सक्रियतावाद और राजनीति- घनिष्ठ संबंध?

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किसी कार्यकर्ता को शब्दकोश में उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो किसी ख़ास उद्देश्य की वकालत पूरे दम-ख़म से करता है। इस लिहाज़ से, राजनीतिक कार्यकर्ता वह व्यक्ति होना चाहिए जो राजनीतिक उद्देश्य की पैरवी करे। नतीजन, यदि वकालत करने वाला ही लाभ पाने वाला हो जाए, तो आम तौर पर इसमें स्वार्थ का बड़ा संघर्ष माना जाएगा। हमारे अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता अपने आंदोलनों से लाभ पाना चाहते हैं।

बीते दिनों पुणे में भड़की हिंसा, जिसने पूरे महाराष्ट्र में रौद्र रूप ले लिया, में हैरतअंगेज बात दिखी कि जहाँ सक्रियतावाद अनगढ़ राजनीतिक महत्वाकांक्षा के रूप में विकसित हो रहा था। जबकि इसके ठीक विपरीत, राजनीतिक अवसरों की कमी या गिरावट कैसे प्रासंगिकता हासिल करने के लिए सक्रियतावाद में परिणीत हो जाती है? क्या यह ऐसा दुष्चक्र है, जिसे आने वाले वर्षों में हमें लगातार बार-बार देखना पड़ सकता है?

किसी भी विपक्षी दल के लिए बहुत आसान होता है कि वह सत्तारूढ़ दल की आलोचना करे और उसे आड़े हाथों ले। वर्ष 2019 के चुनावों से पहले ही लगता है राहुल गाँधी को ये दोनों काम एक साथ मिल गए हैं। कुछ मामलों में दृढ़ता से अपनी बात रखना उनके विचारों की स्पष्टता को दिखाता है लेकिन आश्चर्य होता है कि वर्तमान सरकार द्वारा किए गए हर काम की चरम आलोचना करने की ज़रूरत का उनका एजेंडा क्या है?

जीएसटी, विमुद्रीकरण, उजाला (एलईडी बल्ब प्रयोग से पर्याप्त रोशनी प्रदान करना), सौभाग्य (40 मिलियन घरों को बिजली प्रदान करना) और उड़ान (अर्ध शहरी और ग्रामीण इलाकों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए क्षेत्रीय हवाई अड्डों का विकास) आदि काफी प्रगतिशील योजनाएँ होने से आम तौर पर सर्व सामान्य द्वारा स्वीकृत हैं। यदि ये योजनाएँ सफल हो जाती हैं तो प्रभावशाली परिणाम आ सकते हैं जिसके वादे पिछले सात दशकों से हमारे राजनीतिक वर्ग के लोग करते आ रहे हैं। इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठ सकते हैं लेकिन लागू करने के इरादे पर नहीं।

तो राजनीतिक बिरादरी का एक तबका और अख़बार इन सारी योजनाओं में कोई न कोई ख़ामी क्यों निकालते रहते हैं, बजाए इसके कि सरकार के हाथ से हाथ मिलाकर उन्हें क्रियान्वित करवाने में एड़ी-चो़टी का ज़ोर लगा दें।

सत्तारूढ़ दल की आलोचना कर मतदाताओं के मन में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश करना एक ऐसा तरीका है, जिसे हर राजनेता अपनाता है। तथापि, जब अतिरिक्त वोट पाने के लिए जाति और समुदाय के नाम पर बँटवारा किया जाएँ और जिसका हश्र हिंसा तथा किसी आम इंसान की मौत में हो जाएँ तो यह सक्रियतावादियों की राजनीतिक लड़ाई का नया आम पैंतरा बन रहा है।

