं। कुछ मामलों में दृढ़ता से अपनी बात रखना उनके विचारों की स्पष्टता को दिखाता है लेकिन आश्चर्य होता है कि वर्तमान सरकार द्वारा किए गए हर काम की चरम आलोचना करने की ज़रूरत का उनका एजेंडा क्या है?

जीएसटी, विमुद्रीकरण, उजाला (एलईडी बल्ब प्रयोग से पर्याप्त रोशनी प्रदान करना), सौभाग्य (40 मिलियन घरों को बिजली प्रदान करना) और उड़ान (अर्ध शहरी और ग्रामीण इलाकों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए क्षेत्रीय हवाई अड्डों का विकास) आदि काफी प्रगतिशील योजनाएँ होने से आम तौर पर सर्व सामान्य द्वारा स्वीकृत हैं। यदि ये योजनाएँ सफल हो जाती हैं तो प्रभावशाली परिणाम आ सकते हैं जिसके वादे पिछले सात दशकों से हमारे राजनीतिक वर्ग के लोग करते आ रहे हैं। इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठ सकते हैं लेकिन लागू करने के इरादे पर नहीं।

तो राजनीतिक बिरादरी का एक तबका और अख़बार इन सारी योजनाओं में कोई न कोई ख़ामी क्यों निकालते रहते हैं, बजाए इसके कि सरकार के हाथ से हाथ मिलाकर उन्हें क्रियान्वित करवाने में एड़ी-चो़टी का ज़ोर लगा दें।

सत्तारूढ़ दल की आलोचना कर मतदाताओं के मन में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश करना एक ऐसा तरीका है, जिसे हर राजनेता अपनाता है। तथापि, जब अतिरिक्त वोट पाने के लिए जाति और समुदाय के नाम पर बँटवारा किया जाएँ और जिसका हश्र हिंसा तथा किसी आम इंसान की मौत में हो जाएँ तो यह सक्रियतावादियों की राजनीतिक लड़ाई का नया आम पैंतरा बन रहा है।

एक प्रमुख विपक्षी दल उपेक्षित पत्रकारों के समर्थन से गुंडागर्दी करने वाले ‘राजनैतिक कार्यकर्ताओं’ के साथ मिलकर जब देश का बँटवारा करना तय कर लेता है तो यह प्रवृत्ति ख़ासी चिंताजनक है, ऐसे में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन-सा दल सत्ता में है, उससे होने वाला नुकसान लंबे समय तक झेलना पड़ सकता है क्योंकि वह असाध्य और अपरिवर्तनीय होता है। आज की राजनीति सत्तर और अस्सी के दशक में चली गई है, जब आरक्षण, कर्ज़ माफ़ी, भाषा, धर्म और वोट बैंक की राजनीति आदर्श हुआ करती थी।

निम्नलिखित उदाहरणों के विकराल प्रभाव बड़े भयानक और डरावने हो सकते हैं।

  1. पाटीदार और जाट: गुजरात में पाटीदारों के लिए और हरियाणा में जाटों के लिए आरक्षण की माँग का सच सभी जानते हैं कि इस तरह के आरक्षण देने का कोई ख़ास लाभ नहीं होगा बल्कि यह पतन की ओर ले जाने वाला अल्पकालिक कदम है जिसकी माँग कांग्रेस की शह पर कुछ छुटभइये नेता कर रहे हैं। इन राज्यों की मौजूदा भावी सरकार इन माँगों को किस तरह पूरा कर पाएगी? नई माँगों को पूरा करते हुए, जो लोग आरक्षण के दायरे में नहीं आएँगे उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
  2. दलित: जिग्नेश मेवानी ने केजरीवाल तरीके से बड़बोलापन करते हुए ख़ुलेआम दलितों को सत्ता हासिल करने के लिए सड़कों पर लड़-भिड़ने के लिए उकसाया। यह उसकी सत्ता हासिल करने की अपरिपक्व भूख़ को दर्शाता है। उसी के शब्दों में वह स्वीकार करता है कि वह 2% राजनेता है जबकि 98% कार्यकर्ता है। कितनी जल्दी यह अनुपात बदल जाएगा, कह नहीं सकते? जिग्नेश मेवानी की भड़काऊ भाषण देने की प्रवृत्ति और उस वजह से कानून और व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए बिना कुछ सोचे-समझे कि इस वजह से देश-समाज की कितनी बड़ी क्षति हो सकती है मायावती और राहुल गाँधी जैसे वरिष्ठ नेता उसकी आवाज़ को बल दे रहे हैं।
  3. लिंगायतः  कर्नाटक में चुनाव जीतने के छोटे-से कारण के लिए मतदाताओं के ध्रुवीकरण के इरादे से कर्नाटक में लिंगायतों को हिंदू समुदाय से अलग करने की बेरहम कोशिश की जा रही है। राज्य में इस तरह हज़ारों छोटे-छोटे समुदाय बन जाने से क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है।
  4. अन्य: मतदान के लिए जाने से पहले प्रत्येक राज्य के कार्यकर्ता समय रहते अपने लिए कुछ ऐसे मुद्दे खोज ही लेंगे जो उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत के लिए मज़बूत मंच बन सकेंगे।

