मोदी सरकार के 4 साल, 7.7% विकास, उप-चुनावों में हार

180603 Marcus Aurelius

राजनीति में यह कड़े विरोधाभासों से भरा दिलचस्प सप्ताह रहा।

सभी उदार अर्थशास्त्री और विपक्षी नेताओं के लिए हैरत की बात है जो विमुद्रीकरण और जीएसटी के कार्यान्वयन को घोर प्रलय करार दे रहे थे, जबकि अर्थव्यवस्था ने 7.7% के प्रभावशाली विकास आँकड़ों के साथ वापसी की। यह विकास दर केवल इसकी अग्र-दूत की तरह है कि आने वाले वर्षों में हमें आर्थिक विकास से क्या अपेक्षा है।

यह वह सप्ताह भी था जब मोदी सरकार ने घटनाओं से भरे और सफल 4 वर्षों को पूरा किया था। भले ही ‘कुछ भी नहीं हो रहा’, ऐसा कहने वालों और ‘प्रलय आ गया’ की भविष्यवाणी करने वालों की नज़र में भारत में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ और राहुल गाँधी ने बिना एक भी बार यह सोचे कि अपने पक्ष के नेता के रूप में उन्होंने कैसा प्रदर्शन किया हर बात पर ‘असफल’ का निशान लगा दिया।

आखिरकार, बहुप्रतीक्षित उप-चुनाव जो आम चुनावों में होने वाली संभावनाओं के संकेत माने जाते हैं, उनसे वे रास्ते निकलकर नहीं आएँ जिनकी सत्तारूढ़ दल ने उम्मीद की थी। भाजपा को हराने के प्राथमिक उद्देश्य से विरोधी पक्षों का पंचमेल समूह चुनाव मंच पर एक साथ आकर जीत हासिल करने में सफल रहा और उम्मीद है इससे शक्तिशाली भाजपा को शांति से बैठकर मनन करने में मदद मिलेगी।

चुनावों से एक दिन पहले ईंधन की कीमतों में  आई एक पैसे की कमी को सभी मीडिया चैनलों द्वारा गलत तरीके से दिखाया गया। हम सभी जानते हैं कि मतदान से एक रात पहले 20% से अधिक मतदाताओं को आह्वान होता है और इस 1 पैसे की कमी को लेकर हास्यास्पद वाग्मिता का परिचय देते हुए सबसे प्रतिबद्ध भाजपा मतदाता के दिल-दिमाग और शायद बटुओं पर घर बैठे मानो हमला किया जाता है। हैरानी तो इस बात को लेकर होती है कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने ऐसा होने की अनुमति ही क्यों दी? क्या किसी ने भाजपा के विरोध में कोई छाप छोड़ने के लिए ऐसा किया था? यदि हाँ, तो वह सफल हुआ।

जबकि सकारात्मक बात तो यह है कि, व्यवसाय अच्छी तरह से चल रहे हैं, ग्रामीण आय में वृद्धि हुई है, कारखानों में अधिक उत्पादन हो रहा है, भ्रष्टाचार कम हुआ है, अच्छे मानसून के संकेत मिल रहे हैं, नौकरियों का सृजन हो रहा है, जीएसटी की सफलता के साथ और भी बहुत कुछ देखा जा सकता है। भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड बनाया है और देश का कद ऊँचा उठा है और विश्व नेता के रूप में वह खड़ा है।

मोदी सरकार की उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है और आने वाले वर्षों में लिखा जाता रहेगा, मुझे, जो सभी के लिए पहले से देखने, पढ़ने और अनुभव करने के लिए खुले तौर पर मौजूद है, उसे पुन: व्यवस्थित करना है। ये बिना

तो भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं को इन घटनाओं से कौन-से सबक लेने की जरूरत हैं?