एक प्रमुख विपक्षी दल उपेक्षित पत्रकारों के समर्थन से गुंडागर्दी करने वाले ‘राजनैतिक कार्यकर्ताओं’ के साथ मिलकर जब देश का बँटवारा करना तय कर लेता है तो यह प्रवृत्ति ख़ासी चिंताजनक है, ऐसे में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन-सा दल सत्ता में है, उससे होने वाला नुकसान लंबे समय तक झेलना पड़ सकता है क्योंकि वह असाध्य और अपरिवर्तनीय होता है। आज की राजनीति सत्तर और अस्सी के दशक में चली गई है, जब आरक्षण, कर्ज़ माफ़ी, भाषा, धर्म और वोट बैंक की राजनीति आदर्श हुआ करती थी।

निम्नलिखित उदाहरणों के विकराल प्रभाव बड़े भयानक और डरावने हो सकते हैं।

  1. पाटीदार और जाट: गुजरात में पाटीदारों के लिए और हरियाणा में जाटों के लिए आरक्षण की माँग का सच सभी जानते हैं कि इस तरह के आरक्षण देने का कोई ख़ास लाभ नहीं होगा बल्कि यह पतन की ओर ले जाने वाला अल्पकालिक कदम है जिसकी माँग कांग्रेस की शह पर कुछ छुटभइये नेता कर रहे हैं। इन राज्यों की मौजूदा भावी सरकार इन माँगों को किस तरह पूरा कर पाएगी? नई माँगों को पूरा करते हुए, जो लोग आरक्षण के दायरे में नहीं आएँगे उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
  2. दलित: जिग्नेश मेवानी ने केजरीवाल तरीके से बड़बोलापन करते हुए ख़ुलेआम दलितों को सत्ता हासिल करने के लिए सड़कों पर लड़-भिड़ने के लिए उकसाया। यह उसकी सत्ता हासिल करने की अपरिपक्व भूख़ को दर्शाता है। उसी के शब्दों में वह स्वीकार करता है कि वह 2% राजनेता है जबकि 98% कार्यकर्ता है। कितनी जल्दी यह अनुपात बदल जाएगा, कह नहीं सकते? जिग्नेश मेवानी की भड़काऊ भाषण देने की प्रवृत्ति और उस वजह से कानून और व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए बिना कुछ सोचे-समझे कि इस वजह से देश-समाज की कितनी बड़ी क्षति हो सकती है मायावती और राहुल गाँधी जैसे वरिष्ठ नेता उसकी आवाज़ को बल दे रहे हैं।
  3. लिंगायतः  कर्नाटक में चुनाव जीतने के छोटे-से कारण के लिए मतदाताओं के ध्रुवीकरण के इरादे से कर्नाटक में लिंगायतों को हिंदू समुदाय से अलग करने की बेरहम कोशिश की जा रही है। राज्य में इस तरह हज़ारों छोटे-छोटे समुदाय बन जाने से क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है।
  4. अन्य: मतदान के लिए जाने से पहले प्रत्येक राज्य के कार्यकर्ता समय रहते अपने लिए कुछ ऐसे मुद्दे खोज ही लेंगे जो उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत के लिए मज़बूत मंच बन सकेंगे।

राहुल गाँधी अपनी त्रयी हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी के साथ गुजरात में धमाकेदार लड़ाई लड़ चुके हैं और हो सकता है वे अपने इस प्रदर्शन को कुछ अन्य राज्यों में भी वहाँ के अधिक से अधिक कार्यकर्ताओं के साथ दोहराना चाहेंगे। हालाँकि वे जीतेंगे नहीं, पर सत्ता पक्ष में डर तो निर्माण कर ही सकते हैं। अपने नए थोड़े ऊँचे रूतबे का फायदा लेते हुए हार्दिक पटेल ने पूरे दंभ के साथ दो टूक तरीके से उपमुख्यमंत्री नितीन पटेल को 10 विधायकों के साथ भाजपा छोड़ने का प्रस्ताव दे डाला और उसके बदले उन्हें काँग्रेस में अच्छा पद देने का वादा भी कर दिया। मिलियन-डॉलर का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये त्रिमूर्ति कार्यकर्ता अपने गुरु के ख़िलाफ़ चले जाएँगे तब क्या होगा?