राहुल गाँधी अपनी त्रयी हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी के साथ गुजरात में धमाकेदार लड़ाई लड़ चुके हैं और हो सकता है वे अपने इस प्रदर्शन को कुछ अन्य राज्यों में भी वहाँ के अधिक से अधिक कार्यकर्ताओं के साथ दोहराना चाहेंगे। हालाँकि वे जीतेंगे नहीं, पर सत्ता पक्ष में डर तो निर्माण कर ही सकते हैं। अपने नए थोड़े ऊँचे रूतबे का फायदा लेते हुए हार्दिक पटेल ने पूरे दंभ के साथ दो टूक तरीके से उपमुख्यमंत्री नितीन पटेल को 10 विधायकों के साथ भाजपा छोड़ने का प्रस्ताव दे डाला और उसके बदले उन्हें काँग्रेस में अच्छा पद देने का वादा भी कर दिया। मिलियन-डॉलर का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये त्रिमूर्ति कार्यकर्ता अपने गुरु के ख़िलाफ़ चले जाएँगे तब क्या होगा?

अरविंद केजरीवाल और उनके अपने में ही मगन रहने वाले जत्थे ने दिल्ली वासियों की ज़रूरतों और अभावों को महसूस किया और आंदोलन को नए स्तर तक ले गए। कुछ महीनों तक विरोधी दल के नेताओं ने लोक सभा में हार के दर्द को महसूस किया और तभी उन्होंने इस नए मसीहा को पाया जिन पर उन्हें विश्वास था कि वह उन्हें जीत तक ले जाएगा। केजरीवाल ने अपने दिल्ली के प्रयोग को ‘स्वर्ण मानक’ मान लिया जिसके दम पर वे पूरे देश में अपनी जीत हासिल करना चाहते थे। वे और उनके युवा दल को पंजाब के चुनावों में भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। गुजरात के उनके सभी प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। इन सारे आंदोलनों का नतीजा यह निकला कि दिल्ली में उनके पास जो भारी जन समर्थन था वह भी जाता रहा।

छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, राजस्थान और त्रिपुरा में वर्ष 2018 में चुनाव होने वाले हैं जिसके तुरंत बाद वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव है। मौजूदा और नए आंदोलनकर्ताओं का शोर आने वाले महीनों में कई डेसीबल तक ऊँचा उठ जाएगा। पूरे देश की लंबाई-चौड़ाई से एक दूसरों पर आरोपों की झड़ियाँ उछाली जाएँगी और अभागी जनता से कई वादे किए जाएँगे जिनमें असीम धन और अनगिनत सुविधाएँ देने के आश्वासन होंगे।

सभी दलों तथा व्यक्तियों से कहा जाएगा कि वे भाजपा और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक दल) को कोई भी मंच साझा न करने दे पर तब भी आंदोलनकारियों के पचमेली समूहों और राजनीतिक दलों के भारी विरोध के बावजूद ऐसा होगा। इसके अलावा झूठे झाँसे देकर वे भाजपा मतदाता आधार को दबाने की साँठ-गाँठ कर सकते हैं। बावज़ूद इसके क्या इस तरह की जोड़-तोड़ उन्हें पाँच साल के लिए बने रहने देगी जिसके लिए वे चुने गए होंगे? और तो और,क्या यह तीसरा या चौथा मोर्चा वास्तव में एक प्रतिबद्ध देश देने की काबिलियत रख पाएगा?

