चिकनगुनिया, डेंगू – क्या हम तैयार हैं?

 

170514 Aedes Mosquito

चिकनगुनिया मच्छर से उत्पन्न एक उभरती हुई बीमारी है जो अल्फावायरस, चिकनगुनिया विषाणु के कारण होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से एडीज इजिप्ती और ए अल्बोपिक्टस मच्छरों द्वारा प्रेरित है, इसी प्रजाति के मच्छरों से डेंगू का संचरण होता है।

हमने देखा है कि चिकनगुनिया के परिणामस्वरूप तेज़ बुखार आता है, जिसमें बेहद कमज़ोरी लाने वाला दर्द होता है, खासकर जोड़ों में। गंभीर मामलों में चकत्ते भी देखे जा सकते हैं। कमजोरी, चक्कर आना, निरंतर होने वाली उल्टी की वजह से निर्जलीकरण, मुँह का स्वाद बहुत खराब हो जाना और खून निकलना इसके खतरनाक लक्षण होते हैं।

मानसून आने को है। सरकारें नालियों की सफाई के बारे में बात कर रही हैं, मानो यह साल में एक बार की जाने वाली प्रक्रिया है। मुख्यमंत्रियों और स्वास्थ्य मंत्रियों ने “तैयारियों का भंडार” रखने के लिए बैठकें बुलाना शुरू कर दी है। बारिश के दिनों के आते ही, आम लोगों को ठहरे पानी में मच्छरों के प्रजनन की समस्या के बारे में “शिक्षित” करने के लिए संदेश प्रकाशित किए जाने लगेंगे।

तथापि क्या हम वास्तव में ऐसे वायरल संक्रमण के आक्रमण के लिए तैयार हैं? हम हर साल दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों पर बिना सोचे प्रतिक्रिया क्यों दे देते हैं? हम, आम लोग, सरकार को जवाबदेह क्यों नहीं ठहराते और उनके खोखले वादे कि ‘अगले साल फ़िर ऐसा नहीं होगा’ के सामने हार क्यों मान लेते हैं?

सन् 2016 में, राजनेताओं ने नौकरशाहों को दोषी ठहराया, जिन्होंने नगर निगमों को दोषी ठहराया, जिन्होंने बदले में राजनेताओं को। कुछ स्वास्थ्य मंत्रियों ने फरमाया कि चिकनगुनिया से मौत नहीं होती और आम जनता द्वारा सामना की जाने वाली स्वास्थ्य की चुनौतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया, जबकि मरीज़ अपने प्रियजनों के गुज़र जाने का दुःख झेलते रहे। टीवी एन्कर्स ने गला फाड़ कर चिल्लाते हुए जवाबदेही ठहराई और समाचार पत्रों ने इन कहानियों को अपनी सुर्खियाँ बनाया, पर धीरे-धीरे वे अंदर के पन्नों में चली गईं। क्या हमने सच में पिछले साल कोई सबक सीखा है?

मानसून आता रहेगा और लौट जाएगा, सैलाब कम होता जाएगा और एक दिन सूख जाएगा, और अस्पताल बहाने बनाते रहेंगे और फिर रोगियों के कम होने की रपट देंगे। समाचार चैनल कुछ हफ्तों तक टीआरपी का लाभ उठाएँगे और धीरे-धीरे ये ख़बरें पुरानी हो जाएँगी और अगले वर्ष तक के लिए फिर से गायब हो जाएँगी। हर कोई फिर राहत की साँस लेगा और हमारे देश में जैसा कि हर महामारी या आपातकाल के बाद हमेशा होता है, उस साल की समस्या का “प्रबंध” कर लिया जाता है और जैसे कि लोगों की याददाश्त बहुत कम होती है, सो इस साल की चुनौतियां जल्द ही भुला दी जाती है।

क्या हमने सन् 2016 से सीखा है या दोषारोपण का यह सामूहिक खेल सन् 2017 में भी इसी तरह जारी रहेगा?

स्वास्थ्य की डरा देने वाली बातों पर बिना सोचे प्रतिक्रियाएँ दे देना हमारे लिए अपवाद के बजाय आदर्श हैं। हम जानते हैं कि इस समस्या की हर साल पुनरावृत्ति होती है और जब तक हम इस रोग का उन्मूलन करने में सक्षम नहीं हो जाते है, तब तक सालों-साल यह जारी रहेगी। तो ऐसा क्यों है कि हम पहले ही योजना नहीं बना पाते और इन मच्छरों से उत्पन्न बीमारी के प्रभाव की गंभीरता को कम नहीं कर पाते? हमारी सरकारें क्यों ऐसा कोई कर्मी दल नहीं बनाती, जो केवल आने वाले वर्ष की योजना पर ध्यान केंद्रित करें?