अरविंद केजरीवाल और उनके अपने में ही मगन रहने वाले जत्थे ने दिल्ली वासियों की ज़रूरतों और अभावों को महसूस किया और आंदोलन को नए स्तर तक ले गए। कुछ महीनों तक विरोधी दल के नेताओं ने लोक सभा में हार के दर्द को महसूस किया और तभी उन्होंने इस नए मसीहा को पाया जिन पर उन्हें विश्वास था कि वह उन्हें जीत तक ले जाएगा। केजरीवाल ने अपने दिल्ली के प्रयोग को ‘स्वर्ण मानक’ मान लिया जिसके दम पर वे पूरे देश में अपनी जीत हासिल करना चाहते थे। वे और उनके युवा दल को पंजाब के चुनावों में भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। गुजरात के उनके सभी प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। इन सारे आंदोलनों का नतीजा यह निकला कि दिल्ली में उनके पास जो भारी जन समर्थन था वह भी जाता रहा।

छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, राजस्थान और त्रिपुरा में वर्ष 2018 में चुनाव होने वाले हैं जिसके तुरंत बाद वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव है। मौजूदा और नए आंदोलनकर्ताओं का शोर आने वाले महीनों में कई डेसीबल तक ऊँचा उठ जाएगा। पूरे देश की लंबाई-चौड़ाई से एक दूसरों पर आरोपों की झड़ियाँ उछाली जाएँगी और अभागी जनता से कई वादे किए जाएँगे जिनमें असीम धन और अनगिनत सुविधाएँ देने के आश्वासन होंगे।

सभी दलों तथा व्यक्तियों से कहा जाएगा कि वे भाजपा और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक दल) को कोई भी मंच साझा न करने दे पर तब भी आंदोलनकारियों के पचमेली समूहों और राजनीतिक दलों के भारी विरोध के बावजूद ऐसा होगा। इसके अलावा झूठे झाँसे देकर वे भाजपा मतदाता आधार को दबाने की साँठ-गाँठ कर सकते हैं। बावज़ूद इसके क्या इस तरह की जोड़-तोड़ उन्हें पाँच साल के लिए बने रहने देगी जिसके लिए वे चुने गए होंगे? और तो और,क्या यह तीसरा या चौथा मोर्चा वास्तव में एक प्रतिबद्ध देश देने की काबिलियत रख पाएगा?

निश्चित ही, सभी आंदोलनकर्ताओं को अपनी सुविधा के लिए स्थापित राजनीतिक दलों के साथ भागीदारी देने के अपने ख़तरे भी हैं।

कृषि संबंधी सुधार, बुनियादी संरचना का विकास, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, महिला और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे देश के मूलभूत मुद्दे आखिर कब तमाम कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के प्राथमिक एजेंडे में शुमार होंगे? क्या इंदिरा गाँधी द्वारा साठ के उत्तरार्ध में गढ़े गये ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के नारे की घंटी कम से कम अब बजेगी? क्या मनुष्य की इन मूलभूत आवश्यकताओं के मुद्दे को उठाने की जरूरत है, क्योंकि बीते सत्तर सालों से इन्हें सत्ता के भूखे नेताओं द्वारा अपने सार्वजनिक कार्यालयों में विराजमान हो जाने के बाद भूला दिया जाता रहा है?

भारत को ऐसे कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो मुद्दे उठाए तथा जनजागृति लाएँ और जिनकी राजनीतिक शासकों पर तूती बोलती हो लेकिन हमें ऐसे कार्यकर्ताओं से चार हाथ दूर ही रहना चाहिए जो केवल अपने लिए काम करते हो। क्योंकि अंतत: इन कार्यकर्ताओं के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा मायने रखती है वह अपने स्वान्त: लाभ के लिए ताकत हासिल करना। उनका बड़बोलापन केवल उनके अपने लाभ तक ही सीमित होता है।

लोकतंत्र में, लोगों को अपने लिए ऐसे ही नेता मिलते हैं जिन्हें पाने के लिए वे योग्य होते हैं।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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