निश्चित ही, सभी आंदोलनकर्ताओं को अपनी सुविधा के लिए स्थापित राजनीतिक दलों के साथ भागीदारी देने के अपने ख़तरे भी हैं।

कृषि संबंधी सुधार, बुनियादी संरचना का विकास, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, महिला और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे देश के मूलभूत मुद्दे आखिर कब तमाम कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के प्राथमिक एजेंडे में शुमार होंगे? क्या इंदिरा गाँधी द्वारा साठ के उत्तरार्ध में गढ़े गये ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के नारे की घंटी कम से कम अब बजेगी? क्या मनुष्य की इन मूलभूत आवश्यकताओं के मुद्दे को उठाने की जरूरत है, क्योंकि बीते सत्तर सालों से इन्हें सत्ता के भूखे नेताओं द्वारा अपने सार्वजनिक कार्यालयों में विराजमान हो जाने के बाद भूला दिया जाता रहा है?

भारत को ऐसे कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो मुद्दे उठाए तथा जनजागृति लाएँ और जिनकी राजनीतिक शासकों पर तूती बोलती हो लेकिन हमें ऐसे कार्यकर्ताओं से चार हाथ दूर ही रहना चाहिए जो केवल अपने लिए काम करते हो। क्योंकि अंतत: इन कार्यकर्ताओं के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा मायने रखती है वह अपने स्वान्त: लाभ के लिए ताकत हासिल करना। उनका बड़बोलापन केवल उनके अपने लाभ तक ही सीमित होता है।

लोकतंत्र में, लोगों को अपने लिए ऐसे ही नेता मिलते हैं जिन्हें पाने के लिए वे योग्य होते हैं।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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Activism and Politics – Hand in Glove?

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The dictionary defines an activist as a person who vigorously advocates a cause. Therefore, a political activist should be one who advocates a political cause. By deduction, if the advocates becomes the beneficiary, this would normally be deemed as a major conflict of interest. Most of our political activists want to become the beneficiaries of their movements.

The recent violence in Pune that expanded rapidly in Maharashtra makes one wonder when activism grows into raw political ambition. Conversely, when does lack of or failing political opportunity turn into activism to gain relevance? Is this a vicious circle that we will continue to see repeatedly in the coming years?

For every opposition party, it is easy to criticise and take potshots at the ruling party. Rahul Gandhi seems to be getting his act together before the 2019 elections. Taking a strong position on some matters shows clarity of thought on his part but one wonders what his agenda is when everything done by the current Government needs to be criticised to an extreme?

GST, Demonetisation, Ujala (to provide efficient lighting by using LED bulbs), Saubhagya (to provide electricity to over 40 million homes) and Udan (to develop regional airports to provide connectivity to the semi urban and rural areas) are generally accepted as very progressive schemes. If successful, their impact will yield results that our political class has been promising for the past seven decades. Implementation of these schemes may be questioned but the intent cannot.

So why does a section of the political fraternity and press look for faults in each of these instead of joining hands with the Government to push for implementation.

Criticizing the ruling party in an attempt to win brownie points with the electorate is one thing and is practiced by every politician. However, if the quest for getting additional votes leads to creating a divide based on caste and communities resulting in violence and death of the common person, activism is taking the political battle to a new normal.

When the leading opposition party along with a rag tag group of “political activists” supported by an ignored group of journalists decide to divide the country, the trend is worrying because the damage being caused is for the long term and will be irretrievable and irreversible, no matter which party is in power. The politics of today is slipping back to the politics of the seventies and eighties where reservations, loan waivers, language, religion and vote bank politics was the norm.

The snowballing effect of each of the following examples can be horrific and frightening.