  1. भाजपा की बहुत प्रभावी संचार मशीन अब क्लांत हो रही है और प्रवक्ताओं ने 4 साल पहले जिन आख्यानों को शुरू किया था, वे अब विश्वासप्रद नहीं रहे हैं, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि उनके संदेशों में बदलाव नहीं हुआ है। इसे बदलना ही होगा और ताजा संदेशों के साथ ताजा चेहरों को आगे लाना होगा। मंत्रियों को छोटे पर्दे की बहसों में वापस शामिल होने की ज़रूरत है, उनके निर्विकार रहने से काम नहीं चलेगा।

ईंधन की कीमतों, किसानों के सड़कों पर दूध और सब्जियाँ फेंकने, कश्मीर के मुद्दों आदि जैसे संवेदनशील विषयों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने के बजाय, भाजपा प्रवक्ता बस इन कार्यों को तर्कसंगत बनाने और औचित्य सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे वे खुद ही विपक्षी नेताओं को अनावश्यक हंगामा खड़ा करने के लिए गोला-बारूद का जखीरा दे रहे हैं।

प्रतिक्रियाएँ तत्काल और सक्रिय होना चाहिए। न कि समाचार पत्रों द्वारा किसी बात को उठाए जाने और उस पर बहुत शोर हो जाने के बाद।

  1. साफ़ है कि प्रधान मंत्री बनने के आकांक्षी कम से कम पाँच उम्मीदवारों के नेतृत्व में विरोधी दल आधे सच और झूठ के आधार पर टिकी कहानियों में फेर-फार करते हुए लगातार और काफी निष्ठुरता से हमले बोल रहे हैं। भाजपा प्रवक्ताओं के अनजानेपन को पकड़ा गया है। उन्हें “उस समय भी यही हुआ” की बात करते रहने के बजाय सक्रिय प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है।

यूपीए के मठाधीश पूर्व मंत्रियों ने इस बात को प्रमाणित किया कि ईंधन की कीमतों में 25 रुपये प्रति लीटर की कमी की संभावना है, लेकिन वे इस पर अजीब तरीके से चुप रहते हैं कि जब वे सत्ता में थे उन्होंने इस शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं किया?

  1. भगवान राम के समय मौजूद सभी प्रौद्योगिकियों को लेकर कुछ भाजपा मंत्रियों की तीखी और कर्कश आवाज मतदाताओं के एक बहुत बड़े वर्ग को अपने पक्ष में नहीं कर पा रही है। ये लोग चुपचाप अपना मुँह बंद क्यों नहीं रख सकते हैं या प्रेस के लोगों के सामने अपनी संवाद करने की बुद्धि का प्रदर्शन करने की आवश्यकता का उपयोग करना बंद क्यों नहीं कर देते, जो स्पष्ट रूप से उपलब्धियों से दूर करने के लिए “मसाला” कथानक ढूँढने की बाइट्स की तलाश में हैं?

अगर हिंदुत्व को मंच बनाना है, जो मुझे तो नहीं लगता है, तो दल को हर किसी के लिए कुछ करने की कोशिश करने के बजाय स्पष्ट रूप से सामने आने और ऐसा कहने की जरूरत है।

  1. भ्रष्टाचार एक और बड़ा मुद्दा है जिस पर मतदाता ने निर्णायक और निवारक कार्रवाई देखने की उम्मीद की थी। सत्ता में आने के 4 साल बाद विपक्षी दल बड़ी सफलता से अपने पापों को भाजपा के मत्थे मढ़ रहे हैं। गैर-निष्पादित संपत्ति – एनपीए। यूपीए के वर्षों में नीरव मोदी, माल्या और भी बहुत सारे लोग हुए लेकिन भाजपा अपनी स्थिति समझा रही है।

भाजपा को त्वरित कार्रवाई शुरू करने की जरूरत है जो दिखाई दे और साथ ही साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि विपक्षी नेताओं के पास राजनीतिक प्रतिशोध को लेकर शोर मचाने के कोई आसार न रहे। मलेशिया में, प्रधान मंत्री महातिर मोहम्मद ने पदभार संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर अपने पूर्वजों को देश छोड़ने से रोक दिया।

  1. किसान परेशान हैं और दलितों को लगने लगा है कि उन्हें अनदेखा किया जा रहा है। हालाँकि भाजपा ने किसानों और दलितों के लिए अन्य सरकारों की तुलना में काफी कुछ किया है, भाजपा से होने वाले संवाद को बदलना होगा और इन निर्वाचन क्षेत्रों तक स्पष्ट और संक्षेप संदेश पहुँचाना चाहिए।

