भारतीय सेना – सड़क के गुंडे या संरक्षक और शहीद

170613 Indian Army

सेना के प्रमुख, भारतीय सेना के मुखिया, जो प्रमुख कमांडर (सेनापति) के रूप में भारत के राष्ट्रपति को वृत्तांत कहते हैं, का हमारी सीमाओं पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना का प्रबंधन चुनौतियों का सामना करते हुए करना बहुत कठिन काम है। उनका कार्य तब दोगुना मुश्किल हो जाता है जब दुर्भावनापूर्ण और अशिक्षित नेता और झंडाबदार करियर वाले पत्रकार मीडिया कवरेज प्राप्त करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ उन पर और उनके संस्थान पर अपर्याप्त और गलत डेटा के साथ,निशाना साधने के लिए तैयार बैठे होते हैं।

पिछले सात दशकों में भारतीय सेना में कुछ भी नहीं बदला है। उन्होंने भारत सरकार की सेवा की है, भले ही कोई भी राजनीतिक दल हो। उन्होंने हमारी सीमाओं की रक्षा की, विद्रोह का शमन किया और जब राज्य सरकारों ने बुलाया दंगों को दबाने के लिए राज्यों का समर्थन किया है।

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा संदीप दीक्षित, सेना प्रमुख को “सड़क का गुंडा”  कहता है और फिर माफी माँगता है। वह जानता है कि वह आरोप लगा सकता है और फिर बहुत तेज़ी से पीछे हट सकता है, यह कहकर कि उसकी बात को गलत तरीके से उद्धृत किया गया था या जब मामला बहुत गर्म हो जाए तो ‘विनम्रता से माफी माँगता हूँ’, ऐसा कहकर और विषय को बदल सकता है। उसके बोलने से जो क्षति हुई, उससे उसका कोई लेना-देना नहीं है। संदीप दीक्षित किसलिए जाना जाता है सिवाए इसके कि वह एक महत्वहीन दो अवधि का संसद सदस्य और अमीर घर में पैदा होने वाला है, जो अपने परिवार के नाम और शक्ति का उपयोग अपने निजी लाभ के लिए करता है? क्या वह उन “सड़क के गुंडों” में से एक नहीं है जो कांग्रेस के भीड़ भरे राजनीतिक परिदृश्य में प्रासंगिकता खोजने की कोशिश कर रहा है?

सीपीआई (एम) प्रकाश करात, अपने संघर्षरत राजनीतिक पेशे में संकर्षण हासिल करने के लिए कहते हैं, “शक्ति के उपयोग की एकमात्र निर्भरता के माध्यम से सेना प्रमुख मोदी सरकार के विचारों को प्रतिबिंबित कर रहे हैं और कश्मीर के उन लोगों को दबाने की कोशिश करते हैं, जो अपने राजनीतिक विरोध को आवाज दे रहे हैं” जब सीमा पार से घुसपैठ हो तो सेनाध्यक्ष के प्रमुख को किसे ख़ुलासा देना चाहिए?  प्रकाश करात के मर रहे और अप्रासंगिक दल को या मृत कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी को?

फिर वहाँ अज्ञात और तुच्छ इतिहासकार पार्थ चटर्जी हैं, जो पश्चिम बंगाल में अपने स्वामी से लाभ प्राप्त करने के लिए भारतीय सेना प्रमुख की तुलना जलियाँवाला बाग नरसंहार के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश सेना में अस्थायी ब्रिगेडियर जनरल एडवर्ड हैरी डायर, से करने के लिए धृष्टता करते हैं। उनके लिए, महिमा के कुछ सेकंड अधिक महत्वपूर्ण हैं न कि भारतीय सेना प्रमुख।

कांग्रेस नेता संजय निरुपम, जो महाराष्ट्र में नगण्य व्यक्ति बन गए हैं, सर्जिकल हड़ताल का सबूत चाहते हैं। दिल्ली पर शासन करने में असफल रहे अरविंद केजरीवाल और जिनके राज्य में गंभीर चुनौतियाँ हैं, वे ममता बनर्जी, अपनी आलोचनाओं से ध्यान हटाने के एक अवसर के रूप में इस तरह की आलोचना को देखते हैं। ये नेता चाहते क्या हैं? क्या वे हाथ में वीडियो कैमरा लेकर इन हमलों को फिल्माने के लिए सैनिकों के आगे (या भले ही पीछे )चलना चाहते हैं?

वरिष्ठ पत्रकार जिनका स्पष्ट वामपंथी उदारवादी झुकाव है और वे अपने सुरक्षित स्टूडियो की कुर्सी पर बैठ मठाधीश बन अपने विश्लेषण पर विश्वास करते हैं कि भारतीय सेना को क्या करना चाहिए। और इनमें से कुछ पत्रकार वास्तव में अपना गुस्सा व्यक्त करते हैं कि ऑपरेशन से पहले उन्हें क्यों नहीं बताया गया था। क्यों दुनिया की किसी भी सेना को कहीं भी पत्रकारों को हर बात पहले बतानी चाहिए?