  1. Patidars and Jats: The demand for a reservation for the Patidars in Gujarat and Jats in Haryana, knowing fully well that there is no further scope for making reservations is a short-term retrograde step being demanded by some leaders and supported by the Congress. How will the current future Governments in these states be able to meet this demand? What will be the impact on those who lose the caste based reservation to accommodate new demands.
  2. Dalits: Jignesh Mevani, in a very Kejriwalesque manner of hyperbole, has openly incited the Dalits to take war to the streets to win power. This shows his raw hunger for power. In his own words, he accepts that he is 2% politician and 98% activist. How soon will this ratio reverse? Recognising the incendiary nature of the speech made by Jignesh Mevani and the impact it could have on the law and order situation, senior leaders like Mayawati and Rahul Gandhi chose to lend their voice of support with absolutely no concern for the damage that has been caused since then.
  3. Lingayats: Separating the Lingayats in Karnataka from the Hindu community is a brazen attempt at polarizing voters for a very small cause of wining the elections in Karnataka. What will be the impact of this segmentation of the hundreds of smaller communities in the state is of no concern.
  4. Others: It is a matter of time before activists from every state going to the polls will start to find some issue to serve as their platform for launching their own political careers.

Rahul Gandhi with his triumvirate of Hardik Patel, Alpesh Thakor and Jignesh Mevani fought a valiant battle in Gujarat and he may well be able to repeat his showing in some other states by calling in more activists in other states. Though they did not win, they certainly gave a scare to the ruling party. Taking liberty of his newfound elevated status, Hardik Patel, presumptuously and blatantly made an offer on behalf of the Congress to Nitin Patel, Deputy Chief Minister to leave the BJP with 10 MLA’s in return for a good position in the Congress. The million-dollar question is when will this triumvirate of activists turn against their mentor?

Arvind Kejriwal and his band of merry men realised the needs, or the lack thereof, of the citizens of Delhi and took activism to a new level. For a few months, the opposition leaders, hurting after their losses in the Lok Sabha elections found a new messiah who they believed would lead them to victory. Kejriwal viewed this experiment in Delhi as the gold standard for his future success all over the country. He and his young party failed miserably in the elections in Punjab. All his candidates in Gujarat lost their deposits. The result of all this activism was that they have lost the huge support they had in Delhi.

The states of Chhattisgarh, Karnataka, Madhya Pradesh, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Rajasthan and Tripura will go to the polls in 2018 to be followed by the Lok Sabha Elections in 2019. The noise level of the existing and new activists will increase by several decibels in the coming months. Allegations will be hurled across the length and breadth of the country and promises will be made assuring the hapless voter with limitless wealth and comforts.

There will be talk of all parties and individuals opposed to the BJP and the RSS to come together on a common platform and this may well happen despite the hugely opposing positions of this motley group of activists and political parties. Moreover, they may just manage to dent the BJP voter base by making false promises. However, will such alliances stay the course of the five years that they have been elected for? Moreover, will this third or fourth front actually be able to deliver the Promised Land?

Of course, there is the other threat of all activists getting together and shunning their convenient partnerships with the established political parties.

When will the nation’s core issues of agrarian reforms, infrastructure development, poverty alleviation, education, protection of women and healthcare for all become the primary agenda for every activist and politician? Does the slogan Roti, Kapda Aur Makan coined by Indira Gandhi in the late sixties ring a bell? Are these basic human needs to be raked up, as indeed they have been for the past seventy years, only to be forgotten once our power hungry leaders are comfortably ensconced in their public offices?

India needs activists to raise issues and awareness, in addition to keeping to political rulers on their toes but we must shun activists who are in it only for themselves. Ultimately, the only thing that matters to such activists is to grab power for their own selfish benefits. Their hyperbole is only a means to achieve their end.

In a democracy, people get the leaders they deserve.

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies and the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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Gujarat Elections and Beyond

171218 BJP, Congress logos

The year 2017 is coming to an end with the results of the last two elections in Gujarat and Himachal Pradesh. While the results in Himachal were never in doubt, I had predicted BJP’s win in Gujarat on 1st December 2017. My logic was that while the voter in Gujarat was angry with the BJP because of demonetization, GST and some arrogance after 22 years in power, the voter would decide not to exercise his franchise rather than vote against the BJP. This would be the voter’s way of lodging their protest. This was the reason we saw a dip of 2.91% in the voter turnout in 2017 (68.41%) as compared to 2012 (71.32%). Barring the state of Punjab, the Congress has lost every election in 2017.