पहचानकर क्षेत्रों का नक्शा उतारना– उम्मीद है, पिछले वर्षों के अनुभव के बाद, हमारे शहरों के अधिकारियों ने उन सभी क्षेत्रों का नक्शा उतारा होगा, जिसे उन्होंने जल संग्रहण के प्रवण के रूप में पहचाना है। उचित नियोजन के साथ, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मानसून की शुरुआत से पहले ऐसे सभी क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए कदम उठाए गए हैं।

महामारी संबंधी सबूत– चालू वर्ष के अभिलेखों के आधार पर हमारे स्वास्थ्य शोधकर्ता इस वायरस से जुड़े तनाव के बारे में जानते होंगे जो इसे संभालने की चिकित्सकीय आवश्यकता को पहचानते होंगे। अब कुछ चकित कर देने वाला नहीं होना चाहिए।

प्रकोप की त्वरित रपट करना आवश्यक है– इसका मतलब होगा कि जिन क्षेत्रों में समस्या देखी गई, वहाँ के हालात का जायजा लेने के लिए कक्ष/ निगरानी और मूल्यांकन केंद्र स्थापित करने होंगे। जिनका पूरे उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी के साथ स्पष्ट रूप से दस्तावेजीकरण कर उसका संचारण करने की आवश्यकता है।

प्रयोगशालाएँ– सन् 2016 में नमूनों का परीक्षण एक बड़ी बाधा बन गया था। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रयोगशालाएँ ज्ञात हो और नागरिकों तक उसकी जानकारी पहुँचे। और निश्चित रूप से, हमें आवश्यक जाँचों के लिए शुल्क सूची की ज़रूरत है और उसकी अग्रिम घोषणा करनी होगी।

प्रतिक्रिया– प्रयोगशालाओं से हर घंटे डेटा एकत्रित करने की आवश्यकता है और अध्ययन सुधार के लिए विश्लेषण करना होगा। कुछ रोगियों के लिए देरी घातक साबित हो सकती है। पहले से तैयार समूहों से डेटा और अध्ययन सुधार को तेजी से करने में मदद मिलेगी।

अनुदान आशा है कि महामारी से निपटने की तमाम कार्रवाई के लिए अनुदान पहले से ही अलग रखा गया है, जिसे अब लेना होगा। आखिरी मिनट में धन नहीं देने के लिए केंद्र को दोष दे देने समस्या से छूटकारा पाने का जवाब नहीं हो सकता।

अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम और डॉक्टरों को पहचानकर उन्हें सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। संपर्क दूरभाष क्रमांक और परीक्षण तथा उपचार के लिए पूर्व निर्धारित कीमतों की जानकारी को व्यापक रूप से विज्ञापित किया जाना चाहिए।

नागरिकों की शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना चाहिए न कि तब तक राह देखनी चाहिए जब तक समस्या सिर न उठा लें। इन क्षेत्रों में शिक्षित करने की आवश्यकता है-

  1. किस बात पर गौर करें और बीमारी की रपट कहाँ करें
  2. घरों को मच्छर मुक्त करना
  3. सुरक्षित एयरोसोल के साथ सभी कमरों में स्प्रे करना
  4. मच्छरदानी का उपयोग करना
  5. पानी के बर्तनों को ढाँक कर रखना
  6. पानी के टैंक, पालतू जानवर के कटोरे और गमलों के नीचे रखी प्लेटों को सूखा रखना
  7. पानी को जमे न रहने देना और इस तरह के अन्य निवारक कदम उठाना।

एक बार स्पष्ट रूप से प्रलेखित योजना पर सहमती बन गई,तो इसे सक्रिय रूप से प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान और तेज़ हो जाएगा।

अंत में, बड़े पैमाने पर कोई स्वास्थ्य कार्यक्रम तब तक काम नहीं कर सकता जब तक कि स्पष्ट उत्तरदायित्व स्थापित न हो। किसी राजनेता, नौकरशाह या स्वास्थ्य कर्मचारी को अपने हाथ खड़े कर देने या कंधे झटकने की अनुमति नहीं मिल सकती है,जब तक कि कोई मजबूर आम आदमी उपचार के लिए इंतजार कर रहा है।

आरोप-प्रत्यारोप के खेल को तुरंत रोकना होगा। यह सोच रखकर कहना अच्छा है कि भविष्य में  ऐसा कोई प्रकोप नहीं होगा पर यह अभी तो केवल सपना है। प्रकोप से निपटने के लिए योजना बनाना और इसका प्रसार करना अधिक यथार्थवादी है।

यदि श्रीलंका, मलेरिया के सबसे बुरे शिकारों में से एक, मलेरिया मुक्त हो सकता है, जैसा कि सितंबर 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित किया गया है, तो क्या यह आशा करना बहुत कठिन है कि भारत भी स्वच्छता के स्तर तक पहुंच सकता है, जहाँ मलेरिया और अन्य मच्छरों की वजह से होने वाली अन्य बीमारियां हमारे नागरिकों को प्रताड़ित नहीं करेंगी?

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं और बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट (Reboot) रीइंवेन्ट (Reinvent) रीवाईर (Rewire) : 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन (Managing Retirement in the 21st Century) ; द कॉर्नर ऑफ़िस (The Corner Office) ; एन आई फ़ार एन आई (An Eye for an Eye) ; द बक स्टॉप्स हीयर- लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर (The Buck Stops Here – Learnings of a #Startup Entrepreneur) और द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, (The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur) के लेखक हैं।

  • ट्विटर : @gargashutosh                                      
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