भारतीय सेना से ये सवाल क्या विपक्षी राजनेता और असंतुष्ट पत्रकार कुछ  व्यक्तियों को उकसाकर अपने संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे के चलते भारतीय सेना को बलि का बकरा बना पूछ रहे हैं? भारत सरकार के निर्देशों के तहत काम करने वाली भारतीय सेना को ऐसे लोगों को कोई साक्ष्य या सबूत देने की क्या ज़रूरत है?  क्या इन लोगों को हमारे देश के सबसे ईमानदार और पारदर्शी संस्थानों में से एक को लेकर स्वतंत्रता लेने की अनुमति है? दस लाख से अधिक अधिकारियों और जवानों और हर साल भारतीय सेना में शामिल होने वाले हजारों युवाओं को क्या संदेश दिया जा रहा है?

ये राजनीतिक पंडित जानते हैं कि उच्च अनुशासित भारतीय सेना एक नरम लक्ष्य है, जिन पर इस तरह निशाने साधने पर सेना कोई प्रतिउत्तर नहीं देगी। इन तथाकथित पंडितों की हर आलोचना सीमा पार के चैनलों द्वारा उठा ली जाती है और भारत सरकार की आलोचना की जाती है। इससे कुछ अल्पकालिक राजनीतिक बिंदुओं को छोड़कर कुछ साध्य नहीं होता है। सेना प्रमुख की हर आलोचना पूरी सेना को हतोत्साहित करती है और आलोचकों को अपने मुँह से कुछ भी उगलने से पहले इसे समझने की आवश्यकता है।

कश्मीर ज्ज्वलनशील मुद्दा है जिस पर सभी राजनीतिक दलों और भारतीय सेना को साथ मिलकर ध्यान देना चाहिए। अगर मेजर लेटुल गोगोई अपनी जीप के बोनट पर एक ज्ञात आतंकवादी को बाँधते हैं और लोगों को अपनी कमान में बिना किसी की जान जोखिम में डाले सुरक्षित बाहर निकालते हैं, न तो खुद की ओर से कोई नुकसान होने देते है, न पत्थरबाजी से, तो उन्हें समर्थन और सराहना की जरूरत है और आलोचना की नहीं। यदि इस कार्रवाई में कोई संदेह है, तो केवल सेना अदालत उनसे सवाल पूछ सकती है। वे केवल इसलिए मीडिया द्वारा मुकदमे का विषय नहीं हो सकते कि कुछ चैनलों की टीआरपी गिर रही है।

ज़िम्मेदार पत्रकारों (उनमें से कई हैं), वे नहीं जो अपने धक्के खाते करियर और चैनल के लिए मदद चाहते हैं, को चाहिए कि वे इन टिप्पणियों को अनदेखा करना शुरू कर दें और इन आलोचकों नेताओं पर विश्वास न करें। इस तरह की टिप्पणियों को जितना कम महत्व मिलेगा उतने ही कम प्रासंगिक ये लोग बन जाएँगे।

भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर, भारत के राष्ट्रपति को सेना प्रमुख के बचाव में इन सभी गैरकानूनी टिप्पणियों को हमेशा के लिये दबाने के लिए दृढ़ता से सामने आने की जरूरत है। उन्हें इस तरह उकसाए गए लोगों को दूसरे सभी अनुमान लगाने से रोकना होगा, जिन्हें वे चला रहे हैं। अगर यह बोलने की स्वतंत्रता है, तो इसमें तुरंत कटौती करनी होगी। हमारे पश्चिम में पाकिस्तान जैसा एक दुष्कर पड़ोसी और हमारे पूर्व में चीन जैसा एक अशांत पड़ोसी है, हम चाहते हैं कि हमारी सेना अत्यधिक प्रेरित और तैयार हो। हतोत्साहित और लोग उनके कार्यों के बारे में जाने कब और क्या कहेंगे, इस बारे में अनिश्चित नहीं।

एक उच्च अलंकृत सैनिक, कीर्ति चक्र और एवीएसएम प्राप्त स्वर्गीय ब्रिगेड एम एल गर्ग, जिन्होंने सन् 1962, सन् 1965 और सन् 1971 का युद्ध लड़ा था, के बेटे के रूप में, मुझे सेना के खिलाफ इन राजनेताओं और पत्रकारों के एक तरफा संवाद को देखने से पीड़ा  होती है। मैं ईमानदारी से आशा करता हूँ कि बहुत से “सेना के बच्चे” इस अतुल्य संस्था के मजबूत समर्थन में आगे आएँगे, जिसके लिए उनके पिता ने काम किया था।

भारतीय सेना हमेशा अराजनैतिक रही है और दुनिया भर में इतनी सारी सेनाओं के विपरीत बैरकों में रहती है जिन्होंने राजनीतिक भूमिका तलाशने के लिए बैरकों से बाहर आने का फैसला किया था। सेना के परिवारों की आम नागरिकों के दैनिक अस्तित्व की चुनौतियों से दूर अपनी अलग दुनिया है, जहाँ वे अपने जैसे अन्य लोगों के साथ रहते हैं।

भारतीय सेना हमारी संरक्षक है, जो हमारी सीमाओं पर खड़ी है, तब हम शांति से सोते हैं। हमें उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष और ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हियर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हियर- माई जर्नी फ़्रॉम अ मैनेजर टु ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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