The actual seat numbers have gone back and forth since counting started at 8 am and one stage it was actually felt that the Congress may be able to form the Government in Gujarat, resulting is a steep drop in the stock markets and celebrations at the Congress headquarters.

While the final tally will be known in due course, the overall results are now out and the BJP has got about 107 seats while the Congress has managed to get 75 seats, thus ensuring that the BJP will form the Government once again in Gujarat. While the Congress is claiming a victory in its defeat, the BJP should take comfort in the fact that they have managed anti-incumbency without its tallest leader Mr Modi directly leading the state as its Chief Minister. Further, despite the reduction in its seats, the vote share of the BJP has actually increased by 2 percent to 50 percent.

Shiv bhakt, Rahul Gandhi with his “trishul” of Hardik Patel, Alpesh Thakor and Jignesh Mevani fought a valiant battle. While individually they did make an impact on BJP’s vote share, they were from such disparate ideologies that no matter how hard they tried, the voter could not identify with them on a common platform. With no other Congress leader canvassing, the voter was left wondering if his fate was going to be thrust into the waiting hands of the “trishul” leaders.

Everyone is talking about how, under the leadership of Rahul Gandhi (without crediting the three “trishul” leaders), they have managed to increase their seat tally. This is being seen as a moral victory for Rahul Gandhi. No one is discussing the reasons why the Congress, sitting in power in Himachal Pradesh, has been decimated completely. From a policy of appeasement to reaching out to every Hindu God to making harsh personal remarks against the Prime Minister, the Congress tried it all, unsuccessfully, in these elections.

After this performance of the Congress, while knives would have been out for any other leader, the Congress spokespersons are busy crafting excuses to support the newly anointed 47 ½ year old “youth” leader. After all, as Mani Shankar Iyer candidly stated “Was there an election when Jahangir succeeded Shah Jahan? Was there any election when Aurangzeb became the emperor after Shah Jahan? It was known that the Badshah’s son would become the emperor”. Friendly television anchors have already started building the case for the “potential” of the youth emperor in the elections ahead. Rahul Gandhi, version 2.0 is now expected to take a much more aggressive stance and provide the much-needed leadership to his struggling party.

The results in 2017 clearly demonstrate that the Congress is working hard to achieve the Prime Minister’s “Congress Mukt Bharat” faster than he could ever have imagined or hoped for!

The states of Chhattisgarh, Karnataka, Madhya Pradesh, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Rajasthan and Tripura will go to the polls in 2018. While the BJP has already got into election mode in the north-eastern states, the Congress, once it stops the rejoicing on the appointment of their new leader and their victory in the loss of Gujarat, needs to quickly get its act together. Gloating about Gujarat elections and listening to the obsequious comments of some leaders will do more harm than good.

The noise on EVM tampering has reduced significantly because Congress has better results than they expected in Gujarat. The impact or lack of EVM tampering in Himachal Pradesh is not the cause for any discussion.  It is a matter of time before the shrill voices on collusion between the BJP and the Election Commission will start rising to crescendo once again as the Congress and other opposition parties start to sense their vulnerability in other elections. What needs to be noted is that the Election Commission is a constitutional body and questioning its intent should be taken as seriously as “contempt of court” with appropriate action on those making such allegations.

The system of our democracy is the “first one past the post wins the election” – while a huge victory is definitely better than a smaller victory, a win is a win.

Dr Rajendra Prasad, the first President of India, once famously recalled “shortly before his death Mahatma Gandhi had told us that after attainment of Swaraj, the Congress, whose objective was to attain it, should convert itself into an organisation of a non-political nature whose function would be like that of a Seva Samiti, working on non-party lines for the service of all.”

The Congress, under the leadership of its new president, needs to do some serious “chintan” and soul searching on who its voter constituency is and where it wishes to be in the next fifty years.

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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies and the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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गुजरात चुनाव 2017 – कौन होगा विजेता?