कोई मतदाता इन विरोधी पक्षों को शायद ही स्वीकार कर सकता है, जैसे पश्चिम बंगाल में टीएमसी और सीपीआईएम, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा, तमिलनाडु में एआईडीएमके और डीएमके, दिल्ली में आप और काँग्रेस, कर्नाटक में जेडीएस और काँग्रेस किसी भी मंच पर कभी भी एक साथ आ सकते हैं। फिर उत्तर प्रदेश में आरएलडी जैसे अल्पसंख्यक पक्ष हैं जो पूर्ण लाभ ले रहे हैं। इन पक्षों के हमेशा अलग-अलग मंच होते हैं और वे हमेशा एक दूसरे का विरोध करते रहते हैं।

मुझे नहीं लगता कि कोई भी नेकनीयत और सही सोच का मतदाता आज महागठबंधन से एक नेता पेश करने की उम्मीद कर सकता है। कोई भी अकेला व्यक्ति अन्य राजनीतिक दलों को स्वीकार्य नहीं होगा और इसे वे जानते हैं। क्या वे किसी आम मंच पर लड़ेंगे? उनके चुनाव घोषणापत्र कैसे होंगे? अर्थव्यवस्था या शासन या वित्तीय मामलों के साथ कुछ भी करने पर वे कैसे सहमत हो सकते हैं जबकि वे किसी भी चीज़ पर सहमत नहीं होते हैं? यदि वे किसी तरह बहुमत के साथ अगले वर्ष किसी तरह परिमार्जन करने का प्रबंधन कर लेते हैं, तो अराजकता या विघटनकारी स्थितियाँ चरम पर होंगी।

लेकिन “भाजपा विरोधी” पार्टियों का राष्ट्रव्यापी गठबंधन तब एक विश्वसनीय विकल्प बन जाता है जब एकल सबसे बड़ी सत्तारूढ़ पार्टी से जो अपेक्षा की जाती है, उस पर ध्यान नहीं देती। स्वच्छता के प्रति मानसिकता बदलने के लिए कड़ी मशक्कत की ज़रूरत है और भ्रष्टाचार मुक्त समाज की ओर बढ़ने के लिए लगातार काम करने की ज़रूरत है यदि यह हमारे डीएनए में बैठ गया है। हम विवादित नेताओं के भ्रष्ट समूह की ओर वापस पीछे नहीं जा सकते हैं।

अगले चुनावों के लिए उलटी गिनती शुरू हो गई है। विपक्षी दलों ने भी साथ मिलकर सोशल मीडिया पर अपना काम शुरू कर दिया है और भाजपा के सोशल मीडिया गुरुओं की तुलना में तेजी से हमला कर रहे हैं और प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

 वे ऐसा कर रहे हैं जैसे अगर उनकी निष्क्रियता के कारण भाजपा इन चुनावों में हारी तो यह उनके लिए शर्म की बात होगी। देश को स्थिरता की ज़रूरत है और प्रधान मंत्री मोदी के पास बहुत महत्वपूर्ण और ठोस संरचनात्मक परिवर्तन करने का साहस है, जो आने वाले सालों में बहुत समृद्ध लाभांश का भुगतान करेगा।

श्री मोदी कम से कम एक और कार्यकाल प्राप्त करने के हकदार हैं क्योंकि अब तक सुधारों के माध्यम से बहुत कम परिवर्तन देखा गया है, ताकि अगले दो दशकों तक भारत को अपरिवर्तनीय रूप से उच्च विकास के मार्ग पर रखा जा सके। केवल निरंतर सुधार ही भारत के लोगों के जीवन मानकों के विकास में मदद कर सकते हैं। अगर मोदी को सत्ता में वापस नहीं भेजा जाता है, तो भारत हार जाएगा।

जो लोग सिंगापुर गए हैं, वे हमेशा कहते हैं कि भारत को ली कुआन यू की जरूरत है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी में, हमें वह मजबूत, ईमानदार और मेहनती नेता मिला है जो कठिन निर्णय लेने से नहीं हिचकता और जिसने दुनिया में भारत को उसका सही स्थान दिलवाया है।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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