171201 Map of Gujarat

गुजरात में शीघ्र ही वर्ष 2017 के चुनाव होने वाले हैं। मतदान के पहले दौर के लिए आठ दिन से भी कम समय है और चुनाव प्रचार का बिगुल थमने में सप्ताह भर से भी कम समय है।

यदि वर्ष 2012 को देखें तो भाजपा ने 182 में से 116 सीटें जीती थीं जबकि काँग्रेस ने 60 सीटों पर कब्जा किया था। प्रदेश में रिकॉर्ड तोड 71.32 % मतदान हुआ था। भाजपा को मिलने वाले मतों की हिस्सेदारी 47.9 % थी जबकि काँग्रेस के हिस्से केवल 38.9 % मत थे। भाजपा और काँग्रेस के बीच मतदाताओं के हिस्से का अंतर वर्ष 2007 में 9.49 % से घटकर वर्ष 2012 में 9 % रह गया था इसकी प्राथमिक वजह काँग्रेस के पुराने जुझारू कार्यकर्ता केशुभाई पटेल द्वारा नए दल का निर्माण था जिससे मतदाताओं का 3.6% हिस्सा उनके पास चला गया था।

जीडीपी विकास दर के संदर्भ में गुजरात ने लगातार कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है। राज्य का बुनियादी ढाँचा पूरे देश में सबसे अच्छा है। गुजरात के 18,066 गाँवों में से 17,856 गाँवों की 98.84 % जनता के पास पक्की सड़क है। आँकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि हमारे देश के अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात में कानून और व्यवस्था की स्थिति अधिक बेहतर है। शिक्षा और स्वास्थ्य-सुरक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश की आवश्यकता हो सकती है, बावज़ूद यह तो मानना होगा कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ के हालात काफी अच्छे हैं। आपको भारत में अहमदाबाद और सूरत के अलावा और कहाँ रोशनी से जगमगाते ऐसे प्रशस्त नदी पाट दिखाई देते हैं?

दोनों प्रमुख दल, चाहे भाजपा हो या काँग्रेस, मतदाओं का ध्यान खींचने के लिए अलग से कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनके राजनीतिक कार्यकर्ताओं और प्रेस ने “पंच वार्षिकी” तर्ज पर पहले से ही यह काम कर रखा है। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री ने नेतृत्व संभाल लिया है। ज़ाहिरन वे अपने गृह राज्य से जीत सुनिश्चित करना चाहेंगे।

राहुल गाँधी अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को फेंकने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, कई बार इसके लिए वे बेतुके सवाल तक पूछ बैठते हैं, इस तरह के सवाल पूछना गुजरात के मतदाओं के औसत ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है। उन्होंने वादा किया है कि वे सत्ता में आने के दस दिनों के भीतर ही सारे ऋण माफ़ कर देंगे (मैं हैरान हूँ कि चुनाव आयोग इसे मतदाओं को पैसे का लालच देने के रूप में क्यों नहीं देख पा रहा)

काँग्रेस के नव अध्यक्ष ने कोई भी ‘पत्थर’ ऐसा नहीं छोड़ा है, जिसके आगे सिर न झुकाया हो और वे हर हिंदू भगवान् से आशीर्वाद माँग रहे हैं। पिछले कुछ महीनों या कि कुछ सालों या किसी भी राज्य के चुनाव से पहले तक उन्होंने इतने मंदिरों के दर्शन नहीं किए होंगे जितने इन दिनों वे गुजरात के मंदिरों में जा रहे हैं। आखिर हो भी क्यों न, गुजरात चुनावों के ठीक पहले काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष होने का ताज जो उन्हें मिला है!

एक ओर जहाँ भाजपा प्रश्न पूछ रही है कि राहुल गाँधी के कर्मचारियों ने सोमनाथ मंदिर में उनका नाम गैर-हिंदूओं के रजिस्टर में क्यों लिखा, वहीं कपिल सिब्बल और भी ‘हास्यास्पद’ बात कर रहे हैं, जब श्री सिब्बल प्रधानमंत्री को ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत करते हैं जो हिंदू नहीं है!! दूसरी ओर, काँग्रेस के प्रवक्ता पुरानी तस्वीरों को दिखाकर एक-दूसरे पर ही हल्ला बोल कर यह सिद्ध कर रहे हैं कि उनके नेता ब्राह्मण और तो और शैव हैं!

इसी के साथ पाटीदारों के लिए आरक्षण लाने (इसे भले ही अनुमति न मिली हो) वाला हार्दिक पटेल है, जो यह अच्छी तरह से जानता है कि आरक्षण चाहने वाले स्वार्थी मतदाता बहुत कम है पर मीडिया में अपने दोस्तों की वजह से इसी बात का बहुत शोर करता है। अंतत: ‘आप-आम आदमी पार्टी’ भी एक तरफ बैठी है यह सोचकर की वह चुनाव के खेल को बिगाड़ सकती है जबकि उनके नेता खुद जानते हैं कि वे एक सीट जीतने तक की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

जैसे कि हर चुनाव के समय होता है छोटे पर्दे पर इस तरह बहस चल रही है जैसे हारने वाले के लिए मौत की घंटा हो, जबकि एक बार परिणाम आ जाने के बाद वे भी भूल जाएँगे कि उन्होंने क्या कहा था।

इन सबके बीच निश्चित ही मतदाता भी है जो जानता है कि मतपत्र के माध्यम से वह अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है। बिल्कुल, मतदाता, जो विमुद्रीकरण (नोट बंदी) से आहत हुआ है लेकिन जो प्रधानमंत्री द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण कदम की आवश्यकता को पहचानता है और उनका समर्थन भी करता है। बिल्कुल,वही मतदाता जिसने जीएसटी लागू होने के दर्द को झेला है पर देश में इस एकल कर के दीर्घकालिक लाभों को भी वह जानता है। और बिल्कुल, साथ ही प्रदेश में विरोधी लहर का भी असर है।

तो गुजरात के मतदाताओं की क्या प्रतिक्रिया होगी?

क्या वे भाजपा के लिए मतदान करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति भरोसा जताएँगे जैसे वे सालों से करते आए हैं? या वे काँग्रेस को मत देंगे और उम्मीद करेंगे कि पूरी तरह से नावाकिफ़ राहुल गाँधी जादू की कोई छड़ी घूमाकर गुजरात राज्य के लिए ऐसा कुछ कर दें जिसे वे अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी के लिए कर पाने में असमर्थ रहे? या वे मतदान करने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए “नोटा- उपरोक्त में से कोई नहीं” के लिए मत डालेंगे? हार्दिक पटेल, आम आदमी पार्टी और अन्य दलों के प्रभाव को भी नाकारा नहीं जा सकता लेकिन उनमें से किसी का भी बहुत ज़्यादा प्रभाव भाजपा पर नहीं पड़ेगा।

मेरा मानना है कि गुजरात के मतदाता भले ही समर्थन देते हो पर विमुद्रीकरण और जीएसटी से परेशान हैं और भाजपा को परेशानी में डाले बिना वह अपनी नाराज़गी प्रकट करना चाहेंगे। जीएसटी दाखिले से जिस तरह सारे व्यवसाय सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने आ रहे है इस विचार से हो सकता है मतदाता नाख़ुश हो। तब भी वे पहचानता हैं कि भारत और गुजरात के लिए एक स्थायी उम्मीद भाजपा और मोदी है। निश्चित ही काँग्रेस और राहुल गाँधी नहीं।

भाजपा से नाराज़ मतदाता हो सकता है अपना विरोध प्रकट करने के लिए मतदान के लिए न जाएँ। मतदाताओं का यह तरीका हो सकता है भाजपा को दंडित करने और अपना क्रोध दर्शाने का। इस वजह से इन चुनावों में हमें मतदान में गिरावट दिखाई देगी। भाजपा और काँग्रेस के बीच का फासला शायद और कम नज़र आए, अगरचे यह 2022 को ध्यान में रख बहसों और लेखों का विषय भी हो सकता है।

यद्यपि भाजपा की झोली में आने वाले मतों की संख्या कम हो सकती है, पर भाजपा को मिलने वाली सीटों में वृद्धि होगी। हमारे लोकतंत्र की प्रणाली यही है कि “सबसे अधिक मत पाने वाला प्रत्याशी ही चुनाव में विजयी होता है” और इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा होगी।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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